Saturday, August 31, 2013

आने वाले स्वस्थ कल के लिए आज को सुधारना आवश्यक है --


पिछली पोस्ट में हमने देखा कि बुजुर्गों का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है. इस आयु वर्ग के लोगों की निरंतर बढती संख्या को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि हम उनकी समस्याओं पर ध्यान देते हुए उनका निवारण करने का प्रयास करें। कई प्रवासी भारतीय मित्रों की टिप्पणी से ज्ञात होता है कि विकसित देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए अधिकारिक तौर पर प्रबंध किये जाते हैं जिनमे न सिर्फ आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाती है बल्कि रहने , खाने पीने और मनोरंजन का भी ख्याल रखा जाता है.

लेकिन हमारे देश में इस तरह की सुविधाएँ या तो न के बराबर हैं , या उनका सही उपयोग नहीं हो पाता। ऐसे में परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. शहरीकरण के साथ और आधुनिक जीवन शैली से बिखरते परिवारों में यह और भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए बुजुर्गों का आत्मनिर्भर होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. आत्मनिर्भरता में सबसे ज्यादा आवश्यक है , स्वस्थ रहना क्योंकि कहते हैं कि जान है तो जहान है.

स्वास्थ्य : सिर्फ रोगमुक्त होना ही स्वास्थ्य की निशानी नहीं है. आधुनिक परिभाषा अनुसार स्वास्थ्य -- शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , आध्यात्मिक और आर्थिक सम्पन्नता का होना है. बुजुर्गों में विशेषकर ये सभी कारक बहुत महत्त्व रखते हैं क्योंकि इस उम्र में प्राकृतिक रूप से इन सभी शक्तियों का ह्रास होने लगता है. बढती उम्र के साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं मुख्य रूप से इस प्रकार हैं :

* शारीरिक :  ब्लड प्रेशर , डायबिटिज , हृदय रोग , घुटनों में दर्द ,नेत्र ज्योति का कम होना , मोतिया बिन्द , श्रवण शक्ति कम होना , प्रोस्टेट का बढ़ना और आम कमज़ोरी।

* मानसिक : इस उम्र में अकेलापन बहुत तंग करता है. अवसाद , स्मरण शक्ति कम होना और चिडचिडापन आम होता है. एलजाइमर्स डिसिज एक लाइलाज बीमारी है.

* सामाजिक : अकेलापन विशेषकर यदि पति या पत्नी में से एक न रहे. घरों में भी बच्चों और बड़ों को बुजुर्ग लोग एक बोझ सा लग सकते हैं. संयुक्त परिवार में संतुलन बनाये रखना दुर्लभ सा हो जाता है .

* आध्यात्मिक : इस रूप में कुछ इज़ाफा होता है. अक्सर लोग इस उम्र में आकर अत्यधिक धर्म कर्म में विश्वास रखने लगते हैं. हालाँकि इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि यह उम्र अनुसार यथोचित ही लगता है.

* आर्थिक : अक्सर सेवा निवृत लोगों को आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर होना पड़ सकता है यदि उन्होंने स्वयं अपने लिए उचित धन राशी का प्रबंध न कर रखा हो. यहाँ अभी भी प्रशासनिक आर्थिक सहायता का आभाव है.

बुजुर्गी की ओर बढ़ना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है. लेकिन इससे जुड़ी शारीरिक समस्याएँ बहुत पहले ही शुरू हो जाती हैं. इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान आरम्भ से ही रखें। यदि ज़वानी में सही रहे तो बुढ़ापे में भी सही रहने की सम्भावना बढ़ जाती है. आरामदायक जिंदगी की ही देन है -- मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स।

मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स :

यह शहरीकरण और सम्पन्नता का स्वास्थ्य प्रसाद है , इन्सान के लिए. अति निष्क्रियता से हमारे शरीर में विकार कुछ इस तरह पैदा होते हैं --

* मोटापा
* हाई बी पी
* डायबिटिज
* हाई कॉलेस्ट्रोल
* हाई यूरिक एसिड

उपरोक्त पांचों विकार पारस्परिक सम्बंधित होते हैं यानि एक से दूसरा रोग पनपता है और अंतत : पांचों विकारों से ग्रस्त होकर आप बन जाते हैं मिस्टर एक्स। आप मिस्टर एक्स न बन जाएँ , इसके लिए इन बातों का ध्यान रखा जाये :

१ ) वज़न -- ८ ० किलो से कम रखें।
२ ) बी पी -- नीचे वाला बी पी ८ ० से कम.
३ ) नब्ज़ की गति -- ८ ० से कम .
४ ) ब्लड शुगर फास्टिंग -- ८ ० से कम .
५)  कमर का नाप -- ८ ० सेंटीमीटर से कम .

यह तभी संभव है जब आप खान पान पर नियंत्रण रखें और नियमित सैर करें। ऐसा करने से वज़न , बी पी ,   शुगर , और कॉलेस्ट्रोल सामान्य बने रहते हैं और आप बढती उम्र में भी ज़वान दिखाई देते हैं। खाने में घी और मीठा कम से कम खाना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही अत्यंत ऊर्जावान खाद्य पदार्थ हैं. साथ ही नियमित रूप से  ४५ मिनट की वॉक करने से आपका शरीर आपके नियंत्रण मे रहता है.

