Thursday, June 28, 2012

मैं तो पानी पीता ही नहीं ---


पिछली पोस्ट में गंभीर विचार विमर्श के बाद अब कुछ थोड़ा मस्ती का माहौल बनाया जाए . इसी उद्देश्य से अपना टाइम खोटी कीजिये, बिना किसी शिकायत के .

रोजाना की तरह डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक में बैठे थे . तभी एक मरीज़ आया और बोला -- डॉक्टर साहब पेट में बहुत दर्द रहता है . पेट बढ़ता भी जा रहा है . कोई उपाय बताइए .
डॉक्टर साहब ने पूरा मुआयना किया और पूछा -- शराब पीते हो ?
मरीज़ बोला -- डॉक्टर साहब , झूठ नहीं बोलूँगा , वो तो मैं पीता हूँ .
डॉक्टर : देखिये , शराब पीने की वज़ह से आपका ज़िगर ख़राब हो गया है . और पेट में पानी भी भर गया है .
मरीज़ : डॉ साहब , ज़िगर तो ठीक है लेकिन पेट में पानी कैसे भर गया ? मैं तो पानी पीता ही नहीं . मैं तो दारू भी नीट पीता हूँ .

फिर कुछ सोचकर मरीज़ बोला -- डॉ साहब , याद आया बचपन में जब पीना शुरू किया था तब पानी मिलाकर पीता था . पहले व्हिस्की ली पानी के साथ , पर वो चढ़ गई . फिर रम पीने लगा, लेकिन वो भी चढ़ जाती थी . फिर मैंने वोदका लेनी शुरू कर दी पानी के साथ . लेकिन जब वो भी चढ़ गई , तो मैंने पानी पीना ही छोड़ दिया .

डॉक्टर : नहीं नहीं , देखिये आपको शराब बंद करनी पड़ेगी .
मरीज़ : डॉ साहब , प्लीज़ बंद करने के लिए मत कहिये , मैं मर जाऊंगा . हाँ , कम कर सकता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा कितनी पीते हो ?
मरीज़ : जी झूठ नहीं बोलूँगा --बस चार पैग पीता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा आज से तीन कर दो और दो हफ्ते बाद आकर मिलो .
दो सप्ताह बाद---
डॉक्टर : अब कैसा लग रहा है ?
मरीज़ ; जी कुछ आराम तो है पर अभी भी दर्द रहता है .
डॉक्टर : ठीक है , आज से दो पैग ही लेना .
मरीज़ : ठीक है डॉ साहब . लेकिन दो से कम मत करना . वो क्या है ना, पूरी बोतल एक पैग में आ ही नहीं सकती .

एक महीने तक मरीज़ वापस नहीं आया . फिर एक दिन घूमता घूमता क्लिनिक पहुंचा तो देखा --बाहर एक तख्ती टंगी थी जिस पर लिखा था -- डॉक्टर इज आउट . मरीज़ ने कम्पाउन्दर से पूछा --क्या डॉ साहब कहीं बाहर गए हैं . वो बोला -- नहीं अन्दर हैं , खुद ही देख लो . मरीज़ ने अन्दर जाकर देखा --डॉ साहब कुर्सी पर चित पड़े हैं . उसने हाथ से हिलाकर उन्हें उठाया तो देखते ही डॉक्टर बोला --अरे तुम ! फिर आ गए ! मरीज़ बोला --नहीं नहीं डॉक्टर साहब , मैं अब ठीक हूँ . मैंने पीनी छोड़ दी है . बस कभी कभी पेट में दर्द होता है . डॉक्टर बोला --चिंता नहीं करना . मैं अभी सूई लगाता हूँ . तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे .
डॉक्टर ने सिरिंज भरा और लगा दिया कूल्हे में जैसे भैंस को इंजेक्शन लगाते हैं .

