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Sunday, February 24, 2013

गंगू तेली हो या राजा भोज, सबके लिए एक भोज ---





कामकाज़ी लोग रोज़ सुबह भागते भागते निकलते हैं। हम भी नाश्ते में दो सूखे टोस्ट खाकर काम पर चल देते हैं। लेकिन इतवार छुट्टी का दिन होता है। इसलिए उस दिन अपनी पसंद से शाही अंदाज़ में नाश्ता किया जाता है। हालंकि छुट्टी होने के कारण उठना देर से होता है , फिर आराम से बैठकर पहले घंटों अख़बार छाना जाता है , फिर ब्लॉगिंग और अब तो ना ना करते फेस्बुकिंग भी होने लगी है। ज़ाहिर है, इतवार को न नाश्ता होता है , न लंच , बल्कि 12 बजे के बाद ब्रंच ही हो पाता है।


रविवार के दिन अक्सर हमारा पसंददीदा खाना होता है -- आलू के दो भारी परांठे , साथ में दही तरल मलाई मिलाकर , एक प्लेट में टोमेटो सॉस , उसमे टाबेसको सॉस का छींटा उसे तीखा बनाने के लिए , साथ में शहद सा मीठा मेपल सिरप। परांठे पर कभी कभी मक्खन या मलाई की परत भी चलती है। इन सबके बाद अंत में गर्मागर्म दूध के साथ इतवार का ब्रंच पूरा होता है।

लेकिन महीने में एक या दो बार एक अलग किस्म का नाश्ता भी होता है। इसे ब्रेड पोहा कह सकते हैं।





ज़रा सोचिये , ब्रेड के जो पीस बच जाते हैं , विशेषकर ऊपर नीचे वाले मोटे पीस , उनका आप क्या करते हैं। अक्सर हम इन्हें फेंक दिया करते थे या फिर किसी पशु को खिला देते थे। लेकिन फिर एक दिन एक पत्रिका में पढ़कर हमें यह ख्याल आया और हमने इनका इस्तेमाल पोहा बनाकर करना शुरू कर दिया। अब यह हमारी पसंददीदा डिश बन गई है।

ब्रेड पोहा बनाने के लिए सामग्री : 

* ब्रेड के बचे खुचे पीस , जितने सूखे होंगे उतना ही अच्छा होगा। इसके लिए ज़रूरी है कि आप बचे हुए ब्रेड पीस को  फ्रिज में स्टोर करते रहें वर्ना फंगस लग जाएगी।
* एक बड़ा टमाटर , बड़े टुकड़ों में कटा हुआ , एक प्याज़ भी बड़े टुकड़ों में कटा हुआ , हरी मिर्च कटी हुई
* मसाले -- साबुत धनिया, धनिया पाउडर , गर्म मसाला, अमचूर, नमक -- सब आधी चम्मच।
* हरा धनिया कटा हुआ , एक निम्बू , टोमेटो सॉस
* एक कप दूध।

बनाने की विधि : 

* एक सॉस पेन में एक चम्मच कुकिंग ऑयल डालकर गर्म करिए। इसमें सबसे पहले साबुत धनिया डालकर भूरा होने तक पकाइए।
* अब इसमें कटे हुए प्याज़, टमाटर, हरी मिर्च डालकर मिलाइये और थोड़ा सा पकाकर एक बड़ा चम्मच दूध डालकर हिलाइए।
* अब इसमें बाकि सभी मसाले मिलाकर थोडा और पकाइए। अमचूर की वज़ह से दूध फट जायेगा लेकिन हिलाते रहिये।
* अब ब्रेड के टुकड़े करके सारी ब्रेड इसमें डाल दीजिये और धीरे धीरे करके दूध ब्रेड पर इस तरह डालिए कि सारे टुकड़े दूध में भीग जाएँ। लेकिन ध्यान रखिये कि दूध ज्यादा न हो वर्ना खिचड़ी बन जाएगी। अच्छी तरह से मिलाइये ताकि सारे टुकड़ों पर दूध और मसाले अच्छी तरह से मिल जाएँ।
* जब दूध सूख जाये तो उतार लीजिये। प्लेट में डालकर इस पर  हरा धनिया , नीम्बू और स्वादनुसार टोमेटो सॉस डालकर मिलाइए।






