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Monday, September 8, 2014

इट'स वेरी ईज़ी तो स्टॉप स्मोकिंग , एंड आइ हॅव डन इट सो मेनी टाइम्स ---


युवावस्था मे , विशेषकर कॉलेज के दिनों मे, मूँह मे सिगरेट लगाना मित्रों के संग एक शौक के रूप मे आरंभ होता है ! लेकिन जल्दी ही यह शौक एक लत बन जाता है ! आरंभ के दिनों मे मूँह मे धुआँ भरकर उड़ाना अच्छा लगता है लेकिन जल्दी ही समझ मे आ जाता है या मित्रों द्वारा समझा दिया जाता है कि सिगरेट पीने का सही तरीका क्या है ! यानि धुआँ मूँह मे भरकर गहरी सांस लेते हुए धुएं को फेफड़ों मे भरना पड़ता है ! धीरे धीरे निकोटीन अपना प्रभाव दिखाने लगती है और एक और मासूम युवक धूम्रपान की लत का शिकार हो जाता है ! 

हमारे फेफड़ों मे जाने वाले धुएं मे मौजूद कार्बन के कण फेफड़ों की कोशिकाओं मे जमकर अपना घर बना लेते हैं ! यदि वर्षों तक धूम्रपान किया जाता रहा तो काफी मात्रा मे कार्बन जमा होकर फेफड़ों को गला देता है जिससे हमारी सांस लेने की प्रक्रिया मे बाधा उत्पन्न होने लगती है ! यह क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस , ब्रोंकिओकटेसिस , दमा , टी बी और कैंसर जैसे भयंकर रोगों को जन्म देती है ! अन्तत: फेफड़े इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि एक एक सांस लेने के लिये भी दम लगाना पड़ता है ! सिगरेट के धुएं मे मौजूद निकोटिन ना सिर्फ लत लगाकर मज़बूर कर देती है बल्कि हमारे शरीर की कई प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करती है जैसे ब्ल्ड प्रेशर और हृदय गति का बढ़ना जिससे धीरे धीरे हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है !  

वर्षों पहले दिल्ली के आई टी ओ चौराहे पर लाल बत्ती पर स्कूटर पर इंतज़ार करते हुए हमने देखा कि वहां बहुत ज्यादा वायु प्रदूषण था ! उस समय दिल्ली मे वायु प्रदूषण अपने जोरों पर था ! धुआँ इतना ज्यादा था कि सांस लेने मे भी कड़वाहट महसूस हो रही थी ! तभी साथ मे खड़े हुए एक और स्कूटर वाले ने सिगरेट निकाली और सुलगाकर आराम से कश लगाने लगा ! यह देखकर हमे अचानक यह महसूस हुआ कि हम तो धुएं से पहले ही परेशान हैं और यह शख्श सिगरेट पिये जा रहा है ! क्या बाहर धुएं की कमी है जो और धुआँ फेफड़ों मे भर रहा है ! 
यह विचार आते ही हमारे ज्ञान चक्षु खुल गए , हमे दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और हमे ऐसी विरक्ति हुई कि उसके बाद हमने कभी सिगरेट को हाथ नहीं लगाया ! 

धूम्रपान से ऐसे ही एक झटके मे निज़ात पाई जा सकती है ! बस द्रढ निश्चय और पक्का इरादा चाहिये ! वर्ना एक बहुत बड़े मेडिसिन के प्रोफ़ेसर ने कहा था : इट'स वेरी ईज़ी तो स्टॉप स्मोकिंग , एंड आइ हॅव डन इट सो मेनी टाइम्स ! 


Saturday, August 23, 2014

काश कि वक्त ठहर जाता ---एक संस्मरण मीठी यादों का !