अगले दिन मरीज़ फिर आया तब डॉक्टर पूरे होश हवास में था . देखते ही बोला -तुम फिर आ गए .
मरीज़ बोला --डॉक्टर साहब , आपकी दुआ से मैं अब बिल्कुल सही हूँ . बस ये पूछने आया था --कल जो आपने सूई लगाई थी , उसे कब निकालेंगे ?

और अंत में :

असली शराबी वो कहलाये ,
जो पीने की शुरुआत करे बचपन में नीट बियर से ,
और इक दिन नीट व्हिस्की पीता नज़र आए ,
और इसका कारण ये बतलाये,
भई क्या करें आज ड्राई डे है . इसलिए नो वाटर , नो सोडा , नो आइस .


Sunday, June 24, 2012

डॉक्टर साहब , क्या आप डॉक्टर हैं ? एक अहम सवाल ---


मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने पर अक्सर सीनियर्स द्वारा फ्रेशर्स से एक सवाल पूछा जाता है -- डॉक्टर क्यों बनना चाहते हो ! आजकल तो पता नहीं लेकिन हमारे समय में अक्सर बच्चे यही ज़वाब देते थे -- जी देश के लोगों की सेवा करना चाहता हूँ . इस पर सीनियर्स ठहाका लगाकर हँसते और कहते -- देखो देखो यह देश की सेवा करना चाहता है . यह रैगिंग का एक ही एक हिस्सा होता था .

लेकिन डॉक्टर बनने के बाद समझ आया--- यह भी तो एक प्रोफेशन ही है . जो डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में हैं , उन्हें दिन रात पैसा कमाने की ही चिंता सताती रहती है . यह अलग बात है , इस प्रक्रिया में वे रोगियों का उपचार कर भला काम भी करते हैं . लेकिन यदि सोचा जाए तो सरकारी डॉक्टर्स को सही मायने में ज़रूरतमंद लोगों की सेवा और सहायता करने का पूर्ण अवसर मिलता है क्योंकि अपनी ड्यूटी सही से की जाए तो बहुत लोगों का भला किया जा सकता है .

लेकिन डॉक्टर्स भी इन्सान होते हैं . उनकी भी बाकि नागरिकों जैसी आवश्यकताएं होती हैं . ऐसे में एक सवाल उठता है --क्या डॉक्टर्स आम आदमी से अलग होते हैं !

मसूरी में स्टर्लिंग रिजॉर्ट में आरामपूर्वक छुट्टियाँ बिताते हुए एक दिन रिसेप्शन से फोन आया -- डॉ साहब , आप डॉक्टर हैं ? मैंने पूछा --यह कैसा सवाल है ? रिसेप्शन मेनेजर बोला -- सर एक महिला को कुछ परेशानी हो रही है . क्या आप देख सकते हैं ? एक पल सोचने के बाद मैंने कहा --ठीक है , देख लेता हूँ .

बताये गए अपार्टमेन्ट नंबर पर गया तो देखा -- कमरे में अधेड़ उम्र की तीन फैशनपरस्त महिलाएं मौजूद थीं जिनमे से एक बेड पर लेटी थी . सरकारी अस्पताल में काम करते हुए हमें मैले कुचैले गरीब से मरीजों को ही देखने की आदत सी पड़ गई है . मुद्दतों बाद एक हाई सोसायटी रोगी को देखकर हमें भी थोडा विस्मय हो रहा था . लेकिन जल्दी ही हमने कौतुहल पर काबू पाकर अपना काम शुरू किया और उनसे उनकी तकलीफ़ के बारे में पूछा . महिला ने बताया -- बड़ी घबराहट हो रही है , छाती में भारीपन हो रहा है और साँस भी नहीं आ पा रहा है . यह लक्षण सुनकर कोई भी डॉक्टर सबसे पहले हार्ट के बारे में सोचते हुए यही संदेह करता --कहीं एंजाइना या हार्ट अटैक तो नहीं हो रहा .

