Monday, December 19, 2011

अवैध यौन संबंधों में कानून द्वारा लिंग भेद - एक परिचर्चा !

जब भी किसी ब्लॉग पर सामाजिक दृष्टिकोण से कोई सार्थक और उपयोगी लेख प्रकाशित होता है तो उसे समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों में जगह मिल जाती है । इससे उस लेख की उपयोगिता लाखों लोगों की नज़र में आने से और भी बढ़ जाती है ।

इसी तरह यदि समाचार पत्रों में कोई लेख पसंद आए तो उसे क्यों न ब्लोगर्स के सन्मुख प्रस्तुत कर एक सार्थक चर्चा की जाए ताकि उसका प्रभाव अधिकाधिक हो सके ।

इसी विचार से आज प्रस्तुत है हिंदुस्तान टाइम्स के रविवारीय संस्करण में ( ११-१२-२०११) प्रकाशित सत्य प्रकाश जी के लेख पर एक चर्चा

लेख का विषय था - अवैध यौन संबंधों में कानून द्वारा लिंग भेद

Indian Adultery Law :

इस कानून के अनुसार एक विवाहित पुरुष और महिला के बीच , जो पति पत्नी नहीं हैं , अवैध यौन सम्बन्ध होने पर पुरुष को कानून के अंतर्गत अपराधी माना जायेगा लेकिन महिला को नहीं ।

इस सम्बन्ध को अपराध इसलिए माना गया है ताकि विवाह का पवित्र रिश्ता सुरक्षित रह सके ।

पुरुष के अपराधी होने का कारण है,क्योंकि कानून की नज़र में पत्नी को पति की ज़ागीर / संपत्ति माना जाता है । यदि कोई गैर पुरुष किसी दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध बनाता है तो वह उसकी निजी संपत्ति में दखलअंदाजी करता है । इसलिए उस पर केस बनता है ।

इस तरह के अवैध सम्बन्ध में पति तो अपराधी है लेकिन पत्नी नहीं

एक हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसे सही मानता हैउनका यह भी कहना है कि इस तरह के अवैध सम्बन्ध को गैर कानूनी ही माना जाये
उधर कुछ लोगों की यह राय है कि कानून में पति पत्नी दोनों बराबर होने चाहिए ।

भारतीय कानून क्या कहता है ?

भारतीय दंड संहिता की धारा ४९७ के अंतर्गत यदि एक विवाहित व्यक्ति किसी दूसरी विवाहित महिला के साथ बिना उसके पति की रज़ामंदी के यौन सम्बन्ध बनाता है तो वह दोषी माना जायेगा जिसके लिए उसे कैद की सजा हो सकती है । ऐसे में उस महिला पर कोई अभियोग नहीं लगेगा ।
साथ ही धारा १९८ के अंतर्गत एक पति दूसरे पति पर आरोप लगा सकता है लेकिन अपनी पत्नी पर नहीं ।
यानि पत्नी इस आरोप से फ्री है ।

दूसरे देशों में :

ज्यादातर यूरोपियन देशों में एडलट्री अपराध नहीं माना जाता । वहां इस मामले में लिंग भेद भी नहीं है । और कोई सजा भी नहीं । हालाँकि तलाक की नौबत आ सकती है ।
उधर इस्लामिक देशों में इसे घोर अपराध माना जाता है और महिला को पुरुष से ज्यादा दोषी समझा जाता है ।

धार्मिक पहलु :

सभी धर्मों में इसे पाप माना जाता है । इस्लाम में तो इसके लिए सख्त सज़ा का प्रावधान है ।

अब कुछ सवाल उठते हैं आम आदमी के लिए :

* क्या इस मामले में स्त्री पुरुष में भेद भाव करना चाहिए ?
* यदि पति की रज़ामंदी से उसकी पत्नी से रखे गए सम्बन्ध गैर कानूनी नहीं हैं तो क्या वाइफ स्वेपिंग जायज़ है ?
* क्या इस कानून में बदलाव की ज़रुरत है ?

पति पत्नी के सम्बन्ध आपसी विश्वास पर कायम रहते हैंकानून भले ही ऐसे मामले में पत्नी को दोषी मानता हो , लेकिन व्यक्तिगत , पारिवारिक , सामाजिक और नैतिक तौर पर ऐसे में दोनों को बराबर का गुनहगार माना जाना चाहिए

हमारा स्वस्थ नैतिक दृष्टिकोण ही हमारे समाज के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है

65 comments:

  1. लगता है कि पुरुष पर अधिक पाबंदी इसलिए लगाई गई है कि वह ही प्रायः ऐसे अवैध संबंधों की पहल का ज़िम्मेदार पाया जाता है। यह कहना गलत है कि स्त्री पुरुष की संपत्ति होती है। हां, यह स्वाभाविक है कि पुरुष अधिक पोज़ेसिव हो सकता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि इस रिश्ते की डोर उस बारीक रेशमी डोर से बंधी रहती है जिसका नाम विश्वास है। विश्वासघात कोई भी कर सकते हैं- स्त्री हो या पुरुष!

    ReplyDelete
  2. आपने एक अच्छे मुद्दे पर चर्चा की है.
    आपने कहा है कि
    'इस्लामिक देशों में महिला को पुरुष तुलना में ज़्यादा दोषी माना जाता है .'

    यह तथ्य नहीं है .
    इस्लाम में दोनों का जुर्म एक है तो सज़ा भी दोनों के लिए एक ही है .