इस तरह ब्रेड पोहा तैयार है। इसका स्वाद दूध और मसालों के अनुपात और पकाने पर बहुत निर्भर करेगा। लेकिन आपको पसंद आएगा , ऐसा विश्वास है।

इसे कहते हैं -- आम के आम , और गुठलियों के दाम।  

इसका महत्त्व आपको मेरी एक कविता की चंद अंतिम पंक्तियों में नज़र आएगा :

एब्स डाइटिंग जिम ट्रेडमिल , ये सब अमीरों के चोचले हैं ,
जो वैभव सम्पन्नता पूर्ण, ऐशो आराम की दुनिया में पले हैं।

वर्ना सच तो यही है कि ---

जहाँ कुपोषण के शिकार हों, करोड़ों बच्चे और नर नारी ,
वहां एब्स तो क्या , हड्डी पसली भी खुद ही उभर आती हैं सारी।

ये लोग कैसे हैं , जो रात भर ट्रेडमिल पर पसीना बहाते हैं ,
फिर खाने से कतराते हैं , ताकि पेट बाहर न आये।

कुछ लोग ऐसे हैं जो दिन भर पसीना बहाते हैं ,
ताकि जब शाम ढले तो पेट में कुछ तो जाये।

अगली बार जब आप किसी दावत में जाएँ
और प्लेट भर कर नाना प्रकार के व्यंजन खाएं।

तो छोड़ने से पहले एक बार एक बात अवश्य सोच लें,
कि अभी अभी जो आपने आधा प्लेट खाना छोड़ा है।

शायद उसी समय देश के किसी कोने में ,
क़र्ज़ में डूबे एक किसान ने , भूख से दम तोड़ा है।

नोट : इसे पढ़कर यदि एक भी व्यक्ति ने जूठा छोड़ने की आदत छोड़ दी तो समझिएगा , प्रयास सफल रहा। 





Wednesday, February 20, 2013

जब ऐसा हो या वैसा हो -- तो हाल कैसा हो !


जब विद्यालय परिसर में सफाई होने लगे, पानी का छिडकाव हो
और चूना लगाकर सजाया जाये तो समझो --- वी आई पी  विजिट का तनाव आने वाला है।

जब शहर की सडकें जगमगाने लगें , तारकोल का ताज़ा भराव हो
और फुटपाथ को तोड़कर दोबारा बनाया जाये तो समझो --- शहर में चुनाव आने वाला है।

जब सब्जियां भी मुर्गियां सी बिकने लगें , टमाटर के ऊंचे भाव हो
और मंडी से प्याज़ नदारद पाया जाये तो समझो--- सत्ता में बदलाव आने वाला है।

जब आपको आप के एस एम एस आने लगें , टोपी का पहनाव हो
और हाथ में तिरंगे की तरह  झाड़ू उठाया जाये तो समझो -- इंकलाब आने वाला है।

जब पत्नि बिना बात मुस्कराने लगे,  बदले बदले से हाव भाव हो
और आपको सर आँखों पर बिठाया जाये तो समझो--- कोई महंगा प्रस्ताव आने वाला है।

जब माटी की सोंधी सोंधी सुगंध आने लगे, पीपल की शीतल छाँव हो
और बांसुरी पर गडरिया प्रेम धुन सुनाता जाये तो समझो--- प्रीतम का गाँव आने वाला है।

जब मन बेचैन हो और काम से कतराने लगे, सीने में दर्द का घाव हो
और रह रह के बदन में झुरझुरी सी आ जाये तो समझो--  इश्किया ताव आने वाला है।

जब उठते बैठते घुटने कड़ कड़ करने लगें , गोलियों से लगाव हो
और आपको मेट्रो में बुजुर्गों की सीट पर बिठाया जाये तो समझो , बुढ़ापे का पड़ाव आने वाला है !

जब लड़के हाथ में हाथ डाल कर चलने लगें , बदन में बालियों का फैलाव हो
और बालों को इन्दरधनुषी रंगों से रंगा जाये तो समझो ,संस्कृति में बिखराव आने वाला है।



Friday, February 15, 2013

वेलेंटाइन डे पर रेड रोज और डोमिनोज का भोज -- क्या यही है प्रेम रोग !

