Monday, January 28, 2013

दिल्ली की सर्दियों में शादी और शादी में खाने की बर्बादी ---


एक समय था जब एक के बाद एक सभी मित्रों की शादी होने लगी थीं। अब 25-30 साल बाद जिंदगी का दूसरा दौर शुरू हो गया है जब मित्रों के बच्चों की शादियाँ होने लगी हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पहले जिसकी बधाई गाई  थी, अब उसी का सेहरा गा रहे हैं। शायद यही जीवन चक्र है जो अविरल चलता रहता है। उस ज़माने में शादियाँ भी घर के पास सड़क पर या गली में या पार्क में टेंट गाड़कर हो जाती थी। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं। आजकल मिडल और अपर मिडल क्लास में शादियाँ या तो फार्म हाउस में होती हैं या किसी सितारा होटल में। लो मिडल और लो क्लास की पहुँच समुदाय भवन तक ही होती है जो लगभग हर कॉलोनी में बने हैं। लेकिन आजकल शादियों का स्वरुप इस कद्र बदल गया है कि कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हो गया है। पिछली पोस्ट में आपने शादियों की तैयारियों के बारे में पढ़ा। आइये अब आपको एक आधुनिक शादी में लेकर चलते हैं। 

शादी में कितने बजे पहुंचा जाये ?

सबसे पहले तो विचार करने की बात यह है कि शादी में कितने बजे पहुंचा जाये। कार्ड में कुछ भी लिखा हो, लेकिन यदि आप रात 9 बजे से पहले पहुँच गए तो यह निश्चित है कि आपका स्वागत करने वाला कोई नहीं मिलेगा। उलटे आपको ही मेजबानों का स्वागत करना पड़ सकता है। एक कार्ड में लिखा था , बारात ठीक सात बजे पहुँच जाएगी, और शादी की सभी रस्में , 11 बजे तक संपन्न हो जाएँगी। हम अक्सर समय के पाबंद रहते हैं। इसलिए जल्दी घर आकार पत्नी से कहा -  भई जल्दी से तैयार हो जाओ, छै बज चुके हैं। पत्नी बोली -- एक घंटा पहले बन ठन कर क्या हो जायेगा। मैंने कहा भाग्यवान, एक घंटा तो तुम्हारे श्रृंगार में ही लग जायेगा। फिर भी पत्नी ने सजने में पूरे दो घंटे लगाये और हम विवाहस्थल पर साढ़े आठ बजे ही पहुँच पाए। जाकर देखा तो पाया , कुछ लोग इधर उधर चक्कर लगा रहे थे। पता चला वे तो टेंट वाले थे, अभी टेबल चेयर लगा रहे थे। आखिर फिर वही काम करना पड़ा। बाहर खड़े होकर बारात का इंतजार करना पड़ा।  

बारात :

अब यदि आपको लड़की की शादी का निमंत्रण मिला है तो ज़ाहिर है आप सीधे विवाहस्थल ही पहुंचेगे। लेकिन आजकल लड़के की शादी में भी मेहमान बारात के साथ चलने के बजाय सीधे पंडाल में ही पहुँच जाते हैं। इसलिए क्या बाराती और क्या घराती , सब एक सामान नज़र आते है। इसका फायदा कभी कभी कुछ युवक फ़ोकट में मेहमान बनकर दावत उड़ाकर उठाते हैं।  हमने देखा है कि आजकल बाराती तो सीधे  विवाहस्थल पर पहुँच जाते हैं , और दुल्हे के साथ एक घोड़ी , दो रिश्तेदार, और बाकि बैंडवाले ही रह जाते हैं। उधर दुल्हे के चंद दोस्त दारू चढ़ाकर बैंड के साथ हुडदंग मचा रहे होते हैं, इधर बाराती और घराती सब मिलकर दावत उड़ा रहे होते हैं। फिर जाते जाते दूल्हा दिख गया तो बधाई , वर्ना लिफाफा पिता को सोंप काम तो निपटा ही दिया था भाई ।   

खाना :

शादियों में सभी मेहमानों को भी,चाहे लड़के वालों की तरफ से हों या लड़की वालों की तरफ से, बस एक ही काम होता है , खाने का काम। दिल्ली जैसे बड़े शहर में अक्सर शादियों में जान पहचान वाले या तो बहुत कम मिलते हैं या हेलो हाय करने के बाद अपने में मस्त हो जाते हैं। वैसे भी शादियों में डी जे का इस कद्र शोर होता है  कि बात करने के लिए भी, जोर लगाना पड़ता है। लेकिन गौर से देखा जाये तो बात करने की नौबत ही कहाँ आती है, क्योंकि तीस आइटम्स खाने के बाद पता चलता है , अभी तो चालीस और बाकि हैं।  