वो बहुत खूबसूरत थी।  बहुत ही खूबसूरत थी।  बहुत ही ज्यादा खूबसूरत थी। १७ साल की उम्र में कम से कम हमें तो यही लगता था। शायद रही भी होगी।  तभी तो उसके चर्चे दूर दूर तक के कॉलेजों में फैले थे । अक्सर दूसरे कॉलेजों के छात्र शाम को कॉलेज की छुट्टी के समय गेट पर लाइन लगाकर खड़े होते, उसकी एक झलक पाने के लिये  !  हल्का गोरा रंग , बड़ी बड़ी मासूम सी काली आँखें , लम्बी सुन्दर नाक , मखमल से कोमल गाल , औसत हाइट और वेट ! कुल मिलाकर सुन्दरता की प्रतिमूर्ति ! नाक की बाइं ओर यौवन की निशानी के रूप मे किसी पुराने छोटे से मुहांसे का छोटा सा स्कार , जिसे वो बायें हाथ के अंगूठे से जब होले होले सहलाती तो लगता जैसे कोई दस्तकार हीरे को चमका रहा हो ! निश्चित ही उपर वाले ने उसे कदाचित किसी फुर्सत के क्षणों मे ही बनाया होगा ! 

हमारी सरकारी आवासीय कोलोनी और उसकी पॉश कोलोनी दोनों साथ साथ होने की वज़ह से कॉलेज से वापसी अक्सर साथ ही होती ! खचाखच भरी बस मे क्लास के कई लड़के लड़कियाँ आस पास ही खड़े होते ! लेकिन बाहरी मनचलों का आतंक इस कद्र होता कि इज़्ज़त बचानी मुश्किल हो जाती ! ऐसे मे हम यथासम्भव प्रयास करते साथ की लड़कियों को गुंडों से बचाने की ! अक्सर सफल रहते लेकिन कभी कभी असामाजिक तत्व  भारी भी पड़ जाते ! उन दिनों बसों मे छेडखानी आम बात होती थी !  बस का कंडकटर भी गेट मे फंस कर खड़ा रहता ! कुल मिलाकर बसों मे मुश्किल दिन होते थे ! 

पूरे एक साल हम साथ रहे , पढे , आये गए ! लेकिन इसके बावज़ूद आपस मे कभी बात नहीं हुई ! होती भी कैसे , उस समय लड़के लड़की एक ही क्लास मे पढते हुए भी आपस मे बात नहीं करते थे ! वैसे भी वह हम सबका प्री मेडिकल का एक साल का कोर्स था ! सभी अपना करियर बनाने के लिये दिन रात मेहनत मे लगे रहते !  आखिर एक साल पूरा हुआ और लगभग सभी का मेडिकल कॉलेज मे एडमिशन हो गया ! लेकिन हम लड़कों के कॉलेज मे और वो गर्ल्स कॉलेज मे चली गई ! अगले पाँच साल तक उसके दर्शन तभी हुए जब कभी सब कोलेजों की सामूहिक हड़ताल होती थी !  ऐसा नहीं था कि हमारा कोई किसी किस्म का नाता था , लेकिन कभी कभार उसकी खूबसूरती याद आ जाती तो अनायास ही मन को गुदगुदा जाती !   

वो आखिरी दिन था जब हमने उसे आखिरी बार देखा था ! सुबह के दस बजे थे ! कोलोनी के पास वाली मार्केट मे हमने अपनी बुलेट मोटरसाईकल पार्क की ! स्टेंड पर खड़ा कर ताला लगाकर जैसे ही हम चलने को तैयार हुए तो बिल्कुल साथ खड़ी हरे रंग की फिएट कार मे दुल्हन के लिबास मे  बैठी लड़की पर नज़र पड़ी तो हम चौंक गए ! अरे वही तो थी , दुल्हन के भेष मे , सोलह श्रृंगार किए ! वही गज़ब की खूबसूरती ! लेकिन हमारे पास भी ज्यादा सोचने का वक्त ही कहाँ था ! हम भी तो मार्केट के खुलने का इंतज़ार ही कर रहे थे ! और मार्केट मे दुकाने खुल चुकी थी ! बिना ज्यादा सोचे , हम यन्त्रवत से चल दिये साडियों की एक दुकान की ओर जहाँ से हमे एक साड़ी उठानी थी जिसे मां पसंद कर के गई थी ! आखिर ११ बजे मां पिताजी को लड़की वालों के घर पहुंचना था , अपनी होने वाली डॉक्टर बहु के रोकने की रस्म पूरी करने के लिये !  