वैलेंटाइन डे (II) : 



कल शाम पत्नी बोली पढ़कर अख़बार,
अज़ी बोलो कितना करते हो हमसे प्यार।

वेलेनटाइन डे पर आज के रोज़,
बताइये कितने देंगे हमको रोज।

एक का मतलब समझेंगे , देखते ही हुआ था प्यार।
तीन यानि करते थे,करते हो, करते रहोगे बेशुमार।

108 दिए बिना ही किया था शादी का इकरार,
अब बारह दे कर ही कर दो प्यार का इज़हार।

हमने कहा प्रिये , एक और एक सौ आठ ,
तो भूल जाओ, वो थी गुजरे वक्त की  बात।

बारह में बसा है,  बस हाल का हाल,
तीन में दिखते हैं प्रेम के तीनों काल।

डार्लिंग शौक से हमारे प्यार को आजमाओ ,
पर रोज बहुत महंगे हैं , इस बार तीन में ही काम चलाओ।

लेकिन वेलेंटाइन रोज का तो बहाना था,
पत्नि को हमसे आई लव यु बुलवाना था।

इसलिए पूरे बारह रोज ही ख़रीदवाए,
ये बात और है,कि उनके पैसे हमने उन्ही से दिलवाए । 

भला पत्नी के सामने भी कोई पर्स खोलता है ,
भई शादी के बाद कौन आई लव यू बोलता है !

हमने तो मौके की नज़ाकत थी परखी जांची,
पर पत्नि की फरमाईश थी अभी और बाकि।

बोली वेलेंटाइन डे पर बेलन नहीं उठाऊंगी,
सोच लिया आज रात खाना नहीं बनाऊँगी। 

अब या तो डोमिनोज का पिज़्ज़ा खिलाओ , 
या फिर घर चलकर खुद ही खाना बनाओ !

हारकर एक हाथ में डबलरोटी, और एक हाथ में रोज,
पकड़कर पिटे आशिक से , हम चल दिए डोमिनोज ।

वहां देखा एक हम उम्र युगल बैठे पिज़्ज़ा खा रहे थे
हम उन्हें और वो हमें,  देख देख कर शरमा रहे थे।

उधर एक युवा कन्या हमें देख मुस्कराने लगी
आँखों आँखों में अपने बॉय फ्रेंड को समझाने लगी।

हम भी जहाँपनाह से खड़े खड़े फूल सूंघते रहे,
और अपने ५०० के नोट का खून होते देखते रहे।

घर जाकर फूल सजाये, और पिज़्ज़ा का भोग लगाया,
पर प्रेम रोग की जगह तुरंत निंद्रा रानी ने आ दबाया।

सुबह जब नींद खुली तो रोज देख ये हुआ अहसास,
वेलेंटाइन डे तो रोज़ है , जब तक साथ हैं अपने ख़ास।

Tuesday, February 12, 2013

दुनिया में कोई मनुष्य भगवान कैसे हो सकता है-- एक सवाल !


रविवार का दिन था। सुहानी धूप खिली थी। सोच ही रहे थे कि कई दिनों बाद खिली धूप का आनंद कैसे लिया जाये कि तभी साले साहब का फोन आया कि एक कार्यक्रम में जा रहे हैं। शायद हमें भी पसंद आये। कार्यक्रम क्योंकि घर के पास ही था , इसलिए बिना सोचे कि क्या है , हम निकल पड़े। कार्यक्रम स्थल पर गाड़ियों की लाइन लगी थी।  लोग तेजी से आ रहे थे। जगह जगह कुछ लोग आदर सहित सबका हाथ जोड़ कर स्वागत कर रहे थे। हमें भी कई बार लगा जैसे ये हमें जानते हैं , तभी इतना मुस्करा कर स्वागत कर रहे हैं। एक सज्जन तो डॉक्टर ही थे, सोचा ये तो अवश्य जानते होंगे। पंडाल में पहुँच कर हमें बड़े प्यार से रास्ता दिखाया गया। हमने साले साहब से पूछा कि यह सब क्या है। उन्होंने कहा , कुछ नहीं , बस चलिए मंच पर सजदा करना है। एक असमंजस्य की स्थिति में हम यंत्रवत से मंच से होकर आगे बढ़ गए। लोग लेटकर एक फोटो को दंडवत प्रणाम कर रहे थे। पता चला वो कोई गुरूजी थे , जिनके ये सब अनुयायी थे।




