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Friday, September 16, 2011

छोटी सी है जिंदगी --- प्यार करें या तकरार ?

आजकल टी वी पर हमारे मन पसंद कार्यक्रम --कौन बनेगा करोडपति -- की पांचवीं कड़ी चल रही है । पसंद इसलिए कि इसमें जनता के साथ साथ हमें भी अपनी औकात टेस्ट करने का अवसर मिल जाता है । कभी कभी तो लगता है कि यदि हम हौट सीट पर पहुँच गए होते तो पता नहीं कुछ जीत भी पाते या नहीं ।

वैसे पांच बार में भी हम आज तक यह नहीं जान पाए कि वहां जाने के लिए क्या करना पड़ता है । लेकिन सोचता हूँ यदि गलती से पहुँच भी जाएँ तो क्या होगा । ज्यादातर लोग ३.२० लाख से लेकर १२.५० लाख तक जीतते हैं । अमिताभ जी जब पूछेंगे --इतने रुपयों का आप क्या करेंगे ? तो क्या ज़वाब दूंगा ? अब यह सवाल तो अपने लिए बड़ा कठिन होगा ।

मुफ्त में मिले इन पैसों का क्य़ा करूँगा ? अभी तक तो ज़वाब नहीं सूझा इसका ।
वैसे भी यदि आपकी सांसारिक ज़रूरतें पूरी हो जाएँ तो और क्या चाहिए आपको !

लेकिन शायद सभी इतने भाग्यशाली नहीं होते ।

कार्यक्रम को देखता हूँ तो अजीब सा महसूस होता है । इस बार चयनित लोगों में सभी अलग अलग वर्ग के लोग हैं । कोई गृहणी है , कोई छात्र . कोई मजदूर , कोई मध्यम वर्गीय सरकारी नौकर ।
सबके लिए सबसे बड़ी ख़ुशी यही है कि वो यहाँ तक पहुंचे , अमिताभ बच्चन के दर्शन हो गए और उनके साथ बैठकर बातें करने का अवसर मिला ।

साथ ही कुछ लाख रूपये भी मिल गए जो निश्चित ही उनके बड़े काम आयेंगे ।

एक बंगाली शादीशुदा महिला ने बताया कि उसके पति को अभी काम नहीं मिला है । वह १०००/- महीना कमाती है। अपने लिए एक घर बनाना चाहती है जिसके लिए ३ लाख काफी रहेंगे । वह १२.५० लाख जीत कर गई ।
कोई छात्र --जो आगे पढना चाहता है ।
गृहणियां तो बच्चन जी से मिलकर इतनी खुश होती हैं जैसे उन्हें सारा जहाँ मिल गया ।
कई तो कहते हैं कि उन्हें अमिताभ बच्चन के दर्शन हो गए , जीवन तर गया ।

किसी ने कहा --सर आप यह प्रोग्राम जारी रखें । आपसे मिलकर एक आम आदमी को भी सेलेब्रिटी होने का अहसास होता है ।
ज़ाहिर है , बहुतों की जिंदगी में ख़ुशी घोल रहा है यह प्रोग्राम ।

इसलिए हम तो इस प्रोग्राम को देखकर ही आनंदित होते रहते हैं और दुआ करते हैं कि यह प्रोग्राम यूँ ही ज़रूरतमंद लोगों की जिंदगी में खुशियों का प्रकाश फैलाता रहे ।

इधर सरकार काला धन देश में लाने के लिए एक बार फिर एमनेस्टी स्कीम लागु करने जा रही है । यानि थोडा सा टैक्स दो और काले को सफ़ेद कर लो । कोई सजा नहीं , कोई पूछ ताछ नहीं। यहाँ भी सभी खुश ही खुश ।

सोचता हूँ --दो चार लाख रूपये काला धन अपने पास भी होता तो मज़ा आ जाता ।

लेकिन फिर सोचता हूँ --क्या हो जाता , पत्नी जी तो फिर भी डिनर में दो चपातियाँ ही देती खाने के लिए ।

इधर ब्लॉगजगत का हाल भी कुछ ऐसा ही है ।

ब्लोगर्स में लगभग सभी लोग ऐसे हैं जिनमे लेखन की प्रतिभा है लेकिन अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त साधन नहीं मिलता ।
किसी को कविता लिखने का शौक है लेकिन प्रकाशित नहीं होती ।
कोई कवि है लेकिन श्रोता नहीं मिलते क्योंकि मंच पर आने का अवसर नहीं मिलता ।

जिनको मंच पर आने का अवसर मिलने लगता है , वह ब्लोगिंग के लिए समय नहीं निकाल पाता ।

बुजुर्गों को अक्सर अकेलापन बहुत सताता है लेकिन ब्लोगिंग के ज़रिये अच्छा टाईम पास हो जाता है ।
गृहणियों को काम से छुट्टी मिलने के बाद ब्लॉग पर अपना हुनर दिखाने का सुनहरा अवसर मिलता है ।

