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Sunday, January 10, 2010

जब पहली बार मुझे डी डी ए पर गर्व महसूस हुआ --दिल्ली के एक हरित क्षेत्र की सैर ---

यूँ तो कॉलिज के दिनों में अक्सर उसके पास से जाना होता था। लेकिन किस्मत देखिये की सारी ज़वानी गुज़र गयी और हम एक बार भी इस जगह फटक तक न सके। लेकिन कहते हैं न की दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। इसी तरह जब तक संयोग नहीं होता तब तक आप कुछ नहीं कर सकते । फिर भले ही वो किसी पार्क में जाना ही क्यों न हो ।

उस दिन दिल्ली यूनिवर्सिटी के नोर्थ कैम्पस में कुछ काम था। हमारे पास दो घंटे का फ्री टाइम था। श्रीमती जी ने कहा ---हमें कैम्पस ही घुमा दो । लेकिन गाड़ी में बैठे बैठे , ५-१० मिनट में ही सारा चक्कर पूरा हो गया। तभी हम उस जगह पहुँच गए जहाँ के बारे में हमने सिर्फ सुना ही था । जाने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई ।

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एकदम साथ लगा हुआ , डी डी ए ( दिल्ली विकास प्राधिकरण ) द्वारा विकसित एवम अनुरक्षित ये हरित क्षेत्र :


यहाँ खड़ी पचासों मोटरसाइकिलों को देखते ही अंदाज़ा हो जाता है की ये स्थान युवाओं के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। कारें तो बस इक्का दुक्का ही थी।

गेट से घुसते ही ये ये रास्ता ऐसा लगता है, मानो जंगल से होता हुआ किसी राजा के किले की और जा रहा हो।

लेकिन जल्दी ही घना जंगल शुरू हो जाता है। पेड़ पर बैठा ये बन्दर हमें ऐसे देख रहा था , जैसे कह रहा हो ---
इस ताज़ा नौज़वानों के स्वर्ग में ये भूतपूर्व नौज़वान कहाँ से आ गए।
जी हाँ, यहाँ आने वाले लगभग सभी एक दम ताज़ा ताज़ा ज़वानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाले ही होते हैं।
ये तो हमारी बहादुरी ही थी की हम सैकड़ों शरमाई सी , शकुचाई सी नज़रों का सामना करते हुए , यहाँ विचरण करते रहे।
थोडा आगे चलने पर हम पहुंचे इस स्थल पर जहाँ वृक्षारोपण का बोर्ड लगा था। बायीं तरफ जाने पर ऐसा कोई स्थल तो नहीं मिला ।

हाँ, एक नवयुवक अपने ज़वानी के सुनहरे सपनों को साकार करने का प्रयास ज़रूर कर रहा था , जो हमें देखकर झिझक गया।

घने जंगल में ये बेगन बेलिया का पेड़ लाल और गुलाबी रंग के फूलों से लदा अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था ।
और ये जर्मन शेफर्ड भी घूमने आया था ,अपने मालिक के साथ। ये तो हमें इसके मालिक से ही पता चला।
हालाँकि ये पता नहीं चल सका की मालिक इसको घुमाने लाया था या ये मालिक को।

इस बम्बू द्वार के आगे तो एक झील थी, जिसका नाम ही इतना भयंकर था की रोंगटे खड़े हो गए। जी हाई, वहां लिखा था --खूनी खान झील।

खैर हम आगे बढे , और घनी हरियाली में खो से गए।
ये लताएँ देखकर तो किसी का भी मन टार्ज़न बनने का कर सकता था। लेकिन हमने अपनी उफनती भावनाओं को रोका , ये सोचकर की कहीं कोई हड्डी चटक गयी या मुड भी गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

खूनी खान झील के किनारे ये हरियाली देखकर मन बाग़ बाग़ हुआ जा रहा था।

इस पेड़ को देखकर तो ऐसा लगा मानो सारी पुरवाई बस इसी के लिए चली हो। सारा पेड़ पश्चिम की तरफ झुका हुआ था, अकेला ।

अब तक तो हमारा भी मन कर आया था एक फोटू खिंचवाने का। घूम घूम कर पेट अन्दर हो गया और भूख भी लग आई।


और सच मानिये इतनी स्वादिष्ट चाट जो हमने वहां खाई, आज तक कहीं नहीं खाई थी। बस बंदरों ने नाक में दम कर दिया था। अब चाट वाला तो एक डंडी हाथ में देकर खिसक लिया। और हम डरते डरते चाट खा रहे थे। हमारी श्रीमती जी तो बंदरों से इतना डरती हैं, जितना तो हम कोकरोच से भी नहीं डरते।



वैसे भी कोकरोच भले ही बाहर से घिनोने दिखते हों, लेकिन एक बार पंख हटाओ तो अन्दर से उतने ही साफ़ सुथरे होते हैं। ये हमने प्री-मेडिकल में कोकरोच का डिसेक्शन करते हुए देखा था।

और अंत में यह बोर्ड, मानो जिंदगी का सन्देश देता हुआ।


पेड़ों की छाया, जैसे माँ का आँचल।
इनसे मिलती ओक्सिजन , जैसे माँ का स्तन पान।
यहाँ बैठकर, घूमकर वैसा ही सुकून मिलता है, जैसा माँ की गोद में बैठकर मिलता है।



कमला नेहरु रिज़ दिल्ली यूनिवर्सिटी और रिंग रोड के बीच सैंकड़ों एकड़ में फैला हुआ शायद दिल्ली का सबसे बड़ा पार्क है। इसे पार्क कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ कोई खुला स्थान नहीं है। बस पेड़ ही पेड़ चरों ओर । इतनी हरियाली की दिल बोले हडिप्पा !



पहली बार मुझे दिल्ली विकास प्राधिकरण पर गर्व महसूस हुआ।



नोट : कुछ और फोटो देखने के लिए चित्रकथा पर भी देखें।