पंडाल में हजारों की संख्या में भक्तजन इकट्ठे हुए थे जो बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड़कर बैठे सुन रहे थे , लेकिन प्रवचन देने वाला कोई नहीं था बल्कि एक सज्जन अपनी आप बीती सुनाते हुए  बता रहे थे कि किस तरह गुरूजी ने उन्हें जीवन दान दिया और उनकी कृपा से उनके सारे कष्ट दूर हो गए।

उसके बाद वही डॉक्टर जो हमें प्यार से मिला था, माइक पकड़ कर रोने लगा। पता चला , वह सारा कार्यक्रम उसी ने आयोजित किया था जो उन गुरूजी का परम भक्त था। पता नहीं वह कैसा डॉक्टर था लेकिन एक बात निश्चित थी कि वह तथाकथित गुरूजी पर बहुत विश्वास रखता था। बल्कि यूँ कहिये वहां जितने भी लोग थे , वे सभी गुरूजी पर पूर्ण विश्वास रखने वाले प्रतीत हो रहे थे।

लेकिन सच पूछिए तो हमें तो उनकी कहानियां सुनकर बड़ा अटपटा लग रहा था। यह भी समझ में आ रहा था कि मनुष्य की सायकोलोजी उसकी सोच को कितना प्रभावित करती है। यह साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि कैसे लोग सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करने लगते हैं और पक्की धारणा बना लेते हैं। 



हमने भी बैठकर ध्यान से लोगों को जांचा परखा। मंच पर मस्तक टेक कर जो भी सामने से गुजर रहे थे , सबके चेहरे अत्यंत गंभीर और चिंतित नज़र आ रहे थे। भृकुटियाँ तनी हुई, चेहरे पे हवाइयां उडी हुई , मानो मृत्यु को साक्षात् देख कर आ रहे हों। भगवान ( गुरूजी ) के दर्शन कर इतना परेशां लोगों को पहली बार देखा।


वहां का दृश्य देखकर टी वी वाले कृपालु महाराज याद आ गए। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जाने संसार में कितने कृपालु महाराज भरे पड़े हैं जो अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर हजारों लाखों लोगों को वशीभूत कर लेते हैं। वर्ना एक हार्ट अटैक के रोगी का इलाज़ डॉक्टर कर सकता है या गुरूजी, यह सोचने की बात है ! हालाँकि वहां मौजूद हजारों पढ़े लिखे धनाढ्य लोगो की श्रद्धा को देखकर हम तो अल्पसंख्यक ही महसूस कर रहे थे।


पंडाल के साथ में एक दूसरा पंडाल था जहाँ खाने पीने का पुख्ता इंतजाम किया गया था।





प्रवचन सुनने के बाद सभी शराफत से पंक्तिबद्ध खड़े थे। खाने के मामले में अनुशासन बहुत बढ़िया था। गुरूजी का प्रसाद समझ कर सबने इत्मिनान से कार्पेट पर बैठकर भोजन किया। 

अंत में यही लगा कि श्रद्धा होना या न होना अलग बात है , लेकिन दुनिया में कोई मनुष्य भगवान कैसे हो सकता है। हकीकत यही है कि हम सभी बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं। फिर भी न पाप कर्म करने से डरते हैं , न पाप को धोने में कोई कसर उठाते हैं। लेकिन यदि पाप कर्म किये ही न जाएँ तो धोने की ज़रुरत ही कहाँ रह जाती है।

शायद यही बात समझ नहीं आती आधुनिक मनुष्य को।


Friday, February 1, 2013

कहीं दीप जले कहीं दिल, एक ग़ज़ल ---


एक सुबह अस्पताल जाते हुए रास्ते में यह नज़ारा देखा तो फोटो ले लिया। यही ज़ेहन में आकर एक ग़ज़ल बन गई :



                                                           हर सू  हरियाली छाई  है ,
                                                           अपनी जाँ पे बन आई है। 


                                                           औरों की सजती, महफ़िल है, 
                                                           एक  हम  पर ही तनहाई  है। 



                                                              उनके रौशन चाँद सितारे,
                                                              अपने हिस्से  रुसवाई  है।  

                                                               धोखा मत  खा जाना यारो, 
                                                               तन उजला, मन पर काई है। 

                                                               छोड़ें या अपनायें किसको,  
                                                               एक है कूआँ,  एक खाई है । 