आज उस लम्हे को गुजरे हुए तीस वर्ष बीत चुके हैं ! कुछ समय पहले संयोगवश उस की एक सहेली और सहपाठी से मुलाकात हुई तो पता चला कि वो शादी करके अमेरिका चली गई थी ! ज़ाहिर है , वो वहीं सेटल हो गई होगी ! लेकिन कभी कभी जब यूं ही उसकी खूबसूरती की याद चली आती है तो सोचता हूँ कि : 

जाने कहाँ होगी ,
वो कैसी होगी ?
क्या वैसी ही होगी !   
या वक्त के बेरहम हाथों ने ,
खींच दी होंगी , 
उस खूबसूरत चेहरे पर , 
आड़ी टेढ़ी तिरछी सैंकड़ों लकीरें !  
काश कि वक्त ठहर जाता ! 


Tuesday, August 5, 2014

ये जिन्दगी एक हादसों का सफ़र है, लेकिन वो साथ है तो क्या फिक्र है --- एक संस्मरण !

घूमने का शौक तो हमे कॉलेज के दिनों से ही रहा है ! लेकिन पहाडों से विशेष लगाव रहा है ! १९९० मे जब पहली बार कार हाथ मे आई तो उसके बाद शिमला , मसूरी , नैनीताल तथा उत्तर भारत अन्य के पहाड़ी स्थलों पर कार द्वारा ही जाना हुआ ! लेकिन दिल्ली से मनाली लगभग ६५० किलोमीटर दूर है ! पहली बार यहाँ १९९० मे जाना हुआ था ! तब ना कार थी ना वोल्वो बसें लेकिन डीलक्स बसें सुबह ६ बजे चलकर रात १० बजे मनाली पहुंचती थी ! हमने भी दो सीटें बुक कराई और पहुंच गए मनाली रात के दस बजे ! लेकिन जून का महीना था और हमने होटल की बुकिंग भी नहीं कराई थी ! बस से उतरकर सामान एक जगह रखा और इधर उधर देखा लेकिन सिवाय अंधकार के कुछ और नज़र नहीं आया ! तभी बस की सवारियों मे से एक हमउम्र दंपत्ती हमारे पास आये और अपना परिचय देते हुए कहा कि चलिये मिलकर कमरा ढूंढते हैं ! हम भी पहली बार मनाली आए थे और इसके बारे मे कुछ भी पता नहीं था ! हमने महिलाओं को सामान के पास छोड़ा और पुरुष चल दिये होटल्स की ओर ! लेकिन दो तीन होटल देखने के बाद ही अहसास हो गया कि उस वक्त कोई कमरा नहीं मिलने वाला था क्योंकि सीजन होने के कारण सभी होटल्स फुल थे !  हारकर हम वापस आ गए और बताया कि कोई कमरा उपलब्ध नहीं है ! अभी हम निराश से खड़े थे कि तभी एक व्यक्ति हमारे पास आया और बोला कि उसके घर पर दो कमरे खाली हैं , चाहें तो हम वहां ठहर सकते हैं ! अब यह तो हमारे लिये एक असमंजस की बात हो गई कि कैसे एक अज़नबी पर विश्वास करें ! उसने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं , उसके पास टैक्सी है और वो हमे ले जायेगा ! हमने भी विचार विमर्श किया और सोचा कि घबराने की क्या बात है , आखिर हम पांच लोग थे ! अन्तत: हमने उसके साथ जाने का निर्णय लिया और रात बिताने के लिये दो साधारण से कमरे मिल ही गए ! सुबह होने पर हम निकल पड़े कमरों की तलाश मे और १० बजे चेकआऊट के समय आखिर कमरे मिल ही गए ! 
बाद मे हमे पता चला कि उस दिन कई लोगों को रात फुटपाथ पर बैठकर ही बितानी पड़ी ! खुले मे रात बिताने वालों मे एक नवविवाहित जोड़ा भी शामिल था ! उधर हमारे नए बने मित्र ने बताया कि वो तो अक्सर ऐसा करते हैं कि जब भी किसी नई जगह जाते हैं तो सबसे पहले किसी दंपत्ती को मित्र बना लेते हैं ! इस तरह अज़नबी जगह भी साथ मिल जाता है ! 

