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Monday, May 23, 2016

एक ग़ज़ल ---

१)

भरी जवानी में धर्म कर्म करने लगे हैं ,
मियाँ जाने किस जुर्म से डरने लगे हैं !

जो कहते थे दुनिया में नहीं है ईश्वर कहीं ,
मुसीबत पड़ी तो रामा रामा करने लगे हैं। 


वो ना डरते थे करने से दुष्कर्म कभी , 
अब जिन्दा ही पल पल मरने लगे हैं।  

सब लेकर जायेंगे जैसे , जो धन कमाया ,
बक्सों में सारा ऐसे , सामां भरने लगे हैं।

रहते आये थे सदा कूलर ऐ सी की छाया में ,
जब गर्म लू लगी तो झरने से झरने लगे हैं।

आया वो हूनर जब हाथों में 'तारीफ़' के ,
दुःख दर्द हम रोगियों के हरने लगे हैं । 

२) 

जब मोह भंग हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर लंगोटी हो और खाने को दो रोटी ,
बस एक पिंट बीयर चाहिए पीने के लिए ।

लत्ते, कपड़े, घड़ी, गॉगल्स, गिफ्ट में देते हैं लोग , 
रिटायर्ड बन्दे को क्या चाहिए तन ढकने के लिए ।  

सुबह से बैठे थे खाली , कुछ नहीं था करने को ,
मैडम एक गठरी कपडे दे गई प्रैस करने के लिए।

अब नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजर करने के लिए ।  

बड़े काम के थे , नाकाम नहीं आज भी 'तारीफ़', 
बस जौहरी की नज़र चाहिए, परखने के लिए।   

Tuesday, May 17, 2016

एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल ---


प्रस्तुत है , एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल :

सुबह :

पत्नी : अज़ी सुनते हो , आज कामवाली बाई नहीं आएगी और डस्टिंग करने वाली भी अभी तक नहीं आई।  अब आप सम्भालो , मेरा टाइम हो गया ऑफिस का। ज़रा जल्दी से मेरा लंच पैक कर दो।  

पति : ठहरो , मैं ऐ टी एम से पैसे निकाल लाऊं ।  

पत्नी : अरे आप तो रिटायर्ड आदमी हैं।  अब आपको पैसों की क्या ज़रुरत है ? दस बीस रूपये चाहिए तो मेरे पर्स से निकाल लिया करो। वैसे भी आप ने क्या खर्च करना है , हमेशा से कंजूस के कंजूस ही तो रहे हो।
 
पति : हमें दो शर्ट और दो पैंट खरीदनी हैं।  सारी पुरानी हो गई।

पत्नी : ओहो ! आप भी अब कौन से नए रह गए हैं। और क्या करना है नए कपड़ों का ! आपने कौन सा ऑफिस जाना है ! वैसे भी गर्मी का मौसम है , कहाँ जाओगे इस मौसम में।  घर में बैठो आराम से नेकर और बनियान पहनकर।  

पति : अच्छा ब्रेड तो ले आऊं नाश्ते के लिए।

पत्नी : ठीक है।  लेकिन सारे दिन घर में रहते हो।  अब ये मत करना कि बैठे बैठे सारे दिन खाते ही रहो।  वेट बढ़ जायेगा , पेट बढ़ जायेगा , बी पी बढ़ जायेगा और शुगर भी बढ़ जाएगी।  फिर घूमोगे डॉक्टरों के चक्कर लगाते।
अच्छा सुनो , बाहर कपडे सूख रहे हैं, थोड़ी देर में उतार लेना और धोबी को प्रैस के लिए दे देना। लेकिन सीधे करके देना।  और सुनो , ये करना , वो करना , बहुत काम पड़े हैं , बस टाइम वेस्ट मत करना।

फिर शाम को ऑफिस से आने के बाद :

आप तो कमाल हो जी। मैं ऑफिस गई , तब भी आप अख़बार पढ़ रहे थे , अब आई हूँ तब भी अख़बार ही पढ़ रहे हो। आखिर ऐसा क्या है इस मुए अख़बार में !
अच्छा बताओ , दिन भर क्या किया आपने ?
अरे ये क्या , फ्रिज में सब कुछ वैसा का वैसा ही रखा है।  आपने तो कुछ खाया ही नहीं।  हे भगवान , मैंने कहा था ये दाल ख़त्म कर देना , खराब हो जाएगी।  लेकिन आपको तो कोई फ़िक्र है ही नहीं।  
और कपडे ! वहीँ बाहर जल रहे हैं धूप में। आपके भरोसे तो कुछ भी छोड़ना बेकार है। कितने बेकार बेकाम आदमी हो , पता नहीं सरकार कैसे झेल रही थी आपको।  मुफ्त में तनख्वाह दे रही थी।
जब देखो तब अख़बार या मोबाईल पर फेसबुक और वाट्सएप। इसके अलावा तो कोई काम ही नहीं है आपको। अब तो उठ लो , मुझे पानी ही पिला दो।