                                                              दूल्हा  दुल्हन ना बाराती,
                                                               क्यों बाजा ना शहनाई है। 

                                                               शूगर का रोगी है खुद वो 
                                                               जो  पेशे  से  हलवाई  है। 
                                                           
                                                              ना समझे ना माने दिल की, 
                                                               क्यों  ऐसा  वो  हरजाई  है। 

                                                               रक्त का रंग है एक, मानो तो 
                                                               सब  ही आपस  में  भाई  हैं।


                                                               दिल जीते जो 'तारीफ़ों' से,
                                                               तो  खुशियों की भरपाई है। 

नोट :  ग़ज़ल में मात्रिक क्रम है - 22  22 22 22

Monday, January 28, 2013

दिल्ली की सर्दियों में शादी और शादी में खाने की बर्बादी ---


एक समय था जब एक के बाद एक सभी मित्रों की शादी होने लगी थीं। अब 25-30 साल बाद जिंदगी का दूसरा दौर शुरू हो गया है जब मित्रों के बच्चों की शादियाँ होने लगी हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पहले जिसकी बधाई गाई  थी, अब उसी का सेहरा गा रहे हैं। शायद यही जीवन चक्र है जो अविरल चलता रहता है। उस ज़माने में शादियाँ भी घर के पास सड़क पर या गली में या पार्क में टेंट गाड़कर हो जाती थी। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं। आजकल मिडल और अपर मिडल क्लास में शादियाँ या तो फार्म हाउस में होती हैं या किसी सितारा होटल में। लो मिडल और लो क्लास की पहुँच समुदाय भवन तक ही होती है जो लगभग हर कॉलोनी में बने हैं। लेकिन आजकल शादियों का स्वरुप इस कद्र बदल गया है कि कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हो गया है। पिछली पोस्ट में आपने शादियों की तैयारियों के बारे में पढ़ा। आइये अब आपको एक आधुनिक शादी में लेकर चलते हैं। 

शादी में कितने बजे पहुंचा जाये ?

सबसे पहले तो विचार करने की बात यह है कि शादी में कितने बजे पहुंचा जाये। कार्ड में कुछ भी लिखा हो, लेकिन यदि आप रात 9 बजे से पहले पहुँच गए तो यह निश्चित है कि आपका स्वागत करने वाला कोई नहीं मिलेगा। उलटे आपको ही मेजबानों का स्वागत करना पड़ सकता है। एक कार्ड में लिखा था , बारात ठीक सात बजे पहुँच जाएगी, और शादी की सभी रस्में , 11 बजे तक संपन्न हो जाएँगी। हम अक्सर समय के पाबंद रहते हैं। इसलिए जल्दी घर आकार पत्नी से कहा -  भई जल्दी से तैयार हो जाओ, छै बज चुके हैं। पत्नी बोली -- एक घंटा पहले बन ठन कर क्या हो जायेगा। मैंने कहा भाग्यवान, एक घंटा तो तुम्हारे श्रृंगार में ही लग जायेगा। फिर भी पत्नी ने सजने में पूरे दो घंटे लगाये और हम विवाहस्थल पर साढ़े आठ बजे ही पहुँच पाए। जाकर देखा तो पाया , कुछ लोग इधर उधर चक्कर लगा रहे थे। पता चला वे तो टेंट वाले थे, अभी टेबल चेयर लगा रहे थे। आखिर फिर वही काम करना पड़ा। बाहर खड़े होकर बारात का इंतजार करना पड़ा।  

बारात :

अब यदि आपको लड़की की शादी का निमंत्रण मिला है तो ज़ाहिर है आप सीधे विवाहस्थल ही पहुंचेगे। लेकिन आजकल लड़के की शादी में भी मेहमान बारात के साथ चलने के बजाय सीधे पंडाल में ही पहुँच जाते हैं। इसलिए क्या बाराती और क्या घराती , सब एक सामान नज़र आते है। इसका फायदा कभी कभी कुछ युवक फ़ोकट में मेहमान बनकर दावत उड़ाकर उठाते हैं।  हमने देखा है कि आजकल बाराती तो सीधे  विवाहस्थल पर पहुँच जाते हैं , और दुल्हे के साथ एक घोड़ी , दो रिश्तेदार, और बाकि बैंडवाले ही रह जाते हैं। उधर दुल्हे के चंद दोस्त दारू चढ़ाकर बैंड के साथ हुडदंग मचा रहे होते हैं, इधर बाराती और घराती सब मिलकर दावत उड़ा रहे होते हैं। फिर जाते जाते दूल्हा दिख गया तो बधाई , वर्ना लिफाफा पिता को सोंप काम तो निपटा ही दिया था भाई ।   