    आपने धार्मिक पहलू की चर्चा तो की है लेकिन यह नहीं बताया कि हिंदू धर्म शास्त्र सज़ा के मामले लिंगभेद करते हैं या नहीं ?
    ------------
    Please see :
    http://www.testmanojiofs.com/2011/12/1.html

    ReplyDelete
  3. डा० साहब, सभ्य-सामाजिकता का जहां तक सवाल है, यह भोग-विलासिता का एक गैर-जरूरी और मूर्खतापूर्ण पक्ष है! लेकिन चूँकि यहाँ पर बात क़ानून के पुरुष के प्रति भेदभाव पूर्ण होने की की जा रही है अत: जहां तक मैं समझता हूँ ( और जिस तरह के समाज को हम रोजाना फेस करते है ) स्त्री को दोषमुक्त रखने का प्रावधान इसलिए किया गया क्योंकि यदि कोई कमीना किस्म का कामुक इंसान किसी गैर-स्त्री से जबरन सम्बन्ध बनाता है, उसके बाद वह उस स्त्री अथवा उसके पति को इसतरह से भी ब्लैकमेल कर सकता है कि अगर उन्होंने इसकी रिपोर्ट पुलिस में की तो वह यह कहकर की उसने अमुक स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध उसकी सहमती के बाद ही बनाए थे, उस स्त्री को भी सलाखों के पीछे करवा सकता है ( दुर्भाग्य्बश हमारे अनेक नेता और कुछ नौकरशाह ऐसे कामों में माहिर भी है )

    ReplyDelete
  4. नैतिक दृष्टि से तो दोनो बराबर के गुनहगार हैं और इसमे लिंग भेद नही होना चाहिये यदि पत्नी की रजामंदी के बगैर गैर पुरुष संबंध बनाता है और उसमे उसका पति भी शामिल है तो उन दोनो पुरुषो के खिलाफ़ कार्यवाही होनी चाहिये और यदि दोनो की मर्जी से संबंध बनाये जाते हैं तो स्त्री हो या पुरुष दोनो बराबर के दोषी हैं और इसके लिये सजा का प्रावधान एक समान होना चाहिये।

    ReplyDelete
  5. डॉ अनवर ज़माल साहब आपने कितने देशों में पुरुष पर कोड़े पड़ते देखे सुने हैं यौन शरारतों को लेकर .कृपया बतलाएं .सह पत्नी और बहु -पत्नीय समाज में जहां लिविंग टुगेदर भी जायज़ है पर पुरुष और परस्त्री के बीच यौन सम्बन्ध परपुरुष गमन या परस्त्री गमन को अपराध माना जाना ही अब हास्यास्पद लगता है .भारतीय धर्म व्यवस्था सहिष्णु रही है .द्रौपदी का प्रसंग साक्षी है कृष्ण कन्हैया की सह्पत्नियों सोलह हज़ार रानियों का ज़िक्र है पटरानियों के किस्से रहें हैं भारतीय समाजव्यवस्था में .

    ReplyDelete
  6. डॉ अनवर ज़माल जी , वैसे तो यह लेख उपरोक्त लेख की समीक्षा के रूप में है ।
    लेकिन समाचार पत्रों में पढ़ा है कि बलात्कार की शिकार महिला को भी दोषी करार दिया जाता है ।
    जहाँ तक मैं समझता हूँ , हिन्दू धर्म में इसे पाप समझा जाता है लेकिन सज़ा के लिए कोई प्रावधान नहीं है ।

    गोदियाल जी , इस कानून के तहत बलात्कार के केस को अलग रखा जाता है । यह रज़ामंदी से हुए संबंधों के बारे में ही है ।

    ReplyDelete
  7. कानून समाज के भले के लिए बनाये जाते हैं. परन्तु समय के साथ उनके साथ भी खिलवाड शुरू हो जाता है और उसका अनुपयोग भी होने लगता है.शायद ऐसा ही कुछ इस कानून के साथ भी है.
    मेरा व्यक्तिगत विचार है कि कानून हो या सही -गलत की परिभाषा - सभी के लिये समान होनी चाहिए.

    ReplyDelete
  8. सही है कौन कहता है कि कानून की नजर में सब बराबर है। भेद-भाव हर जगह है।

    ReplyDelete
  9. 'हिन्दू' (अमृत, 'गंगाधर' / 'चंद्रशेखर'/ 'सोमेश्वर' आदि शिव के माथे में इंदु) मान्यतानुसार, आरम्भ में शिव जी अर्धनारीश्वर (शरीर और शक्ति / सती), के योग से बने अकेले थे और काशी में रहते थे...उनके प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब समान, माँ के गर्भ में लिंग-भेद तीन (३) माह पश्चात ही आरम्भ होता है (?)...
    अर्थात पृथ्वी का, आरम्भिक आग के गोले के, हवा-पानी से ठण्ड हो ठोस बने बाहरी मिटटी-चट्टान आदि और उसके भीतर, ह्रदय में, लाल जिव्हा वाली 'माँ काली'/ सती आर्थात अग्नि यानि पिघली हुई चट्टानें आदि, जो ज्वालामुखी फटने पर बाहर धरातल में आ फिर से उपरी काल के प्रभाव से मरी मिटटी में जान दाल देती है...

    फिर योगेश्वर विष्णु /शिव की नाभि से ब्रह्मा अर्थात सूर्य / (पृथ्वी के अन्दर से) चन्द्र की उत्पत्ति हुई (और हमारी गैलेक्सी के ही अन्दर असंख्य सितारों और अन्य ग्रहों की भी)... जिनमें से नवग्रहों के सार से पशु आदि से उत्पत्ति कर, आदमी/ किन्नर/ औरत भी 'ब्रह्मा' के प्रतिरूप प्रकृति में व्याप्त विवधता को दर्शाने हेतु बनाए गए... घोर कलियुग के प्रभाव से माती के पुतले/ कंप्यूटर आरम्भिक अवस्था को प्रतिलक्षित कर रहे हैं, क्यूंकि काल की चाल उलटी है - सतयुग से कलियुग अर्थात क्षीर-सागर मंथन के जुपिटर अर्थात गुरु बृहस्पति के देख रेख में विष से आरम्भ किये काल-चक्र में अमृत (शिव) को पाने हेतु...
    ब्रह्मा के चार दिशाओं में चार विभिन्न मुंह (चार मुख्य धर्म) होने के कारण मतिभ्रम का अहसास हो रहा है निरंतर बदलाव वाले मानव जगत में...जबकि निराकार ब्रह्म ही अजन्मे और अनंत होने के कारण परमानन्द स्थिति में सदैव रह सकते हैं...:)

    ReplyDelete
  10. मानवीय-भूल या कृत्य के लिए दोनों बराबर के हकदार हैं !

    ReplyDelete
  11. कानून दोनों के लिए बराबर होने चाहिए ,....ये बात ठीक है ...पर हम लोगो के समाज में आज भी पुरुष की बड़ी से बड़ी गलती को माफ़ कर दिया जाता हैं ...पर औरत की छोटी सी बात भी पहाड़ का रूप ले लेती है ...और अगर बात अनैतिक संबंध से जुडी सामने आती है तो ...ता उम्र उसका जीना दूभर हो जाता है ....एक औरत आपने पति को माफ़ करके जीना सीख लेती है ...पर वही पति ता उम्र ऐसा नहीं कर सकता .......

