Monday, December 20, 2010

दिल्ली की शादियाँ --भाग II

इससे पहले कि हम दिल्ली में शादियों की श्रंखला को आगे बढ़ाएं, मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ , मर्मज्ञ: "शब्द साधक मंच"वाले श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी का , जिन्होंने अंतर्मंथन का सौवां फोलोवर बनकर इस नाचीज़ को भी ब्लॉग जगत के विशिष्ठ ब्लोगर्स की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया ।

आखिर कछुए की चाल चलते हुए हमने भी सीमा रेखा को छू ही लिया

पिछली पोस्ट में हमने शादियों में व्यर्थ होने वाले खाने के बारे में चर्चा की ।

आइये अब देखते हैं शादियों का एक और रूप । यदि शादी में बदइन्तजामी हो जाए तो क्या हाल होता है । प्रस्तुत है आँखों देखी , ऐसी एक शादी का आँखों देखा हाल :

एक शादी में हमने , देखा अज़ब नज़ारा
बरात में जाने कैसे , शहर पहुँच गया सारा

जब खाना खुला पौने ग्यारा , तो ऐसी अफ़रा तफ़री मची
कि पलक झपकते ही प्लेट , और चम्मच एक बची

खाने की तलाश में लोग , खानाबदोश से भटक रहे थे
एक प्लेट में तीन तीन मिलकर , खाना गटक रहे थे

एक बेचारा तो लिए हाथ में , खाली फ़ॉर्क घुमा रहा था
दूसरा किस्मत का मारा , सीधे डोंगे में ही खा रहा था

लोग भोजन के नवीनतम आविष्कार कर रहे थे
गुलाब जामुन को उछाल , सीधे मूंह में धर रहे थे

अस्तित्त्व के इस संघर्ष में ,उस दिन ऐसी नौबत आई
जीवन में पहली बार हमने भी , आइसक्रीम हाथ से खाई

क्रमश:---

35 comments:

  1. दराल साहेब,
    शादी में ढेर सारी स्टाल्स पर खाने में बहुत मज़ा आता है।
    बहुत ही अच्छी प्रस्तुति..

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  2. खाने की तलाश में लोग , खानाबदोश से भटक रहे थे
    एक प्लेट में तीन तीन मिलकर , खाना गटक रहे थे ।
    ................बहुत खूब, लाजबाब !

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  3. लोग किस हद तक मंदी की मार झेल रहे है आपके उपरोक्त व्यंग्य काव्य से झलक रहा है डा० सहाब ! :)

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  4. मुझे लगता है न सिर्फ दिल्ली में बल्कि हर शहर की शादियों में आज कल यही हाल रहता है.यदि हम अनुशासन में रहें तो ऎसी स्थिति से निपट सकते हैं.खुद भी खाने का मज़ा ले सकते हैं और बाकी लोग भी.

    सादर

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  5. aajkal ki shaadiyon mein yehi haal hai/...

    mere blog par bhi kabhi aaiye
    Lyrics Mantra

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  6. ha ha ha..
    bada hi mazedaar haal bayan kiya hai aapne...amooman yahi haal sab jagah hote hain...

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  7. अस्तित्त्व के इस संघर्ष में ,उस दिन ऐसी नौबत आई
    जीवन में पहली बार हमने भी , आइसक्रीम हाथ से खाई ।

    हा हा बहुत ही मजेदार चित्र खींचा है....

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  8. बहुत अच्छी श्रृँखला है इसी तरह लिखते रहे ।

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  9. हा हा अच्छी कमेंट्री और व्यथा कथा सुनायी और वाह की कविताई !

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  10. हा..हा..हा..बफैलो सिस्टम का दर्द बड़ी कुशलता से बयान किया आपने।

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  11. दिल्ली की शादी श्रंखला रोचक लग रही है कृपया क्रम बनाये रखें .... मजेदार

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  12. सर बफर की जगह पंगत प्रथा(जमीन पर बैठकर पत्तल में खाना परोसा जाता है) अच्छी होती है उसमें इस तरह की झंझट तो नहीं रहती की खाने के लिए संघर्ष करना पड़े ....

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  13. दिल्ली में ऐसी शादियाँ करीब २० साल पहले होती थी । तब बरात के आने तक खाना नहीं खुलता था । ऐसे में बरात के लेट होने पर सारा इंतजाम गड़बड़ा जाता था ।

    आजकल बरात के आने का इंतजार नहीं करते । खाना चलता रहता है , बरात आये न आये ।
    दूसरा, खाने के लिए स्नेक्स की इतनी वेराइटी होती है कि असली खाने की naubat ही नहीं आती ।

    इसका दिलचस्प वर्णन अगली पोस्ट में ।

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  14. पण्डे जी , मिस्र जी , शायद आप बुफे सिस्टम की बात कर रहे हैं ।
    पंगत में बैठकर खाए हुए तो ३० साल हो गए । अब तो यहाँ गाँव में भी बुफे सिस्टम ही होता है ।

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  15. बुफ़े भी हो तो लोगो को थोडा ध्यान से खाना चाहिये, बीच बीच मे घुस घुस कर लाईन को नही तोडना चाहिये, एक बार जितना खाना हो ले ले, हर पांच मिंट बाद लाईन मे घुसना..... तोबा तोबा

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  16. भगवान् बचाए ...शुभकामनायें आपको !