सबसे पहले तो गेट में घुसते ही ताबेदार ट्रे में रंग बिरंगे पेय पदार्थ लिए तत्परता से आपका स्वागत करते हैं, मानो कड़ाके की ठंड में भी प्यास से आपका गला सूख रहा हो। फिर आप ढूंढते हैं अपने मेज़बान को क्योंकि उनके पास तो इतनी फुर्सत होती नहीं कि वे स्वयं आपसे मिल सकें। आरंभिक औपचारिकतायें निभाने के बाद आप स्वतंत्र होते हैं खाद्य यात्रा पर निकलने के लिए। हमारे जैसे बुद्धिमान मेहमान यात्रा का आरम्भ करते हैं फ्रूट चाट की दुकान से-- मांफ कीजिये फ्रूट स्टाल से। कभी इम्पोर्टेड कपड़ों का बोलबाला होता था , आजकल इम्पोर्टेड फ्रूट्स का होता है। 
चाट पापड़ी: इसके बाद एक ही लाइन में गोल गप्पे , भल्ला पापड़ी , आलू  चाट , आलू टिक्की ,  चिल्ला , पाव भाजी , राज कचोरी , लच्छा टोकरी देखकर आप राजसी भोजन का आनंद लेने से खुद को नहीं रोक पाएंगे।   
पंजाबी रसोई :  यहाँ आपको मिलेंगे छोले बठूरे , मक्के दी रोटी ते सरसों दा साग , साथ में लस्सी जिन्हें खाने के लिए मंजी ( खाट ) बिछाई गई हैं। 
दक्षिण भारतीय : इस स्टाल पर गर्मागर्म सांभर के साथ डोसा , इडली , बड़ा आदि तुरंत तैयार मिलेगा। 
चाइनीज़ : यदि आपका चीनी खाना खाने का मूड है तो चाउमीन , नूडल्स , मंचूरियन आदि आप सामने खड़े होकर बनवा सकते हैं। 
पिज़्ज़ा : यहाँ आप जो भी टॉपिंग चाहेंगे , बिना हील हुज्ज़त के पाइपिंग हॉट पिज़्ज़ा के साथ पाएंगे। 
स्नैक्स : अलग अलग तरह के स्नैक्स जो अक्सर ड्रिंक्स के साथ लिए जाते हैं, वेटर्स ट्रे में लिए बार बार आपके सामने लेकर आते रहेंगे। अंतत: आप स्वयं ही बोर होकर उन्हें देखते ही हाथ से इशारा कर भगाते नज़र आयेंगे। 
सूप : इतना कुछ खाने के बाद अब निश्चित ही आपको एपेटाईज़र की ज़रुरत महसूस होने लगेगी, वर्ना खाना कैसे खाया जायेगा । एक्स्ट्रा मसाले डाल कर आप सूप को एक्स्ट्रा स्ट्रोंग बनाकर मेन कोर्स के लिए साहस जुटाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं प्लेट उठाने के लिए प्लेट्स के प्लेटफोर्म की ओर। आखिर एक प्लेट तो आपके नाम की भी रखी गई है जिसका आप न अनादर कर सकते हैं, न उपेक्षा।                   
एक ज़माना था जब लोग लड़की की शादी में प्लेट यह सोचकर छोड़ देते थे कि लड़की के पिता का कुछ खर्चा बचेगा। और चाट पकोड़ी खाकर ही पेट भर लेते थे।  लेकिन आजकल यह सोच आउटडेटड हो गई है। 

खाने का आखिरी पड़ाव : होता है सम्पूर्ण खाना। लेकिन यह क्या -- सामने एक स्टाल और बची है जहाँ मिल रहे हैं तवे की रोटी और दाल , तवा रोटी और साग , तवा सब्जियां और इन सबके साथ नान , तंदूरी रोटी , मिस्सी रोटी और देसी घी का तड़का। अब आपका कन्फ्यूज होना स्वाभाविक है। क्या गेट से होकर हॉल में प्रवेश करना चाहिए जहाँ रखे हैं सजे सजाये -- तरह तरह के पुलाव, पनीर की कई तरह की सब्जियां , मटर मशरूम , कोफ्ते, दही भल्ले , कढ़ी कोफ्ते, आलू भाजी , पालक कोफ्ते, और भी न जाने कितने तरह की सब्जियां जिन्हें देखकर लगता है जैसे अभी तक किसी ने उन्हें छुआ ही न हो। आखिर कन्फ्यूजन में आप क्या खाएं , यह आपको स्वयं भी न समझ आता है , न निर्णय कर पाते हैं।  

एक और आखिरी पड़ाव : 

