कुछ दिन से ब्लॉगजगत में मची आपा धापी को देख कर मन में यही ख्याल बार बार आता है --आखिर लोग ब्लोगिंग क्यों करते हैं ? सामान्य सी बात है , सब अपनी अपनी रूचि अनुसार ही ब्लोगिंग करते हैं । कोई स्वांत : सुखाय तो कोई अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल । कोई इसे अपना फ़र्ज़ समझता है । कोई समाजीकरण के लिए ब्लॉग पर समय देता है ।
कोई दिन में तीन बार पोस्ट लिखता है , कोई तीन दिन में एक बार । किसी ने एक ब्लॉग बनाया है , कोई दस दस ब्लॉग चला रहा है । गीत -ग़ज़ल , कहानियां , सामाजिक मुद्दे , हास्य -व्यंग , कार्टून , सैर सपाटा यहाँ तक कि व्यक्तिगत बातों की भी ब्लोग्स पर सभी तरह की सामग्री मौजूद है । ज़ाहिर है , जितनी विविधता यहाँ देखने को मिलती है , शायद ही कहीं और मिले ।
ऐसे में अपनी लिखी हुई एक पुरानी पोस्ट याद आती है जिसे हमने आरम्भ में ही लिखा था , लेकिन आज भी उतनी ही तर्कसंगत लगती है ।
क्या है ब्लोगिंग :
ब्लोगिंग एक असाध्य रोग है, बीमारी है
टिप्पणियों का अनंत इंतज़ार है, बेकरारी है।
लेखन का विकट भूत है
पहचान की अमिट भूख है।
टिप्पणियां पचास तो खुशी है
रह जाएँ पाँच तो मायूशी है।
बुजुर्गों का टाईम पास है
युवाओं का समय ह्रास है।
ब्लोगिंग मय सा अतुल्य नशा है
ब्लोगर्स की नस नस में बसा है।
लेकिन ब्लोगिंग ये भी तो है ---
विचारों की मूक अभिव्यक्ति है
हज़ारों की अचूक शक्ति है।
मानविक चेतना की कड़ी है
सामाजिक एकता की लड़ी है।
सेवानिवृत बुजुर्गों का सकून है
कार्यरत युवाओं का जुनून है।
प्रणाली पर उठता सवाल है
बदहाली पर उछलता बवाल है।
मुहब्बत का फैलता संसार है
सदी का श्रेष्ठतम आविष्कार है।
सदी के इस श्रेष्ठतम अविष्कार को यदि हम सकारात्मक रूप में प्रयोग करें तो निश्चित ही ब्लोगिंग एक सशक्त माध्यम के रूप में जन जागरण के कार्य में सहायक सिद्ध हो सकती है ।
और अब एक सवाल, एक ज़वाब :
सवाल: बहादुर इंसान कैसा होता है ?
ज़वाब: बहादुर इंसान उस धावक जैसा होता है, जो दौड़ में भाग लेने तो जाता है, लेकिन दौड़ शुरू होने के बाद भी , आरम्भ रेखा पर ही खड़ा रहता है। क्योंकि जिस समय बाकि सभी धावक मैदान में उसे पीठ दिखा कर भाग रहे होते हैं, एक अकेला वही होता है, जो मैदान में डटा रहता है।