    ReplyDelete
  12. आपने कहा है कि
    'जहाँ तक मैं समझता हूँ , हिन्दू धर्म में इसे पाप समझा जाता है लेकिन सज़ा के लिए कोई प्रावधान नहीं है ।'
    के बारे में

    @ डा. टी. एस. दराल जी ! जिस बात को धर्मानुसार पाप कहा जाता है उसके लिए धार्मिक व्यवस्था में दण्ड का विधान भी होता है।
    यह बात आपको जाननी चाहिए कि मनु स्मृति में बलात्कार और अवैध यौन संबंधों के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था है।

    मनु स्मृति में अवैध यौन संबंध के लिए दंड

    कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किंचिदपि दापयेत् ।
    जघन्य सेवमानां तु संयतां वासयेद्गृहे ।।
    -मनु स्मृति, 8, 365
    अर्थात उच्चजाति के पुरूष की सकाम सेवा करने वाली कन्या दण्डनीय नहीं है किंतु हीन जाति के पास जाने वाली को प्रयत्नपूर्वक रोके।

    भर्तारं लंघयेद्या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
    तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ।।
    -मनु स्मृति, 8, 371
    जो स्त्री अपने पैतृक धन और रूप के अहंकार से पर पुरूष सेवन और अपने पति का तिरस्कार करे उसे राजा कुत्तों से नुचवा दे। उस पापी जार पुरूष को भी तप्त लौह शय्या पर लिटाकर ऊपर से लकड़ी रखकर भस्म करा दे।

    मनु स्मृति के इसी 8 वें अध्याय में जार कर्म और बलात्कार आदि के लिए दंड का पूरा विवरण मौजूद है।

    http://deepakbapukahin.wordpress.com/2011/08/20/men-and-women-in-manu-smruti-hindi-lekh/

    ReplyDelete
  13. कानूनी पक्ष को सीधे शब्दों में जो समझ आ सके आपने रख दिया. मुझे तो मौजूदा प्रावधान ठीक ही लगता है.

    ReplyDelete
  14. आश्चर्य है आज भी ऐसे क़ानून लैंगिक भेदभाव रखते हैं ....कई पेंशन उत्तराधिकार में पुरुष पत्नी को उत्तराधिकारी बनाने को बाध्य है मगर पत्नी को ऐसी कोई बाधयता नहीं है ..इनके पीछे क्या सोच हो सकती है .....टेम्पटेशन तो फेयर सेक्स की ही और से पैदा किया जाता है :)

    ReplyDelete
  15. आपकी पोस्ट और इस पर हुई टिप्पणियाँ विचारणीय हैं.
    विवादस्पद मुद्दा उठाया है आपने.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
    हनुमान जी से भी विचार विमर्श कर लीजियेगा जी.

    ReplyDelete
  16. डॉ अनवर ज़माल जी , वर्तमान परिवेश में इन पुरातन कथन या आलेखों का कोई महत्त्व नहीं । वर्तमान में सिर्फ और सिर्फ न्यायालय द्वारा लागु कानून का ही पालन करना आवश्यक है ।
    वैसे भी यहाँ बात कानून के सन्दर्भ में हो रही है न कि धर्म के ।
    भारतीय दंड संहिता की धारा ४९७ के अंतर्गत जो दंड का प्रावधान है , वह सही है या नहीं , कृपया इस पर अपने विचार व्यक्त करें तो बेहतर रहेगा ।
    फ़िलहाल तो हमारा चिंतन इसी बारे में है ।

    ReplyDelete
  17. राकेश जी , आप तो वकील भी हैं । कोई राय तो देनी चाहिए ।

    ReplyDelete
  18. apki ray ki prateeksha me hoon .... akhir kya hona chahiye?

    ReplyDelete
  19. यह सही है कि अपराधिक कानून स्त्री और पुरुष में भेद करता है। हमारा संविधान लिंग के आधार पर असमानता बरतने से वर्जित करता है। लेकिन वह लक्ष्य है जिसे प्राप्त किया जाना है। वह वर्तमान स्थिति नहीं है।
    अपराधिक और कुछ अन्य कानूनों में यह भेद तब तक बना रहेगा जब तक कि समाज में स्त्री-पुरुष के बीच वास्तविक समानता स्थापित नहीं हो जाती है। क्या वास्तव में हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के बीच समानता स्थापित हो गयी है? क्या अभी भी कन्या भ्रूण हत्या का अभिशाप मिटा पाए हैं? क्या अभी हम दहेज को समाप्त कर पाए हैं? ऐसे अनेक प्रश्न हैं।

    ReplyDelete
  20. @ डा. टी. एस. दराल जी ! अगर आपने अपनी पोस्ट और टिप्पणी में धर्म का हवाला न दिया होता तो हम भी बलात्कार के विषय में धार्मिक व्यवस्था का ज़िक्र न करते।

    ReplyDelete
  21. नवीन जी , ज़वाब तो साफ है । भले ही कानून में पत्नी को सुरक्षा प्रदान हो , लेकिन शायद ही कोई पति हो जो पत्नी की बेवफाई को सहन कर पाए । कम से कम समाज तो महिलाओं को यह सुविधा प्रदान नहीं करता ।

    कानून की दृष्टि में , जैसा कि द्विवेदी जी ने कहा , अभी समय लगेगा स्त्री पुरुष की समानता में ।
    हालाँकि , आधुनिक विकास के चलते महिलाएं अब किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं रही ।
    फिर भी , सामाजिक स्तर पर पूर्णतय: महिलाओं का उत्थान अभी बाकि है ।

    ReplyDelete
  22. डॉ अनवर ज़माल जी , आप को अभी भी विषय के बारे में कन्फ्यूजन चल रहा है ।
    भाई यह विषय विवाहित स्त्री और विवाहित पुरुष के बीच रज़ामंदी से स्थापित किये गए यौन संबंधों के बारे में है ।
    धारा ४९७ भी इसी बारे में है । इसका बलात्कार से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
    बलात्कार की परिभाषा ही अलग होती है ।

    ReplyDelete
  23. सॉरी, आपकी टिप्पणी में बलात्कार शब्द आया तो हम भी अपनी टिप्पणी में जल्दी में बलात्कार लिख गए। बलात्कार की जगह ‘अवैध यौन संबंध‘ पढ़ा जाए।
    जो श्लोक हमने उद्धृत किए हैं वे भी विवाहित स्त्री और विवाहित पुरुष के बीच रज़ामंदी से बनने वाले अवैध यौन संबंधों के बारे में ही हैं न कि बलात्कार के बारे में।

    ReplyDelete
  24. गंभीर लेख और टिप्पणिया ....
    हार्दिक शुभकामनायें आपको !