लेकिन हमारे पास जाँच करने के लिए न तो स्टेथोस्कोप था , न बी पी इंस्ट्रूमेंट. ई सी जी का तो सवाल ही नहीं था . ऐसे में कैसे पता चलता , क्या रोग है . वैसे भी आजकल डॉक्टर्स जाँच यंत्रों पर ही पूर्णतया निर्भर रहते हैं . इसीलिए ज़रुरत हो या न हो , सभी टेस्ट करा डालते हैं . हालाँकि इसमें सी पी ऐ का बहुत बड़ा रोल है .

लेकिन अनुभव एक ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के हमेशा काम आती है , हर क्षेत्र में . मेडिकल प्रोफेशन में भी अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता . इसीलिए अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए हमने भी बिना किसी सुविधा के उस महिला का निदान करने का प्रयास किया .

मेडिकल कंसल्टेशन में डॉक्टर दो बातों पर निर्भर करता है --एक हिस्टरी , दूसरा फिजिकल एक्सामिनेशन . अब फिजिकल एक्सामिनेशन के लिए तो हमारे पास कोई औजार थे नहीं , इसलिए हिस्टरी के सहारे हमने बीमारी के बारे में पता किया . पता चला --उनको अक्सर नर्वसनेस हो जाती है . फैमिली में भी एडजस्टमेंट प्रॉब्लम थी . सारी परिस्थितयां देख कर यही समझ आ रहा था --उनको सायकोलोजिकल प्रॉब्लम ज्यादा थी बजाय हृदय रोग के .
लेकिन यह निदान करने से पहले सारे टेस्ट करने ज़रूरी होते हैं जो वहां संभव नहीं थे .

एक चिकित्सक की भूमिका में बड़ी असमंजस की स्थिति थी . मरीज़ की हालत देखकर कोई भी परेशान हो सकता था . हमारे सामने दो ही विकल्प थे -- या तो ज्यादा रिस्क न लेते हुए उन्हें किसी मेडिकल सेंटर में रेफेर कर देते . उस हालत में तीनों की दिक्कत बढ़ जाती . या फिर अपनी सूझ बूझ पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाते , की चिंता न करें , बिलकुल ठीक हो जायेंगे . बहुत बड़ा डाइलेमा था . मन कह रहा था --रिस्क नहीं लेनी चाहिए , रेफेर कर देते हैं . वैसे भी हार्ट के मामले में न कोई लापरवाही चल सकती है , न कभी पता होता है कब क्या हो जाए . लेकिन दिल कह रहा था -- हमारा डायग्नोसिस सही है . ये ठीक हो जाएँगी , इन्हें बस रिएस्युरेंस की ज़रुरत है . आखिर हमने अपनी योग्यता पर विश्वास रखते हुए उन्हें बताया --चिंता की कोई बात नहीं है , आप ठीक हो जाएँगी . बस आराम कीजिये . रिलेक्स करने के लिए एक गोली एंटी एनजाईटी पिल भी बता दी .

उन महिलाओं से मिलकर पता चला , आजकल हर उम्र की महिलाएं ग्रुप बनाकर घूमने निकल पड़ती हैं , परिवारों को छोड़कर , यह शायद नया ट्रेंड चल पड़ा है . या यूँ कहिये यह भी कन्ज्युमेरिज्म का ही एक रूप है . हालाँकि अधेड़ उम्र में शारीरिक रूप से स्वस्थ न होने से यह मिसएडवेंचर भी हो सकता है .

अपने कमरे में आकर थोड़ी चिंता हुई -- कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए . यानि भला करने निकले और बुराई सर आ पड़े . उससे भी ज्यादा ज़रूरी था उस महिला का स्वस्थ होना . हालाँकि उन्हें बता दिया था --यदि आराम करने पर भी छाती में दर्द / घबराहट आदि बढती जाए तो अस्पताल जाना पड़ेगा . फिर भी उनकी चिंता तो रही .

