Thursday, January 28, 2010

क्या अब भी आप कह सकते हैं की ६० वर्षों में कोई विकास नहीं हुआ।

गणतंत्र दिवस की साठवीं वर्षगाँठ और देखिये आज ही हमारी कामवाली एक सप्ताह के अर्जित अवकाश पर चली गई। भई उसका कहना है की जब सरकारी नौकर काम करें या ना करें, उनको हर ६ महीने में सरकार १५ दिन का अर्जित अवकाश देती है। तो घर का सारा काम , यानि झाड़ू पोंछा , सफाई करना और बाहर के भी छोटे मोटे काम करके उनको भी तो कम से कम एक सप्ताह की छुट्टी चाहिए।
( मानव अधिकार )

यहाँ तक तो बात ठीक है। लेकिन ज़रा सोचिये , काम वाली छुट्टी पर चली जाये , तो घरवाली यानि श्रीमती जी पर क्या गुजरेगी। अरे भई, कुछ नहीं गुजरेगी। क्योंकि जो गुजरेगी वो तो श्रीमान जी, यानि घरवाले पर गुजरेगी। जहाँ पहले आधा काम जिम्मे होता था , अब पूरा का पूरा मियां के सर।
भला ६० साल पहले कोई सोच सकता था ऐसी बात
( विमेन लिबरेशन )

वैसे भी जब से श्रीमती जी को यह बात पता चली है की इस मुए कंप्यूटर के इंटरनेट पर घर बैठे ही सारी जानकारी प्राप्त हो जाती है, तबसे उन्होंने लायब्रेरी छोड़ नेट पर ही सारे आर्टिकल्स रिव्यू करने शुरू कर दिए हैं। यानि जहाँ कंप्यूटर पर पहले हमारा एकछत्र राज था, अब श्रीमती जी एक तरह से सौत बनकर बैठ जाती है। और हम टिपियाने के लिए गिगियाने लगे रहते हैं
( नारी सशक्तिकरण )

खैर हम बात कर रहे थे काम वाली की। तो भई, गई तो है एक सप्ताह की छुट्टी , पर हमें पता है दो सप्ताह से पहले नहीं आने वाली। और जब ये शंका मैडम ने उससे ज़ाहिर की तो बोली --मैडम आप मेरा मोबाइल नंबर ले लो ।
श्रीमती जी ने कहा --बोलो।
बोली --- अरे बीबी जी, हम काय तोहार जैसन पढ़े लिखें थोड़े ही हैं। हम का याद नहीं रह जात। तम इ करो इ हमार विजिटिंग कार्ड रख लियो।
अब ये देख कर हम तो सकते में आ गए । भई हमने आजतक अपना विजिटिंग कार्ड नहीं बनवाया । और यहाँ काम वाली !
कौन कहता है , देश में विकास नहीं हुआ

वैसे भी एक ज़माना था जब फिल्म मोंसून वेडिंग में एक टेंट वाले के हाथ में मोबाइल देखकर सबको हंसी आई थी। आज मोबाइल दूध वाला , सब्जी वाला , अखबार वाला , यहाँ तक की काम वाली के भी हाथ में दिखाई देता है। हाथ में ही क्यों , कान में भी लगा हुआ
भैया ये विकास नहीं तो और क्या है

पिछली बार जब वो गयी थी तो एक नेक सलाह भी दे गई थी कामवाली। की कभी देर हो तो एक मिस काल दे दिया करो। लेकिन जब भी श्रीमती जी फोन मिलाती , फ़ौरन एक रिंग पर ही फोन उठाती और कहती ---बीबी जी थोड़ा बुद्धि का इस्तेमाल कर लिया होता । अच्छा होता यदि एक मिस काल कर दिया होता। दो पैसे की बचत हो जाती।

अब अपना तो सारा पढ़ा लिखा ही बेकार हो गया लगता है, क्योंकि आज तक ये पता नहीं चला की ये ससुर का नाती , मिस काल कैसे किया जाता है

अब अगर विकास का कुछ और प्रमाण चाहिए तो इस चित्र को देखिये :