हमारा आने वाला कल स्वस्थ हो , इसके लिए अपने आज को संवारना सुधारना आवश्यक है. स्वस्थ शुभकामनायें .

        

Sunday, August 25, 2013

जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है , वह केवल अपना हिंदुस्तान है---


विकास और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के कारण अब हमारे देश में भी मनुष्यों की औसत आयु ७० वर्ष से ज्यादा हो गई है. हमारे मित्रों और निकट सम्बन्धियों में ही चार पांच ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति हैं जिनकी उम्र ८० से ज्यादा है.  ज़ाहिर है , देश में ६० वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की संख्या निरंतर बढती जा रही है. ऐसे में परिवारों , समाज और देश की नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है, ताकि देश के बुजुर्गों का यथोचित ख्याल रखा जा  सके.

हमारे जीवन में बड़े बूढों का बहुत महत्त्व होता है. ये  वर्तमान के बुजुर्ग ही हैं जिन्होंने हमारे वर्तमान को सुनहरा बनाने के लिए भूतकाल में अपना वर्तमान न्यौछावर किया था. आज जब हम समर्थ हैं और  वे असमर्थ होने लगे हैं , तब उनका सहारा बनकर यह क़र्ज़ चुकाना हमारा फ़र्ज़ है.

कहते हैं , जितनी आवश्यक विधालय और कॉलेज में ग्रहण की गई  शिक्षा है , उतनी ही आवश्यक घर में बड़े बूढों से ली गई अनौपचारिक शिक्षा है. जहाँ औपचारिक शिक्षा हमें  भौतिक विकास और प्रगति की राह पर ले जाती है , वहीँ अनौपचारिक शिक्षा नई पीढ़ी में संस्कारों का संचार करती है, जिससे हमारा नैतिक विकास होता है. हम भाग्यशाली हैं कि हमारे देश में  अभी भी हमारे संस्कार जीवित हैं. इसीलिए यहाँ अभी भी पारिवारों में पारस्परिक प्रेम और सौहार्द नज़र आता है.

माना कि विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है ,
और अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है.
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है ,
वह केवल अपना हिंदुस्तान है.               

लेकिन देखने में आता है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ अब संयुक्त परिवार समाप्त होते जा रहे हैं. शहरों में एकल ( न्यूक्लियर फैमिली ) परिवार भी तभी तक रहते हैं , जब तक बच्चे विधालय में पढ़ते हैं. एक बार कॉलेज में आने के बाद अक्सर दाखिला किसी दूर दराज़ शहर के कॉलेज में हो गया तो बच्चा सदा के लिए दूर हो जाता है. और घर में रह जाते हैं बस पति पत्नि। ये भी तभी तक साथ होते हैं जब तक दोनों जिन्दा हैं. लेकिन बुढ़ापे के साथ कई तरह की शारीरिक, मानसिक , सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी आने लगती हैं. ऐसे में उनका बच्चों पर आश्रित होना स्वाभाविक सा है.

बुढ़ापे में सबसे बड़ी समस्या है , एकाकीपन। संयुक्त परिवारों में भी देखने में आता है कि बुजुर्गों से बात करने वाला कोई नहीं होता। जहाँ कामकाजी पति पत्नि अपने अपने काम में व्यस्त रहते हैं , वहीँ बच्चों को बुजुर्गों की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। ऐसे में बुजुर्गों में सबसे ज्यादा सम्भावना अवसाद पैदा होने की रहती है. अवसाद से अनेकों शारीरिक और मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं. वैसे भी इस उम्र में आकर ब्लड प्रेशर , मधुमेह , हृदय रोग , जोड़ों का दर्द , शारीरिक और मानसिक कमजोरी आदि ऐसे रोग हैं जो स्वत ; ही मनुष्य को घेर लेते हैं.

ज़ाहिर है , बुजुर्गों को अपनी संतान के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है. जिन्होंने अपनी उंगली पकड़ाकर आपको चलना सिखाया , बुढ़ापे में उन्ही को आपके सहारे की आवश्यकता होती है. विकसित देशों में लोग वर्ष में एक बार मदर्स डे / फादर्स डे आदि मनाकर अपना कर्तव्य पूर्ण समझ लेते हैं. लेकिन इस मानसिकता का प्रभाव हमारे समाज पर न पड़े , इसके लिए हमें अपनी संस्कृति को याद रखते हुए सचेत रहना पड़ेगा . याद रहे कि आज के युवा कल के  बुजुर्ग हैं और आज के बच्चे कल के युवा। यह जीवन चक्र यूँ ही चलता रहता है.

नोट : एक अरसे से भाषण देने का अवसर नहीं मिला था. सोचा काव्य अभिव्यक्ति की तरह क्यों न ब्लॉग पर ही भाषण दे दिया जाये !  
         


