Saturday, June 8, 2013

एक जहां, जहाँ हर मन कवि मन बन कविता करने को मचलने लगे ---



छुट्टियाँ हों और दिल्ली की गर्मी और भीड़ भाड़ से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर कुछ दिन के लिए निकल जाएँ तो तन और मन दोनों तरो ताज़ा हो जाते हैं , भले ही कुछ धन की कुर्बानी देनी पड़े। पेड़, पर्वत , नदिया और बादल मिलकर ऐसा समां बांधते हैं कि मन कविता करने को स्वत: आतुर हो उठता है।












पर्वत, नदिया और शाम का धूआं ,
ऐसे में कवि मन रहे बस में कहाँ।
शहर की भागमभाग से कहीं दूर,
कितना रोमांटिक है ये सारा जहाँ।






प्रेमासक्त हो नागिन सी लहराई सी,
किसी षोडशी ने ली ज्यों अंगडाई सी।
कुलांचें भरती हिरनी सी कूदती फांदती,
जैसे मचलते अरमानों की दिखलाई सी।





कल कल बहता पानी देख के जी मचलाये,
इसकी निर्मलता देख मन भीगा भीगा जाये।
नहीं है वजूद नदी का बगैर स्थिर पत्थरों के,
कलाकार सा तराशने में सदियाँ बीत जाये।




यहाँ मौसम जाने कब ले जाये अंगडाई ,
सूरज हो मध्यम और काली घटा छाई। 
रूप बदल कर भी कुदरत देती है सकून,
पर ये बात इन्सान की समझ ना आई।





कभी कभी बेताबी जब हद से गुजर जाये ,
तपते बादल जब शीतल वायु से टकराएँ। 
द्रोपती सा रोद्र रूप धारण कर नदिया तब,
बाढ़ बन पापियों के पाप संग बहा ले जाये।






पत्थरों से टकरा कर भी प्रवाह अपना खोती नहीं,
ये नदी वो औरत है जो दुखी होकर भी रोती नहीं।  
एक कहानी है पर्यावरण पर इन्सां के प्रभाव की,  
हम चैन से सो सकें इसलिए स्वयं कभी सोती नहीं।


नोट : इस रचना में अनायास ही जिनका योगदान है , वे हैं क्रम से --सर्वश्री संजय कुमार सिंघला , राज भाटिया ,अविनाश वाचस्पति , शिखा वार्ष्णेय जी , देवेन्द्र पाण्डेय और डॉ अरविन्द मिश्र जी। आप सब का आभार।


27 comments:

  1. एक सुन्दर और अपने ढंग के अनूठे प्रयोग से उपजी कविता !

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  2. बहुत सुंदर
    कवि मन कब स्थिर होता है भला

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  3. तरो-ताज़ा जैसे गर्मी में ठंडी हवा का झोंका ....
    बधाई !

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  4. कविता सुंदर और सहज है, शायद ब्यास नदी के किनारे बैठकर लिखी गई है?

    रामराम.

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  5. पत्थरों से टकरा कर भी प्रवाह अपना खोती नहीं,
    ये नदी वो औरत है जो दुखी होकर भी रोती नहीं।
    एक कहानी है पर्यावरण पर इन्सां के प्रभाव की,
    हम चैन से सो सकें इसलिए स्वयं कभी सोती नहीं।

    वाह, शानदार बिंब है, नमन आपको.

    रामराम.

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  6. प्रेमासक्त हो नागिन सी लहराई सी,
    किसी षोडशी ने ली ज्यों अंगडाई सी।
    कुलांचें भरती हिरनी सी कूदती फांदती,
    जैसे मचलते अरमानों की दिखलाई सी।
    प्रकृति का मानवीकरण और आपके क्रमशः प्रकृति के अद्भुत रूप का वर्णन बहुत खूब संयोजन

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  7. प्रकृति का सानिध्य हो तो सुंदर कविता का स्फुटित होना स्वाभाविक है. बहुत जानदार, शानदार और अदभुत.

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  8. बहुत सुंदर चित्र और कविता ....इस बार कहा सैर की .

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    1. यह अगली पोस्ट में। अभी बस अनुमान ही।

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  9. वाह वाह अद्भुत प्रयोग.
    मजा आ गया .

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  10. प्रकृति आपके अन्दर और बड़ा कवि निकाल कर लाये।

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  11. पत्थरों से टकरा कर भी प्रवाह अपना खोती नहीं,
    ये नदी वो औरत है जो दुखी होकर भी रोती नहीं।
    एक कहानी है पर्यावरण पर इन्सां के प्रभाव की,
    हम चैन से सो सकें इसलिए स्वयं कभी सोती नहीं।

    ...वैसे तो सभी बंद अच्छे बन पड़े हैं मगर यह तो बेहतरीन है!

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  12. बढ़िया प्रयोग ..

    लगे रहे प्रभो ! बधाई !

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  13. वाह वाह क्या बात है, वाह वाह क्या बात है...

    जय हिंद...

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  14. बहुत खूब!
    मौसम खुशगवार हो,समय की भरमार हो उस पर
    प्रकृति के नज़ारे लुभावने हों तो कविता अपने आप बनने लगती है.

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  15. वाह वाह ! अल्पना जी , बस इतना और जोड़ दीजिये -- और दिलों में प्यार हो।

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  16. यह पहेली भी खूब रही कि नदी ने पत्थर को तराशा या पत्थरों ने किनारों में बाँधा !!

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  17. बढिया है जी।

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  18. वाह.....
    बहुत सुन्दर....
    कलकल बहती.......

    सादर
    अनु

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  19. बहुत ही खूबसूरत आंदज...

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  20. प्रेमासक्त हो नागिन सी लहराई सी,
    किसी षोडशी ने ली ज्यों अंगडाई सी।
    कुलांचें भरती हिरनी सी कूदती फांदती,
    जैसे मचलते अरमानों की दिखलाई सी..

    वाह ... छलक रहा है प्रेम रस ... प्राकृति की ताकत आपकी कलम और भावों मिएँ नज़र आ रही है ...

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