अगले दिन छुट्टी के दिन डॉक्टर के पास :

डॉक्टर साहब , मेरे पति सारी रात नींद में बड़बड़ाते हैं , कोई अच्छी सी दवा दीजिये।
डॉक्टर : ये दवा लिख रहा हूँ , केमिस्ट से ले लेना।  रोज एक गोली सुबह शाम लेनी है।  आपके पति बड़बड़ाना बंद  कर देंगे।
पत्नी : नहीं नहीं डॉक्टर साहब , आप तो कोई ऐसी दवा दीजिये कि ये साफ साफ बोलना शुरू  दें।  पता तो चले कि ये नींद में किसका नाम लेते हैं।
डॉक्टर : बहन जी , ये दवा आपके पति के लिए नहीं , आपके लिए है। आप उन्हें दिन में बोलने का मौका दें , वे नींद में बड़बड़ाना अपने आप बंद  कर देंगे।  

नोट : यह गर्मी में टाइम पास के लिए लिखा गया हास्य व्यंग है।  इसका किसी जीवित या अजीवित व्यक्ति से कोई  सम्बन्ध नहीं है।



Friday, May 13, 2016

रोते हुए जाते हैं सब , हँसता हुआ जो जायेगा ---


सेवा निवृति एक ऐसा अवसर होता है जिसमे ख़ुशी भी शामिल होती है और थोड़ा रंज भी।  ख़ुशी एक लम्बे व्यवसायिक जीवन के सफलतापूर्वक पूर्ण होने की। और रंज सफलता की ऊँचाई पर पहुंचकर कुर्सी छोड़ने का। अक्सर  ऐसे में सेवा निवृत होने वाला व्यक्ति भावुक हो जाता है और कभी कभी लोग रोने भी लगते हैं।  लेकिन हमारे अस्पताल में पिछले दस सालों में सेवा निवृत होने वाले सभी अधिकारीयों को हमने हँसते हँसते विदा किया।  इसी क्रम को बनाए हुए ३० अप्रैल को जब हम स्वयं सेवा निवर्त हुए तो हमने उसी ख़ुशी के वातावरण को बनाए रखा।  हमारे साथ हमारे एक और साथी डॉकटर को भी विदा किया गया जिन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृति ली थी।  




मंच पर चिकित्सा अधीक्षक और अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक के साथ हम दोनों।



गंभीर रूप में बस यही एक पल था जब हम हँसते हुए नज़र नहीं आ रहे थे।  लेकिन स्वागत सम्मान समारोह आरम्भ होने के बाद एक भी क्षण ऐसा नहीं था जिसमे लोगों के चेहरे पर मुस्कान न रही हो।  फूल भेंट करने वालों में सभी उच्च अधिकारीगण शामिल हुए।




प्रिंसिपल स्कूल ऑफ़ नर्सिंग।



अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक।



पूर्व चिकित्सा अधीक्षक एवम विभाग अध्यक्ष ई एन टी।



पूर्व चिकित्सा अधीक्षक एवम विभाग अध्यक्ष शल्य चिकित्सा।



डायरेक्टर फैमिली वेलफेयर।



एडिशनल सेक्रेटरी स्वास्थ्य मंत्रालय।



विभाग अध्यक्ष मनो रोग।



हमारे एक पुराने साथी जो सेवा निवृत हो चुके हैं।



अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक।



नर्सिज यूनियन की सदस्या अधिकारीगण।



कर्मचारी यूनियन के सदस्य।



सीनियर प्रोफ़ेसर और हमारे कॉलेज के सबसे पहले बैच की हमारी सीनियर सहपाठी।



हॉल का एक दृश्य।



दूसरी ओर वरिष्ठ डॉक्टर्स।



कार्यक्रम का सञ्चालन करते हुए भारत भूषण जो सदा हमारे साथ मंच पर सहयोगी रहे और अपनी आवाज़ से सबको मंत्रमुग्ध करते थे।