Thursday, August 22, 2013

एक अद्भुत अनुभव -- मुंबई से खंडाला !


पिछली पोस्ट से आगे ---

जीवन में पहली बार राजधानी ट्रेन की यात्रा कर हम ईद के दिन मुंबई पहुंचे और दिन भर मुंबई की सैर करते हुए ईद का दिन वस्तुत: मुंबई की आम जनता के बीच बिताया। अगले दिन आई आई टी में दीक्षांत समारोह में सम्मिलित होना था. हमारे लिए तो यह भी प्रथम अवसर ही था जब हम किसी दीक्षांत समारोह में शामिल होने जा रहे थे. हमें तो अपनी डिग्री अपने कॉलेज के छोटे बाबु ( क्लर्क ) से ही मिली थी.         



सभा कक्ष में छात्रों के लिए आयोजन किया गया था और सभी अभिभावकों को चार लेक्चर थियेटर्स में बैठाया गया था. लेक्चर हॉल भी बहुत आधुनिक साज सज्जा से लैस और आरामदायक थे. तीन बड़े स्क्रीन्स पर सारी कार्यवाही दिखाई जा रही थी. एक बजे सभी के लिए लंच का आयोजन था. लंच के समय हजारों लोगों का एक साथ लंच करना भी एक आश्चर्यजनक दृश्य था. आरम्भ में थोड़ा असमंजस्य की स्थिति लगी लेकिन जल्दी ही स्थिति को संभाल लिया गया और सभी ने आराम से लंच किया।    





लंच के बाद कैम्पस घूमने का समय मिल गया. कैम्पस इतना हरा भरा है कि पेड़ों के झुरमुट में भवन भी दिखाई नहीं देते। एक तरफ पवाई लेक और उसके पार हीरनन्दानी आवासीय  कॉम्प्लेक्स और दूसरी ओर पहाड़ , बहुत मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे.

घर पहुँचते पहुंचते शाम हो गई थी. लेकिन बेटी की सहेलियां जो अलग अलग शहरों से आई हुई थी, सबने मिलकर मॉल जाने का प्रोग्राम बना लिया। हमें भी उनके पीछे पीछे जाना ही पड़ा. आखिर डिनर पार्टी भी हमारी तरफ से हुई. बदले में बस उन्हें हमारी दो चार कवितायेँ सुननी पड़ी. लेकिन रात के खाने के बाद पता चला बिटिया ने केक का ऑर्डर दिया हुआ था. एक बार फिर पहली बार हमने रात के बारह बजे जन्मदिन का केक काटा।   

अगले दिन हमारा कार्यक्रम था लोनावला और खंडाला की सैर. सुबह ८ बजे टैक्सी वाला पहुँच गया और हम चल दिए खंडाला की ओर -- एक बार फिर जीवन में पहली बार.   




मुंबई में तीनों दिन रह रह कर बारिश हो रही थी. मुंबई पूना हाइवे पर रास्ते भर बारिश होती रही. पहाड़ शुरू होने के बाद सड़क पानी में धुलकर शीशे की तरह चमक रही थी. 




थोड़ी और चढ़ाई आने पर सड़क पर इतना गहरा कोहरा छा गया था कि दस फुट आगे भी मुश्किल से ही दिख रहा था. हमारा पहला पड़ाव था -- टाइगर हिल.  



यह लोनावला का शायद सबसे ऊंचा स्थान रहा होगा। वैसे यहाँ की ऊंचाई ज्यादा नहीं है , करीब ६०० मीटर। लेकिन बरसात के दिनों में यहाँ धुंध ऐसे छाई रहती है जैसी कभी मसूरी में देखने को मिलती थी. इस स्पॉट पर मेला सा लगा था. गहरी धुंध में लोग पिकनिक मना रहे थे. चाय , भुट्टे , और अन्य स्नैक्स के अलावा  युवाओं के झुण्ड मौज मस्ती का सारा सामान साथ लेकर आए थे. इस स्थान से नीचे घाटी दिखाई देती होगी जो एकदम ढलान वाली जगह है. लेकिन उस वक्त तो बस सफ़ेद चादर ही दिख रही थी.     



समतल स्थान के आगे तारों की बाड़ लगाई गई थी ताकि लोग इससे आगे न जाएँ। फिर भी कुछ युवा युगल एडवेंचर लव मेकिंग से बाज नहीं आ रहे थे. हालाँकि इस बोर्ड को पढ़कर कोई भी घबरा जाये। यहाँ लिखा था -- अब तक छप्पन ---




उधर सड़क पर कुछ युवाओं का दल ढोल मंजीरे बजाते हुए मस्ती कर रहा था. कुल मिलाकर बरसात के मौसम में धुंध का आनंद अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था.

यहाँ से वापसी में रास्ते में एक जगह आती है जहाँ घाटी में बहते दर्ज़नों झरनों से बहते पानी को इक्कट्ठा कर बांध बनाकर एक झील के रूप में परिवर्तित किया गया है. यह स्थल एक खूबसूरत पिकनिक स्थान बन गया है. बहते पानी से होकर बांध तक पहुंचना पड़ता है जहाँ लोग पानी में ढलान पर लुत्फ़ उठाते हैं.    