    ReplyDelete
  25. हमारे देश में बहुत से ऐसे नियम क़ानून हैं जो यहां की परम्पराओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

    ReplyDelete
  26. मुझे ऐसा लगा की आपने इस लेख के माध्यम से जो सवाल किया उसका जवाब भी आपने स्वयं ही दे दिया :-)"पति पत्नी के सम्बन्ध आपसी विश्वास पर कायम रहते हैं। कानून भले ही ऐसे मामले में पत्नी को दोषी न मानता हो ,लेकिन व्यक्तिगत,पारिवारिक,सामाजिक और नैतिक तौर पर ऐसे में दोनों को बराबर का गुनहगार माना जाना चाहिए।
    इस लेख के माध्यम से उठाये गए प्रश्न का मेरी समझ से एक मात्र सबसे सटीक उत्तर यही है जो आपने लिखा है मैं इस से पूर्णतः सहमत हूँ

    ReplyDelete
  27. हमारे देश में रीती-रिवाज,परंपरा और ऐसे कई चीज़ है जिसे ध्यान में रखकर ही नियम बनाये जाते हैं भले ही लोग उन नियमों को सही तरीके से नहीं मानते हैं! बहुत ही गंभीर विषय को लेकर आपने सुन्दरता से आलेख प्रस्तुत किया है!

    ReplyDelete
  28. जिस समाज में भ्रूण हत्या रोकने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ता हो उस समाज में ऐसे कानून जरूरी हैं। महिला पुरूष बराबर हैं, कहने भर से बराबर नहीं हो जाते। सभी जानते हैं कि एक नारी को पुरूष की तुलना में खुद को स्थापित करने के लिए, अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कितना अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

    ReplyDelete
  29. यौन विषयों खास कर विवाहेतर संबंधों , सन्नी लियोन वगैरह पर हो रही चर्चा के दौरान इस तरह के संबंधों के विधिक पक्षों में निहित लिंग भेद का कारण संभवतः दिनेश राय जी के कथनानुसार हो ? दिनेश जी कथन में स्त्री पुरुष के दरम्यान वास्तविक समानता की कल्पना की गई है ! समानता के इस स्तर पर पहुंचने में पता नहीं कितना वक़्त लगेगा ?
    विषयान्तर ही सही पर दिनेश जी के अभिमत को सिद्ध करता एक और उदाहरण ...आयकर में स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में अधिक स्पेस भी कानून के इसी मर्म / मंतव्य को आगे बढाता है ! हमें भले ही लिंग भेद लगे !

    ReplyDelete
  30. पहली बात हमारे कानून जब बने थे तब से समय आगे चला गया हैं

    According to Section 497 of Indian Penal Code a person is guilty of adultery is a crime.
    Essentials of Adultery:- The prosecution must prove the following things for convincing an accused on a charge of adultery-

    That the accused had sexual intercourse with the woman in question;
    That she was the lawful married wife of another man;
    That the accused knew or had reason to believe that she was the lawfully married wife of another man;
    That the husband of the woman did not consent to or connive at such intercourse;
    That the sexual intercourse so had did not amount to rape.

    http://legalpoint-india.blogspot.com/2009/01/adultery-is-offence-under-indian-penal.html

    आप जिस कानून की बात कर रहे हैं उसके बनते समय स्त्री किसी ना किसी की पत्नी ही होती थी और किसी की पत्नी के साथ सम्बन्ध रखना क़ानूनी अपराध था । इस में लिंग भेद की बात इस लिये नहीं थी उस समय क्युकी उस समय स्त्री का अस्तित्व ही नहीं था वो केवल किसी की पत्नी मात्र थी


    समाज में स्त्री का अस्तित्व ही नहीं हैं वो केवल पत्नी हैं और इसलिये अस्तित्व ना होते हुए भी भी कानून ने उसके अधिकारों का प्रोटेक्शन किया हैं क्युकी समाज ने अधिकार दिये ही नहीं हैं ।
    आज भी आप को ऐसे लोग मिल जाये गए जिनकी द्रष्टि में स्त्री केवल और केवल वासना पूर्ति का साधन मात्र हैं और वो इस सोच को गलत नहीं मानते ।
    अगर समाज ने अपनी सोच सही रखी होती जैसा दिनेश जी ने कहा तो असमानता ही नहीं होती ।
    लिंग भेद समाज की देन हैं कानून ने केवल उसके बचाव में अधिकार प्रदान किये हैं स्त्री को

    अब क्या आप जानते हैं की अगर किसी की पत्नी का बैंक अकाउंट हैं केवल उनके नाम से तो पति उत्तराधिकारी नहीं हैं । बैंक पति को नहीं ये पैसा पत्नी के निधन के बाद उसके बच्चो को ही देगा । कारण बैंक मानता हैं की पत्नी का पैसा जरुरी नहीं हैं की आप का ही दिया हो वो उसके मायके , उसके बच्चो का भी दिया हो सकता हैं । जिन लोगो को इस बात पर विश्वास ना हो वो बैंक से पता कर सकते हैं
    आप इसको भी लिंग भेद मान सकते हैं पर आज पुरुष वर्ग लिंग भेद की बात महज इस लिये करता हैं क्युकी नारी लिंग भेद को लेकर सजग हो गयी हैं ।

    ReplyDelete
  31. जानकारी हेतु ये पोस्ट भी देखे
    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/05/blog-post_31.html

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/08/blog-post_19.html

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/05/blog-post_22.html

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/blog-post_21.html


    नारी हमेशा दोयम रही हैं समाज में और इस लिये संविधान और कानून ने उसके अधिकारों को बढ़ा कर उसको सुरक्षित किया हैं । जैसे जैसे समय बदलेगा , समानता आयगी लिंग भेद का नज़रिया पुरुषो को रीवार्सल जैसा लगेगा ।

