Wednesday, November 9, 2011

कज़रारे कज़रारे तेरे कारे कारे नैना ---

क्या कभी आपका किसी सरकारी बाबू से पाला पड़ा है ? यदि नहीं तो आप बड़े भाग्यशाली हैं
प्रस्तुत है एक मुलाकात , एक सरकारी बाबू से वैसे तो यह यह एक हास्य व्यंग लेख होता , लेकिन आदत से मज़बूर होकर तुकबंदी कर पेश कर रहा हूँ , एक कविता के रूप में


)

एक व्यक्ति आर टी आई का फार्म लेने ऑफिस पहुंचा
गेट पर खड़े सिक्युरिटी गार्ड से उसने पूछा

भैया यहाँ आर टी आई का फार्म कहाँ मिलेगा ?
गार्ड बोला , यह तो आर टी आई के ऑफिस में ही पता चलेगा

सा' आप जैसा जो भी यहाँ कुछ मांगने आता है
वह सामने वाली बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर जाता है

बंदा साढ़े बारह बजे पहुंचा तो सारा ऑफिस खाली पाता है
थक हार कर वह एक कुर्सी खींच कर बैठ जाता है

आँख खुली तो देखा , घडी ढाई बजे का समय दिखा रही थी
और सामने वाली कुर्सी से गुनगुनाने की आवाज़ रही थी

कज़रारे कज़रारे तेरे कारे कारे नैना ---

) वार्तालाप :


सर ये आर टी आई का फार्म क्या आपके पास मिलेगा ?
बाबु बोला भैया , यह तो लंच के बाद ही पता चलेगा


सर प्लीज लंच के टाइमिंग्स तो बतला दो
दिखता नहीं क्या , सामने लिखा है --एक से दो


पर मैं तो यहाँ साढ़े बारह बजे ही गया था
अरे भैया उस वक्त मैं लंच करने चला गया था


अब आप सोचेंगे , कि लंच की ऐसी क्या जल्दी है
भई सुबह से शाम तक खटते हैं , भूख तो लगती है



पर सर देखिये इस वक्त तो ढाई बजे पड़े हैं
ठीक है मुझे काम करने दें , क्यों सर पर खड़े हैं ?



एक मिनट का चैन नहीं , घर में बीबी की कमांड
दफ्तर में आओ तो यहाँ पब्लिक की डिमांड



सर अगर आप इज़ाज़त दें तो मैं कुछ बोलूं ?
अगर आपको एतराज़ हो तो मैं ये फ़ाइल खोलूं ?



सर मैं तो बस ये जानना चाहता हूँ --
देखिये मैं आपको ये कहना चाहता हूँ



कि यदि चाहने से ही सब कुछ हो जाता
तो मैं भी इस वक्त रेस्तरां में खाना खा रहा होता



आप सीधे सीधे बोलिए , आपको क्या काम है
मैं एक सवाल का ज़वाब दे सकता हूँ , मुझे और भी काम हैं


ये आर टी आई का फार्म क्या आपके पास मिलेगा ?
नहीं अब तू चलता है या यहीं खड़ा रहेगा


तो फिर कहाँ मिलेगा , यह तो बतलाइए
देखिये मैंने एक सवाल का ज़वाब दे दिया , अब आप जाइये


अरे ऐसे कैसे जाइये , आप दो घंटे में एक सवाल का ज़वाब नहीं दे सकते
मैं आप की शिकायत करूँगा , अब आप इस सीट पर नहीं रह सकते

अरे भाई साहब आप तो बुरा मान गए, बैठिये पहले कुछ ठंडा हो जाये
अरे छोटू उठ ज़रा , सा' के लिए लाना एक गरमा गर्म चाय


अबे उठ , कुछ काम धाम भी करता है ,
जब देखो साला खर्राटे ही भरता है


हाँ तो बताइए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?
बस एक आर टी आई का फार्म पाने की तमन्ना रखता हूँ


अच्छा आर टी आई का फार्म कल मिले तो चलेगा ?
क्योंकि ये सिर्फ मिस्टर कपूर के पास ही मिलेगा


और मिस्टर कपूर अभी लंच पर गए हैं
पर सर इस वक्त तो साढ़े तीन बज गए हैं


अरे भाई मिसेज बजाज के साथ गए हैं , रेस्तरां
अब खाने में थोडा वक्त तो लगेगा ही ना


कज़रारे कज़रारे तेरे कारे कारे नैना ---


अच्छा कब तक जायेंगे , यह तो बता सकते हैं ?
भई क्या भरोसा , आने में दो दिन भी लगा सकते हैं


वैसे आपको क्या काम है कपूर से , यह तो बतलाइए
बताया तो था , मुझे एक आर टी आई का फार्म चाहिए


आपने पहले बतलाया होता तो मैं कुछ कुछ कर देता प्रबंध
पर अब तो साढ़े चार बज रहे हैं और ऑफिस होने वाला है बंध


आप बस थोडा सा कष्ट और उठाइये
ऐसा करिए , आप कल जाइये


मैं कुछ कुछ इंतजाम अवश्य कर दूंगा
आपके लिए एक फार्म ढूंढकर रख लूँगा


ठीक है , ऑफिस कितने बजे खुलता है ?
आप कभी भी जाएँ , सब चलता है


मैं साढ़े दस बजे जाऊं तो चलेगा ?
अरे नहीं उस वक्त सफाई वाला आपको परेशां करगा


तो ग्यारह बजे ?