मनाली अगली बार १९९९ मे जाना हुआ ! लेकिन तब हमारा प्रोग्राम बना अपनी मारुति कार द्वारा जाने का ! लेकिन इतना लम्बा सफर हमने एक दिन मे कभी नहीं किया था ! इसलिये जाते समय हम रास्ते मे पड़ने वाले मॅंडी शहर मे रुक गए ! इस तरह हम बिना थके आराम से अगले दिन मनाली पहुंच गए जहां हमारा ठहरने का इंतज़ाम था स्टर्लिंग रिजॉर्ट्स मे जिसके ठीक पीछे श्री अटल बिहारी बाजपेई जी का बंगला था ! इत्तेफाक़ से उसी समय उनका भी आने का कार्यक्रम था , इसलिये सारे रिजॉर्ट मे सुरक्षाकर्मी फैले हुए थे ! लेकिन तभी पता चला कि पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण कर दिया था और बाजपेयी जी का आना केन्सिल हो गया ! लेकिन हमने अपनी मारुति उठाई और १४००० मीटर ऊंचे रोह्ताँग पास पहुंच गए ! हमारे लिये यह सबसे ज्यादा ऊँचाई पर ड्राईव करने का पहला अनुभव था ! हालांकि नीचे आते समय लहराती बल खाती नई बनी सड़क पर ड्राईव कर के आनंद आ गया ! 

सन २००६ मे एक बार फिर मनाली जाने का प्रोग्राम बना ! लेकिन इस बार हमने साहस का परिचय देते हुए तय किया कि हम एक ही दिन मे पूरा सफर तय करेंगे ! क्योंकि हम गाड़ी ज्यादा तेज कभी नहीं चलाते , इसलिये अनुमान था कि १५-१६ घंटे अवश्य लग जायेंगे ! इसलिये हम मूँह अंधेरे सवा चार बजे घर से रवाना हो गए ताकि पौ फटने तक हम हाईवे पर पहुंच जाएं ! आराम से ड्राईव करते हुए हम करीब पौने पांच बजे आज़ाद पुर मोड से होकर हाईवे पर पहुंच गए ! अभी हल्का हल्का सा अंधेरा था लेकिन रौशनी होने लगी थी ! हमने भी राम का नाम लिया और राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर एक पर अपनी टाटा इंडिगो को मोड दिया ! अभी मुश्किल से ५ मिनट ही हुए होंगे कि सामने बायीं ओर एक कट नज़र आया जिसे देख हम थोड़ा स्लो हो गए ! लेकिन तभी हमारे होश उड़ गए ! बायीं स्लिप रोड के तिराहे पर एक भयंकर एक्सीडेंट हो गया था जिसमे हाईवे पर जाती एक कार और स्लिप रोड से आते एक ट्रेक्टर ट्रॉली मे भिड़ंत हो गई थी ! सड़क पर दसियों लाशें बिछी पड़ी थीं ! टक्कर इतनी भयंकर थी कि सब के सब लोगों की मृत्यु ऑन दा स्पॉट हो गई थी ! कुछ ही मिनटों मे वहां लोग इकट्ठा हो गए थे लेकिन सभी हेल्पलेस महसूस कर रहे थे ! इतना भयंकर एक्सीडेंट हमने कभी नहीं देखा था ! सुबह के करीब पांच बजे थे और हमे ६५० किलोमीटर का रास्ता तय करना था ! अब हमारे सामने चलने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था ! लेकिन उस समय हमारी हालत क्या हुई होगी, इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल है ! मौत का तांडव हमसे बस चंद ही मिनट दूर हुआ था ! कार मे जाने वाले यात्री भी हमारे जैसे सैलानी ही रहे होंगे ! 