शाम के समय बौन फायर का कार्यक्रम था . माल पर घूमकर जब हम वापस पहुंचे तब देखा , सब लोग खूब एन्जॉय कर रहे थे . वे तीनों महिलाएं भी वहां मौजूद थी . हमारी पेशेंट भी मज़े से प्रोग्राम देख रही थी . उन्होंने बताया अब वो ९९ % ठीक थी . ज़ाहिर था , हमारा डायग्नोसिस सही निकला . हमने भी राहत की एक लम्बी साँस ली .
एक सरदारजी , ख़ुशी से मुफ्त में सभी को पेग पिला रहे थे . दिल तो हमारा भी किया --- इसी बात का जश्न मनाया जाए . लेकिन फिर श्रीमती जी को देख कर मन मारना पड़ा .

अक्सर सुनते आए हैं -- डॉक्टर्स ट्रेन या प्लेन में यात्रा करते हुए नाम के आगे डॉक्टर नहीं लिखते ताकि उनकी पहचान छुपी रहे . क्योंकि पता होने पर किसी भी इमरजेंसी में आपको बुलाया जा सकता है . ज़ाहिर है , छुट्टियों पर वे डिस्टर्ब होना नहीं चाहते . लेकिन सोचता हूँ --क्या यह सही है ?
क्या एक डॉक्टर अपने फ़र्ज़ से मूंह मोड़ सकता है ?
क्या हमें इतना स्वार्थी होना चाहिए ?

लेकिन यह भी सच है -- डॉक्टर की सही या गलत सलाह किसी को जिंदगी दे या ले भी सकती है .
सब ठीक रहा तो ठीक वर्ना ---!
भली करी तो मेरे भाग , वर्ना मरियो नाइ बाह्मण !
ऐसे में -- आ बैल मुझे मार-- क्या सही रहेगा !

ज़रा बताएं -- आपको क्या लगता है , क्या सही है , क्या गलत .


Thursday, June 21, 2012

पहाड़ों पर भी चलने लगे हैं ऐ सी -- वैभव सम्पन्नता या निर्धनता !


रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी और दिल्ली की गर्मी से परेशान लोग जिनके पास समय , साधन और शौक होता है , वे मई जून में पहाड़ों का रुख कर लेते हैं कुछ दिनों के लिए . यही कारण है , इन दिनों में मसूरी , शिमला और नैनीताल जैसे पर्वतीय स्थलों पर दिल्ली और एन सी आर की गाड़ियाँ बहुतायत में दिखाई देती हैं . थके हुए तन और मन को तरो ताज़ा करने के लिए यह आवश्यक भी है .

समय , साधन और शौक के साथ स्वास्थ्य भी :

पहाड़ों पर जाने से पहले अपना शारीरिक मुआयना ज़रूर कर लेना चाहिए . यदि आप हृदय रोग से पीड़ित हैं , या बी पी हाई रहता है , या दमा है, या फिर मोटापे से ग्रस्त हैं तो आपको सावधान रहना पड़ेगा .
क्योंकि भले ही आप गाड़ी से जाएँ लेकिन पहाड़ों के ऊंचे नीचे रास्तों पर तो पैदल ही चलना पड़ेगा . और यदि आप स्टर्लिंग रिजौर्ट्स जैसे किसी बड़े होटल / रिजॉर्ट में ठहरे तो समझिये आ गई शामत .


यहाँ ठहरने वाले सभी मेहमानों को कम से कम १०० सीढ़ियों से रोजाना बार बार ऊपर नीचे होना पड़ेगा . ज़ाहिर है , यहाँ सभी की साँस फूलती नज़र आती है . कूदते फांदते यदि कोई नज़र आते हैं तो वो यहाँ के कर्मचारी ही हैं जो बिना किसी दिक्कत के सीढियां
चढ़ते उतरते नज़र आयें
गे .
ऐसे में सलाह यही दी जाती है की पहाड़ों पर जाने से पहले कम से कम १५ दिन पहले से सुबह सैर पर जाना शुरू कर दें . तभी स्टेमिना बन सकता है और आप पहाड़ों पर पैदल चलने का आनंद ले सकते हैं .