इस स्थान पर सैंकड़ों लोग पानी में भीगते हुए जिंदगी के मज़े ले रहे थे.




लेक को पार कर आप पहुँच जाते हैं घाटी में जहाँ जगह जगह अनेक खूबसूरत झरने दिखाई देते हैं. ये झरने सिर्फ मॉनसून में ही बहते हैं. इसलिए यहाँ आने का सर्वोत्तम समय बरसात के दिनों में ही है. दूर तक फैली घाटी में हरियाली और पानी के झरने देखकर स्वत: ही तन और मन में साहस और रोमांच का अहसास प्रवाहित होने लगता है.  



लोनावला से करीब १२ किलोमीटर आगे पूना हाइवे पर एक और दर्शनीय स्थल है जहाँ एक पहाड़ी पर एक मंदिर है और पहाड़ को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं. रास्ते से यहाँ की हरियाली बड़ी मनभावन लग रही थी. 




पहाड़ की चोटी पर बनी ये गुफाएं और उनके ऊपर से बहते झरने बड़े रहस्यमय लग रहे थे.




अंतत: लोनावला से वापस मुंबई को जाते हुए रास्ते में खंडाला आता है जहाँ इस मौसम में बादल पर्वतों के साथ आँख मिचौली खेलते रहते हैं. थोड़ी थोड़ी देर में दृश्य बदलता रहता है. साथ ही बीच बीच में होती बारिश वातावरण को खुशगवार बनाये रखती है.

लोनावला / खंडाला में भुने हुए भुट्टे और उबली हुई साबुत मूंगफली बड़ी स्वादिष्ट मिलती हैं. लेकिन यहाँ की एक विशेष मिठाई भी है -- चिक्की -- जिसे यहाँ हम मूंगफली की पट्टी कहते हैं. लेकिन विभिन्न स्वादों और मेवों से बनी चिक्की का स्वाद वास्तव में अनूठा होता है.

लोनावला / खंडाला मुंबई वालों के लिए ठीक वैसा है जैसे दिल्ली वालों के लिए मसूरी या शिमला। इसकी ऊँचाई ज्यादा नहीं है , इसलिए बरसात के मौसम को छोड़कर बाकि समय यहाँ कुछ विशेष आकर्षण नहीं है. इसलिए मुंबई वाले इन ३ - ४ महीनों में यहाँ पिकनिक मनाकर पूरे साल का लुत्फ़ एक साथ उठा लेते हैं. 

लेकिन पर्यावरण के प्रति यहाँ भी लोगों का रवैया वैसा ही है जैसा बाकि भारत में. यदि समय रहते सचेत नहीं हुए तो मुंबई वालों को भी तरसना पड़ जायेगा, बरसात के मौसम में बारिश और हरियाली के लिए.       


Sunday, August 18, 2013

ई है मुंबई नगरिया , तू देख बबुआ --- १२ साल बाद !


इत्तेफ़ाक से ईद के दिन हम पहुंचे मुंबई, जहाँ हमारा जाना पूरे १२ वर्ष बाद हुआ. इन बारह वर्षों में हमने  पहली बार रेल यात्रा भी की. किसी भी राजधानी ट्रेन में यह हमारी पहली यात्रा थी. अवसर था हमारी बेटी का मुंबई आई आई टी में एम् बी ऐ का दीक्षांत समारोह जो १० अगस्त को होना था। बस या ट्रेन का सफ़र हमें हमेशा ही लुभाता रहा है. खिड़की के पास बैठकर बाहर का नज़ारा देखते हुए हम घंटों बिता सकते हैं. इस सफ़र में भी दिल्ली से निकलते ही बहुत खूबसूरत नज़ारे देखने को मिले क्योंकि बरसात के मौसम में सारी पृथ्वी हरी भरी नज़र आ रही थी. जब तक अँधेरा नहीं हो गया , हम हरियाली का आनंद लेते रहे. 

ईद के दिन १० बजे तक हम घर पहुँच गए थे. छुट्टी का दिन था , इसलिए मुंबई घूमने के लिए सबसे उपयुक्त दिन था. घुमाने की जिम्मेदारी भी बिटिया की ही थी , इसलिए उसके कहे अनुसार हम ऑटो / टैक्सी पकड़ते रहे और एक ही दिन में लगभग सारी मुंबई  घूम ली.

सबसे पहले पहुंचे आर्थर रोड जहाँ समुद्र किनारे घूमने का अच्छा इंतज़ाम था लेकिन सफ़ाई कुछ ख़ास नहीं थी. एक पार्क था -- जोगर्स पार्क -- जो दोपहर को बंद था. इसलिए ऑटो पकड़ हम वहां से बांद्रा पहुँच गए, जहाँ सड़क पर एक जगह ऐसे भीड़ लगी थी जैसे कोई तमाशा हो रहा हो.  सैंकड़ों लोग और दसियों ओ बी वैन खड़ी थी किसी सीधे प्रसारण के लिए.       