खाना :

शादियों में सभी मेहमानों को भी,चाहे लड़के वालों की तरफ से हों या लड़की वालों की तरफ से, बस एक ही काम होता है , खाने का काम। दिल्ली जैसे बड़े शहर में अक्सर शादियों में जान पहचान वाले या तो बहुत कम मिलते हैं या हेलो हाय करने के बाद अपने में मस्त हो जाते हैं। वैसे भी शादियों में डी जे का इस कद्र शोर होता है  कि बात करने के लिए भी, जोर लगाना पड़ता है। लेकिन गौर से देखा जाये तो बात करने की नौबत ही कहाँ आती है, क्योंकि तीस आइटम्स खाने के बाद पता चलता है , अभी तो चालीस और बाकि हैं।  

सबसे पहले तो गेट में घुसते ही ताबेदार ट्रे में रंग बिरंगे पेय पदार्थ लिए तत्परता से आपका स्वागत करते हैं, मानो कड़ाके की ठंड में भी प्यास से आपका गला सूख रहा हो। फिर आप ढूंढते हैं अपने मेज़बान को क्योंकि उनके पास तो इतनी फुर्सत होती नहीं कि वे स्वयं आपसे मिल सकें। आरंभिक औपचारिकतायें निभाने के बाद आप स्वतंत्र होते हैं खाद्य यात्रा पर निकलने के लिए। हमारे जैसे बुद्धिमान मेहमान यात्रा का आरम्भ करते हैं फ्रूट चाट की दुकान से-- मांफ कीजिये फ्रूट स्टाल से। कभी इम्पोर्टेड कपड़ों का बोलबाला होता था , आजकल इम्पोर्टेड फ्रूट्स का होता है। 
चाट पापड़ी: इसके बाद एक ही लाइन में गोल गप्पे , भल्ला पापड़ी , आलू  चाट , आलू टिक्की ,  चिल्ला , पाव भाजी , राज कचोरी , लच्छा टोकरी देखकर आप राजसी भोजन का आनंद लेने से खुद को नहीं रोक पाएंगे।   
पंजाबी रसोई :  यहाँ आपको मिलेंगे छोले बठूरे , मक्के दी रोटी ते सरसों दा साग , साथ में लस्सी जिन्हें खाने के लिए मंजी ( खाट ) बिछाई गई हैं। 
दक्षिण भारतीय : इस स्टाल पर गर्मागर्म सांभर के साथ डोसा , इडली , बड़ा आदि तुरंत तैयार मिलेगा। 
चाइनीज़ : यदि आपका चीनी खाना खाने का मूड है तो चाउमीन , नूडल्स , मंचूरियन आदि आप सामने खड़े होकर बनवा सकते हैं। 
पिज़्ज़ा : यहाँ आप जो भी टॉपिंग चाहेंगे , बिना हील हुज्ज़त के पाइपिंग हॉट पिज़्ज़ा के साथ पाएंगे। 
स्नैक्स : अलग अलग तरह के स्नैक्स जो अक्सर ड्रिंक्स के साथ लिए जाते हैं, वेटर्स ट्रे में लिए बार बार आपके सामने लेकर आते रहेंगे। अंतत: आप स्वयं ही बोर होकर उन्हें देखते ही हाथ से इशारा कर भगाते नज़र आयेंगे। 
सूप : इतना कुछ खाने के बाद अब निश्चित ही आपको एपेटाईज़र की ज़रुरत महसूस होने लगेगी, वर्ना खाना कैसे खाया जायेगा । एक्स्ट्रा मसाले डाल कर आप सूप को एक्स्ट्रा स्ट्रोंग बनाकर मेन कोर्स के लिए साहस जुटाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं प्लेट उठाने के लिए प्लेट्स के प्लेटफोर्म की ओर। आखिर एक प्लेट तो आपके नाम की भी रखी गई है जिसका आप न अनादर कर सकते हैं, न उपेक्षा।                   
एक ज़माना था जब लोग लड़की की शादी में प्लेट यह सोचकर छोड़ देते थे कि लड़की के पिता का कुछ खर्चा बचेगा। और चाट पकोड़ी खाकर ही पेट भर लेते थे।  लेकिन आजकल यह सोच आउटडेटड हो गई है। 