अंत में आप स्वीट्स की ओर अग्रसर होते हैं। थोड़ा सा गाजर हलवा , मूंग का हलवा भी थोड़ा सा , दो चार जलेबियाँ , उस पर रबड़ी , एक गुलाब जामुन भी रख ही लेते हैं। अब तक प्लेट भर चुकी है , इसमें और रखने की जगह नहीं बची। कोई बात नहीं,  आइस क्रीम के साथ रसमलाई एक अलग प्लेट में बाद में ले लेंगे। सब चट करने के बाद अब इसे हज्म करने के लिए गर्मागर्म दूध तो होना चाहिए , मलाई मार के। किसी तरह मुश्किल से ख़त्म कर के बाहर आते हैं, टाई के पीछे पेट पर हाथ फिराते हुए। बस अब तो घर का रास्ता नापना चाहिए। 

लेकिन यह क्या , बाहर जाने का रास्ता तो दुल्हे ने घेर कर रखा है जो पिछले आधे घंटे से न जाने क्या कर रहे हैं कि अन्दर आ ही नहीं रहे। आप सोचते हैं , चलो कॉफ़ी ही हो जाये , उसे भी क्यों छोड़ा जाये।  जब तक कॉफ़ी ख़त्म करेंगे तब तक तो रास्ता साफ हो ही जायेगा। अंतत : गेट पर आकर पता चलता है कि पान मुफ्त में मिल रहे हैं तो क्यों न यह शौक भी फरमा लिया जाये। यार सादा ही लगाना , मीठा अब नहीं खाया जायेगा -- यह कहते हुए पान का बीड़ा मूंह में डालते हैं , और चल पड़ते हैं मूंह हाथ से पोंछते हुए, गाड़ी की ओर यह सोचते हुए कि :

*  हम शादियों में ऐसे ठूंस ठूंस कर क्यों खाते हैं जैसे एक ड्राइवर गाड़ी को हिला हिला कर पेट्रोल भरवाता है टैंक फुल करवाने के लिए ? 
* शादियों में इतना खाना ही क्यों बनवाते हैं जो खाया ही न जाये ? 
* बाहर खाने के इतने सारे व्यंजन होने के बाद क्या अन्दर के खाने की आवश्यकता रह जाती है ? 
ज़रा सोचिये।    

Wednesday, January 23, 2013

सर्दी एक महीना और ताम झाम बारह महीना ---


दिल्ली में दिसंबर जनवरी के महीने कड़ाके की सर्दी के महीने होते हैं। इन दिनों सारे गर्म कपडे जो महीनों से बिस्तरबंद कैद में पड़े रहते हैं , स्वतंत्रता की सर्द हवा खाते हुए हमें गर्मी का अहसास देने के लिए कैद से छूट जाते हैं। यही समय शादियों का भी होता है। हालाँकि इस वर्ष शादियों का साया बहुत ही कम समय तक रहा। लेकिन शादियों में वे कपड़े बहुत इज्ज़त पाते हैं जिनका बाकि समय कोई विशेष योगदान नहीं रहता। आखिर कुछ तो फर्क होता ही है आम और खास में, फिर वो कपड़े हों या पहनने वाला। इत्तेफ़ाक देखिये कि दोनों ही आम,  सारी जिंदगी पिसते रहते हैं जबकि खास कभी कभी ही कष्ट करते हैं , अपनी सुरक्षा के घेरे से निकलने का। 

दिल्ली में सर्दी तो अत्यधिक होती है लेकिन बस एक या डेढ़ महीने। इसलिए गर्म कपड़े बाहर कम और अन्दर ज्यादा रहते हैं। एक बार खरीद लीजिये तो चलते भी बरसों हैं। लेकिन पहनने का अवसर कम ही आता है। यदि गर्म कपड़ों को देखें तो , हजारों की कीमत के सूट साल में एक या दो बार ही पहने जाते हैं। महिलाओं की साड़ियों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह होती है। उनकी भारी साड़ियों का नंबर तो अक्सर जिंदगी में एक बार ही आता होगा। जब भी किसी शादी में जाना होता है तो हम तो अपना एक आरक्षित सूट निकाल लेते हैं, लेकिन श्रीमती जी के सामने यही सवाल आ उठता है कि क्या पहना जाये। अमुक साड़ी तो वहां पहनी थी, दोबारा कैसे पहन सकते हैं। हम समझाते हैं कि भाग्यवान जब हमें ही याद नहीं तो किसी और को क्या याद होगा। इस पर उनका वही नारीवादी नारा होता है कि आप तो मेरी ओर देखते ही कहाँ हैं। इस विषय में हो सकता है कि महिलाओं का नजरिया अलग हो क्योंकि उनकी पैनी नज़र से एक दूसरे का पहनावा और मेकअप बच नहीं सकता। शुक्र है कि पुरुष इस ओर कोई ध्यान नहीं देते , इसलिए जो भी पहन लो , सब चलता है। 

