Monday, November 25, 2019

महा चुनावों पर एक पैरोड़ी ---


नगरी नगरी , होटल होटल , छुपता जाये बेचारा ,
ये सियासत का मारा  ....

चुनावों तक का साथ था इनका , जीतने तक की यारी,
आज यहाँ तो कल उस दल में , घुसने की तैयारी।
नगरी नगरी , होटल होटल ----

मंत्री पद के पीछे क्यों हैं , ये नेता सब पगले ,
यहाँ की ये कुर्सी नहीं मिलेगी , ग़र होटल से निकले ।
नगरी नगरी , होटल होटल ----

कदम कदम पर नेता बैठे , अपना हाथ बढ़ाये ,
सियासत के खेल में जाने , कौन कहाँ मिल जाये।
नगरी नगरी , होटल होटल ---

काले नोटों में बिकता हो, जहाँ दलों का प्यार ,
वोट्स भी बेकार वहां पर , वोटर भी बेकार।
नगरी नगरी , होटल होटल  ----

उन जैसों के भाग में लिखा , कुर्सी का वरदान नहीं ,
जिसने उनको नेता चुना वो , अवसर है मतदान नहीं।
नगरी नगरी , होटल होटल ---




6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (26-11-2019) को    "बिकते आज उसूल"   (चर्चा अंक 3531)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ....... ,.....4 दिसंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. वाह!!!
    बहुत सटीक...

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  4. वाह बेहतरीन 👌

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  5. सामयिक व्यंग सटीक प्रहार।
    बहुत सुंदर पैरोड़ी।

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