खाने का आखिरी पड़ाव : होता है सम्पूर्ण खाना। लेकिन यह क्या -- सामने एक स्टाल और बची है जहाँ मिल रहे हैं तवे की रोटी और दाल , तवा रोटी और साग , तवा सब्जियां और इन सबके साथ नान , तंदूरी रोटी , मिस्सी रोटी और देसी घी का तड़का। अब आपका कन्फ्यूज होना स्वाभाविक है। क्या गेट से होकर हॉल में प्रवेश करना चाहिए जहाँ रखे हैं सजे सजाये -- तरह तरह के पुलाव, पनीर की कई तरह की सब्जियां , मटर मशरूम , कोफ्ते, दही भल्ले , कढ़ी कोफ्ते, आलू भाजी , पालक कोफ्ते, और भी न जाने कितने तरह की सब्जियां जिन्हें देखकर लगता है जैसे अभी तक किसी ने उन्हें छुआ ही न हो। आखिर कन्फ्यूजन में आप क्या खाएं , यह आपको स्वयं भी न समझ आता है , न निर्णय कर पाते हैं।  

एक और आखिरी पड़ाव : 

अंत में आप स्वीट्स की ओर अग्रसर होते हैं। थोड़ा सा गाजर हलवा , मूंग का हलवा भी थोड़ा सा , दो चार जलेबियाँ , उस पर रबड़ी , एक गुलाब जामुन भी रख ही लेते हैं। अब तक प्लेट भर चुकी है , इसमें और रखने की जगह नहीं बची। कोई बात नहीं,  आइस क्रीम के साथ रसमलाई एक अलग प्लेट में बाद में ले लेंगे। सब चट करने के बाद अब इसे हज्म करने के लिए गर्मागर्म दूध तो होना चाहिए , मलाई मार के। किसी तरह मुश्किल से ख़त्म कर के बाहर आते हैं, टाई के पीछे पेट पर हाथ फिराते हुए। बस अब तो घर का रास्ता नापना चाहिए। 

लेकिन यह क्या , बाहर जाने का रास्ता तो दुल्हे ने घेर कर रखा है जो पिछले आधे घंटे से न जाने क्या कर रहे हैं कि अन्दर आ ही नहीं रहे। आप सोचते हैं , चलो कॉफ़ी ही हो जाये , उसे भी क्यों छोड़ा जाये।  जब तक कॉफ़ी ख़त्म करेंगे तब तक तो रास्ता साफ हो ही जायेगा। अंतत : गेट पर आकर पता चलता है कि पान मुफ्त में मिल रहे हैं तो क्यों न यह शौक भी फरमा लिया जाये। यार सादा ही लगाना , मीठा अब नहीं खाया जायेगा -- यह कहते हुए पान का बीड़ा मूंह में डालते हैं , और चल पड़ते हैं मूंह हाथ से पोंछते हुए, गाड़ी की ओर यह सोचते हुए कि :

*  हम शादियों में ऐसे ठूंस ठूंस कर क्यों खाते हैं जैसे एक ड्राइवर गाड़ी को हिला हिला कर पेट्रोल भरवाता है टैंक फुल करवाने के लिए ? 
* शादियों में इतना खाना ही क्यों बनवाते हैं जो खाया ही न जाये ? 
* बाहर खाने के इतने सारे व्यंजन होने के बाद क्या अन्दर के खाने की आवश्यकता रह जाती है ? 
ज़रा सोचिये।    

Wednesday, January 23, 2013

सर्दी एक महीना और ताम झाम बारह महीना ---


दिल्ली में दिसंबर जनवरी के महीने कड़ाके की सर्दी के महीने होते हैं। इन दिनों सारे गर्म कपडे जो महीनों से बिस्तरबंद कैद में पड़े रहते हैं , स्वतंत्रता की सर्द हवा खाते हुए हमें गर्मी का अहसास देने के लिए कैद से छूट जाते हैं। यही समय शादियों का भी होता है। हालाँकि इस वर्ष शादियों का साया बहुत ही कम समय तक रहा। लेकिन शादियों में वे कपड़े बहुत इज्ज़त पाते हैं जिनका बाकि समय कोई विशेष योगदान नहीं रहता। आखिर कुछ तो फर्क होता ही है आम और खास में, फिर वो कपड़े हों या पहनने वाला। इत्तेफ़ाक देखिये कि दोनों ही आम,  सारी जिंदगी पिसते रहते हैं जबकि खास कभी कभी ही कष्ट करते हैं , अपनी सुरक्षा के घेरे से निकलने का। 