हम दोनों के परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
अपने विदाई भाषण में हमने उपस्थित सभी कर्मचारियों और अधिकारीयों को विशेष रूप से दो बातों को याद रखने का आह्वान किया।
एक तो ये कि एक अच्छा स्वास्थयकर्मी होने के लिए तीन गुणों का होना आवश्यक है -- avilability , affability , ability . यानि आपकी उपस्थिति , मृदु व्यवहार और आपकी योगयता।
दूसरा अपने कर्मों को इस कद्र सुधारना चाहिए कि जाते समय बुरे कर्मों का बोझ साथ ना हो।
कवि नीरज की इन पंक्तियों के साथ हमने अपने अभिभाषण को समाप्त किया :

जितना कम सामान रहेगा ,
उतना सफ़र आसान रहेगा।
जितना भारी बक्सा होगा ,
उतना ही तू हैरान रहेगा।  


Thursday, April 7, 2016

मधु के सेवन से कभी , मधुमेह नहीं होता ---


विश्व स्वास्थ्य दिवस पर प्रस्तुत हैं कुछ काम की बातें :



सिगरेट पीते थे हमदम, हम दम भर कर ,
अब हरदम हर दम पर, दम निकलता है।

गुटखा खाते थे वो , मुंह में चबा चबा कर ,
अब खाने को भी , मुंह ही नहीं खुलता है।  

मत समझो दाने दाने में है केसर का दम ,
होता है दाने दाने में कैंसर का डर हरदम।

ग़र जी भर कर वर्षों तक, पीते रहे शराब ,
जिगर फिर इक दिन होकर रहेगा खराब।

मधु के सेवन से कभी , मधुमेह नहीं होता ,
ग़र हो जाये तो सही, मधु से नेह नहीं होता।

निष्क्रिय न रहो , चलो काम पर लगा जाये ,
वेट और पेट घटाने को , ज़रा तेज चला जाये।

वरना घेर लेंगे बी पी , शुगर, आर्थराइटिस ,
और सेहत की हो जायेगी टायं टायं फिस।


Wednesday, February 17, 2016

पत्नी वो होती है जो ---


पत्नी वो होती है जो ,
बोल बोल कर, पति की बोलती बंद कर दे ,
फिर बोले कि आप कुछ बोलते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो  ,
पहले बच्चे को खिला खिला कर बीमार कर दे ,
फिर डॉक्टर से कहे कि ये कुछ खाता क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शॉपिंग तो पति के कार्ड से  करे, उनके कार्ड से ही सारे बिल भरे ,
फिर पति से शिकायत करे कि आप कुछ खर्च करते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शादी  या पार्टी के लिए सजने संवरने में खुद घंटों लगाये ,
पर लेट होने पर पति से कहे कि आप जल्दी तैयार होते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
बीस रूपये की सब्ज़ी खरीदे , और दस की हरी मिर्च धनिया मुफ्त ले ,
फिर पति से कहे कि खाली हाथ खड़े हो, आप कुछ पकड़ते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
ऑड दिन भी ईवन नंबर की गाड़ी चलाये , पति को करे बाय ,
और कहे कि आप एक ऑड नंबर की गाड़ी खरीदते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
घर पर रहे तो पति से कहे , ये मत खाना वो मत खाना ,
पर मायके से आये तो कहे कि आप पीछे से कुछ खाते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिंदगी होती है पर जीने नहीं देती, नशा होती है पर पीने नहीं देती ,
लेकिन जब पति पीकर घर आये तो कहे कि आप समझते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिसकी सब बातें मांफ होती हैं, जो चुपके से कान में कहती है ,
मैं बहुत बोर करती हूँ ना , पर आप कभी बोर होते क्यों नहीं ! !



Monday, February 8, 2016

दिन महीने साल गुजरते जायेंगे -- हमारी आस्थाएं ...


हमारी आस्थाएं :

मथुरा से करीब २० किलोमीटर दूर है गोवर्धन।  श्रीकृष्ण जी से सम्बंधित एक छोटा सा क़स्बा जहाँ स्थित है गोवर्धन नाम का पहाड़ , जिसे कहते हैं कभी श्रीकृष्ण जी ने अपनी छोटी उंगली पर उठाया था।  अब यहाँ एक छोटी सी पहाड़ी सी ही है जिसके चारों ओर भक्तजन २१ किलोमीटर की पैदल परिक्रमा कर पुण्य कमाते हैं।
किसी काम से यहाँ जाना हुआ तो हमने भी सोचा कि चलो गाड़ी में बैठकर ही एक चक्कर लगा लिया जाये क्योंकि परिक्रमा करने के लिए पैदल ही एक तरीका नहीं है बल्कि लोग रिक्शा , ऑटो और कार में बैठकर भी परिक्रमा करते हैं। हालाँकि परिक्रमा का असली तरीका है पेट के बल लेटकर कैटरपिलर की तरह चलते जाना।  मेन रोड से परिक्रमा एक गली में शुरू होती है जो पहाड़ी के साथ साथ जाती हुई अनेकों गावों से गुजरती हुई एक इलिप्टिकल सर्कल के रूप में उसी सड़क में आ मिलती है।  सड़क के शुरू में लगभग १०० मीटर तक भिखारियों और साधु बाबाओं की कतार लगी थी। आगे कुछ आश्रम और  धर्मशालाएं दिखी जहाँ रुकने का इंतज़ाम था।  लेकिन एक किलोमीटर के बाद ही एक गांव में ट्रैफिक जैम हो गया।  गांव की कीचड में मुश्किल से गाड़ी रिवर्स कर हम वापस आ गए मेन बाजार में जहाँ सड़क पर ही बने एक मंदिर में भक्तजनों ने हाथ जोड़े और फिर तलाशने लगे खाने के लिए कोई अच्छा सा रेस्ट्रां।