    और यौन संबंधो में शुचिता की बात अगर सब मान ले तो सजा का प्रावधान ही ख़तम हो जाए । यहाँ भी बेशक कानून में स्त्री के लिये सजा का प्रावधान ना हो पर समाज ने स्त्री के लिये "दूसरी औरत " का नाम दे कर सजा का प्रावधान कर रखा हैं ।
    आप ने कभी "दुसरा पुरुष " जैसी शब्दावली कहीं सुनी हो तो कहे ।

    ये हैं लिंग भेद लिखना हो तो इस पर लिखे , लोगो को भ्रमित करने वाली पोस्ट हैं ये

    ReplyDelete
  32. @ रचना --
    लोगो को भ्रमित करने वाली पोस्ट हैं ये--
    रचना जी , भ्रमित न हों । यह पोस्ट एक लेख पर चर्चा है जिसमे आपसे कुछ सवालों के ज़वाब मांगे गए हैं , आपके विचार अनुसार ।

    आपने एडल्ट्री को सही परिभाषित किया है जो कानून में लिखा है । साथ ही , यह भी सही है की ये कानून बहुत पहले बनाया गया होगा जब महिलाओं के अधिकारों का हनन होता था । लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि अब समय बदल गया है , इसलिए इस कानून को भी बदलना चाहिए ।

    अब महिलाएं भी स्वावलंबी और स्वतंत्र हैं , अपना खाता रखने के लिए भी जिस पर सिर्फ उसी का अधिकार होता है । वो अब सिर्फ पत्नी भी नहीं है ।

    एक बात और --That the husband of the woman did not consent तो-- what if the husband gives consent ?

    ReplyDelete
  33. अगर दो बालिग रज़ामंदी के साथ यौन संबंध बनाते हैं तो ये नैतिक रूप से बेशक गलत हो लेकिन क़ानून के लिए उसमें ज़्यादा गुंजाइश नहीं होनी चाहिए....

    आजकल टीवी पर एक एड आती हैं...शायद ऑफिसर्स च्वायस...जिसमें एक महिला को सिड्यूसिंग अंदाज़ में देखकर कुछ दोस्त अपने दोस्त से कहते हैं...चला जा, ऐश कर...वाइफ़ को पता नहीं चलेगा...इस पर दोस्त वहां से उठते हुए कहता है...वाइफ़ को पता न चले लेकिन मुझे तो पता रहेगा...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  34. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि अब समय बदल गया है , इसलिए इस कानून को भी बदलना चाहिए ।
    dr dral
    maene jitni bhi post kaa link diyaa haen aap ko un mae sab mae yahii kehaa haen ki kanun / samvidhaan sab ko barabar adhikaar daetaa haen samaaj nahi daetaa

    aaj bhi log mahila sashaktikarn kae virodh me haen
    aaj bhi log pink chaddi aur slut walk to mahila ke virodh kaa prateek haen usko sahii nahin maantae aur
    wahii naabalig ladkae kae sperm baechane ko sahii mantae haen

    aap khud soch kar daekhae kyaa badalane ki jarurat haen yae kanun jis ki vajah sae hazaro lakho mahila surakshit haen yaa wo soch jiski vajah sae hazaro lakho mahila asuraskshit

    bhramit karnae waali post is liyae kehaa kyuki ismae yae kanun kyun aesaa haen yaa banagyaa haen uski koi vivechna hi nahin hui haen

    ReplyDelete
  35. That the husband of the woman did not consent तो-- what if the husband gives consent ?


    sir with due respect

    in so many homes in indian villages the woman are being sent by their husbands to the person from whom they took a loan
    in so many elite homes the woman marries a nri and latter finds out that she is being taken to an arabian country for flesh trade

    its still happening and that is why the court of law is bent towards woman

    writing on reverse gender bias is not wrong but keep in mind the suppressed has been suppressed for centuries and the law and constitution is going to protect the suppressed

    ReplyDelete
  36. --anavar jamaal jee
    भर्तारं लंघयेद्या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
    तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ।।..श्लोक में..
    ..संस्थाने बहुसंस्थिते ।। का अर्थ ..’उस पापी जार पुरूष को भी तप्त लौह शय्या पर लिटाकर ऊपर से लकड़ी रखकर भस्म करा दे”..कहां से आया ।
    ---वास्तव में यह आलेख भ्रामक तो नहीं है परन्तु निष्कर्ष हीन है, परन्तु यह विषय ही एसा है । हां विश्वास की बात एक निष्कर्ष तो है परन्तु प्रश्न तो विश्वास के टूटने के बाद का है ...
    -- रचनाजी का भाव प्रायः अतिरेकता सम्पन्न होता है और जल्दबाजी में एक तरफ़ा...सम्न्वयवादी द्रष्टिकोण होना चाहिये ..

    --- स्त्री-पुरुष भेद तो प्रक्रिति ने बनाया है सदा रहेगा ही , चाहे जितना उन्नत होजायं..चिल्लाते रहें...आग और पानी को किस प्रकार अभेद किया जा सकता है ...न कभी दोनों आग बन पायेंगे न पानी ....
    "भेद रहा है सदा रहेगा,
    भेद-भाव व्यवहार नहीं हो।’...यही सत्य है...
    ---स्त्री-पुरुष भेद के कारण ही हिन्दू धर्म ग्रन्थों व आज के कानून में भी पुरुष को अधिक दोषी माना गया है..जो जितना समर्थ होता है उसका उतना ही अधिक दोष होता है ...
    ---कानून भी सदा उस समाज की एतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक व प्रचलित विश्वासों के अनुसार ही बनते हैं कहीं ऊपर से बन कर नही आते.....
    ----समस्या का मूल तो मानव-मात्र के आचरण में है ।

    ReplyDelete
  37. @ डा. श्याम गुप्ता जी ! मनु स्मृति का यह अनुवाद महान विद्वान डा. चमन लाल गौतम जी ने किया है . इस विषय में आप संस्कृति संस्थान बरेली से संपर्क करें .

