Wednesday, April 28, 2010

पता ही नही चलता कि भिखारी कौन और दाता कौन है---

कहते हैं --एक मच्छर आदमी को क्या से क्या बना देता हैइसी तरह एक छोटी सी पिन कंप्यूटर का बेडा गर्क कर देती हैये तो हमने अभी जानाअब हुआ यूँ कि हम ज़नाब की सफाई करने बैठे और की बोर्ड का तार निकाल कर जब दोबारा डालने लगे तो ज़रा चक्कर खा गएलगे अक्ल के बैल दोड़ानेलेकिन अपनी तो बुद्धि चकरा गई और समझ ही नहीं आया कि ये कैसे डलेगाकई दिन तक कोशिश करते रहे , कईयों से सलाह भी ली लेकिन वही ढाक के तीन पातआखिर स्पेशलिस्ट के पास ले जाना पड़ाऔर पता चला कि हमने अपनी होर्स पावर का प्रयोग करते हुए लीड की एक छोटी सी पिन तोड़ दी थी , जिसकी वज़ह से वो काम नहीं कर रहा था
अब हमें तो यही समझ आया कि भई अनजान रास्ते पर चलते समय लापरवाही नहीं, सावधानी बरतनी चाहिएवर्ना एक गलत कदम बड़ी मुसीबत में डाल सकता है आपकोअब पिछले सप्ताह मैंने ब्लोगिंग कम करने की सलाह क्या दी , अपनी तो ब्लोगिंग ही बंद हो गई


अभी कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा कि भीख दोगे तो सजा मिलेगी। रोड रेगुलेशंस १९८९, के नियम २२ (अ) के अंतर्गत आपको १०० रूपये जुर्माना हो सकता है। यानि एक रुपया भीख दोगे तो १०० रूपये की चपत लगेगी। अब मैंने तो ये ज्ञान सप्त.२००२ में ही पा लिया था तो मैंने तो डर कर भीख देना बंद कर दिया। पर लगता है कि दिल्ली वाले बहुत बहादुर लोग हैं। तभी तो रेड लाइट पर गाड़ी रोकते ही भिखारियों का एक सैलाब सा आ जाता है। और भिखारी भी ऐसे कि गलती से आपने एक बार उनकी तरफ़ देख लिया तो फ़िर बिना कुछ लिए पीछा नही छोड़ने वाले। इसका उपाय मैंने तो ये खोजा है कि बिना उनकी तरफ़ देखे हाथ हिला कर इशारा करो कि--- जा-जा। वो अपने आप समझ जाते हैं कि ये खडूस कुछ नही देने वाला। लेकिन आजकल भिखारी भी बड़े हाई -टेक्क हो गए हैं। कई बार तो पता ही नही चलता कि भिखारी कौन और दाता कौन है।

एक चौराहे पर जब मैं रुका और नजर घुमाई ,
फुटपाथ पर खड़े एक भिखारी ने
जेब से मोबाईल निकाला और कॉल लगाई।

और उधर से बौस पुकारा, दीनानाथ
आज तुम्हारी वी आई पी रूट पर ड्यूटी है।
भिखारी बिगड़ गया और बोला सौरी,
मेरी सी एल लगा देना , आज मेरी छुट्टी है।

नही बौस , वी आई पी ड्यूटी से मेरा लॉस हो जाएगा भारी,
अरे नेताओं से क्या मिलेगा , वो तो ख़ुद ही हैं भिखारी
जब भी चुनाव होते हैं , ये हाथ जोड़ खड़े होते हैं,
और इस गठबंधन के ज़माने में चुनाव भी तो रोज होते हैं।


बौस बोला भैया ऐसा सोचना भी
तुम्हारी भारी गलती है।
अब नेता भी समझदार हो गए हैं ,
इसलिए गठबंधन की सरकारें ज्यादा चलती हैं



46 comments:

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  2. हर आदमी भिखारी हर आदमी दाता है
    वेश बदल लेता है जब मौका पाता है

    इस रोजगार में भी बहुत बरक्कत है.