क्या अब भी आप कह सकते हैं की ६० वर्षों में कोई विकास नहीं हुआ

Sunday, January 24, 2010

दिल दा मामला है----- कुछ ते करो जतन----- ,

दिल दा मामला है , दिल दा मामला है
कुछ ते करो जतन ,
तौबा खुदा दे वास्ते, कुछ ते करो जतन ----
दिल दा मामला है ,
दिल ---दा ------है।

युवा दिलों की धड़कन , गुरदास मान द्वारा गाया ये रोमांटिक गाना हम बरसों से सुनते रहे हैं

लेकिन आज हम दिल के उस चैंबर की बात नहीं कर रहे, जिसमे रोमांस रहता है। बल्कि उस चैंबर की बात करेंगे जिससे सांस चलती रहती है, जिंदगी चलती रहती है।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं लेफ्ट वेंट्रिकल की, दिल का वो चैंबर जो सारे शरीर को रक्त प्रवाह द्वारा शक्ति प्रदान करता है। लेकिन ज़रा सोचिये यदि शक्ति दाता ही शक्ति विहीन हो जाये तो क्या होगा।

तो हार्ट अटैक होगा यानि हृदयाघात

वही हार्ट अटैक जिसके बारे में कुछ दिन पहले डॉ अरविन्द मिश्रा ने लिखा था ---

वेटिंग लिस्ट वाले बैठे हैं ,तत्काल सेवा वाले चले जा रहे ....


आइये देखते हैं , हार्ट अटैक होता क्यों है ---

पूरे शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले को भी ऊर्जा की ज़रुरत होती है। और हार्ट को यह ऊर्जा मिलती है रक्त प्रवाह से , जो मिलता है दो धमनियों द्वारा जिन्हें कहते हैं ---कोरोनरी आर्टरीज

लेफ्ट कोरोनरी आर्टरी जो हृदय के सामने और बाएं हिस्से यानि लेफ्ट वेंट्रिकल को रक्त सप्लाई करती है और राईट कोरोनरी जो दायें वेंट्रिकल को।

अब यदि इन आर्टरीज में कहीं रुकावट आ जाये तो हृदय के उस हिस्से में रक्त संचार बंद हो जाता है और हृदय की मांस पेशियाँ दम तोड़ देती हैं यानि वो हिस्सा बेकार हो जाता है। इसी को हार्ट अटैक कहते हैं।

हार्ट अटैक का मुख्य कारण लेफ्ट कोरोनरी आर्टरी में रुकावट होना है, जिससे लेफ्ट वेंट्रिकल का एक हिस्सा काम करना बंद कर देता है

क्यों होती है रुकावट :

हमारे रक्त में मौजूद वसा जो कोलेस्ट्रोल के रूप में होता है , धीरे धीरे हृदय की धमनियों में जमता रहता है। यूँ तो कोलेस्ट्रोल शरीर की कई गति विधियों के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी अत्यधिक मात्रा हानिकारक होती है।
कोलेस्ट्रोल का धमनियों में जमना --पलौक कहलाता है।

जब यह पलौक धमनी को इतना बंध कर देता है की मसल्स की ओक्सिजन डिमांड पूरी नहीं हो पाती तो मसल्स चीखना शुरू कर देती हैं यानि छाती में दर्द शुरू हो जाता है , जिसे एंजाइना कहते हैं।

अक्सर एंजाइना तब होता है जब हम कोई भारी काम करते हैं जैसे ---सीढियाँ चढ़ना, दौड़ना, साइकल चलाना आदि।
यदि धमनी में ७० % रुकावट हो तो भारी काम करने पर दर्द होता है। लेकिन ९० % रुकावट होने पर बिना भारी काम के दर्द होने होने लगता है। ऐसी स्थिति में एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी ज़रूरी हो जाती है।

हार्ट अटैक के लक्षण :

सीने में दर्द, बायीं तरफ ,विशेषकर भारी काम करने पर। यह दर्द बाएं कंधे, बाजू या ज़बड़े में भी हो सकता है।
साथ में पसीना आना
घबराहट और बेचैनी
दिल में धड़कन महसूस होना