    Please see this post's link on
    http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/12/blog-post_5807.html

    ReplyDelete
  38. कानून का बारिकी से अध्‍ययन नहीं है अत: कोई टिप्‍पणी नहीं। वैसे दोषी दोनों हैं।

    ReplyDelete
  39. JC said...
    सारी समस्या काल के प्रभाव की जानकारी न होने की है... प्राचीन हिन्दुओं के अनुसार, 'हम', अमृत शिव के घोर कलियुगी प्रतिरूप हैं, और इस युग में संभव ही नहीं है मानव में सम्पूर्ण ज्ञान होना, जैसा सत युग में संभव हो पाया होगा क्षीर-सागर मंथन के पश्चात - विष से आरम्भ कर देवताओं के अमृत होने के बाद... मानव मस्तिष्क में अरबों सेल होने के बावजूद, सबसे ग्यानी पुरुष भी आज केवल नगण्य सेल का उप्तोग ही कर पाता है, और हिन्दू मान्यता भी है कि कलियुग में कार्य क्षमता सत युग की तुलना में केवल २५ से ०% घट के रह जाती है कलियुग के दौरान... ("मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी"...:(
    अज्ञानता वश, 'समुद्र-मंथन' के आरम्भ में 'विष' उत्पन्न होने के कारण, और विषैले शुक्र ग्रह द्वारा जनित प्रकृति में द्वैतवाद, सत्य-असत्य के भ्रम के कारण, हमारे लिए 'परम सत्य', अर्थात निराकार ब्रह्म को जान पाना लगभग असंभव है...
    आम आदमी अपने को असमर्थ पा रहे हैं 'योग माया' को तोड़ पाने में... और समस्या बढ़ती ही जा रही है समय के बीतने के साथ साथ... अन्ना हजारे की टीम और सांसदों के बीच महाभारत का वाक् युद्ध नाद ही पैदा कर रहा है जैसा कि आरम्भ में ब्रह्मनाद रहा होगा - सृष्टि से पहले...:(

    December 20, 2011 12:23 PM

    ReplyDelete
  40. खुशदीप सेहगलजी से सहमत
    जी विश्वनाथ

    ReplyDelete
  41. पत्नी पति की जागीर न मानी जाए,तो भी,केवल पति-पत्नी के बीच यौन-संबंध जायज है। इससे इतर,सहमति से हो कि अन्यथा,ग़लत है और यह कानून-सम्मत हो तो भी निषिद्ध ही रहना चाहिए।
    अगर सर्वेक्षण किया जाए तो आप पाएंगे कि जिन कारणों से कानून को महिलाओं के पक्ष में बनाया गया था,वैसे मामलों की संख्या लगातार घटी है जबकि कानून का दुरूपयोग कर पुरूषों को फंसाने के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। तुर्रा यह कि महिला अगर रज़ामंदी से भी कुछ करे,तो भी उसे पुरूषों द्वारा "फंसाया गया" बताया जाता है। इसलिए पुरूष को तो हर हाल में लपेटो। वो करें तो लीला,आप करें तो कैरेक्टर ढीला! मनोचिकित्सक सहकर्मी आपको बता सकते हैं कि नारीवादी कानूनों के कारण,कितने ही पुरूष मेंटल हो गए हैं और कई अन्य बस होने ही वाले हैं!

    ReplyDelete
  42. उपरोक्त टिपण्णी पर सहमती और असहमति से उठे सवाल और उस पर कुछ अपने पहलु रखने से पहले एक बात मन में आई है जिसे रखने से शायद मेरे मन की दुविधा जरुर कम होगी ...सवाल है विवाहित पुरुष और स्त्री में अवैध- यौन सम्बन्ध उचित या अनुचित , उस पर कठोर दंड व्यवस्था ........हर देश के अलग अलग कानून हैं पर भारत में धार्मिक तौर पर इसे सभी धर्मों पर पाप माना गया है क्यों ?? ये मनु स्मृति भी तो किसी पुरुष का ही लिखा है और भी जितने धार्मिक ग्रन्थ हैं उसे लिखनेवाले भी पुरुष हैं . पर ऐसे किसी भी सम्बन्धों पर नारी को समाज में ज्यादा जलालत मिलती है पुरुषों को कम ,समाज में विवाह का बंधन बना रहे, नैतिकता के तौर पर समाज स्वच्छ बना रहे इसीलिए ऐसे धार्मिक विधान बने ,फिर भी ऐसे कई उदहारण हैं जिसमे कठोर दंड न्यायिक हो या सामाजिक उसका डर और भुगतान नारी को ही मिलता है , सहमती हो तब भी असहमति हो तब भी . पर ऐसे सम्बन्ध क्यों पनप जाते हैं ये ना तो हम सोंचते हैं ना समाज ,जब दो लोगों से बनी जीवन की गाड़ी में कुछ खराबी आ जाये जिससे एक से दूरी किसी और से नजदीकी का कारण बन जाती है , जब समाज ये विधान तय करता है पति-पत्नी में ही सम्बन्ध हो ,तो फिर ये तय क्यों नहीं करता कि आपस में बंधने के बाद अपने व्यवहार से,अधिकार से सामनेवाले पक्ष को आहट ना करें ,उसे अपने समान ही मने तभी ये गाड़ी ठीक से आगे चलेगी, क्योंकि आज सचमे समाज बदल रहा पुरुषों कि तरह स्त्रियाँ भी अपने आप को सम्मानित और प्यार से पोषित देखना चाहती हैं, कभी समय था जब उसे पाठ पढ़ाया जाता था वो पुरुष कि जरखरीद गुलाम है और वैवाहिक जीवन में आये उतार चढ़ाव, तनाव को अकेले हँस कर झेल जाती थी, पर जहाँ भी ऐसे सम्बन्ध बनते सुने गए हैं वहा सबसे पहली कमी विवाहित जीवन में एक दुसरे के ओर से आई संवेदनाओं कि कमी है ,और जब ऐसे रिश्ते फिसल जाते हैं तो धार्मिक न्याय, दंड कानून और समाज अपने तर्कों पर तौलने लगते हैं ............

    ReplyDelete
  43. विवाहित व्यक्ति के विवाहेतर सम्बन्ध केवल नैतिकता के कटघरे में आ सकते हैं न कि कानून के। वे तलाक का आधार हो सकते हैं किन्तु कैद का नहीं। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। कानून बदलना चाहिए। सब जानते हें कि जो कानून है वह तब का है जब स्त्री सम्पत्ति मानी जाती थी। मुझे नहीं लगता कि यह स्त्री के पक्ष में बनाया गया था।
    यदि विवाहित पुरुष अविवाहित स्त्री से सम्बन्ध सथापित करता है तो उसे क्या कहेंगे?
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  44. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

    ReplyDelete
  45. बढ़िया बहस चल रही है..और चले..मैं अपने मत पर कायम हूँ।

    ReplyDelete
  46. गंभीर विषय पर अच्छी चर्चा,क़ानून सबके लिए समान है दोषी दोनों है
    समय के मांग के अनुसार कानून में परिवर्तन होना चाहिए,..

