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Tuesday, August 6, 2013

दिल्ली की सडकों पर अराजकता -- पर हमें क्या !


फेसबुक पर हमने सवाल पूछा था कि इस क्रॉस का अर्थ क्या है. लेकिन एक भी ज़वाब सही नहीं आया. इससे ज़ाहिर होता है कि हम पढ़े लिखे और जागरूक नागरिक भी यातायात के नियमों से कितने अनभिज्ञ हैं. ऐसे में कम शिक्षित लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है.   


यह तो अच्छा है कि यहाँ संकेत के साथ लिखा भी है. अब पालन करना तो अपने ही हाथ में है.




अब शहरों में लगभग सभी सडकों पर ये लाइने बनी हैं जिनके बारे में जानना भी ज़रूरी है और पालन करना भी. यहाँ आमने सामने दोनों ओर जाने वाला ट्रैफिक है लेकिन सीधी रेखा को पार करना वर्जित है. अपनी तरफ की सड़क में दो लेन हैं जिनके बीच टूटी लाइन यह इंगित करती है कि आप लेन बदल सकते हैं. किनारे की लाइन से आगे नहीं जाना है. लेकिन अफ़सोस होता है यह देखकर कि अक्सर इस नियम का पालन कोई नहीं करता। ऐसे में पालन करने वाले के लिए और भी मुश्किल हो जाता है , नियमानुसार चलना।




आजकल एक नई समस्या देखने को मिल रही है. चौराहे पर ट्रैफिक रुकते ही कुछ भिखारी बच्चे बीच सड़क पर कलाबाज़ी दिखाना शुरू कर देते हैं. फिर लाईट हरी होने से पहले भीख माँगना शुरू कर देते हैं. यह वास्तव में बड़ा ख़तरनाक लगता है. लेकिन पुलिस वाले इस मामले में बिल्कुल निरपेक्ष रहते हैं.

आईये देखते हैं , कैसे कैसे तोड़े जाते हैं ,  यातायात के नियम : 

* मोड़ पर ओवरटेक करना मना है लेकिन बायीं ओर मुड़ते समय विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं कोई बाईक वाला आपके बाएं से निकल कर चोट ना खा बैठे।

* रौंग साईड से साईकल , रिक्शा आदि का आना आम बात है. लोग ज़रा भी नहीं घबराते मरने से. शायद वे जानते हैं कि यदि आपने उन्हें मारा तो आप  खुद कहाँ बच  पाएंगे।     

* कान में इयरफोन लगाकर कहीं से भी सड़क पार करना यहाँ सब अपना अधिकार समझते हैं. हॉर्न बजाने पर भी ऐसा लगता है जैसे भैंस के सामने बीन बजा रहे हों. एक चेलेंज सा लगता है कि उड़ा सको तो उड़ा दो.

* फ़्लाइओवर पर ओवरटेक करना भी मना होता है लेकिन यह बात कोई फोलो नहीं करता।

* हाईवे पर भी लोग लेन में नहीं चलते। ऐसे में यदि आप लेन ड्राईविंग करना भी चाहें तो रिस्क आपका ही है.

* टीनेजर्स को बिना हेल्मेट बाईक दौड़ाते देखकर दिल धक् से रह जाता है. नादाँ ये भी नहीं सोचते कि जब तक बच्चे घर नहीं आ लेते तब तक माँ बाप पर क्या बीतती है.      

इसके अलावा लाईट जम्प करना , स्टॉप लाइन को पार कर रुकना , ओवरस्पीडिंग , होंकिंग , ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात करना , काले शीशे आदि के मामले में तो दिल्ली वालों का पुलिस के साथ लुका छिपी का खेल चलता रहता है. यदि पकडे गए तो किसी मामा , चाचा का नाम लेकर छूट गए वर्ना ----!   

कुल मिलाकर यह लगता है कि सम्पन्नता आने से दिल्ली वाले संसाधनों का आनंद तो ले रहे हैं , लेकिन अपने फ़र्ज़ का पालन करने में संकुचित महसूस करते हैं. या फिर वे ये मानते हैं कि, दुनिया मेरे ठेंगे से !