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  3. डाक्टर साहब ,
    आपने तो मुहावरा ही नए रूप में लिख दिया....अभी तक तो अकाल के घोड़े ही दौड़ते थे...अब ये बैल भी.. :):)

    लेख सटीक है..जिसका बन्दर वही नचाये तो बेहतर है...

    और कविता तो बिलकुल सार्थक...अब तो भिखारियों की यूनियन भी बन गयी हैं...और आज कल दाता ज्यदा भिखारी नज़र आते हैं

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  4. माफ़ी चाहूंगी....अकाल की जगह अकल पढियेगा

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  5. दराल साहेब,
    एक कहावत है जिसका बन्दर वही नचावे....
    बहुत अच्छा लगा आपको देख कर..स्वागत है आपका...
    ...'अदा'

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  6. ब्लाग पर आना सार्थक हुआ
    काबिलेतारीफ़ प्रस्तुति
    आपको बधाई
    सृजन चलता रहे
    साधुवाद...पुनः साधुवाद
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  7. बहुत सुंदर डां साहब मजा आ गया

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  8. डॉक्टर साब
    आज तो नेताओं का मी्टर लाम्बा कर दिया।
    बड़ा ही धांसू ब्यंग्य सुणाया।

    राम राम

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  9. वाह सर देर से आये पर दूर की कौड़ी लाये है अच्छा लगा नए भिखारियों से मिलना

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  10. चकाचक है सर।

    सर टिप्प्णी मांगना भीख है या नही ।

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  11. ... कमाल-धमाल .... लाजवाब !!!!

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  12. बेहतरीन। लाजवाब।

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  13. डा. साहिब, कंप्यूटर कारण था आपकी गैर हाजिरी का उसका पर्दाफाश हुआ,,,और आपने याद दिला दिया कि हमारे पिताजी एक पुराना मुहावरा दोहराते थे, "जिसका काम उसी को साजे / और करे तो डंडा बाजे!"

    आपने अच्छा किया जो बता दिया कि भिखारी को दान देना अपराध है...किन्तु फिर एक प्रश्न उठता है कि जो शनिवार के दिन 'शनि देवता' आते हैं तो क्या उन की बाल्टी में पैसा डालना मना तो नहीं है?

    कौन दाता है और कौन भिखारी पर व्यंग बढ़िया लगा :) शायद सत्य ये है कि हर कोई कभी दाता है तो कभी भिखारी...

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  14. जे सी जी , बहुत दिनों से एक पोस्ट शनि देव ( मनी देव ) पर ही लिखने की सोच रहा हूँ । लेकिन लोगों की धार्मिक आस्थाओं को देखकर रह जाता हूँ ।
    वैसे जल्दी सचित्र एक पोस्ट का वादा है।

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  15. देखा मैं न कहता था कि आप बेकार में परेशान हो रहे हैं सर । दबा के ब्लोग्गिंग करिए देखिएगा पिन पुन और बांकी सारे यंत्र भी एकदम धडाधड दौडते फ़िरेंगे , उन्हें पता हो गया होगा कि यार चलते रहो , कहीं खराब हुए तो ....ये ब्लोग्गर है भाई जाने कहां कहां से इंजिनियर्स को बुलवा कर ठोंक पीट करवाएगा , फ़िर उसके बाद फ़िर से शुरू हो जाएगा , इसलिए चले चलो बस चले चलो।

    भिखारियों को नकद मत दिया करिए उनसे उनका अकाऊंट नंबर एसएमएस करने को बोल दीजीए ..और सीधा अकाऊंट में डाल दीजीए ..देखा कित्ता सिंपल है ?