लेकिन शायद इसी का नाम जिंदगी है ! यह हर हाल मे चलती रहती है ! और हम इसके पुतले हैं ! हाड़ मांस के पुतले जिनमे जब तक जान है तब तक जीवन रहता है ! कब कहाँ किस मोड पर क्या हो जाये , कोई नहीं जानता ! इसलिये हम तो अक्सर यह मानकर चलते हैं कि हम कुछ भी नहीं , सब कुछ उपर वाले के हाथ मे है ! बस उसे याद रखिये तो वो आपको याद रखेगा ! वह हर पल हर जगह मौजूद होता है ! बस आवश्यकता है , उसे महसूस करने की, उसे याद रखने की , ताकि वो आपकी रक्षा कर सके ! 
हमारा सफ़र तो आनंददायक रहा , लेकिन आज भी जब वह वाकया याद आता है तो तन मन को विचलित कर जाता है !   

Sunday, July 27, 2014

हर सुबह की शाम होती है, लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ---


रोजमर्रा की भाग दौड़ की ज़िदगी से हटकर यदि कुछ दिनों  के लिये भी आप शहर से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले जाएं , तो तन और मन मे नई ऊर्ज़ा और स्फूर्ति का संचार हो जाता है 


पर्वतों की रानी मसूरी मे एक सुहानी सुबह , धुंध भरी ! वृक्ष भी जैसे मिलकर हमारा मनोरंजन करने के लिये तैयार थे !  




लेकिन शाम का धुंधलका सूर्य और बादलों के साथ आंख मिचौली खेलता हुआ , पर्वतीय धरा पर अपना रंगई जादू बिखेर रहा था ! 




पर्वतों मे कुछ ही दिन का आराम और सुबह की सैर , और रास्ते मे खोखे की चाय , जीवन को असली आनंद से भर देती है ! 




इस छोटे से स्तूप को अक्सर हम मिस कर जाते थे ! लेकिन देखिये तस्वीर मे कितना भव्य लग रहा है ! 





ये टेढ़े मेढ़े पहाड़ी रास्ते हमे बताते हैं कि जिंदगी कभी सीधी नहीं चलती ! इसमे ना जाने कितने मोड़ , उतार चढ़ाव और पड़ाव आते हैं !   




हमारे लिये तो हर यात्रा एक हनीमून जैसी होती है ! फिर आपकी शादी को तीन दिन हुए हों या तीस साल , क्या फर्क पड़ता है ! यह फोटो एक नवविवाहित युग्ल द्वारा ली गई है ! 




इस वृक्ष ने हमे सिखाया कि कैसे हर विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है ! बहारें फिर भी आती हैं , फिर भी आयेंगी , बस हौसला बनाये रखना आवश्यक होता है ! 





अब पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर भी ध्यान दिया जा रहा है ! यह अच्छी बात है ! 





दिल को सकूं पहुंचाती एक और सुहानी शाम ढलने वाली है !  




अगली भोर ने फिर अपनी सुंदरता बिखेर दी ! 




यहाँ मौसम भी घड़ी घड़ी अंगडाई लेता है ! कभी धूप कभी छाँव ! यही तो खूबसूरती है मसूरी की ! 




शहर मे ही घना जंगल हो तो वायु भी शुद्ध ही होती है ! बस इसे अशुद्ध ना कर दें , यह हमारा फ़र्ज़ है ! 





एक पैरामिलिट्री फोर्स के गेट के पास से मसूरी का यह नज़ारा बड़ा मनमोहक होता है ! कुछ देर तक निहारने के बाद जब हमने एक ज़वान से फोटो लेने का अनुरोध किया तो उसने बड़े प्यार से कहा कि सर मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा था कि आप मुझे फोटो खींचने के लिये कहें ! फिर उसने धड़ाधड़ कई फोटो खींच डाले ! शायद उसे हम मे अपने माँ पिता नज़र आ रहे थे !  





हर सुबह की शाम होती है ! लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ! यही संदेश देती हुई इस शाम के सुनहरे नज़ारे को आँखों मे भरकर हमने अगले दिन दिल्ली के लिये प्रस्थान करने की तैयारी की , मन मे एक बार फिर मसूरी आने की तमन्ना के साथ ! 