ये सभी लक्षण हैं एंजाइना के। ऐसे में यदि धमनी में रुकावट १००% हो जाये तो हार्ट अटैक हो जाता है

ऐसा कब हो सकता है :

अत्यधिक ठण्ड, तनाव, डर , अत्यधिक ख़ुशी या ग़म , इस तरह के हालातों में धमनी में अचानक स्पाज्म हो सकता है जिसकी वज़ह से पूर्ण रुकावट हो जाती है।
इसके अलावा पलौक का टूटना, या कहीं से ब्लड क्लौट आकर वहां फंसने से भी अटैक हो सकता है।

आइये देखते हैं की इस आकस्मिक विपदा से कैसे बचा जाये ---ज़रा इस चित्र को देखिये :


यह फ्लो डायग्राम साभार प्रस्तुत किया है, प्रोफ़ेसर श्रीधर द्विवेदी जी ने , विभागाध्यक्ष --चिकित्सा विभाग एवम अध्यक्ष प्रिवेंटिव कार्डियोलोजी क्लिनिक, जी टी बी हॉस्पिटल, दिल्ली।

घ्यान रखिये की :

हार्ट अटैक आजकल २० से ३० साल की उम्र के युवकों को भी होने लगा है
एथिरोस्क्लेरोसिस ( धमनियों में कोलेस्ट्रोल का जमना ) बचपन से ही शुरू हो जाता हैइसलिए बच्चों को भी जंक फूड्स से बचना चाहिए
महिलाएं भी इससे प्रभावित हो सकती हैं
अक्रिय जीवन शैली आदमी की दुश्मन और सक्रियता लाभकारी साबित होती है
सात्विक जीवन दीर्घकालीन सुखमय जीवन की कुंजी है

खुदा दे वास्ते सही, अपने वास्ते और अपनों के वास्ते, भाई ज़रा दिल का ध्यान रखिये

यह लेख आपको कैसा लगा , बताइयेगा ज़रूर।

Sunday, January 17, 2010

आइये निवेदन करें गूगल वासियों से , की भई, कम से कम भारत में तो इसे बंद मत करिए।

चिकित्सा है पेशा, समाज सेवा जिम्मेदारी

फोटोग्राफी का शौक, हंसना हँसाना है जिंदगी हमारी।

नए साल में हमने यही सोचा था की अब सारी पोस्ट इन्ही चार विषयों पर लिखा करेंगे। पहली तीन पोस्ट लिखने के बाद अब बारी है हास्य- व्यंग की। तो चलिए थोडा हास्य -व्यंग हो जाये।

पता चला है की गूगल अब चीन में अपना कारोबार समेटने जा रहा है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन हमें तो चिंता सी होने लगी है की कहीं हमारे देश में भी बंद हो गया तो क्या होगा। यानि हम हिंदी ब्लोगर्स का क्या होगा। आइये देखते है , क्या होगा :

१) जो ब्लोगर्स सुबह सुबह मोर्निंग वॉक छोड़कर कंप्यूटर पर बैठ जाते हैं, वो फिर से वॉक पर जाना शुरू कर देंगे।

२) जो दोस्त ऑफिस का काम छोड़कर , सारे दिन ब्लॉग पर लगे रहते हैं, वो फिर से ऑफिस का काम करना शुरू कर देंगे।

३) जो मित्र शाम को घर आते ही, घर के काम धाम छोड़, टिपियाने लग जाते हैं, वो घर के काम काज में श्रीमती जी हाथ बटाने लगेंगे। यानि सब्जी लाना, बाज़ार जाना, मरम्मत के काम इत्यादि।

४) जो महानुभव डिनर के समय भी बाल- बच्चों को छोड़ कंप्यूटर पर बैठे रहते हैं, वो फिर से परिवार के साथ उठना बैठना शुरू कर देंगे।