    नये पोस्ट की चंद लाइनें पेश है.....

    पूजा में मंत्र का, साधुओं में संत का,
    आज के जनतंत्र का, कहानी में अन्त का,
    शिक्षा में संस्थान का, कलयुग में विज्ञानं का
    बनावटी शान का, मेड इन जापान का,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

    ReplyDelete
  47. कानून सारे अंग्रेजों के समय से चले आ रहे हैं और आज ऐसा मकडजाल बन गया है कि 'आधुनिक भारत' के लिए प्रसिद्द है, "You show me the man, I will show you the rule"!

    ReplyDelete
  48. रजनी जी , सविता जी , मुझे भी यही लगता है कि बदलते वक्त को कोई रोक नहीं सकता । समय के साथ हमें भी बदलना पड़ेगा । और नई पीढ़ी बदल भी रही है । तभी तो लिव इन रिलेशनशिप , सिंगल मदर और एल जी बी टी जैसे शब्द यहाँ भी स्वीकार्य होने लगे हैं ।
    ऐसे में इन संबंधों को भले ही सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनैतिक और पाप समझा जाये , कानूनी तौर पर अपराध नहीं माना जाना चाहिए , वेस्ट की तरह ।
    जब अपराध ही नहीं होगा तो भेद भाव की बात अपने आप ही ख़त्म हो जाएगी ।
    इन सम्बन्धों को अनैतिक और विवाह के पवित्र बंधन के विरुद्ध तो पश्चिमी देशों में भी माना जाता है । तभी तो यह तलाक का वैध कारण बनता है ।
    समाज में नैतिकता और स्त्री को सम्मान कानून द्वारा नहीं , बल्कि समाज के आचरण द्वारा ही दी जा सकती है ।

    ReplyDelete
  49. yeh ek gambheer mudda hai sabhi ke tarq vitarq padhe bahas achchi hui hai jab ki baat bilkul saaf hai ki avaidh sambandh natikta,samajikta aachar sanhita sabhi roop se nindneeya hai agar dono married vyakti isme lipt hain to dono hi barabar ke doshi hain dono hi to vivaah jaisi pavitra sanstha/bandhan ka majaak bana rahe hai atah kaanoon barabar hone chahiye.

    ReplyDelete
  50. .
    .
    .
    Indian Adultery Law :

    इस कानून के अनुसार एक विवाहित पुरुष और महिला के बीच , जो पति पत्नी नहीं हैं , अवैध यौन सम्बन्ध होने पर पुरुष को कानून के अंतर्गत अपराधी माना जायेगा लेकिन महिला को नहीं ।

    इस सम्बन्ध को अपराध इसलिए माना गया है ताकि विवाह का पवित्र रिश्ता सुरक्षित रह सके ।

    पुरुष के अपराधी होने का कारण है,क्योंकि कानून की नज़र में पत्नी को पति की ज़ागीर / संपत्ति माना जाता है । यदि कोई गैर पुरुष किसी दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध बनाता है तो वह उसकी निजी संपत्ति में दखलअंदाजी करता है । इसलिए उस पर केस बनता है ।

    इस तरह के अवैध सम्बन्ध में पति तो अपराधी है लेकिन पत्नी नहीं ।

    एक हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसे सही मानता है । उनका यह भी कहना है कि इस तरह के अवैध सम्बन्ध को गैर कानूनी ही न माना जाये ।


    मेरी राय में राष्ट्रीय महिला आयोग की सिफारिश सही है, विवाहेतर दूसरे किसी विवाहित से शारीरिक संबंध सामाजिक व नैतिक रूप से गलत हैं तथा अपने जोड़ीदार के प्रति विश्वासघात हैं पर इन्हें गैरकानूनी कह किसी को अपराधी मानना चीजों को जरूरत से ज्यादा आगे ले जाना है... इस तरह के संबंध अपराध तो निश्चित ही नहीं हैं और न ही माने जाने चाहिये किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक समाज में...



    ...

    ReplyDelete
  51. JC said...
    अपन 'इतिहासकार' नहीं हैं... किन्तु जैसे छोटी सी वस्तु भी नुछ न कुछ लाभदायक कार्य करती है, झूट-सच इतिहास भी कुछ न कुछ लाभदायक काम करता ही होगा...
    यदि मन में प्राचीन भारत को देखें तो अंग्रेजों का आगमन तब हुआ जब देश का राज पश्चिम दिशा से (जिसका राजा शनि देवता को नाबा जाता है, और धातु लोहे और 'आकाश' समान नीले रंग से सम्बंधित), मैदानी रास्तों से, (कांसे से बनी कमजोर तलवार की तुलना में लोहे की तलवार लिए आये अधिक शक्तिशाली) गुलाम वंश के राजाओं से आरम्भ कर मुग़ल राजाओं के पास था... और तत्कालीन हिन्दुओं को उसके पतन के आसार दिख रहे होंगे (औरंगजेब के राज में हिन्दुओं पर तथाकथित अत्याचार के कारण इच्छा?) ... वे इस लिए पश्चिम देशों से जल-मार्ग से लोहे की अधिक शक्तिशाली तोप लिए आये, विशेषकर अंग्रेजों के आगमन पर, संभवतः प्रसन्न हुवे होंगे... और कुछ हिन्दू राजाओं ने उनकी सहायाता भी की होगी अपना-अपना राज्य स्थापित करने हेतु... और यह भी सभी को पता हैं कि अंग्रेजों ने अपने सख्त कानूनी तंत्र पर धीरे धीरे 'भारत' में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण संसार में से लगभग ५०% भाग में कॉलोनियां बना लीं... और यह प्रसिद्द हो गया कि उनके राज में (राम-राज्य समान?) सूर्योदय ही नहीं होता!
    किन्तु अफ़सोस कोई भी मानवी व्यवस्था अभी तक १००% सही नहीं पायीं गयीं हैं - हर राज का उत्थान होता है तो पतन भी निश्चित है :(

    December 21, 2011 7:29 AM

    ReplyDelete
  52. http://hindi-vishwa.blogspot.com/2011/12/blog-post_21.html

    ReplyDelete
  53. नैतिकता के मापदंडों के अनुसार स्त्री और पुरुष दोनों को ही समान रूप से दोषी माना जाना चाहिए ....
    वही यह भी सत्य है कि हमारी सामाजिक व्यवस्थाओ के अनुसार स्त्रियाँ कमजोर रही हैं , उन पर दबाव की सम्भावना अधिक होती है , इस लिए कानून की दृष्टि से स्त्रियों को सुरक्षित रखने के लिए इस प्रकार के कानूनी प्रावधानों को रखा जाना उचित समझा गया हो !