Thursday, July 17, 2014

दिल्ली गर्मी मे जले और और मुम्बई मे रिमझिम बारिश पड़े ---


यूं तो मुम्बई जाना किसी व्यक्तिगत काम से हुआ था ! लेकिन जब आ ही गए थे तो आम के आम और गुठलियों के दाम वसूलना तो हमे भी खूब आता है ! इसलिये काम के साथ साथ हमने मुम्बई के मित्रों से भी मिलने की सोची ! लेकिन बारिश के मौसम मे हमारे साथ साथ मुम्बईकारों की भी शायद हिम्मत नहीं पड़ी मिलने मिलाने की ! इसलिये यह काम इस बार अधूरा ही रहा ! हालांकि हमारे पास भी वक्त कम ही था ! 

दिल्ली की गर्मी से त्रस्त जब हम मुम्बई पहुंचे तो बारिश धीमे धीमे ऐसे हो रही थी जैसे इन्द्र देवता थककर कूल डाउन वॉक कर रहे हों जैसे हम पार्क मे आधा घंटा ब्रिस्क वॉक करने के बाद करते हैं ! बाद मे टैक्सी मे बैठने पर टैक्सी वाले ने भी बताया कि एक दिन पहले जम कर बारिश हुई थी जो मुम्बई मे एक सीजन मे केवल तीन बार होती है ! एक तो हो गई थी , बाकी दो का इंतज़ार था ! उस दिन के अखबार मे भी "मुम्बई पानी पानी" जैसे खबरें छपी थीं ! लेकिन गर्मी से परेशान हम दिल्ली वालों को तो यह बारिश पत्नी से भी ज्यादा प्यारी लग रही थी ! 

मुम्बई मे लगातार बारिश होने से यहाँ घरों की दीवारें अक्सर काली पड़ जाती हैं !  सड़कों पर भी गीला गीला अहसास रहता है , लेकिन यहाँ की ज़मीन ज्यादा रेतीली नहीं है जिसकी वज़ह से मकानों और कपड़ों पर धूल नहीं जमती ! लेकिन एक बात ने विशेष तौर पर हमारा ध्यान आकृषित किया ! यहाँ ज्यादातर घरों / मकानों मे बालकनी नहीं होती ! उसकी जगह पर खिड़की मे ग्रिल लगाकर कपड़े सुखाने का इंतज़ाम किया जाता है ! यह बात हम दिल्लीवालों को नहीं भाती ! हमे खुले मे बैठने की बड़ी आदत है ! 

वैसे तो मुम्बई का अधिकांश भाग पुराना सा ही लगता है और कहीं से भी विकसित देश जैसा नहीं लगता ! लेकिन पवई क्षेत्र मे बना हीरानन्दानी आवासीय क्षेत्र का कोई ज़वाब नहीं ! यहाँ आकर एक मुद्दत के बाद किसी विकसित देश जैसा अनुभव हुआ ! बहुमञ्ज़लीय सुन्दर इमारतों के पीछे पहाड़ियों का दृश्य जैसे गज़ब ढा रहा था ! 



मुम्बई आने से पहले हमने फ़ेसबुक पर अपने आने की सूचना इसलिये दी थी ताकि यदि संभव हो तो एक ब्लॉगर मिलन का आयोजन किया जा सके ! लेकिन बारिश , हमारी व्यस्तता और सही संपर्क ना होने से यह संभव ना हो सका ! वैसे भी कुछ एक लोगों को छोड़कर आजकल लगभग सभी आभासी दुनिया मे ज्यादा व्यस्त रहने लगे हैं ! लेकिन सभी विषमताओं के बावज़ूद हमने समय निकालकर एक कार्यक्रम बना ही लिया , मालाड मे रहने वाले श्री हरिवंश शर्मा जी से मिलने का ! देर रात तक उनके घर पर और इस बीच घर के पास मौजूद बीच पर बारिश मे भुट्टा खाते हुए हम चार नौज़वानों ने खूब लुत्फ उठाया !  



आजकल सभी छोटे बड़े शहरों मे मॉल कल्चर खूब पनप रहा है ! सर्दी , गर्मी , या हो बरसात , मॉल्स मे हर समय युवा दिलों की भरमार रहती है ! अधिकतर लोग तो आयु मे भी युवा होते हैं , लेकिन कुछ हमारे जैसे तन से प्रौढ़ लेकिन मन से युवाओं के युवा लोग भी नज़र आ जाते हैं ! 