वैसे किसी को याद रहे या न रहे , लेकिन एक बात तो अवश्य है कि किसी मित्र के यहाँ दूसरी शादी में जल्दी ही जाना पड़े तो कपड़ों का ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आजकल वीडियो और फोटो में देखकर यह पता चलना स्वाभाविक है कि आपने क्या पहना है। हालाँकि यहाँ भी पुरुषों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सबके सूट लगभग एक जैसे ही होते हैं। वैसे भी अधिकांश पुरुष पहनावे के मामले में काफी लापरवाह होते हैं। या तो सूट ठीक से प्रेस नहीं होगा, या टाई नहीं पहनी होगी। सही मायने में सूटेड बूटेड पुरुष आम शादियों में कम ही नज़र आते हैं।    

हम तो पिछले पांच वर्ष से विशेष अवसरों के लिए एक ही सूट सुरक्षित रखे हुए हैं। छोटे मोटे से ब्रांडेड सूट को अरमानी समझ कर पहनते हैं, फिर कमीज़ भी ऐसी पहनते हैं जिसे कहीं और नहीं पहन सकते। टाई पहनते ज़रूर हैं लेकिन गाँठ बांधनी आज तक नहीं आई। ज़रुरत पड़ने पर श्रीमती जी या बच्चों से बंधवा लेते हैं। हमें तो टाई गले में फंदा सा लगती है लेकिन शादियों में पहनना पड़ता है। हालाँकि सरकारी सेवा में रहते हुए सूट पहनने की आदत सी ही नहीं रहती। वैसे भी एक डॉक्टर का काम ही ऐसा होता है कि सूट पहनने की न ज़रुरत होती है , न यह संभव होता है।        



यह फोटो चलने से पहले श्रीमती जी ने अपने नए सैमसंग मोबाईल से लिया है। अब इसमें पीसा की मीनार जैसा इफेक्ट आ रहा है तो यह कैमरे की गलती नहीं है। इस फोन का 5 मेगा पिकसल कैमरा तो वास्तव  में बड़ा अच्छा है। लेकिन अभ्यास करना पड़ेगा जो हमें कराना भी पड़ेगा। वर्ना कुछ का कुछ हो सकता है। 

अगली पोस्ट में देखिएगा शादियों में खाने की बर्बादी पर एक टिप्पणी। 

Thursday, January 17, 2013

फेसबुक ने कर डाला ब्लॉगर्स का ब्रेन ड्रेन ---



आजकल एक पुराना हिंदी फ़िल्मी गाना बहुत याद आता है --

मैं ढूंढता हूँ जिनको , रातों को ख्यालों में 
वो मुझको मिल सके ना , सुबह के उजालों में। 

कुछ यही हाल हिंदी ब्लॉगिंग का हो रहा है। अभी ललित शर्मा जी की पोस्ट पढ़कर यही अहसास हुआ कि वास्तव में सभी जाने माने ब्लॉगर जिन्हें हम ब्लॉग पर ढूंढते ही रह जाते हैं , वे तो सारे के सारे फेसबुक पर बुक्ड और हुक्ड हैं। और हम खामख्वाह यहाँ माथाफोड़ी( यह एक राजस्थानी लफ्ज़ है ) कर रहे हैं। एक तो वैसे ही एक पोस्ट लिखने में घंटों ख़राब हो जाते हैं, फिर पढने वाले भी जब ज्यादा नहीं मिलते तो लो कॉस्ट बेनेफिट रेशो देखकर दम ख़म ही ख़त्म सा हो जाता है। दूसरी ओर फेसबुक पर देखिये। हर घड़ी एक पोस्ट -- नहीं अपडेट। आप जितने चाहो फ्रेंड्स बना लो , जितने चाहो अपडेट्स पढ़ लो। पढने के लिए भी कहाँ गज भर लंबे लेख होते हैं। बस एक या दो पंक्तियाँ , या वो भी नहीं। खाली तस्वीर से भी काम चल जाता है। और अपडेट करने के लिए भी न समय चाहिए , न विचार -- कहीं भी कुछ देखा , फोटो खींचा , और अपडेट कर दिया अपने मोबाइल से। और आपकी पोस्ट/ अपडेट पहुँच गया तुरंत आपके हजारों फ्रेंड्स के पास। अब आपके हज़ार दोस्तों में से सौ पचास तो अवश्य  निठल्ले बैठे ही रहते होंगे , जो तुरंत या तो लाइक का चटका लगा देंगे , या एक दो तुके बेतुके शब्द टाइप कर एंटर दे मारेंगे। और कुछ नहीं तो स्माइली तो रेडीमेड मिलती ही है।  