सभी तो खुश हैं यहाँ ब्लोगिंग के बहाने ।

सही मायने में ब्लोगर डोट कॉम ब्लोगर्स के लिए के बी सी के अमिताभ बच्चन का काम कर रहा है ।
ऐसे में सब ब्लोगर्स का फ़र्ज़ बनता है कि सब मिलकर ब्लोगिंग में सद्भावना और सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाये रखें ।

विचारों में मतभेद हो सकता है , लेकिन पारस्परिक सम्मान का ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है ।
आखिर यह जिंदगी बड़ी छोटी सी होती है ।

डॉ अमर कुमार के यूँ अकस्मात असमय चले जाने से सारे ब्लॉगजगत को धक्का लगा है । आज हम ब्लोगिंग में उनके योगदान को याद कर प्रेरणा ही प्राप्त कर सकते हैं ।

लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि कल फिर कोई और जायेगा । कौन और कब --यह किसी को पता नहीं होता ।

उसके बाद ब्लॉगजगत में रह जाएँगी बस यादें --आपके लेखों और टिप्पणियों की ।

फिर काहे का झगडा, काहे की लड़ाई !

इसलिए क्यों न हम ऐसी छाप छोड़कर जाएँ कि लोग याद करते समय आपके बारे में सिर्फ अच्छा और अच्छा ही बोलें ।

Tuesday, September 13, 2011

ब्लोगिंग --सदी का श्रेष्ठतम अविष्कार ....

कुछ दिन से ब्लॉगजगत में मची आपा धापी को देख कर मन में यही ख्याल बार बार आता है --आखिर लोग ब्लोगिंग क्यों करते हैं ? सामान्य सी बात है , सब अपनी अपनी रूचि अनुसार ही ब्लोगिंग करते हैं । कोई स्वांत : सुखाय तो कोई अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल । कोई इसे अपना फ़र्ज़ समझता है । कोई समाजीकरण के लिए ब्लॉग पर समय देता है ।

कोई दिन में तीन बार पोस्ट लिखता है , कोई तीन दिन में एक बार । किसी ने एक ब्लॉग बनाया है , कोई दस दस ब्लॉग चला रहा है । गीत -ग़ज़ल , कहानियां , सामाजिक मुद्दे , हास्य -व्यंग , कार्टून , सैर सपाटा यहाँ तक कि व्यक्तिगत बातों की भी ब्लोग्स पर सभी तरह की सामग्री मौजूद है । ज़ाहिर है , जितनी विविधता यहाँ देखने को मिलती है , शायद ही कहीं और मिले ।

ऐसे में अपनी लिखी हुई एक पुरानी पोस्ट याद आती है जिसे हमने आरम्भ में ही लिखा था , लेकिन आज भी उतनी ही तर्कसंगत लगती है ।

क्या है ब्लोगिंग :


ब्लोगिंग एक असाध्य रोग है, बीमारी है
टिप्पणियों का अनंत इंतज़ार है, बेकरारी है।

लेखन का विकट भूत है
पहचान की अमिट भूख है।

टिप्पणियां पचास तो खुशी है
रह जाएँ पाँच तो मायूशी है।

बुजुर्गों का टाईम पास है
युवाओं का समय ह्रास है।

ब्लोगिंग मय सा अतुल्य नशा है
ब्लोगर्स की नस नस में बसा है।

लेकिन
ब्लोगिंग ये भी तो है ---

विचारों की मूक अभिव्यक्ति है
हज़ारों की अचूक शक्ति है।

मानविक चेतना की कड़ी है
सामाजिक एकता की लड़ी है।

सेवानिवृत बुजुर्गों का सकून है
कार्यरत युवाओं का जुनून है।

प्रणाली पर उठता सवाल है
बदहाली पर उछलता बवाल है।

मुहब्बत का फैलता संसार है
सदी का श्रेष्ठतम आविष्कार है।


सदी के इस श्रेष्ठतम अविष्कार को यदि हम सकारात्मक रूप में प्रयोग करें तो निश्चित ही ब्लोगिंग एक सशक्त माध्यम के रूप में जन जागरण के कार्य में सहायक सिद्ध हो सकती है ।

और अब एक सवाल, एक ज़वाब :

सवाल: बहादुर इंसान कैसा होता है ?