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  16. आपकी कविता पढ़कर भिखारी कवि मेरा मतलब है कि एक कवि जिनका उपनाम ही भिखारी है की कविता याद आ गई---

    यहाँ हर कोई भिखारी है
    फर्क सिर्फ इतना है
    किसी का कटोरा छोटा
    किसी का भारी है।
    --मेरा तो सबकुछ खराब चल रहा है.. कम्प्यूटर अचानक से बंद हो जाता है, बिजली अचानक से चली जाती है, नेट धीमे-धीमे नींद के आगोश में सुलाता है। मेरे ब्लाग में एक टिप्पणी युवा कवि की टिप्पणी आई कि ब्लागिंग प्रसव पीड़ा के समान है! मैं अभी तक अचरज में डूबा हूँ।

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  17. bahut badhiyaa likhaa hain aapne, lekin ek baat to aap bataanaa bhool hi gaye.......

    aapne ye to bataa diyaa ki bhikhaari ko bheekh dene par 100 rs jurmaanaa hain.

    par ye nahi bataayaa ki--"har baar chunaav main jo bhikhaari (neta) log aate hain unhe bheekh (vote) dene par kya or kitnaa jurmaanaa hain???

    bahut badhiyaa. thanks.

    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  18. हर आदमी भिखारी हर आदमी दाता है
    वेश बदल लेता है जब मौका पाता है

    इस रोजगार में भी बहुत बरक्कत है.

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  19. ब्लॉगर है कि मानता नहीं...

    टिप्पणी दान...महादान...

    जय हिंद...

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  20. भीख मांगना और देना दोनों अपराध हैं।

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  21. डा० साहब चाहे अक्ल के बैल दौडाएं या घोड़े ! हमारे देशसे जाने वाली नहीं है ये भिक्षा वृत्ति! किये कराए पर पानी फेर देती है ! सराहनीय पोस्ट ! आभार !

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  22. दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया!

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  23. खतरनाक लेखन क्या होता है,उसी का नजारा आज यहाँ देखा!मस्त भी और जबस्दस्त भी!
    कम्प्यूटर से नेता वाया भिखारी!

    कुंवर जी,

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  24. भीख लेना देना दोनों अपराध हैं. हां ताऊ को चाहे जितना दे सकते हैं उसमें कोई धारा नही लगेगी चाहे तो नोटों की माला भी ताऊ पहनने को तैयार है. कोई कार्यवाही नही होगी बे फ़िक्र रहें.

    रामराम

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  25. शानदार व्यंग्य

    प्रणाम

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  26. jai ho..............sahi likha hai .

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  27. हालंकि हम सड़कों पर भिखारियों को भीख देने से दूर रहते हैं, लेकिन अक्सर किसी मांगने वाले की दारुण स्थिति देखते हैं उसकी आँखों में सचाई देखते हैं तो जो दिल कहता है उतना दे देते हैं.

    आपकी बात सही है, कहीं पर लोग दाता होते हैं तो कहीं पर भिकाड़ी.

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  28. डा साहिब, भीख मांगने की प्रथा कहाँ से आरंभ हुई होगी प्राचीनतम देश भारत में?

    संभव है मानव जीवन के मूल, गुफा, के कारण ही,,,जहां से मानव जीवन की उत्पत्ति संभवतः आरंभ हुई होगी, वैसे ही जैसे बच्चा माँ के गर्भ में लगभग ९ माह व्यतीत करता है - (और मंदिर के गर्भ-गृह में 'हिन्दू' भगवान् की मूर्ति भी परंपरागत रखता आ रहा है, अजन्मे को भगवान् का प्रतिरूप मान) - और उत्पन्न होने के बाद 'बिगड़ता' ही चला जाता है, यानी द्वैतवाद, दुःख-सुख, सही-गलत आदि के फेर में पड़ जाता है...