दिल्ली मे भी मॉल्स मे सिनेमा हॉल होते हैं लेकिन ऐसे नहीं जैसे यहाँ देखे ! हॉल की आखिरी दो पंक्तियों मे रिकलाइनिंग सोफे लगे थे जिन्हे आप सीधे बैठने की पोजीशन से पूरा लेटने की मुद्रा तक एड्जस्ट कर सकते हैं ! यानि आप अपनी कमर के हिसाब से आगे पीछे करते हुए घड़ी घड़ी पोजीशन बदल सकते हैं ! अच्छी बात यह लगी कि यदि फिल्म बोर हो तो आप चैन की नींद सो सकते हैं ! 



दिल ना माने मगर आना भी था ! वो तो समय रहते हमने पहले से ही टैक्सी बुक करा दी थी , वर्ना ऐसी बारिश मे ट्रेन पकड़ना बड़ा मुश्किल पड़ता ! मीटर से डेढ़ गुना किराया तय कर हमने टैक्सी वाले को पहले ही खुश कर दिया था ! लेकिन उसे भी यह आभास नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला था ! एक तो उसकी पचास साल पुरानी फिएट जो अस्सी साल की बुढिया की तरह ज़र्ज़र हालत मे थी, उस पर बारिश का कहर ! सामने वाले शीशे मे भी एक ही वाईपर जिसे वह एक खटका दबाकर एक बार चलाता और बंद कर देता ! शायद एक बार से ज्यादा चलना उसके बस का ही नहीं रहा होगा ! एक समय तो सड़क पर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था !    

वैसे तो मुम्बई की सड़कें अधिक बारिश के कारण आर सी सी से बनाई गई हैं , इसलिये दिल्ली की तरह एक बारिश पड़ते ही गड्ढे नहीं बन जाते ! लेकिन कई जगह पानी की निकासी सही ना होने से हाईवे पर भी पानी भर जाता है , जिससे ट्रैफिक जाम हो जाता है ! हमारे इलाहाबादी ड्राईवर भैया की गाड़ी भी एक दमे के रोगी की तरह मुश्किल से सांस लेती हुई धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी ! हमारी ही उम्र का भैयन भी हमको अंक्ल कहता हुआ बार बार डरा रहा था कि गाड़ी अब बंद हुई और तब बंद हुई ! हमने देखा कि मुम्बई मे मेहनत मज़दूरी करने वाले लोग किसी भी पढ़े लिखे दिखने वाले व्यक्ति को अंकल कहकर ही बुला रहे थे, भले ही उम्र मे वो उससे छोटा हो ! 
अब हाल यह होने लगा था कि हमे डर लगने लगा था कि पता नहीं ट्रेन मिलेगी या नहीं ! हम तो यह सोच कर डर रहे थे कि पता नहीं कैसे स्टेशन पहुंचेंगे और टैक्सी वाला यह सोचकर डर रहा था कि अब वापस कैसे जाउंगा ! अब उसे यह विचार भी सताने लगा था कि उसने कम पैसे मे क्यों हाँ भर दी जबकि वह पहले ही डेढ़ गुना चार्ज कर रहा था ! वह यह सोचकर परेशान था कि आज तो बारिश मे नुकसान हो गया और हम यह सोचकर कि यदि ट्रेन छूट गई तो विमान का टिकेट लेने मे कितने का नुकसान होगा ! इस बीच वह हनुमान का जाप किये जा रहा था कि कहीं टैक्सी बंद ना हो जाये और हम भगवान को याद कर रहे थे कि कहीं ट्रेन ना छूट जाये ! अंत मे दोनो की प्रेयर काम आई और ना गाड़ी रुकी और ना ही ब्रेक फेल हुआ जिसका डर था ! हम समय से पहले ही स्टेशन पहुंच गए थे ! हमने भी उसका ध्यान रखते हुए उसे १०० रुपये ईनाम मे दिये और चल पड़े अपनी मंज़िल की ओर ! 