ज़वाब: बहादुर इंसान उस धावक जैसा होता है, जो दौड़ में भाग लेने तो जाता है, लेकिन दौड़ शुरू होने के बाद भी , आरम्भ रेखा पर ही खड़ा रहता है। क्योंकि जिस समय बाकि सभी धावक मैदान में उसे पीठ दिखा कर भाग रहे होते हैं, एक अकेला वही होता है, जो मैदान में डटा रहता है।


Thursday, September 8, 2011

प्यार करने वाले कभी क्यों डरते नहीं ---

स्नेह भाव के मामले में मनुष्यों और पशुओं में एक बड़ी समानता है --दोनों प्रजातियों में व्यस्क, विशेषकर मादा अपने बच्चों को चूम कर अपने स्नेह और भावनाओं का इज़हार करती हैं । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ।

यदि मनुष्य की बात की जाये तो मनुष्य चुम्बन का कई तरह से प्रयोग करता है ।

* एक मां का संतान के प्रति ममता और स्नेह । मां हर हाल में अपने बच्चे को चूम सकती है ।
* कुछ देशों में यह आदर और सम्मान का प्रतीक माना जाता है । हालाँकि इस चुम्बन में खाली गाल से गाल मिलाते हैं ।
* प्यार और रोमांस का प्रतीक --प्रेमी-प्रेमिका और पति पत्नी के बीच चुम्बन । यह अक्सर होठों पर होता है । ज़ाहिर है , इसमें सलाईवा ( लार ) का आदान प्रदान होता है ।

अब यदि किसी के मूंह से बदबू आ रही हो तो सारा प्यार उड़न छू हो सकता है ।

किसी
भी मनुष्य के मूंह से बदबू आने के कारण हो सकते हैं :

* नियमित रूप से दन्त मंजन या ब्रश न करना । शहर में अक्सर लोग खाने के बाद कुल्ला भी नहीं करते क्योंकि यह अभद्र माना जाता है । इसीलिए शहर में भी बहुत से लोगों के मूंह से बदबू आ रही होती है ।
* दांतों में कीड़ा --डेंटल केरीज। इससे भी मूंह से बदबू आ सकती है ।
* अनियंत्रित मधुमेह तथा अन्य असाध्य रोग ।
* विशेष किस्म के खाद्य पदार्थ जैसे लहसुन , प्याज़ , मूली आदि भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं ।

उपरोक्त परिस्थितियों में न सिर्फ मूंह से आने वाली बदबू प्यार की दुश्मन बन सकती है बल्कि व्यक्ति विशेष को सार्वजनिक तौर पर भी उपहास और उपेक्षा का पात्र बना सकती है ।

लेकिन
कहते हैं --प्यार करने वाले कभी डरते नहीं । वे इन्सान तो क्या कुत्तों को भी प्यार करने में नहीं हिचकते ।

अब
ज़रा इस सुंदरी को ही देखिये :


चित्र गूगल से साभार ।

माना कुत्ता एक स्वामिभक्त , वफ़ादार , भरोसेमंद और प्यारा सा पालतू प्राणी है । लेकिन क्या इस तरह कुत्ते से प्यार करना सही है ?

वैसे तो प्यार करने के लिए दुनिया में मनुष्यों की कमी नहीं है । और प्यार करने लायक भी बहुत हैं । लेकिन यदि पालतू प्राणियों से भी प्यार किया जाए तो इन बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है :

कुत्ते से मूंह चटवाने से पहले इतना जान लीजिये --कुत्ते से आपको कई बीमारियाँ लग सकती हैं , जिन्हें जूनोटिक डिसिजिज कहा जाता है , यानि जानवरों से मनुष्य को लगने वाले रोग ।
और ये हैं :

* रेबीज जो १०० % घातक बीमारी है . इसका रोगी पानी नहीं मांगता ।
* वोर्म्स इन्फेस्टेशन -- जैसे हुक्वोर्म , राउंड वोर्म , टेप वोर्म ।
हुक्वोर्म से खून की कमी हो जाती है ।
राउंड वोर्म से पेट में दर्द रहता है ।
टेप वोर्म से Hydatid disease और सिस्टीसर्कोसिस होता है ।
* लेपटोस्पाइरोसिस-- यह भी एक भयंकर रोग का रूप धारण कर सकती है ।
* टिक बोर्न रोग ।

आप कह सकते हैं कि आप तो अपने कुत्ते को हमेशा साफ सुथरा , और नहला धुलाकर रखते हैं ।

लेकिन अब ज़रा यहाँ देखिये :



दिल्ली
के लोदी गार्डन में पिकनिक मनाने आए ये मां बेटा /बेटी , भले ही जोरबाग में रहने वाले किसी फोरेन डिप्लोमेट के डार्लिंग हों , लेकिन ये अपने लम्बे बालों में घास से कितने कीटाणु या पेरासाईट लेकर गए होंगे , यह कहा नहीं जा सकता ।

और जब इनका मालिक प्यार से इनसे गले मिलेगा या चूमा चाटी करेगा , तो उसका भी संक्रमित होना तय है ।