यह लाइक करने का खेल भी बड़ा दिलचस्प है। आपको बस इतना करना है कि अपडेट के नीचे लाइक इंग्लिश में कहाँ लिखा है, यह ढूंढना है। दिग्गज फेस्बुकिये इसे वैसे ही पहचान लेते हैं जैसे एक टाइपिस्ट बिना देखे कीबोर्ड की कीज को पहचान लेता है। इसके बाद तो दे दनादन लाइक करते जाइये। हो गया आपका सैकड़ों मित्रों के साथ सोशलाइजिङ्ग। यदि --न बोले तुम , न मैंने कुछ कहा -- वाली तर्ज़ पर  वार्तालाप करना है तो चैट का ऑप्शन बड़े काम का है। इसके लिए आपको कहीं जाने की ज़रुरत भी नहीं है। खुद ही चैट में दिलचस्पी रखने वाला आपको आपकी वॉल पर नज़र आ जायेगा। आपको तो बस उसका ज़वाब देना है। इसके बाद  आप जितनी भी उजूल फ़िज़ूल बातें करना चाहें , बस लिखते जाइये और चैट करते रहिये। विश्वास रखिये , आप कुछ भी लिख सकते हैं -- आपके और आपके मित्र के सिवाय कोई नहीं देख पायेगा, यह निश्चित है। वैसे यह जानते हुए भी कि जिस सुन्दर सी दिखने वाली लड़की की फोटो को देखकर आप रोमांचित और रोमांटिक हो कर चैट करते हुए अनाप सनाप लिखते जा रहे हैं , वह लड़की नहीं बल्कि कोई अधेढ़ उम्र का शैतान या कोई विकृत दिमाग का मालिक बुड्ढा भी हो सकता है , आप चैट का मज़ा लेने से बाज़ नहीं आते। यही फेसबुक की खूबी है जो अच्छे अच्छों को ज़मूरा बना देती है। 
    
फेसबुक की एक ओर खासियत है। यहाँ आपको पता चलता रहता है कि कौन कब क्या कर रहा है। कभी पता चलता है कि फलां फलां तो सोने चला गया , कभी पता चलता है कि अमुक अभी अभी सोकर उठा है। यहाँ तक कि कौन किस के साथ बैठा है , क्या खा रहा है -- यह सभी अपडेट होता रहता है। यह अलग बात है कि इन सब बातों से आपको क्या फर्क पड़ता है। लेकिन यदि आपको फर्क नहीं पड़ता तो आप मित्र कैसे ! और इस तरह फ्रेंड -- अन्फ्रेंड हो जाते हैं। कमाल की साईट है भाई ये फेसबुक भी। लोगों को जीने का अजीबो ग़रीब तरीका सिखा रही है। 


एक और बात जो फेसबुक में खास है , वह है अलग अलग पोज में नित नए फोटो खींचकर स्टेट्स पर डालकर चेहरे को तरो ताज़ा रखना। आत्ममुग्ध होना तो किसी भी इन्सान के लिए स्वाभाविक प्रवृति है। फेसबुक ने यह अवसर मुफ्त में दिया है जहाँ आप नित नए फोटो डालकर ,अपने मियां मूंह मिट्ठू बनने के इल्ज़ाम से बचते हुए सेल्फ प्रोमोशन कर सकते हैं। विशेषकर कवियों के लिए तो यह सुविधा बहुत काम की है क्योंकि हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी खूब जम जाता है। 

लेकिन यहाँ भी लेन देन का व्यापार धड़ल्ले से चलता है। यानि आपके स्टेटस को लोग तभी लाइक करेंगे , जब आप उनको करेंगे। यहाँ भी टिप्पणियों का उतना ही महत्तव है जितना ब्लॉग पर। लेकिन यहाँ उनकी संख्या बढ़ाना बड़ा आसान है। स्टेटस पर ही चैट करते जाइये , आपके स्टेटस पर सैंकड़ों टिप्पणियां इकठ्ठा हो जाएँगी। अब इससे आपको संतुष्टि मिलती है तो फेसबुक को धन्यवाद दीजिये। वैसे भी फेसबुक ने लाखों लोगों को रोजी रोटी प्रदान कर रखी है। 

हमारे देश की राजनीति में दल बदलना न कोई गुनाह है , न कोई शर्म की बात। यह अलग बात है कि अब इस पर अंकुश लगा हुआ है। लेकिन यहाँ तो वह डर भी नहीं . यानि आप जब चाहें , ब्लॉगिंग छोडकर फेस्बुकिया सकते हैं। आखिर हिंदी का विकास और प्रोत्साहन तो वहां भी हो ही रहा है। 

छोडो कल की बातें , कल की बात पुरानी।
नए दौर में बोलेंगे,  हम मिलकर बेजुबानी। 

जय जय फेसबुक। जय जय फेसबुक। 

नोट : यह पोस्ट सर्व साधारण के सन्दर्भ में लिखी गई है। इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं है। 



Friday, January 11, 2013

डाक्टर अच्छा मिले , तो और बात है --


कहते हैं , हँसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं होता। लेकिन लगता है कवियों के जीवन में ये प्रक्रियाएं साथ साथ ही चलती हैं। तभी तो ख़ुशी हो या ग़म, एक कवि का धर्म तो कविता सुनाना ही है। विशेषकर हास्य कवियों के लिए यह दुविधा और भी महत्त्वपूर्ण होती है। भले ही दिल रो रहा हो, लेकिन हास्य कवि को तो श्रोताओं को हँसाना होता है। यही उसका कर्म है , यही कवि धर्म है।