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  17. आज कल तो कई बार बारात के आने से पहले ही आधे लोग खा कर घर भी पहुच जाते है और बुफे होने के बाद ही एक बार में ही सारे खाने के आइटम प्लेट में भर लेते है एक के ऊपर एक जैसे दुबारा खाना मिलेगा ही नहीं और एक लम्बी डकार लेने के बाद कहते है की खाना बेकार था |

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  18. युगल जोड़ी को सारे मेहमान बस इतना बता रहे हैं
    जीवन अफरा-तफरी है प्रायोजित प्रोग्राम दिखा रहे हैं

    बहुत ही बढ़िया,
    आभार..

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  19. mazedar khaka kheecha aapne.........

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  20. डा .सा :आपने दिल्ली का हवाला दिया है लेकिन सब जगह एक ही हाल है.नक़ल की होड़ा -होडीऔर व्यर्थ का दिखावा ही इसकी जड़ में है. शायद आपको भी याद होगा -जब ज्योत्रदित्य सिंधिया की शादी हुयी थी ,उन्ही दिनों दिल्ली के ही पास शायद गुडगाँव में ही एक शादी सी.पी.एम्.कार्यालय में मार्क्स -एंजिल के चित्रों के समक्ष अध्यापक -अध्यापिका ने मात्र ५ फल ,५ फूल के लें -देन तथा गिने -चुने लोगों के बीच की थी.दरअसल शादियों में सादगी ही होनी चाहिए.

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  21. ... bahut badhiyaa ... rochak post !!!

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  22. माथुर साहब , आजकल दिखावे की होड़ सी हो गई है लोगों में । शायद इसके लिए जिम्मेदार है आसानी से इकट्ठा किया हुआ काला धन ।
    शादियों के कुछ और अवगुण अगली पोस्ट में लेकर आ रहा हूँ ।

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  23. यदि सब एकसा सोचने और करने लगें तो जीवन नीरस हो जायेगा: हर समय, शायद कुम्भ के मेले जैसे, गंगा के किनारे सभी माला जपते दिखाई पड़ें (१२ साल के बृहस्पति के चक्र में जमा होने के स्थान पर)...

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  24. बूफ़े में बफेलो बन जाते हैं लोग ।

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  25. .

    अस्तित्त्व के इस संघर्ष में ,उस दिन ऐसी नौबत आई
    जीवन में पहली बार हमने भी , आइसक्रीम हाथ से खाई ।

    Quite interesting !

    .

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  26. दराल सर,
    सेंचुरी की बधाई, जल्दी ही डबल सेंचुरी भी लगे...

    वैसे शादी में कई लोगों की प्लेट को लबालब भर लेने की आतुरता भी देखने वाली होती है...

    एक बार गुल्ली और मक्खन भी एक शादी की दावत में गए...
    वहां गुल्ली एक प्लेट में दाल-रोटी लेकर खाने लगा...
    मक्खन ने ये देखा तो आकर झट से गुल्ली को एक धौल जमाई और बोला...
    कंजर दे पुतर, घर वी दाल खाईं ते एथे आके वी दाल ही खा रया वें, तैणू ओ कुकड़ (चिकन) ते शाही पनीर नज़र नहीं आ रया...

    जय हिंद...

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  27. तभी मैं सोचूं कि इस बार तस्वीर कहां गई। हाथ में आइसक्रीम जो लगी थी!

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  28. हा हा हा ! खुशदीप , शाही पनीर और चिकन तक तो ठीक है । लेकिन कॉन्टिनेंटल की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखना । जाने कितनी दिन पहले बन कर तैयार की गई हों ।

    राधारमण जी , वहां की तस्वीरें नहीं दिखा सकता था । वैसे यह वर्णन एक डॉक्टर्स पार्टी का है ।

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  29. डॉ साहेब आपकी कविता पड़कर मुझं 'राजू श्री वास्तव
    की वो फेमस कविता याद आ गइ| जिसमे उसने खाने का
    रोचक किस्सा प्रस्तुत किया हे | आगे की स्टोरी सुनने की अभिलासा हे |आभार |

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  30. इस लाजवाब और लजीज पसंद को सलाम। बहुत सुन्दर टिप्पणी है आपकी । Majedar tha.
    Thanks
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  31. ये बात तो आप भी मान ही गए की आपको उंगलियाँ चाटनी पड़ ही गयीं

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  32. दर्शन जी , आगे की कविता राजू श्रीवास्तव से भिन्न है , हालाँकि हास्य व्यंग के रूप में ही है ।
    हा हा हा ! रचना जी , सही पकड़ा आपने ।
    लेकिन यह अस्तित्त्व के संगर्ष का ही फल था ।

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