    और ऐसे ही काल चक्र में पहला आदमी भीड़ और दुखदायी दिनचर्या से परेशान हो शायद हिमालय की ठंडी गुफा में जा, मनन करने पर, केवल कन्द, मूल, फल आदि खा,,, झरने का शीतल और निर्मल जल पी, अपने अंतर्मन में कुछ न कुछ ज्ञान तो प्राप्त किया ही होगा जिससे आम जनता को भी लाभ हुआ होगा (और कुछ नहीं तो जड़ी बूटियों द्वारा ही),,,और शायद किसी समय जनता में से औरों को भी प्रेरित किया होगा उसने, 'तपस्या' करने के लिए, जनता से भिक्षा प्राप्त कर,,,अथवा हर व्यक्ति को भी अपनी दिनचर्या में कुछ समय 'साधना' के लिए निकालने के लिए,,, यानी मन को अपने नियंत्रण में करने के लिए, जो वर्ना तथाकथित 'लक्ष्मी' के समान चंचल है और इस कारण भटकता रहता है...किन्तु शायद काल के प्रभाव से आज घंटी तो हम राम के लिए बजाते हैं पांच मिनट, किंतु उसके बाद रावण समान सोने के चक्कर में ८ घंटे गुजार देते हैं, और शेष समय भी 'सोने' में :)

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  29. डाक्टर साहब , नमस्कार !
    आपके ब्लॉग पर आज पहली बार आना हुआ | माफ़ी चाहुगा कि अब तक आपसे touch में नहीं था ! आगे बना रहूगा !
    शुभकामनाएं !

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  30. वैसे नेता अब भिखारी कहाँ रहे साहब ............... पूरा देश तो नोच नोच कर खा गए !

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  31. भिखारी तंत्र बड़ा संगठित व्यवसाय है , शायद ही कोई व्यवसाय इससे मुकाबला कर पायेगा ! एक प्लेन भिखारी रोज २०० रुपया , लूला लंगड़ा बना बहरूपिया ५०० से १००० रुपया रोज कमाता है ! फ्लेक्सिबिल डयूटी आवर, खाना पीना, रहना, बिजली , पानी ट्रांसपोर्टेशन सब कुछ फ्री !
    डॉ साहब यह विषय रिसर्च का है ...पता नहीं इस पर पी एच डी हुई या नहीं ?
    :-)

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  32. डा. साहिब, आम तौर पर मैं अपने आप पूजा आदि के लिए, या कुछ अपने लिए, 'भिखारी समान', मांगने मंदिर नहीं गया, हांलांकि हम अपनी कालोनी के बच्चे खेलने मंदिर जरूर जाते थे, और पिताजी के साथ काली मंदिर कई बार गया हूँगा...बाद में बीमार पत्नी के साथ एक बार और बाद में अकेले भी उनके कारण गुवाहाटी में कामख्या मंदिर अवश्य गया, पर मौन ही खड़ा रहा, कुछ भीख में मांगा नहीं...

    बचपन में एक देर से सुबह कृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपनी माँ के साथ मंदिर मार्ग पर स्तिथ लक्ष्मी-नारायण मंदिर ('बिरला मंदिर') तक गया,,,क्यूंकि उनकी अन्य साथी, हमारी कालोनी की अन्य स्त्रियाँ पहले चली गयीं थीं,,, और वहां पहुँच उनके सुझाव पर मंदिर के पीछे कृष्ण के जीवन काल से सम्बंधित कथाओं के आधार पर बनी झांकियां देखने के इरादे से मंदिर के बगल में स्तिथ सीढ़ी की ओर बढ़ गया...और, भीड़ में शामिल हो, जब सीढ़ी तक पहुंचा तो मैंने अपने को भीड़ के बीच में दबा पाया! मैंने अपने बाल सुलभ दिमाग से सोचा मैं मर गया था! क्यूंकि मुझे कुछ अँधेरे के कारण दिखाई नहीं दे रहा था, मैं सांस भी ठीक से नहीं ले पा रहा था और मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे! वो तो जब सब के ऊपर पहुँच भीड़ के छिटक जाने से मेरे पैर फिर से जमीन पर थे, और सांस ठीक आ-जा रही था तो मुझे यकीन हुआ कि मैं जिन्दा था!...