कुछ ऐसा ही हुआ गत सप्ताह। सांपला सांस्कृतिक मंच, हरियाणा में एक हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमे हमें मुख्य अतिथि बनाया गया था। लेकिन उसी दिन सुबह ही पता चला कि बहादुरी के साथ जीवन संघर्ष कर रही दामिनी की सिंगापुर में मृत्यु हो गई थी। अचानक यह खबर सुनकर एक पल को ऑंखें नम हो गईं। ऐसा लगा जैसे अचानक कुछ ढह सा गया। उस दिन शाम को ही तो कवि सम्मेलन में जाना था। भला ऐसे में हँसना हँसाना क्या उचित होता। आयोजक को फोन किया तो पता चला कि सारी तैयारियां हो चुकी थी , इसलिए स्थगित करना संभव नहीं था। हमने भी सम्मिलित होने का वचन दिया था, इसलिए अब पीछे नहीं हटा जा सकता था। आखिर भारी मन से हमने प्रस्थान किया।        







कवि सम्मेलन में एक से बढ़कर एक धुरंधर कवि अलग अलग राज्यों से आए हुए थे। साथ ही सांपला के क्षेत्रिय निवासियों में भी कई लोग थे जिन्हें कविता का शौक था। इनमे से कई तो डॉक्टर ही थे। रात 8 बजे शुरू हुआ कार्यक्रम आधी रात के बाद ढाई बजे तक चला। हैरानी की बात थी कि कड़ाके की ठण्ड के बावजूद , रात 2 बजे तक एक भी श्रोता पंडाल छोड़कर नहीं गया और सब तन्मयता से कवितायेँ सुनते रहे। हालाँकि हमें तो इतनी देर तक बैठे रहने की आदत नहीं थी लेकिन 6 घंटे कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। 

कवियों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि उन्हें देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि यह कवि हास्य रस का है या वीर रस का , या फिर श्रृंगार या प्रेम रस का। एक दम शांत सा दिखने वाला कवि मंच पर माईक के सामने आते ही जब दहाड़ने लगता है तब उसके ओजस्वी होने का अहसास होता है। इसी तरह साधारण सा इन्सान दिखने वाला बंदा जब हर वाक्य पर हास्य की फुलझड़ियाँ छोड़ता है तब उसकी असाधारण प्रतिभा का बोध होता है। किसी को हँसाना बड़ा मुश्किल काम है। वास्तव में यह एक गंभीर काम है। हम तो पहले से ही मानते आए है कि जब लोग हँसते हैं तब वे अपना तनाव हटाते हैं। और जो लोग हंसाते हैं, वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं। इस तरह हँसाना वास्तव में एक परोपकार का कार्य है। और एक कला भी है जो सब के पास नहीं होती ।

ज्यादातर कवि सम्मेलन अक्सर रात में ही आयोजित किये जाते हैं। समाप्त होते होते आधी रात से भी ज्यादा गुजर जाती है। फिर खाना और अक्सर 3-4 बजे प्रस्थान। ज़ाहिर है, कवियों की जिंदगी खतरों और मुश्किलों से भरी होती है। रात में सडकों पर ड्राईव करना खतरे से खाली नहीं होता, विशेषकर दूर दराज़ के क्षेत्रों में। 2009 में हुए एक सड़क हादसे में श्री ओम प्रकाश आदित्य समेत कई जाने माने प्रसिद्द कवियों को जान से हाथ धोना पड़ा था। जिन कवियों की डिमांड ज्यादा रहती है , वे विशेष अवसरों पर लगभग रोज़ाना कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं। ऐसे में नींद भी पूरी नहीं हो पाती होगी। बेशक, इनसे होने वाली कमाई ज्यादातर कवियों के लिए बहुत अहमियत रखती है। कई कवियों की तो रोजी रोटी ही कवि सम्मेलनों से चलती है। लेकिन निसंदेह , समाज में कवियों का योगदान न सिर्फ मनोरंजन के लिहाज़ से बल्कि सामाजिक चेतना जागरूक करने में भी महत्त्वपूर्ण होता है।   





आजकल सभी कवि सम्मेलन हास्य कवि सम्मेलन ही कहलाते हैं। हालाँकि सभी कार्यक्रमों में कविगण मिश्रित रस के ही होते हैं। लेकिन सभी कवि अपनी विधा की कविता के साथ हंसाने में भी सफल रहते हैं। इसी से पता चलता है कि लगभग सभी कवि विनोदी स्वाभाव के होते हैं। दूसरे शब्दों में यदि आप विनोदी स्वाभाव के हैं तो आप भी कवि हो सकते हैं। एक तरह से कवि हमें जिंदगी को सही मायने में जीना सिखाते हैं। अक्सर कवियों की हाज़िरज़वाबी तो कमाल की होती है। मंच पर भी एक दूसरे पर फब्तियां कसते रहते हैं। लेकिन सब इसे हास परिहास के रूप में ही लेते हैं। हालाँकि कभी कभार मामला हद से गुजर जाता है।