ऑटो से उतरने के बाद हमने जानना चाहा कि क्या माज़रा है !




लेकिन सभी देखने में ही इतने व्यस्त थे कि खुद ही  मशक्कत करनी पड़ी यह पता लगाने के लिए कि चक्कर क्या है !




अंत में हमारे कैमरे ने ही पकड़ लिया कि अरे यह तो मन्नत है -- शाहरुख़ खान का बंगला। हालाँकि  बाहर से देखकर हमें तो निराशा ही हुई. सारे बंगले को सफ़ेद और हरी चद्दरों से ढक दिया गया था. आगे के हिस्से पर टिन शेड लगे थे. बाहर से सिर्फ गेट ही दिख रहा था. लेकिन एक बार टी वी पर देखा था , अन्दर से बेहद खूबसूरत है किंग खान का बंगला। यहाँ लोग ईद के अवसर पर शाहरुख़ और अन्य मेहमानों के दीदार की उम्मीद में खड़े थे.    




भीड़ से बचकर हम तो शाहरुख़ की गली के आगे समुद्र में उतर गए , पेंट ऊपर चढ़ाकर और भुट्टे खाकर। वैसे इतने स्वादिष्ट भुट्टे हमने पहले कभी नहीं खाए थे.




यहाँ से सी लिंक रोड से होते हुए हमें जाना था चौपाटी।




रास्ते में दिखा एंटिला -- बहुत भीड़ भाड़ वाला क्षेत्र लेकिन महंगा -- सड़क से हटकर बना है. इसके आगे अन्य भवन होने से सड़क से छुपा रहता है. जाने क्या ख़ास बात है !




बहुत पहले जब चौपाटी आए थे तब यह जोहड़ का किनारा सा लगा था. लेकिन अब पहले से काफ़ी बेहतर है. ईद होने के कारण खूब भीड़ थी. ज्यादातर मुस्लिम लोग ही पिकनिक मना रहे थे. सही मायने में आम आदमी , जिनकी बहुतायत थी. लेकिन उम्र और ओहदे के तहत अब ऐसी भीड़ में हम स्वयं को अज़नबी सा ही महसूस करते हैं. जाने क्यों , थोड़ा दुःख सा भी होता है. हालाँकि छोटी छोटी बातों से लोगों को खुश होते देखकर मन को सुकून सा भी मिलता है.      




यहाँ मेरीन ड्राइव पर सड़क और समुद्र के बीच बने चौड़े फुटपाथ पर सैर करते लोग और चबूतरे पर बैठकर समुद्र से आती ठंडी हवा का आनंद लेते हुए घंटों बिताना यहाँ के लोगों का खास शौक लगता है. यहाँ की एक विशेषता यह है कि यहाँ हर वर्ग के लोग वॉकिंग या जॉगिंग के लिए आते है. मुंबई में आर्थिक भेद भाव कम ही नज़र आता है. लेकिन रेत में पड़ी गन्दगी को देखकर स्वदेश में होने का अहसास सदा याद दिलाता रहता है, कि हम अभी भी विकासशील ही हैं.
  



टैक्सी पकड़ी और आ गया -- गेटवे ऑफ़ इंडिया ! सारे दिन सफ़ेद लिबास का बोलबाला रहा. ईद के दिन बच्चे और युवाओं समेत बड़े बूढ़े, सभी सफ़ेद कपड़ों में नज़र आ रहे थे। लगभग सभी के पास मोबाईल कैमरे जिनसे तरह तरह के पोज मारकर फोटो खिंचवाते लोगों को देखकर हंसी भी आती और आनंद भी. एक ज़माना था जब हम रील ख़त्म होने के डर से फोटो लेने में बड़ी अहतियात बरतते थे. लेकिन अब ज़ाहिर है , न रील ख़त्म होने का डर , न रील धुलवाने का इंतज़ार। इसलिए अब लोग फ़ोटो खींचते हैं और सबसे पहला काम करते हैं देखने का. सचमुच ज़माना बदल गया है.     




यहाँ सर घुमाते ही नज़र आता है -- होटल ताज़महल। वही ताज़महल जहाँ क़रीब ५ साल पहले २६/११ को धांय धांय की आवाज़ के बीच इतिहास में आतंकवाद का सबसे भयंकर रूप देखने को मिला था. हमारे पीछे होटल का जो कोना दिखाई दे रहा है , वह तब धू धू कर जल रहा था. पास से देखने पर मरम्मत के निशान साफ दिखाई देते हैं जो शायद सदा याद दिलाते रहेंगे कि इस ईमारत ने इन्सान के हाथों कितनी मार खाई है.

मुंबई में मौसम दिल्ली की अपेक्षा ज्यादा सुहाना लगा. थोड़ी थोड़ी देर में बारिश आकर उमस को ख़त्म कर देती है. सारे समय छाये बादलों ने सूरज की गर्मी से हमें बचाए रखा. हालाँकि , हर समय गीलेपन का अहसास भी होता रहा जो हमें बुरा नहीं लगा.