५) जो युवा मित्र रात में नई नवेली पत्नी को भूल कर कंप्यूटर टेबल पर बैठ कर आधी रात गुज़ार देते हैं, वे भी गृहस्थ जीवन में लौट आयेंगे।

यानि अगर यहाँ, गूगल बंद हुआ तो बहुत से लोगों का भला होगा, यह निश्चित है।

लेकिन ज़रा सोचिये , उन लोगों का क्या होगा :

१) जो सेवा-निवृत हैं, और ब्लोगिंग के ज़रिये न सिर्फ रोज़ अच्छा टाइम पास करते हैं, बल्कि उनको ब्लोगिंग के ज़रिये एक नहीं सैकड़ों मित्र, बेटे, और बेटियां मिल जाते हैं।

इस संसार में ज़हां बुजुर्गों को अपने ही बच्चे छोड़ दूर चले जाते हैं, ब्लोगर्स ही तो हैं, जो एक दुसरे का ख्याल करते हैं।

आखिर अपने बुजुर्गों का सम्मान करना, उनकी देखभाल करना और उनकी सुख सुविधाओं का ख्याल रखना , हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।

२) उन पतियों का क्या होगा , जो पत्नी के सास बहु के सीरियल्स के शौक की वज़ह से टी वी देखने से वंचित होकर , ब्लोगिंग में अपनी खीज उतारते हैं।

३) हमारे जैसे अनेकों कवियों, शायरों और गज़लकारों का क्या होगा, जिनको अपनी रचनाएँ सुनाने या पढ़ाने के लिए ब्लॉग एक अच्छा और मुफ्त का माध्यम मिला हुआ है।

४) उन पहलवानों का क्या होगा , जिनका और किसी पर तो बस चलता नहीं, दुसरे ब्लॉग मित्रों को नौक झोंक, गाली गलोज, और अगर मिल जाएँ तो हाथा पाई तक का कौशल दिखाने में बाज़ नहीं आते।

अब अगर गूगल बंद हुआ, तो ये सब तो वंचित हो जायेंगे, इतनी सुविधाओं से।

तो आइये निवेदन करें गूगल वासियों से , की भई, कम से कम भारत में तो इसे बंद मत करिए।

और अंत में ---

एक चौराहे पर :

एक बूढ़े भिखारी से मैंने कहा ,बाबा आज दायाँ

कल तो आपने बायाँ हाथ फैलाया था ।

भिखारी बोला, बेटा बूढा हो गया हूँ

अब याद नहीं रहता , कल किस हाथ में पलस्तर चढ़ाया था।

नोट : यह सिर्फ व्यंग है, कृपया इसे व्यक्तिगत रूप में न लें।

अगली पोस्ट में देखिये और पढ़िए --स्वस्थ जीवन के कुछ नुस्खे ।

Thursday, January 14, 2010

कोई रूठ भी जाये , तो अपनी बला से ---

कल लोहड़ी थी। हालाँकि लोहड़ी तो हम भी हर साल मनाते रहे हैं। कल भी मूंगफली, रेवड़ी और फुल्ले खाकर विधिवत रूप से लोहड़ी मनाई। लेकिन भाई खुशदीप सहगल की पोस्ट पढ़कर पहली बार दूल्हा भट्टी के बारे में पता चला। यही ब्लोगिंग का एसेंस है।

आज ब्लोगिंग जानकारी का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है।

आज संक्रांति है। और इस त्यौहार को अलग अलग राज्यों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। जहाँ लोहड़ी मुख्यतय पंजाब का पर्व है, वहीँ उत्तर भारत में संक्रांति--- हरयाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक ही तरीके से मनाई जाती है।

और जहाँ लोहड़ी हर्ष और उल्लास की प्रतीक मानी जाती है, वहीँ संक्रांति को मनाने का तरीका बिलकुल अलग है।

मुझे याद है, बचपन में हम गाँव में देखते थे की इस दिन कैसे घर के बड़े बूढ़े अचानक रूठ जाते थे। और कहीं दूर दूसरे मोहल्ले में जाकर बैठ जाते थे। फिर घर की नई नवेली बहू उन्हें मनाती थी ।