एक धार्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्द होने के कारण यहाँ देश और विदेश से भी सैलानी और आस्थापूर्ण भक्त मंदिरों में दर्शन करने के लिए आते हैं।  इसलिए सड़क पर भिखारियों और साधुओं का जमावड़ा बना रहता है।  धूलभरा यह क़स्बा कहीं से भी विकसित नहीं लगता।  लेकिन एक दुकान पर लगी भीड़ देखकर यह तो समझ में आ गया कि वह यहाँ का सबसे मशहूर ढाबा था।  खाने में पूड़ी और कचौड़ी धड़ल्ले से बिक रही थी।  वैसे देसी घी में बनी कचौड़ी वास्तव में बहुत स्वाद थी।  बस खाने के लिए आदिवासी बनना पड़ा।  दुकान के अंदर भी घी का धुआं और अँधेरा था।  बाहर सड़क पर मथुरा के मशहूर पेड़े जगह जगह बनाये जा रहे थे।

सूटेड बूटेड दिल्ली के शहरी बाबू को देखकर भिखारी भी मक्खियों की तरह मंडरा रहे थे।  किसी तरह वहां से निपटकर हम अपनी गाड़ी में बैठे और चल दिए अपने गंतव्य की ओर यह सोचते हुए कि हमारा देश कितना आस्थाओं का देश है जो आज भी विकास से दूर पौराणिक धार्मिक गाथाओं के वशीभूत होकर जी रहा है।
ढाबे में बैठे इस युवक को यंत्रवत पूड़ी सब्ज़ी डोंगे में डालते हुए , जम्हाई लेते हुए ग्राहकों को देते हुए देखकर लगा कि ये बेचारा तो लगता है सारी जिंदगी यही काम करता रहेगा। शायद दिन महीने साल गुजरते जायेंगे , भक्तजन यहाँ यूँ ही आते जायेंगे।


Wednesday, February 3, 2016

जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है ---


आज से ऑटो एक्सपो ( वाहन मेला ) शुरू हो रहा है।  वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे कोई बच्चे पैदा करने का कैम्प लग रहा हो। आज जहाँ देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई आबादी है , वहीँ दिल्ली की समस्या वाहनों की बढ़ती संख्या से फैलता प्रदुषण है।  लेकिन ऑटो मैनुफैक्चरिंग कंपनियों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होता है।  उनके लिए तो सबसे बड़ी चिंता इस बात की रहती है कि कैसे वाहनों की बिक्री में वृद्धि दिखाएँ। यानि यदि गत वर्ष ५०००० वाहनों की बिक्री हुई तो इस वर्ष का लक्ष्य ६०००० होना चाहिए। यही कारण है कि दिल्ली में वाहनों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है। देखा जाये तो ऑटो कम्पनियाँ लोगों की आदत और शहर की हालत बिगाड़ने में लगी हुई हैं।

अब समय आ गया है कि जहाँ एक ओर बढ़ती आबादी को रोकने के लिए 'वन चाइल्ड नॉर्म ' यानि 'एकल बाल परिवार' आवश्यक है , वहीँ दूसरी ओर वाहनों की बिक्री पर भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए।  प्रत्येक कंपनी को मार्किट शेयर अनुसार एक निश्चित संख्या तक ही वाहनों की बिक्री की अनुमति होनी चाहिए। भले ही पूर्व में परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो गया हो , लेकिन जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।

वर्ना जैसा कि किसी शायर ने कहा था कि :

होश आये भी तो क्योंकर तेरे दीवाने को ,
एक जाता है तो दो आते हैं समझने को।  

यही सिलसिला चलता रहेगा।  और सारे प्रयोग असफल होते रहेंगे।