मुंबई में आवागमन के लिए ऑटो और टैक्सी की सुविधा भी बहुत सुविधाजनक है. बिना हील हुज्ज़त किये मीटर डाउन कर चल देते हैं , मंजिल की ओर. साथ ही , लोकल ट्रेन्स तो जैसे मुंबई की जान हैं. खचाखच भरी लोकल में यात्रा करने की आदत सी पड़ जाती है. हालाँकि हमारे जैसे तो बेचारे फस्ट क्लास में ही ट्रेवेल कर सकते हैं. सेकण्ड क्लास में ट्रेवेल करने पर और लोग ही हमारी ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उन्हें हम पर दया आ रही हो कि बेचारे कहाँ फंस गए. लेकिन हमने भी यह अनुभव करने की ठान रखी थी.

यहाँ की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ रात भी रात नहीं लगती। लगता है , मुम्बईकर कम ही सोते हैं.

          
नोट : मुंबई में तीन रहे लेकिन किसी से भी संपर्क करना संभव नहीं था. ऐसे में कुछ मित्रों को शिकायत भी हो सकती है. या शायद न भी हो !    




Tuesday, August 13, 2013

नापाक कदम ना सह पायेंगे , हमें वतन जान से प्यारा है ---


गत सप्ताह सीमा पर हुई एक नापाक दुर्घटना ने हमें यह कविता लिखने को प्रेरित किया :


जो छुपकर पीठ पर वार करें, वो कायर कहलाते हैं,
ऐसे शैतानों को हम क्यों , सर आँखों पर बिठलाते हैं.

वो तीर विषैले चला रहे , हम दर्द से भी नहीं कराहते ,
सर जवानों का काट रहे , हम सर तक नहीं हिलाते।

क्यों दूध पिलाते हैं , आस्तीन के ज़हरीले साँपों को,
क्यों हाथ दिखाते हैं, दोस्ती का इन लातों के भूतों को.  

छोडो अब मेहमाननवाज़ी, अफज़ल और कसाबों की , 
बातें करना छोड़ो अब, शैतानों से हसीन ख्वाबों की.  

थप्पड़ खाकर एक गाल पर, चलो अब तो संभल जाएँ,
एक के बदले दो गालों पर , अब जमकर घूंसे चार लगायें।

बदतमीज़ों की बदतमीज़ी को , अब नहीं सह पायेंगे ,
ज़ालिमों को ज़ुल्मो सितम का , सबक ज़रूर सिखाएंगे।

हम शांति के सदा पुजारी , पर गीता का पाठ पढ़ाते हैं ,
दुष्ट पापी को सज़ा दिलाकर,  अपना फ़र्ज़ निभाते हैं.

जागो देश के नौज़वानों, सरहद तुम्हें पुकार रही ,
भारत माँ की पावन माटी, उधार दूध का मांग रही.

उठो देश के अर्जुन वीरो, अब मिलकर गांडीव उठाओ ,
देश के दुश्मन दुस्सासन को , द्वार नर्क का दिखलाओ।

मीठी मीठी बातें छोडो , अब आँख से आँख मिलाओ ,
जिसकी शह पर कूद रहे , उस मामा को भी धूल चटाओ।   

राणा प्रताप और वीर शिवाजी की, धरती ने फिर पुकारा है , 
नापाक कदम ना सह पायेंगे , हमें वतन जान से प्यारा है.  


Tuesday, August 6, 2013

दिल्ली की सडकों पर अराजकता -- पर हमें क्या !


फेसबुक पर हमने सवाल पूछा था कि इस क्रॉस का अर्थ क्या है. लेकिन एक भी ज़वाब सही नहीं आया. इससे ज़ाहिर होता है कि हम पढ़े लिखे और जागरूक नागरिक भी यातायात के नियमों से कितने अनभिज्ञ हैं. ऐसे में कम शिक्षित लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है.   


यह तो अच्छा है कि यहाँ संकेत के साथ लिखा भी है. अब पालन करना तो अपने ही हाथ में है.




अब शहरों में लगभग सभी सडकों पर ये लाइने बनी हैं जिनके बारे में जानना भी ज़रूरी है और पालन करना भी. यहाँ आमने सामने दोनों ओर जाने वाला ट्रैफिक है लेकिन सीधी रेखा को पार करना वर्जित है. अपनी तरफ की सड़क में दो लेन हैं जिनके बीच टूटी लाइन यह इंगित करती है कि आप लेन बदल सकते हैं. किनारे की लाइन से आगे नहीं जाना है. लेकिन अफ़सोस होता है यह देखकर कि अक्सर इस नियम का पालन कोई नहीं करता। ऐसे में पालन करने वाले के लिए और भी मुश्किल हो जाता है , नियमानुसार चलना।




आजकल एक नई समस्या देखने को मिल रही है. चौराहे पर ट्रैफिक रुकते ही कुछ भिखारी बच्चे बीच सड़क पर कलाबाज़ी दिखाना शुरू कर देते हैं. फिर लाईट हरी होने से पहले भीख माँगना शुरू कर देते हैं. यह वास्तव में बड़ा ख़तरनाक लगता है. लेकिन पुलिस वाले इस मामले में बिल्कुल निरपेक्ष रहते हैं.