इसका भी एक अजीब सा तरीका होता था । मोहल्ले की सारी औरतें इकट्ठी होकर , गीत गाती हुई ताऊ या दादा जी को मनाने जाती थी , एक लस्कर बनाकर। फिर घर की बहू, उन्हें एक शाल, चादर या कम्बल भेंट करती थी, साथ में कुछ रूपये श्रधानुसार।

इस तरह ताऊ या दादा की नाराज़गी दूर हो जाती थी। हालाँकि यह सब बनावटी ही होता था। लेकिन इसे सभी खूब एन्जॉय करते थे।

आज ये सब लुप्त सा हो गया है। शहरी जिंदगी ने शायद रूठने का हक़ भी छीन लिया है।

और कोई रूठ भी जाये , तो अपनी बला से । मनाता कौन है।

सब अपनी अपनी दुनिया में मस्त हैं।

लोहड़ी हो या संक्रांति या पोंगल ---सबका उद्देश्य एक ही है ।

--- की सब मिलकर रहें, --- मिलकर खुशियाँ मनाएं, --- सारे गिले शिकवे भूलकर।

आप सब को लोहड़ी, संक्रांति और पोंगल की ढेरों बधाई और शुभकामनायें।

संक्रांति के बारे में अधिक जानकारी आपकी टिप्पणियों में अपेक्षित है।

Sunday, January 10, 2010

जब पहली बार मुझे डी डी ए पर गर्व महसूस हुआ --दिल्ली के एक हरित क्षेत्र की सैर ---

यूँ तो कॉलिज के दिनों में अक्सर उसके पास से जाना होता था। लेकिन किस्मत देखिये की सारी ज़वानी गुज़र गयी और हम एक बार भी इस जगह फटक तक न सके। लेकिन कहते हैं न की दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। इसी तरह जब तक संयोग नहीं होता तब तक आप कुछ नहीं कर सकते । फिर भले ही वो किसी पार्क में जाना ही क्यों न हो ।

उस दिन दिल्ली यूनिवर्सिटी के नोर्थ कैम्पस में कुछ काम था। हमारे पास दो घंटे का फ्री टाइम था। श्रीमती जी ने कहा ---हमें कैम्पस ही घुमा दो । लेकिन गाड़ी में बैठे बैठे , ५-१० मिनट में ही सारा चक्कर पूरा हो गया। तभी हम उस जगह पहुँच गए जहाँ के बारे में हमने सिर्फ सुना ही था । जाने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई ।

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एकदम साथ लगा हुआ , डी डी ए ( दिल्ली विकास प्राधिकरण ) द्वारा विकसित एवम अनुरक्षित ये हरित क्षेत्र :


यहाँ खड़ी पचासों मोटरसाइकिलों को देखते ही अंदाज़ा हो जाता है की ये स्थान युवाओं के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। कारें तो बस इक्का दुक्का ही थी।

गेट से घुसते ही ये ये रास्ता ऐसा लगता है, मानो जंगल से होता हुआ किसी राजा के किले की और जा रहा हो।

लेकिन जल्दी ही घना जंगल शुरू हो जाता है। पेड़ पर बैठा ये बन्दर हमें ऐसे देख रहा था , जैसे कह रहा हो ---
इस ताज़ा नौज़वानों के स्वर्ग में ये भूतपूर्व नौज़वान कहाँ से आ गए।
जी हाँ, यहाँ आने वाले लगभग सभी एक दम ताज़ा ताज़ा ज़वानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाले ही होते हैं।
ये तो हमारी बहादुरी ही थी की हम सैकड़ों शरमाई सी , शकुचाई सी नज़रों का सामना करते हुए , यहाँ विचरण करते रहे।
थोडा आगे चलने पर हम पहुंचे इस स्थल पर जहाँ वृक्षारोपण का बोर्ड लगा था। बायीं तरफ जाने पर ऐसा कोई स्थल तो नहीं मिला ।

हाँ, एक नवयुवक अपने ज़वानी के सुनहरे सपनों को साकार करने का प्रयास ज़रूर कर रहा था , जो हमें देखकर झिझक गया।