    ReplyDelete
  54. रचना जी , यह पोस्ट मैंने भी पढ़ी । इसके आखिरी पैरा में न्यायालय द्वारा दिया गया सुझाव ही असली समाधान लगता है ।
    हमारा भी यही विचार है ।
    अब समय आ गया है कि स्त्रियाँ इस कानून के बिना भी सुरक्षित रहें और महसूस करें ।

    ReplyDelete
  55. ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती .और फिर यह तो दिल लगे का सौदा है दिल्लगी का नहीं .नैतिकता के मानदंड बदल रहें हैं कोई माने या न माने बेगार ढोए ढ़ोता रहे ...

    ReplyDelete
  56. 'सूर्यास्त' लिखना था सूर्योदय टंकण कर बैठा :(

    ReplyDelete
  57. अब समय आ गया है कि स्त्रियाँ इस कानून के बिना भी सुरक्षित रहें और महसूस करें ।


    abhi kam sae kam 50 varsh kaa samay lagegaa

    ReplyDelete
  58. जब आपसी सम्बन्ध बिना किसी दबाव के बन्ने ही हैं और बन रहे हैं तो कोई तो वजह होगी ... और जब वो वजह सही है तो फिर किसी एक या किसी को भी दोष देना कहाँ तक उचित ... परिपक्व होने के बाद ऐसी किसी भी बात को क़ानून की बजाय आपसी रिश्तों की तरह से देखा जाना चहिये ...

    ReplyDelete
  59. JC said...
    'भारतीय कानून' की बात करें तो, सिनेमा में सब देखते आते हैं हर प्रत्यक्षदर्शी को गीता पर हाथ रख कहते "मैं जो भी कहूँगा, सच कहूँगा/ और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा"... एक वकील को भी एक दिन टीवी पर कहते सूना कि वकील जब कोई केस लेता है तो वो सत्य को जानने के पश्चात ही केस लेता है... किन्तु यदि वो या उसका मुवक्किल सच बोले तो यह 'घोड़े की घास से दोस्ती' समान होगा :) और जो भी झूट-सच बोला जाता है उस के आधार पर जिस भी पूर्व निर्धारित सेक्शन आदि से कोर्ट को लगता है जज निर्णय लेते हैं...
    ९९% भारतीयों के लिए गीता में लिखे शब्द "काला अक्षर भैंस बराबर' कहावत को सार्थक करते हैं... गीता में तो शरीर को तो (अजन्मे और अनंत) आत्मा के वस्त्र समान माना गया है :) और हिन्दुओं के अनुसार सभी आत्माएं अमृत शिव, परमेश्वर, के ही प्रतिरूप हैं जो माया के कारण विभिन्न वस्त्र-रुपी शरीर के दृष्टि-दोष के कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं...
    गीता के हीरो कृष्ण किन्तु ख गए कि वो मानव रूप में बार-बार स्वयं आते रहते हैं... इस कारण विश्वास और इंतज़ार आवश्यक है, सब ठीक होने के लिए...(नेपथ्य में ef एम् रेडियो में गाना आ रहा है, "है ये माया..."!)...

    December 21, 2011 7:39 PM

    ReplyDelete
  60. जे सी जी , कानून में जब तक गुनाह साबित नहीं होता , तब तक मुल्ज़िम --मुज़रिम नहीं होता ।
    लेकिन अफ़सोस , अक्सर गुनाह साबित ही नहीं होता ।

    ReplyDelete
  61. डॉक्टर दराल जी, यहीं पर मूल प्रश्न उठ जाता है "ऐसा क्यूँ हो रहा है?" और, हमारे पूर्वज प्रार्थना कर ऐसा कुछ क्यूँ कह गए (निराकार भगवान् से?), " सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे शन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् । "
    यानि सभी सुखी, स्वस्थ, और सभ्य हों तो दुःख का सवाल ही नहीं उठता (?)...
    और इसका कारण?
    प्रभु (प्र + भू|, अर्थात जो पृथ्वी के आने से पहले भी, वर्तमान पृथ्वी के केंद्र में, नादबिन्दू, अर्थात निराकार अनंत शक्ति रूप में अनादिकाल से परमानंद स्थिति में विद्यमान था, यह शरारत उसी नटखट नंदलाल की है :)

    ReplyDelete
  62. आज जब महिलाएं हर कार्य मैं आगे हो रही है और नर नारी को एक सामान अधिकार देने कि बात हो रही है तो बदलते ज़माने के हिसाब से या तो ज्यादातर यूरोपियन देशों की तरह इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए या फिर कानून की पेचीदगियों को दूर करते हुए इसमें पुरुष के साथ साथ महिला को भी बराबर की दोषी माना जाये.कानून में किसी प्रकार का लिंगभेद नहीं होना चाहिए .क्योंकि जिस प्रकार कुछ महिलाएं समाज के ड़र और पारिवारिक इज्ज़त के कारण अपने पति के हरकतों को बर्दाश्त करती हैं उसी प्रकार कुछ ऐसे पति भी होतें हैं जो समाज और इज्ज़त के कारण से अपनी पत्नी की हरकतें देखते हुए भी घुटते घुटते मर जाते हैं. ज़रूरत तो यह है की औरत और आदमियों के बारे मैं समाज की जो गलत सोच है उनको बदला जाये.ताकि कहीं पर नर और नारी के नाम पर भेद न हो अभी तक समाज ने औरतों के साथ जो ज्यादती की है वो अब २१वी सदी में न हो और न तो औरत और न ही आदमी एक दूसरे के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हों.

    ReplyDelete
  63. डॉ साहेब आपने बहुत अच्छा विषय उठाया है . आगे भी आप इसी तरह के मुद्दों को उठाते रहेंगे ऐसी आशा हम करते हैं . धन्यवाद !

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया अंकित जी । प्रयास जरी रहेगा ।

      Delete