आईये देखते हैं , कैसे कैसे तोड़े जाते हैं ,  यातायात के नियम : 

* मोड़ पर ओवरटेक करना मना है लेकिन बायीं ओर मुड़ते समय विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं कोई बाईक वाला आपके बाएं से निकल कर चोट ना खा बैठे।

* रौंग साईड से साईकल , रिक्शा आदि का आना आम बात है. लोग ज़रा भी नहीं घबराते मरने से. शायद वे जानते हैं कि यदि आपने उन्हें मारा तो आप  खुद कहाँ बच  पाएंगे।     

* कान में इयरफोन लगाकर कहीं से भी सड़क पार करना यहाँ सब अपना अधिकार समझते हैं. हॉर्न बजाने पर भी ऐसा लगता है जैसे भैंस के सामने बीन बजा रहे हों. एक चेलेंज सा लगता है कि उड़ा सको तो उड़ा दो.

* फ़्लाइओवर पर ओवरटेक करना भी मना होता है लेकिन यह बात कोई फोलो नहीं करता।

* हाईवे पर भी लोग लेन में नहीं चलते। ऐसे में यदि आप लेन ड्राईविंग करना भी चाहें तो रिस्क आपका ही है.

* टीनेजर्स को बिना हेल्मेट बाईक दौड़ाते देखकर दिल धक् से रह जाता है. नादाँ ये भी नहीं सोचते कि जब तक बच्चे घर नहीं आ लेते तब तक माँ बाप पर क्या बीतती है.      

इसके अलावा लाईट जम्प करना , स्टॉप लाइन को पार कर रुकना , ओवरस्पीडिंग , होंकिंग , ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात करना , काले शीशे आदि के मामले में तो दिल्ली वालों का पुलिस के साथ लुका छिपी का खेल चलता रहता है. यदि पकडे गए तो किसी मामा , चाचा का नाम लेकर छूट गए वर्ना ----!   

कुल मिलाकर यह लगता है कि सम्पन्नता आने से दिल्ली वाले संसाधनों का आनंद तो ले रहे हैं , लेकिन अपने फ़र्ज़ का पालन करने में संकुचित महसूस करते हैं. या फिर वे ये मानते हैं कि, दुनिया मेरे ठेंगे से !
        

Saturday, August 3, 2013

ज़रा हटके , ज़रा बचके -- ये है दिल्ली का ट्रैफिक मेरी जान !


जब पहली बार हमने गाड़ी चलानी सीखी, तब लगता था कि क्या कभी हम भी गाड़ी चला पाएंगे। लेकिन सिखाने वाले ने बहुत अच्छे तरीके से हमें सिखाया और हमें भी सीखने में मज़ा आया. लेकिन आज सोचते हैं कि क्या हमारे बच्चे  दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी चला पाएंगे। जिस तरह सड़कों पर वाहनों का अनुशासनहीन यातायात देखने को मिलता है , उससे तो यही लगता है कि सिर्फ विदेश में रहने वाले भारतीय ही नहीं बल्कि भारत में भी रहने वाले भावी भारतीयों के लिए गाड़ी चलाना अत्यंत कठिन होगा।

दिल्ली में ७० लाख से ज्यादा पंजीकृत वाहन हैं. साथ ही पड़ोसी राज्यों से भी लाखों वाहन प्रतिदिन दिल्ली में प्रवेश करते हैं. भले ही सरकार सड़कों को चौड़ा करने और फ़्लाइओवर बनाकर यातायात को नियंत्रित करने का भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन चालकों की अनुशासनहीनता और डेविल मे केयर रवैये से सडकों पर वाहनों की सुरक्षा उतनी ही कम दिखती है जितनी दिल्ली में महिलाओं की. नियमों का पालन करते हुए , अनुशासित रूप में गाड़ी चलाना असंभव सा लगने लग गया है.

इसका मुख्य कारण है, चालकों को यातायात के नियमों का ज्ञान न होना। यह सर्वविदित है कि यहाँ विदेशों की तरह लाइसेंस मिलने में कोई कठिन टेस्ट पास नहीं करने पड़ते। इसलिए लाइसेंस पाना बच्चों के खेल जैसा है. हालाँकि औपचारिक और अधिकारिक तौर पर यहाँ भी सभी तरह के सख्त नियम बनाये गए हैं, लेकिन सभी कागज़ी शेर बन कर ही रह गए हैं. यहाँ भी भ्रष्टाचार का उतना ही बोलबाला है जितना अन्य क्षेत्रों में. बिना सम्पूर्ण ज्ञान के प्राप्त लाइसेंस गाड़ी चलाने का कम, नियम तोड़ने के ज्यादा काम आते हैं.