घने जंगल में ये बेगन बेलिया का पेड़ लाल और गुलाबी रंग के फूलों से लदा अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था ।
और ये जर्मन शेफर्ड भी घूमने आया था ,अपने मालिक के साथ। ये तो हमें इसके मालिक से ही पता चला।
हालाँकि ये पता नहीं चल सका की मालिक इसको घुमाने लाया था या ये मालिक को।

इस बम्बू द्वार के आगे तो एक झील थी, जिसका नाम ही इतना भयंकर था की रोंगटे खड़े हो गए। जी हाई, वहां लिखा था --खूनी खान झील।

खैर हम आगे बढे , और घनी हरियाली में खो से गए।
ये लताएँ देखकर तो किसी का भी मन टार्ज़न बनने का कर सकता था। लेकिन हमने अपनी उफनती भावनाओं को रोका , ये सोचकर की कहीं कोई हड्डी चटक गयी या मुड भी गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

खूनी खान झील के किनारे ये हरियाली देखकर मन बाग़ बाग़ हुआ जा रहा था।

इस पेड़ को देखकर तो ऐसा लगा मानो सारी पुरवाई बस इसी के लिए चली हो। सारा पेड़ पश्चिम की तरफ झुका हुआ था, अकेला ।

अब तक तो हमारा भी मन कर आया था एक फोटू खिंचवाने का। घूम घूम कर पेट अन्दर हो गया और भूख भी लग आई।


और सच मानिये इतनी स्वादिष्ट चाट जो हमने वहां खाई, आज तक कहीं नहीं खाई थी। बस बंदरों ने नाक में दम कर दिया था। अब चाट वाला तो एक डंडी हाथ में देकर खिसक लिया। और हम डरते डरते चाट खा रहे थे। हमारी श्रीमती जी तो बंदरों से इतना डरती हैं, जितना तो हम कोकरोच से भी नहीं डरते।



वैसे भी कोकरोच भले ही बाहर से घिनोने दिखते हों, लेकिन एक बार पंख हटाओ तो अन्दर से उतने ही साफ़ सुथरे होते हैं। ये हमने प्री-मेडिकल में कोकरोच का डिसेक्शन करते हुए देखा था।

और अंत में यह बोर्ड, मानो जिंदगी का सन्देश देता हुआ।


पेड़ों की छाया, जैसे माँ का आँचल।
इनसे मिलती ओक्सिजन , जैसे माँ का स्तन पान।
यहाँ बैठकर, घूमकर वैसा ही सुकून मिलता है, जैसा माँ की गोद में बैठकर मिलता है।



कमला नेहरु रिज़ दिल्ली यूनिवर्सिटी और रिंग रोड के बीच सैंकड़ों एकड़ में फैला हुआ शायद दिल्ली का सबसे बड़ा पार्क है। इसे पार्क कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ कोई खुला स्थान नहीं है। बस पेड़ ही पेड़ चरों ओर । इतनी हरियाली की दिल बोले हडिप्पा !



पहली बार मुझे दिल्ली विकास प्राधिकरण पर गर्व महसूस हुआ।



नोट : कुछ और फोटो देखने के लिए चित्रकथा पर भी देखें।











Thursday, January 7, 2010

क्या आप जानना चाहेंगे ---आप मिस्टर एक्स हैं की नहीं ?

मिस इण्डिया, मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स जैसी उपाधियाँ तो अपने सुनी ही होंगी।

मिस्टर इण्डिया भी सुना होगा। लेकिन मिस्टर एक्स ? ये भला क्या होता है ?