जाइये पर इंतजार करना पड़ सकता है खूब सारा
दरअसल मेरी ट्रेन पहुँचने का टाइम ही है साढ़े ग्यारा


ठीक है , मैं फिर बारह बजे जाता हूँ
नहीं भाई , काम से पहले मैं पूजा पाठ करता हूँ


आप बिलकुल मत घबराइये ,
ऐसा करिए, साढ़े बारह बजे जाइये


एक दिन लंच देर से करने में मेरा क्या जाता है,
आखिर आदमी ही तो आदमी के काम आता है


अब चलें , टाइम वेस्ट करने में भला क्या रखा है
वैसे भी सरकार ने ओवर टाइम देना बंद कर रखा है


मुझे भी काम पर जाना है , खडूस लाला बिना बात के डांट देगा
ग़र पांच मिनट भी लेट हो गया, तो साला आधी पगार काट देगा

नोट: यदि आपको भी कभी कोई ऐसा अनुभव हुआ हो तो उसे सुनाइएगा ज़रूर
यह घटना भले ही काल्पनिक है लेकिन सच्चाई के बेहद करीब है



10 comments:

  1. लम्बी ज़रूर है . लेकिन एक कहानी की तरह पढेंगे तो आनंद आएगा .

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  2. hahaha...bahut achchi rachna bahut rochak.sahi kaha sachchaai ke bahut kareeb har pffice me yese log mil jaayenge.

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  3. एक पुरानी कहानी के अनुसार, एक राज्य में एक सरकारी आदमी था जो मशहूर था ऊपर की कमाई के लिए...
    वो जहां भी काम करता था पैसा खाता था... राजा इमानदार था उस तक भी शिकायत पहुँच गयी तो उसने उसे हुक्म दिया कि समुद्र के तट पर जाए और जहां उसका काम केवल लहरें गिनना ही होगा... और वो दिन का हिसाब भेज दे गृह मंत्री को...

    कुछ समय शान्ति पूर्वक बीत गया... किन्तु फिर गुप्तचरों से राजा को समाचार मिला कि वो फिर भी पैसा खाने लगा था!
    राजा ने जब उनसे पूछा तो पता चला कि वहां से जितनी भी नावें गुजरती थी, उन के नाविकों को वो बुला उस के स्वयं राजा द्वारा दिए गए - लहरों को बिगाड़ - लहरें गिनने के काम में बाधा डालने ले लिए कैद में भेजने का भय दिखा पैसे ले छोड़ देता था!
    इमानदार राजा ने परेशान हो अंततोगत्वा उसको मृत्यु दंड का हुक्म कर दिया! (डिक्टेटर तो ऐसा कर सकता है किन्तु गणतंत्र में भाग्यवश यह संभव नहीं है :)

    कहानी से शिक्षा मिलती है कि मानव प्रकृति पानी के समान है - वो ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है, और "लातों के भूत बातों से नहीं मानते", अर्थात जैसे शक्तिशाली राजा समान सूर्य की अग्नि ही सागर जल को आकाश तक उठाने में सक्षम है, और वैसे ही जल-चक्र समान काल-चक्र भी अनंत है, जिसमें शैतान आत्माएं आ-जा रही हैं, जन्म-कर्म-मृत्यु और फिर से जन्म-कर्म-मृत्यू, अनंत चक्र, विभिन्न भेष बदल बदल के... :)

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  4. वातावरण प्रधान दिग्विजय रचना .

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  5. डॉक्टर साहिब, सब चक्कर 'कुर्सी' का है! कुर्सी में बैठते ही अच्छे से अच्छे आदमी का भी माथा घूम जाता है (किन्तु विपरीत प्रभाव, यदि वो कुर्सी दन्त-चिकित्सक के क्लिनिक की हो :)

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  6. बहुत सुन्दर, शानदार, रोचक और ज़बरदस्त रचना लिखा है आपने! उम्दा प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.com/

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  7. सुन्दर प्रतीकों से सजी प्रभावशाली प्रस्तुति

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  8. हैरान हूँ कि इस पोस्ट पार ज्यादा पाठक क्यों नहीं आए !
    क्या --
    शीर्षक पसंद नहीं आया ?
    पोस्ट ज्यादा लम्बी हो गई ?
    सरकारी बाबुओं की बुराई पसंद नहीं आई ?

    हमारीवानी ने भी इसे स्वीकार नहीं किया और नहीं दिखाया । कहीं यही कारण तो नहीं ?

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  9. फिर भी इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि अधिकांश सरकारी बाबुओं में काम करने की भावना न के बराबर होती है । ज्यादतर दफ्तर खली पड़े रहते हैं । बाबु लोग गप्पें मरते रहते हैं । छोटे से भी काम को करने में महीनों लगा देते हैं ।

    काश कि यह सिस्टम बदल सकता ।

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