अब यहाँ बैठे है झेलते हुए दिल्ली की गर्मी !

Wednesday, July 9, 2014

मनुष्य अपने मित्रों से जाना पहचाना जाता है ---


जो ख़ुशी में इतराये ना ,
ग़म से कभी घबराये ना !
ऐसे शख्स का संग भी ,
सत्संग जैसा होता है !

जो ख़ुशी में बुलाये ना ,
ग़म में साथ निभाए ना !
ऐसे शख्स का याराना ,
नादानों जैसा होता है !


जो दिल की बात बताये ना,
दिल की लगी को भुलाये ना !
ऐसे शख्स से दिल लगाना ,
आत्मघात जैसा होता है !




Thursday, July 3, 2014

जब ताई कै चढ़ ग्या ताप -- एक शुद्ध हरयाणवी हास्य कविता !


आज फोकस हरयाणा टी वी चैनल पर एक छोरी को हरयाणवी में समाचार पढ़ते देखकर बहुत हंसी आई ! पहले तो समझ ही नहीं आया कि वो भाषा कौन सी बोल रही थी। फिर स्क्रॉल पर लिखा हुआ पढ़ा तो जाना कि वो तो हरयाणवी बोल रही थी।  उसकी हरयाणवी ऐसी थी जैसे कटरीना की हिंदी ! खैर , उसे देखकर हमें भी जोश आ गया और  ठेठ हरयाणवी में एक हास्य कविता लिख डाली । अब आप भी आनंद लीजिये :


ताई बोल्ली , ऐं रे रमलू
तेरै ताप चढ़ रह्या सै ?

रमलू बोल्या , ना ताई ,
ताई बोल्ली --  रे भाई ,

देखे तू तै बच रह्या सै
पर मेरै चढ़ रह्या सै !

पाहयां में मरी सीलक सी चढ़ गी ,
ज्यां तै हाडां में निवाई  बन गी !

पेडू में दर्द सै , कड़ में बा आ ग्या ,
अर चस चस करैं सै सारे हाथ पां !

पांसुआ में चब्बक चब्बक सी हो री सै ,
मात्थे की नस तै , पाटण नै हो री सै ।

देखे रे छाती में तै हुक्का सा बाज्जै सै !
साँस कुम्हार की धोंकनी सा भाज्जै सै !

काळजा भी धुकड़ धुकड़ कर रह्या सै ,
ऐं रेमेरा तै हलवा खाण नै जी कर रह्या सै !

रमलू बोल्या  री ताई ,
तू मतना करै अंघाई ।

घी ख़त्म हो रह्या सैतू लापसी बणवा ले ,
अर पप्पू की माँ तै पाँह दबवा ले ।

काढ़ा पी ले अर सौड़ ओढ़ कै लोट ज्या  ,
फेर देख यो ताप क्योंकर ना छोड़ ज्या !

ताई बोली , पाँ तै बेट्टा तेरा ताऊ दबाया करै था ,
इसे करड़े हाथां तै दबाता, जी सा आ जाया करै था। 

दिल्ली जात्ता तै मेरी ताहीं गाजरपांख लको कै ल्याया करै था ।
अर देखे जीमण जात्ता ना,  तै बावन लाड्डू खा जाया करै था !

आज तै तेरे ताऊ की याद घणी सतावै सै, 
ऐं रे मुए तू क्यों मन्नै बात्तां में लगावै सै !

पर देख तेरे ताऊ के नाम का चमत्कार ,
उस नै याद कर कै ए उतर ग्या बुखार !

बेट्टा मर्द बीर का तै सात जनम का हो सै साथ,
तू पराई लुगाई कैड़यां कदै मतना उठाइये आँख !

आच्छा माणस वो हो सै जो सदाचारी हो सै  ,
जो पराई औरत कै हाथ न लगावै, वोए ब्रह्मचारी हो सै। 

गीता में लिखा सै , बेट्टा , गीता में।  





नोट : इस कविता में शुद्ध हरयाणवी शब्द इस्तेमाल किये गए हैं।  समझ में न आये तो हम बता देंगे।