आइये आपको आज मिस्टर एक्स से मिलवाते हैं।

शहर की भाग दौड़ की जिंदगी , उस पर टारगेट्स का तनाव। दूसरी तरफ सभी सुख सुविधाओं से परिपूर्ण ऐशो आराम की जिंदगी। खाते पीते घरों के लोग। मोटे ताज़े लोग। हाथ पैर हिलाने की ज़रुरत ही नहीं। वैसे भी खानदानी रईस।

यही लोग आगे चलकर बनते हैं, मिस्टर एक्स।

जी हाँ, एक बीमारी है जो आजकल हमारे देश में तेज़ी से फैलती जा रही है। और इसे कहते हैं --मेटाबोलिक सिंड्रोम या मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स या फिर सिर्फ सिंड्रोम एक्स।

अब जो इससे पीड़ित है , वो मिस्टर एक्स ही हुआ न।

आइये देखते हैं , ये सिंड्रोम एक्स क्या है ---

यह कई रोगों का मिश्रण है। यदि आपको इनमे से कोई दो या तीन विकार हैं तो आप ही हैं , मिस्टर एक्स।

१) डायबिटीज या ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होना।

२) हाइपर्तेन्शन यानि ब्लड प्रेशर का ज्यादा होना।

३) मोटापा ।

४) रक्त में अत्यधिक वसा यानि हाई कोलेस्ट्रोल।

५) रक्त में यूरिक असिड की मात्रा का बढ़ना।

यदि आपको डायबिटीज या मोटापे के साथ कोई अन्य दो विकार भी हैं, तो आप निश्चित तौर पर सिंड्रोम एक्स के रोगी हैं।

सिंड्रोम एक्स क्यों होता है ---इसके मुख्य कारण हैं ---

१) तनाव पूर्ण जीवन।

२) अक्रिय जीवन शैली।

३) व्यायाम की कमी।

४) ज़रुरत से ज्यादा खाना।

५) सिगरेट, शराब जैसे व्यसन।

६) अनुवांशिकता।

निदान :

यदि आप १५ डिग्री पर ढलती जवानी के दौर में पहुँच चुके हैं, यानि आप ४० वर्ष से ऊपर हैं , तो साल में कम से कम एक बार ये जांच अवश्य करवाएं ---

वज़न, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल, औए सीरम यूरिक असिड।

वज़न : मोटापा न होने दें। ३६-२२-३४ इंच का अनुपात केवल महिला मोडल्स के लिए ही उपयुक्त नहीं है, बल्कि पुरुषों के लिए भी इसके मायने हैं।

याद रखिये --कमर का नाप महिलाओं में ३५ इंच और पुरुषों में ४० इंच से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

ब्लड प्रेशर : सामान्य १२०/८० है। १३५/८५ से ज्यादा असामान्य माना जायेगा।

ब्लड शुगर : खली पेट = १०० से नीचे, खाने के बाद ---१४० से नीचे।

यदि आपकी ब्लड शुगर २०० से अधिक आती है तो आप निश्चित ही डायबिटिक हैं।

लिपिड्स : रक्त में वसा की मात्रा । यानि ब्लड कोलेस्ट्रोल ।

एच डी एल , जिसे अच्छा कोलेस्ट्रोल भी कहते हैं, क्योंकि यह हार्ट के लिए अच्छा होता है ---4० से ऊपर होना चाहिए। कोलेस्ट्रोल २०० से कम होना चाहिए।

यदि आपके पैर के अंगूठे में दर्द या सूजन है तो आपको गाउट नाम की बीमारी हो सकती है। इसमें सीरम यूरिक असिड की जांच करानी चाहिए।

सिंड्रोम एक्स होने से हार्ट अटैक या दिल की बीमारी होने की सम्भावना काफी बढ़ जाति है।

उपचार : अब इतनी बीमारियाँ हैं तो दवाएं भी इतनी ही ज्यादा होंगी। लेकिन घबराइये नहीं। यदि अभी भी आप सचेत जाते हैं और निम्नलिखित बातों का ध्यान रखते हैं तो आप मिस्टर एक्स बनने से बच सकते हैं।

१) नियमित व्यायाम -- brisk walk--सबसे बढ़िया व्यायाम है।

गाँव में लोग काम पर जाते हैं, पैदल चलकर

यहाँ शहर में पैदल चलना भी एक काम है।

लेकिन काम ही सही, करिए ज़रूर।

२) परहेज़ : डायबिटीज में मीठे का, ब्लड प्रेशर में नमक का , हाई कोलेस्ट्रोल में घी का, और मोटापे में ज्यादा खाने का। फिर खाएं तो क्या खाएं।