सांपला हास्य कवि सम्मेलन में सभी कवियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमारे लिए तो यह एक नया अनुभव था। मंजे हुए कवियों के बीच बैठकर बिना हूट हुए कविता आदि सुनाकर हमने भी अपना निशुल्क योगदान दिया। वापसी में कई अन्य कवियों को दिल्ली बस अड्डा छोड़कर हम सुबह साढ़े पांच बजे जब घर पहुंचे तो घर में एंट्री मुश्किल से ही मिली। आखिर यह भी कोई वक्त होता है घर आने का !   

अंत में एक सवाल : यदि कवि सम्मेलनों का आयोजन दिन में किया जाये तो क्या बुराई है। इससे सभी को सुविधा रहेगी, विशेषकर कवियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। या शायद बढ़ भी सकती हैं। 

नोट :  हमें सुनने के लिए कृपया यहाँ चटका लगायें।   
कवि सम्मेलन के मुख्य आयोजक भाई अंतर सोहिल का आभार प्रकट करते हुए, उन्हें एक अत्यंत सफल आयोजन पर बधाई देता हूँ।    



Saturday, January 5, 2013

क्या हो बलात्कारियों की सज़ा -- फांसी का फंदा या डॉक्टर की सुई !


गाँव में अक्सर देखते थे कि कैसे गायों के बछड़ों को ज़वान होते ही पशु चिकित्सालय ले जाकर मेकेनिकल कासट्रेशन करा दिया जाता था। इस प्रक्रिया में बछड़े के अंडकोषों को एक मशीन से दबाकर क्रश कर दिया जाता था जिससे कुछ ही दिनों में अंडकोष सिकुड़ कर अट्रोफिक हो जाते थे। इसके बाद न बांस होता था , न बजती थी बांसुरी। यानि युवा बैल की न सिर्फ प्रजनन क्षमता ख़त्म हो जाती थी बल्कि उसकी यौन इच्छा भी ख़त्म हो जाती थी।  लेकिन उसकी शारीरिक ताकत पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़ने से , वह किसान के लिए खेती के काम में पूर्ण उपयोगी रहता था। 

आजकल दामिनी के बलात्कारियों को सज़ा देने के मुद्दे पर जम कर बहस हो रही है। जहाँ अधिकांश लोगों की पुकार है कि इन दरिंदों को फांसी की सज़ा होनी चाहिए , वहीँ केमिकल या फिजिकल कासट्रेशन की भी बात हो रही है। अमेरिका सहित कई देशों में बलात्कारियों के लिए इस सज़ा का प्रावधान है।  कासट्रेशन का मुख्य उद्देश्य दोषी को गाय के बछड़े की तरह यौन क्षमता से वंचित करना है ताकि वह भविष्य में यह कुकर्म न कर सके। लेकिन क्या यह सही है और इससे वांछित न्याय मिलने की सम्भावना है , इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। 

कासट्रेशन :

केमिकल कासट्रेशन में मनुष्य को एंटीएंड्रोजेनिक इंजेक्शन लगाये जाते हैं। ये इंजेक्शन एक डॉक्टर द्वारा लगाये जाते हैं जिनका असर तीन से छै महीने तक ही रहता है। यानि ये बार बार लगाने पड़ते हैं और जब तक लगाते  रहेंगे तब तक यह अपना असर दिखाते रहेंगे। इनके प्रभाव से मनुष्य के शरीर में टेस्टोस्टिरोंन हॉर्मोन की मात्रा कम हो जाती है। फलस्वरूप उसकी मर्दानी ताकत ख़त्म हो जाती है यानि वह सेक्स करने के काबिल नहीं रहता। न उसमे सेक्स की इच्छा रहती है और न ही क्षमता। चिकित्सा के क्षेत्र में इनका उपयोग ऐसे रोगियों में किया जाता है जिनकी यौन इच्छा अप्राकृतिक रूप से अत्यधिक होती है। ज़ाहिर है , यह रोगी द्वारा स्वयं उपचार कराने की इच्छा ज़ाहिर करने पर ही इस्तेमाल किया जाता है। इन दवाओं का विपरीत प्रभाव भी होता है जो काफी कष्टदायक हो सकता है। इनमे हड्डियों का कमज़ोर होना , हृदय रोग और महिलाओं जैसे शारीरिक परिवर्तन प्रमुख हैं। यह इलाज़ महंगा होता है। हालाँकि इंजेक्शन या गोलियों द्वारा किया गया कासट्रेशन रिवर्सिबल होता है। 

फिज़िकल कासट्रेशन में अंडकोषों को स्थायी तौर पर नष्ट करने से या सर्जिकलि काट देने से नामर्दी भी स्थायी होती है। इसलिए इसे सज़ा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि अपने देश में इसका इस्तेमाल शायद ही कभी किया गया हो। लेकिन अमेरिका और युरोपियन देशों में कैदियों को कभी कभी यह सज़ा सुनाई जाती है। 

क्या कासट्रेशन एक उपयुक्त तरीका है ? 