दिल्ली में सर्दी तो अत्यधिक होती है लेकिन बस एक या डेढ़ महीने। इसलिए गर्म कपड़े बाहर कम और अन्दर ज्यादा रहते हैं। एक बार खरीद लीजिये तो चलते भी बरसों हैं। लेकिन पहनने का अवसर कम ही आता है। यदि गर्म कपड़ों को देखें तो , हजारों की कीमत के सूट साल में एक या दो बार ही पहने जाते हैं। महिलाओं की साड़ियों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह होती है। उनकी भारी साड़ियों का नंबर तो अक्सर जिंदगी में एक बार ही आता होगा। जब भी किसी शादी में जाना होता है तो हम तो अपना एक आरक्षित सूट निकाल लेते हैं, लेकिन श्रीमती जी के सामने यही सवाल आ उठता है कि क्या पहना जाये। अमुक साड़ी तो वहां पहनी थी, दोबारा कैसे पहन सकते हैं। हम समझाते हैं कि भाग्यवान जब हमें ही याद नहीं तो किसी और को क्या याद होगा। इस पर उनका वही नारीवादी नारा होता है कि आप तो मेरी ओर देखते ही कहाँ हैं। इस विषय में हो सकता है कि महिलाओं का नजरिया अलग हो क्योंकि उनकी पैनी नज़र से एक दूसरे का पहनावा और मेकअप बच नहीं सकता। शुक्र है कि पुरुष इस ओर कोई ध्यान नहीं देते , इसलिए जो भी पहन लो , सब चलता है। 

वैसे किसी को याद रहे या न रहे , लेकिन एक बात तो अवश्य है कि किसी मित्र के यहाँ दूसरी शादी में जल्दी ही जाना पड़े तो कपड़ों का ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आजकल वीडियो और फोटो में देखकर यह पता चलना स्वाभाविक है कि आपने क्या पहना है। हालाँकि यहाँ भी पुरुषों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सबके सूट लगभग एक जैसे ही होते हैं। वैसे भी अधिकांश पुरुष पहनावे के मामले में काफी लापरवाह होते हैं। या तो सूट ठीक से प्रेस नहीं होगा, या टाई नहीं पहनी होगी। सही मायने में सूटेड बूटेड पुरुष आम शादियों में कम ही नज़र आते हैं।    

हम तो पिछले पांच वर्ष से विशेष अवसरों के लिए एक ही सूट सुरक्षित रखे हुए हैं। छोटे मोटे से ब्रांडेड सूट को अरमानी समझ कर पहनते हैं, फिर कमीज़ भी ऐसी पहनते हैं जिसे कहीं और नहीं पहन सकते। टाई पहनते ज़रूर हैं लेकिन गाँठ बांधनी आज तक नहीं आई। ज़रुरत पड़ने पर श्रीमती जी या बच्चों से बंधवा लेते हैं। हमें तो टाई गले में फंदा सा लगती है लेकिन शादियों में पहनना पड़ता है। हालाँकि सरकारी सेवा में रहते हुए सूट पहनने की आदत सी ही नहीं रहती। वैसे भी एक डॉक्टर का काम ही ऐसा होता है कि सूट पहनने की न ज़रुरत होती है , न यह संभव होता है।        



यह फोटो चलने से पहले श्रीमती जी ने अपने नए सैमसंग मोबाईल से लिया है। अब इसमें पीसा की मीनार जैसा इफेक्ट आ रहा है तो यह कैमरे की गलती नहीं है। इस फोन का 5 मेगा पिकसल कैमरा तो वास्तव  में बड़ा अच्छा है। लेकिन अभ्यास करना पड़ेगा जो हमें कराना भी पड़ेगा। वर्ना कुछ का कुछ हो सकता है। 

अगली पोस्ट में देखिएगा शादियों में खाने की बर्बादी पर एक टिप्पणी।