जी हाँ, बहुत कुछ है खाने को --सभी सब्जियां, फल, दालें, अन्न, नट्स, दूध और दूध से बने पदार्थ ।

यही आप नॉन-वेज हैं तो अंडे की सफेदी , बेक्ड मांस भी ले सकते हैं।

बस मीठे से परहेज़ रखें और खाने में नमक सिर्फ थोडा सा सब्जी में । सब्जियां भी तेल में पकाएं और कम मात्रा का इस्तेमाल करें।

सिगरेट कभी नहीं, शराब कभी कभी ।

तनाम मुक्त रहने के लिए --हँसना हँसाना।

और हाँ, जो लोग सारे दिन कंप्यूटर पर बैठे रहते हैं, थोडा कम करें।

आखिर मिस्टर एक्स बनकर क्या हासिल होगा, ज़रा सोचिये ज़रूर।

Sunday, January 3, 2010

गत वर्ष की शुभकामनायें ---देखिये कितनी काम आई ---

आज ही के दिन, एक साल पहले , ३ जनवरी २००९ को मैंने पहली पोस्ट लिखी थी। नव वर्ष की शुभकामनायें ---

इस एक साल में कितनी कामनाएं पूर्ण हुई, आइये देखते हैं --

नव वर्ष के लिए शुभकामनाये कामना करता हूँ कि इस नए साल में सबके जीवन में :

हँसी के फुव्वारे हों ,

खुशी के गुब्बारे हों ,

न सीमा का विवाद हो,

न मुंबई सा आतंकवाद हो !

और इस नए साल में मुक्ति मिले --

भूखों को भूख से ,

घूसखोरों को घूस से ,

किसानो को कर्ज से ,

मरीजों को मर्ज से ।

गरीबों को कुपोषण से ,

शरीफों को शोषण से !

कंजूसों को खर्चों से,

छात्रों को पर्चों से ।

बाबुओं को फाइलों से,

अस्पतालों को घायलों से।

चुनाओं को फर्जी वोटों से ,

देश को नकली नोटों से !

और इस नए साल में सबको मुहँ मांगी मुराद मिले :-

नेताओं को मत मिले,

पार्टियों को बहुमत मिले।

जनता को चावल दाल मिले,

और दो रूपये किलो हर माल मिले!

आतंकवाद से निपटने के लिए :-

पुलिस को ऐ के ४७ मिले,

बुल्लेत्प्रूफ़ जैकेट मिले।

जैकेट भी असली हो,

पर न कोई एनकाउंटर नकली हो !

मोहब्बत की दुनिया में :-

सैफ को मिले करीना ,

सलमान को कटरीना ।

अभिषेक की ऐश रहे,

अमिताभ के हाथ में कैश रहे!

पर इस नए साल में मिले न मिले --

सलमान को कमीज,

पाकिस्तान को तमीज।

प्यासों को शराब,

भूखों को कबाब !

और रहे न रहे--

चाँद संग फिजा बनी अनुराधा,

पुलिस में आई जी पांडा बन के राधा।

शाहरुख़ के सिक्स पैक एब्स,

और मैंगलोर के मयखानों में पैग्स।

ये सब रहे न रहे, पर सलामत रहे--

बच्चों की मुस्कान,

पंछियों की उड़ान।

फूलों के रंग,

अपनों का संग।

बड़ों का दुलार,

और भाई भाई का प्यार!

और सलामत रहे--

देश की आज़ादी,

वीरों के हौसले फौलादी,।

लोकतंत्र में अटल विश्वास,

और रामराज्य की आस!

और कामना करता हूँ कि --

इस वर्ष ये नया साल ,

करदे दिलों का वो हाल,

कि ढह जायें सब नफरत और मज़हब की दीवारें,

और सर्व धर्म मिल कर पुकारें ,

मुबारक हो नया साल,

सबको मुबारक हो नया साल!