अक्सर बलात्कार में बिना रज़ामंदी के अवांछित सम्भोग ही नहीं होता बल्कि शारीरिक हिंसा, मार पीट, अपहरण और चोट आदि भी होते हैं। अपराध इन सभी श्रेणियों में भी होता है। इसलिए सज़ा भी कई काउंट्स पर दी जाती है। कासट्रेशन से यौन क्षमता तो ख़त्म हो जाती है लेकिन शारीरिक क्षमता में कोई कमी नहीं होती। ऐसा मनुष्य और भी खतरनाक हो सकता है। भले ही वह यौन सम्बन्ध न बना सके लेकिन शारीरिक तौर पर शक्तिशाली होने से हिंसा के लायक तो रहता ही है। अधिकांश बलात्कारी हिंसक और अपराधिक प्रवृति के होते हैं। ऐसे लोग यौन क्षमता के न रहते और भी हिंसक हो सकते हैं। इसीलिए कासट्रेशन सिर्फ लम्बी कैद की सज़ा प्राप्त कैदियों में ही किया जाता है। 

बलात्कार : 

महिलाओं के प्रति इससे ज्यादा जघन्य अपराध और कोई नहीं हो सकता। इसे निसंदेह रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। इसलिए इसकी सज़ा भी सख्त से सख्त होनी चाहिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि इस दुखद घटना के बाद भी दिल्ली में बलात्कार बेख़ौफ़ हो रहे हैं। इसलिए दामिनी के अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा देकर फांसी पर टांग देना चाहिए ताकि भावी बलात्कारियों को मौत का खौफ़ नज़र आए। आशा करते हैं कि सरकार जल्दी ही संविधान में आवश्यक परिवर्तन कर इस अमानवीय सामाजिक कुकृत्य से नागरिकों को सुरक्षित रखने की दिशा में तत्परता से कार्यवाही करेगी।  

Tuesday, January 1, 2013

गुजरे वर्ष का लेखा जोखा और नव वर्ष की शुभकामनायें --


वर्ष 2012 की अंतिम पोस्ट में ब्लॉगिंग का कच्चा चिट्ठा पढ़कर आप अवश्य आनंदित हुए होंगे। एक अच्छी बात यह हुई कि इसी बहाने हमें भी कई अच्छे ब्लॉगर्स से परिचय का अवसर मिला और हमने उनको फोलो करना भी आरम्भ कर दिया। वर्ष 2013 की पहली पोस्ट में हमेशा की तरह गुजरे वर्ष का लेखा जोखा प्रस्तुत  है :   

गुजर गया फिर एक और साल 
छोड़ गया देखो करके क्या हाल, 
अन्ना करते ही रह गए ना ना , पर 
पॉलिटिक्स में कूद गए केजरीवाल।  

केजरी टोपी कईयों की पगड़ी उतार गई 
भ्रष्टाचार से फिर भी मानवता हार गई,
पोलियो से हम बचे रहे पूरे साल
पर देश को मुई महंगाई मार गई।     

भुखमरी में छूटे पाकिस्तान से भी पीछे 
जनसँख्या में रह गए बस चीन से नीचे, 
डीजल पैट्रोल मिले ना मिले,  
हम तो अब दौड़ेंगे बी आर टी बसों के पीछे।    

राजा रानी की  निकली जेल से गाड़ी 
खुले घूम रहे हैं अब मिस्टर खिलाडी,
किंग की उड़ान में आ गई फिशर 
भला कब तक बचा पाती बियर ताड़ी।     

कसाब का आखिर हो गया हिसाब
पर अफज़ल को नहीं मिला ज़वाब,  
बना बैठा है वो मेहमान सरकारी
कर रहा जो देश के करोड़ों ख़राब।

बसों में घूम रहे दरिन्दे बलात्कारी 
लाठियां चला रहे बेरहम अत्याचारी ,  
फांसी दो निर्भया के गुनहगारों को 
गुहार लगा रही है रुष्ट दुनिया सारी।  

सांसों के दंगल में दामिनी हार गई
जिजीविषा में लेकिन बाज़ी मार गई,
देकर अपने युवा जीवन की कुर्बानी 
लाखों युवाओं की सोच को सुधार गई।    

जनता जब सुख चैन से सो पायेगी 
बेटियां भी जब सुरक्षित हो जाएँगी,  
इंसान में जब इंसानियत जागेगी 
नव वर्ष की कामना तभी शुभ हो पायेगी।