कमर्शियल वाहन :

दिल्ली में एक बहुत बड़ी संख्या कमर्सियल वाहनों की है जिनके ड्राईवर अक्सर आठवीं फेल गावों के युवा होते हैं. उन्हें बस गाड़ी को दौड़ाना आता है और उन्हें नियमों से कुछ लेना देना नहीं होता। यही वे लोग हैं जो सडकों पर आतंक फैलाये रखते हैं. न इन्हें लेन में चलना होता है , न कानून का डर होता है. ओवरस्पीडिंग , रेड लाईट जम्पिंग , होंकिंग आदि इनका शौक होता है. चौराहे पर लाईट हरी होते ही ये हॉर्न बजाना शुरू कर देते हैं और अक्सर हॉर्न पर हाथ रखकर ही चलते हैं जबकि नियम अनुसार चौराहे के १०० मीटर दूर तक हॉर्न बजाना अपराध है.

१८ से कम आयु के बच्चे :

दिल्ली वालों को बच्चों के हाथ में बाइक या गाड़ी देने का भी शौक होता है. १८ वर्ष से कम आयु के लोगों को न लाइसेंस मिलता है , न ड्राईव करने की अनुमति होती है. लेकिन अमीर बाप के बिगड़े बच्चों के लिए यह भी एक खेल है. अभी हाल में हुई एक दुर्घटना इसका एक जीता जागता उदाहरण है जिसमे रात के समय सडकों पर बाइक सवार युवक दिल्ली की सडकों पर स्टंट करते पाए गए थे. देखा जाये तो इसके लिए सारा दोष अभिभावकों को ही जाना चाहिये। बच्चों को अनाधिकृत रूप से वाहन सौंपना भी एक अपराध है जिसके लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

धनाढ्य लोग :

दिल्ली जैसे शहरों में धनाढ्य लोगों में रात देर तक पार्टी करना एक स्टेटस सिम्बल माना जाता है. अक्सर इन पार्टियों में पेज थ्री ग्रुप के लोग होते हैं जिन्हें सोशलाईट कहा जाता है. ये लोग शराब के नशे धुत होकर जब घर के लिए निकलते हैं तब सुबह के ३ या ४ बजे होते हैं. ऐसे में दुर्घटना होना स्वाभाविक है. जाने कितने ही केस इस तरह दिल्ली की सडकों पर होते रहते हैं.

हमसे बढ़कर कौन :

दिल्ली वालों में एक बुरी आदत यह होती है कि वे अपने सामने किसी दूसरे को कुछ नहीं समझते, बल्कि तुच्छ समझते हैं । इसलिए दिल्ली की सडकों पर पढ़े लिखे गंवारों की कोई कमी नहीं होती। हालाँकि ऐसे लोग पढ़े लिखे कम और पढ़े लिखे दिखने वाले ज्यादा होते हैं. इसका कारण है दिल्ली में पैसे वाले लोगों का बहुतायत में पाया जाना। पैसा होने के बाद अनपढ़ भी शक्ल से सभ्य लगने लगता है जबकि अक्ल से वह अत्यंत असभ्य ही होता है. 

पैदल जनता : 

गाड़ी वाले तो गाड़ी वाले , यहाँ पैदल चलने वाले लोग भी कम नहीं होते। सड़क पर हर चौराहे पर ज़ेबरा क्रॉसिंग बने होते हैं लेकिन उसे छोड़कर बाकि सब जगह से सड़क पार करना अपना परमोधर्म समझते हैं. सरकार चाहे जितने ओवरब्रिज बना ले , लेकिन सड़क पार रेलिंग को कूदकर ही करेंगे। पूर्वी दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे के सामने सौ मीटर की दूरी पर दो ओवरब्रिज बने हैं और डिवाईडर पर ६ फुट ऊंची रेलिंग लगाईं गई है ताकि कोई कूद कर न जा सके. फिर भी रोज दो चार बहादुर भैया बन्दर की तरह कूदते फांदते हुए रेलिंग पार करते हुए मिल जायेंगे, मानो यह साबित करना चाहते हों कि हमारे पूर्वजों के जींस के अवशेष  अभी तक हमारे शरीर में बचे हैं.     

ट्रैफिक पुलिस : 

पौने दो करोड़ की आबादी वाले शहर में पुलिस वालों की संख्या अत्यधिक कम होने से सडकों पर अराजकता होना स्वाभाविक सा लग सकता है. लेकिन हमने दुबई में एक भी पुलिस वाला सडकों पर नहीं देखा था । फिर भी कोई भी कानून नहीं तोड़ रहा था, जबकि वहां के ड्राइवर सारे या तो भारतीय थे या पाकिस्तानी। उधर कनाडा के एल्गोंक्विन जंगल के बीचों बीच एक अकेली लड़की ओवरस्पीडिंग करने वालों के चलान काट रही थी. ज़ाहिर है , कानून व्यवस्था में सुधार भी बहुत आवश्यक है. अभी तो हमारे पुलिस वाले चौराहे पर यातायात नियंत्रण करने के बजाय चलान काटने में ज्यादा व्यस्त नज़र आते हैं, जैसे उल्लंघन करने का इंतजार कर रहे हों.       

नोट : अगली पोस्ट में यातायात के नियम और उन्हें तोड़ने के तरीकों पर दिल्ली वालों की आदत के बारे में.