ऑस्ट्रेलिया में भारत एक और टेस्ट मैच पारी से हार गया । विदेशी भूमि पर लगातार सातवीं हार और वर्तमान सीरिज में लगातार दूसरा मैच पारी से हारने के बाद , किसी भी क्रिकेट प्रेमी को सोचने पर मजबूर होना पड़ सकता है कि अब इसके बाद क्या । हमने क्रिकेट में दिलचस्पी लेनी शुरू की थी १९६९ में जब ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत के दौरे पर आई थी, बिल लौरी की कप्तानी में । उन दिनों बस छोटे छोटे ट्रांजिस्टर होते थे , कमेंट्री सुनने के लिए । ट्रांजिस्टर भी किसी किसी के पास ही होता था । लेकिन जहाँ भी मौका मिलता , हम कान लगाकर खड़े हो जाते । लोगों में भी इतना उत्साह होता था कि हमारे स्कूल के बाहर एक चाय की दुकान वाला ब्लैक बोर्ड लगाकर पूरा स्कोर बॉल टू बॉल लिखता रहता था । हमें भी अचानक इतनी दिलचस्पी हुई कि कमेंट्री सुनते सुनते हमें ऑस्ट्रेलिया टीम के सारे सदस्यों के नाम रट से गए ।
लौरी, स्टैकपॉल, चैपल, सीहन, वाल्टर्स, रेडपाथ, कोनाली, मेकेंजी, टेबर , ग्लिसन , फ्रीमन , मेलेट । इस सीरिज के बाद , ऑस्ट्रेलिया को भारत में सीरिज जीतने में पूरे ३५ साल लग गए ।
उस समय भारतीय क्रिकेट में स्पिनर्स का बोलबाला था ।
बेदी , प्रसन्ना , चन्द्रशेखर और वेंकटराघवन की चौकड़ी विश्व भर में मशहूर थी । मीडियम पेसर के नाम पर होते थे बस
आबिद अली और सोलकर जो बस दो चार ओवर फेंकते थे ।
फिर १९७१ में गावस्कर की एंट्री हुई । गावस्कर और विश्वनाथ , जो बाद में साला जीजा बने , हमारी टीम के विश्वसनीय बल्लेबाज़ होते थे । गावस्कर की ठुक ठुक कभी कभी बोर भी करती थी, लेकिन
उनकी जमकर खेलने की कला से उन्हें कई विश्व रिकोर्ड बनाने का अवसर मिला । सबसे ज्यादा शतक और रन का कीर्तिमान कभी उन्ही के नाम होता था ।
१९७९ में पाकिस्तान के विरुद्ध खेलते हुए
कपिल देव का आगमन हुआ । कपिल पा जी एक ऑल राउंडर के रूप में छा गए । उनकी बल्लेबाज़ी देखने में बड़ा मज़ा आता था । उस समय के चार ऑल राउंडर थे --
इमरान खान , इयान बॉथम , रिचर्ड हेडली और कपिल देव ।१९८३ में विश्व कप जीतने के बाद १९८५ तक भारत की धाक जमी रही । सारजाह में
चैम्पियन ऑफ़ चैम्पियंस ट्रॉफी जीतकर
रवि शास्त्री मेन ऑफ़ द सीरिज बने थे जिन्हें गिफ्ट में एक औडी कार मिली थी ।
१९८९ में वंडर बॉय
सचिन तेंदुलकर का क्रिकेट जगत में प्रवेश हुआ । तब से अब तक लगातार २२ साल से क्रिकेट खेलते हुए सचिन ने लगभग हर संभव रिकोर्ड तोड़ा या बनाया ।
१९९५-९६ में
सौरव गांगुली और
राहुल द्रविड़ ने भारित टीम में अपने पैर जमाये । तदपश्चात् करीब दस साल तक
सौरव , सचिन , राहुल और लक्ष्मण की बल्लेबाज चौकड़ी ने टीम इंडिया को शिखर पर पहुँचाने में बहुत योगदान दिया । सौरव की कप्तानी में पहली बार विदेश में भी मैच जीतने लगे ।
इस बीच
अनिल कुंबले ने एक मंजे हुए स्पिनर का रोल प्ले करते हुए , भारत के क्रिकेट इतिहास में पहली और आखिरी बार एक पारी में दस विकेट लेकर इतिहास रचा ।
कुंबले के बाद क्रिकेट कप्तान बने
धोनी ने पहले अपनी बल्लेबाजी , फिर कप्तानी से टीम इंडिया को शिखर पर पहुंचा दिया ।
पहले प्रथम टी २० विश्व कप जिताया । फिर २०११ में वन डे विश्व कप जिताया । इस बीच दो साल तक टेस्ट मैच में भी भारत की टीम नंबर एक बनी रही । देखा जाए तो यह समय भारतीय क्रिकेट के इतिहास में गोल्डन पीरियड कहा जायेगा । इस सफलता में धुरंधर बल्लेबाज
वीरेन्द्र सहवाग का रोल भी अहम रहा । सहवाग भारत के अकेले बल्लेबाज हैं जिन्होंने टेस्ट मैच में दो बार तिहरा शतक लगाया है । साथ ही सहवाग वन डे मैचिज में एक पारी में सबसे अधिक रन बनाकर दोहरा शतक बनाने वाले सचिन के बाद दूसरे क्रिकेटर हैं ।
लेकिन वर्ल्ड कप की जीत के बाद टीम इंडिया के सितारे गर्दिश में आ गए । पहले इंग्लेंड में चार ज़ीरो से हारे । अब ऑस्ट्रेलिया में भी चार ज़ीरो से हारने का पूरा खतरा है ।
अब सवाल यह उठता है कि क्या सीनियर प्लेयर्स को रिटायर हो जाना चाहिए ?
लक्ष्मण : अब लैक्स मेन ( ढीला आदमी ) बन चुका है ।राहुल द्रविड़ : को एक दो सीरिज खेल कर टॉप फॉर्म में सेवा निवृत हो जाना चाहिए । सचिन : के लिए बी सी सी ई को सोचना चाहिए और ज़िम्बाब्वे या बंगला देश को जल्दी से जल्दी भारत में टेस्ट मैच खेलने के लिए बुलाना चाहिए ताकि वह अपना सौवां शतक लगाये और देश की १२२ करोड़ जनता चैन की साँस ले सके । धोनी : को कप्तानी और टेस्ट खेलना छोड़ देना चाहिए । आखिर किसी और विकेट कीपर को भी लाइफ बनाने का अवसर मिल जायेगा । बेचारा पार्थिव पटेल न जाने कब से इंतजार कर रहा है । पता नहीं १२ वीं पास भी कर पाया या नहीं । लेकिन अब सवाल यह पैदा होता है कि टेस्ट टीम की कप्तानी किसे सौंपी जाएगी । सहवाग और गौतम गंभीर दोनों आउट ऑफ़ फॉर्म चल रहे हैं । ऐसे में कप्तानी का भार डालना क्या सही रहेगा ।
तो क्या फिर से एक बार राहुल या सचिन को यह भार संभालना पड़ेगा ? लेकिन हम और आप यह चिंता क्यों करें । पांच पांच सेलेक्टर्स हैं ना जो इस काम के लिए मोटी मोटी तनख्वाह पाते हैं ।