    किन्तु उस दिन के बाद मैं भीड़ से डरने लग पड़ा,,,यद्यपि दो अन्य बार भी, एक बार एवेरेस्ट की चोटी पर पहुंची टीम के स्वागत पर मंदिर मार्ग पर ही काली-बाड़ी में पिचका और एक बार उससे पहले उसी सड़क पर महात्मा गांधी को देखने पिताजी आदि के साथ जा भीड़ को देख कार्यक्रम समाप्त होते ही उनको बिना बताये ही घर भाग के आ गया था,,,और डांट भी खायी थी :)

    वो तो कई दशक बाद जब भारी सितारे के 'ब्लैक होल' (सीधे रूपान्तर में, 'कृष्ण छिद्र') में परिवर्तन के बारे पढ़ा तो समझ आया कि मेरा पिचकना उसी की एक झलक थी, सांकेतिक भाषा में - जो न मालूम मुझे क्यूँ दिखाई गयी थी उस कच्ची उम्र में जिसने मुझे भयभीत करके रखा और मेरे भाई-बहन द्वारा मजाक का एक विषय भी बना :)

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  33. सतीश जी , पी अच् डी का तो पता नहीं , लेकिन हमने रिसर्च ज़रूर की है । कभी फुर्सत में बैठे तो सुनाऊंगा।

    जे सी जी , भीड़ भाड़ से तो हम भी डरते हैं।

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  34. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती ! शानदार और लाजवाब!

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  35. भिखारी ही भिखारी को भेख दे तो भी ज़ुर्माना होता है क्या ।

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  36. डा. साहिब, यह तो अपने दृष्टिकोण का दोष है कि हर व्यक्ति अपने-अपने मन के झुकाव के, यानि 'पसंद' के (या अज्ञान से उपजी 'माया' के), कारण भिखारी और दाता में अंतर भिन्न रूप से देख रहा है...

    जैसे गणित के प्रश्न में मान लेते हैं, कुछ देर के लिए यदि कोई मान ले - (जैसा प्राचीन योगियों ने सत्य जान 'शिवोहम' कहा) - कि हर व्यक्ति शिव यानी अनंत निराकार परमात्मा के अनंत जीवन का एक छोटा सा हिस्सा प्रतिबिंबित करता है अपने लघु जीवन काल में,,, तो दाता यदि मैं हूँ, यानी शिव का एक प्रतिरूप या प्रतिबिम्ब, तो भिखारी भी शिव का एक प्रतिबिम्ब होने के कारण मेरा ही एक प्रतिबिम्ब है :)

    उपरोक्त कठिन अवश्य है किन्तु मुझे भी अपने संन्यास आश्रम में, कंक्रीट की गुफा में एकांत में रह, संभव लगा, विशेषकर 'गीता' पढने के बाद और उस पर मनन कर :)

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  37. बहुत ही बढ़िया लेख है ... तीखा व्यंग्य और हास्य रस से भरपूर ... हमारे देश के तथाकथित 'नेता' चुनाव से पहले तो भिखारी ही होते हैं पर चुनाव के बाद चोर, डाकू, लुटेरा, खुनी, बलात्कारी, तस्कर, देशद्रोही और न जाने क्या क्या बन जाते हैं ... वो दाता तो कभी थे ही नहीं ...

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  38. डॉ. साब हमारे साथ भी ऐसा ही हो चुका है. मेरे श्रीमान जी ने भी कुछ इसी प्रकार पिन के साथ कुश्ती लड़ी थी. नतीजा वही, जो आपके साथ हुआ.

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  39. एक बात बतलाऊं

    कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स पर भिखारियों के कियोस्‍क खुलेंगे और वहां पर सिर्फ विदेशी मुद्रा में ही भीख स्‍वीकार की जाएगी। मतलब इंडियन्‍स को तो वहां पर हाई टेक भिखारी भी नहीं पूछेंगे।

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  40. सटीक व्यंग है ... तभी नेता लोग वोटिंग को कर्तव्य बनाने में जुटे हैं ... कम से कम नेताओं को भीख तो नही माँगनी पड़ेगी वोट की ....

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  41. interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this website to increase visitor.Happy Blogging!!!

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  42. इस पोस्ट में लगता है कि आपने अपनी पुरानी पोस्ट का मिश्रण कर दिया...दोबारा पढकर भी अच्छा लगा :-)

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