जी हाँ , कुत्ते की लार में रेबीज के वायरस होते हैं ।
बालों में वोर्म्स के अंडे और टिक्स हो सकते हैं ।
पेशाब से लेपटोस्पाइरोसिस का संक्रमण हो सकता है ।

क्या यह जानकर भी आप अपने कुत्ते के साथ खाना खाना , सोना या चूमकर प्यार करना चाहेंगे ?
मर्ज़ी आपकी ।

Saturday, September 3, 2011

हम सपने में भी ना ना चिल्लाते रहे --

पिछले महीने सारा देश अन्नामयी रहा । लोगों का जोश देखकर सरकार को भी झुकना पड़ा । जनता जनार्दन में ऐसा जोश बहुत कम देखने को मिलता है । लेकिन इस दौरान कुछ अप्रत्यासित घटनाएँ भी देखने को मिली । प्रस्तुत है इसी पर आधारित एक हास्य-व्यंग रचना :

भ्रष्टाचार की मार की मारी
एक दिन बोली पत्नी हमारी

बहुत हो गया अब उठो , अज़ी सुनते हो
क्यों टी वी के सामने पड़े , बेकार सर धुनते हो !

दिल्ली की जनता सारी, इण्डिया गेट को है भागी
आपकी देश प्रेम की भावना, अभी तक नहीं जागी ?

टोपी ना टी शर्ट , ना ही तिरंगा खरीद कर लाए हैं
शर्माजी तो दो बार रामलीला मैदान भी हो आए हैं ।

बाजु वाला पडोसी भी अन्ना टोपी लगाये खड़ा है
पर हे भगवान , मेरा कैसे कंजूस से पाला पड़ा है !

अन्ना अन्न सन्न छोड़ , अनशन पर बैठे हैं
पर आप जाने किस बात की टेंशन में ऐंठे हैं !

सुन बीबी के प्रवचन , हमको होश आ गया
दिल में देश भक्ति का , अन्ना जोश छा गया ।

पत्नी से कहा , जल्दी खाना पैक करो
आज हम भी अनशन करने जायेंगे ।

देश भक्तों संग लंच व रात का खाना
रामलीला मैदान में ही बैठ कर खायेंगे ।

पत्नी बोली अज़ी घर का खाना तो आप रोज खाते हैं
बुद्धिजीवी लोग तो वहां बस पिकनिक मनाने जाते हैं ।



हमने पडोसी से टोपी और टी शर्ट उधार मंगवाई
फिर उन्ही की बाईक उठा , बिना हेलमेट दौड़ाई ।

८०-९० की रफ़्तार से सड़क पर सरपट दौड़े
अन्ना के नाम पे सारे कानून बेधड़क तोड़े ।

गेट पर एक स्वयं सेवक ने पूछा , बताएं
ज़नाब आप क्या अन्ना सेवा कर सकते हैं ?

हमने कहा भैया , पहले ज़रा भोजन करायें
फिर शाम तक भूख हड़ताल पर बैठ सकते हैं ।

लेकिन फ़ूड स्टाल पर देखा , पब्लिक कतार लगाने लगी थी
मंच पर एक भद्र महिला , जमूरे का खेल दिखाने लगी थी ।

थोड़ी देर बाद एक हास्य कवि , वीर रस की कविता सुनाने लगे
सुनकर होश खोकर लोग , जोश में आकर तालियाँ बजाने लगे ।

एक फ़िल्मी पात्र को , अन्ना भक्ति कुछ ज्यादा चढ़ गई
उनके अभिनय से पंडाल में गर्मी अत्याधिक बढ़ गई ।

अभिनेता जब जनता को नेताओं का गुणगान सुनाने लगा
एक स्वामी चुपके से सारी ख़बरें हाईकमान को पहुँचाने लगा ।

जैसे जैसे पंडाल में पब्लिक की भीड़ बढ़ने लगी
हम जैसों के चेहरों पर , हवाईयां सी उड़ने लगी ।

उधर सड़क पर पुलिस की तादाद बढ़ रही थी
इधर हमारे दिल की धड़कन भी चढ़ रही थी ।

डंडाधारी पुलिस को देख , हमें बाबा रामदेव याद आये
वन्दे मातरम का नारा छोड़ , हम जोर से चिल्लाये ।

मत मारो , हमें मत मारो , हम तो बीबी के बहकाए हैं
कौन अन्ना, कैसा अन्ना, मुफ्त का खाना खाने आए हैं ।

तभी पत्नी ने जोर जोर से हिलाकर हमें जगाया
क्यों नींद में चिल्लाते हो , ३२ बच्चों के ताया ।


'शरीफ़' तो गली गली में अन्ना के नारे लगाते रहे
और 'तारीफ' सपने में भी ना ना ही चिल्लाते रहे ।


नोट : अन्ना आन्दोलन में मध्यम और युवा वर्ग का योगदान अत्यंत सराहनीय रहा ।