रिजॉर्ट के गेट से निकलते ही बायीं ओर जाती यह सड़क करीब दो किलोमीटर तक जाती है जिसके एक तरफ पहाड़ है , दूसरी ओर घाटी है जिसमे कई बोर्डिंग स्कूल बने हैं . जब बाकि लोग रात की मदिरा की खुमारी में बेहोश खर्राटे भरते, हम सुबह उठकर यहाँ पैदल सैर को निकल जाते . कहीं धूप , कहीं छाँव की आँख मिचौली में वादियों को निहारते हुए विचरने में स्वर्गिक आनंद का अनुभव होता . गेट के दायीं ओर से आने वाली सड़क लाइब्रेरी चौक से आती है . इस सड़क पर शाम के समय एक डेढ़ किलोमीटर टहलना भी बड़ा आनंददायक रहता है .

अंजान से जान पहचान :

रिजॉर्ट के सामने जो पहाड़ है , उस की चोटी पर बना है राधा भवन जो इस इस्टेट के मालिक का खँडहर हुआ आलिशान बंगला है . रिजॉर्ट से यहाँ तक ट्रेकिंग का इंतजाम किया जाता है . लेकिन हमें तो वैसे भी घुमक्कड़ी का शौक है , इसलिए एक सुबह स्वयं ही निकल पड़े अनजानी राहों पर . रास्ते में एक वृद्ध कुर्ता पायजामा पहने खड़े होकर कसरत कर रहे थे. जब उनसे रास्ता पूछा तो बोले --मैं भी बाहर से ही हूँ . परिचय का आदान प्रदान होने पर उन्होंने पूछा -आप क्या करते हैं ? मैंने कहा --बस यूँ ही छोटा सा जॉब करता हूँ . इस पर वो बोले --लगता तो नहीं है .

अब इसके बाद जो विचारों का आदान प्रदान हुआ तो उनके घर जाकर चाय बिस्कुट आदि के साथ ही समाप्त हुआ. घर भी रिजॉर्ट के बिल्कुल साथ ही था जो उन्होंने ग्रीष्म निवास के रूप में हाल ही में खरीदा था . पता चला वो देहरादून में चकराता रोड पर एक बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं , जिसके वे चेयरमेन हैं . उन्हें देखकर हमें भी यही लगा --लगता तो नहीं है .

ट्रेक करते हुए रास्ते में एक और मुसाफिर नज़र आया तो हमने उसका फायदा उठाते हुए एक फोटो खिंचवा लिया .
कहते हैं चालीस की उम्र के बाद पति पत्नी --भाई बहन जैसे नज़र आने लगते हैं .
हम तो यही कहेंगे --नज़र जो भी आयें , व्यवहार तो पति पत्नी जैसा ही होना चाहिए .


राधा भवन :

एक पहाड़ की चोटी पर समतल स्थान पर बना यह विशाल बंगला अब खँडहर बन चुका है . लेकिन यहाँ से मसूरी और आस पास के क्षेत्रों का ३६० डिग्री बड़ा मनोरम दृश्य नज़र आता है . इस बंगले में आगे की ओर दो बड़े हॉल हैं जो बैठक यानि ड्राइंग रूम रहे होंगे . पीछे एक लॉबी और कई बेडरूम थे जो अब टूट चुके हैं . नीचे की मंजिल में अनेक छोटे कमरे हैं जो शायद नौकरों के लिए रहे होंगे .

यहाँ के केयरटेकर ने बताया --इसे कभी एक काबुल के सेठ ने बनवाया था . अंग्रेजों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया . फिर किसी सेठ ने इसे खरीद लिया .उसकी संतानें निकम्मी निकली . इसलिए अब इसकी कोई देख रेख नहीं हो पा रही . करीब ९० एकड़ में फैला यह एस्टेट आज २०० करोड़ रूपये का है .


तिब्बती बाज़ार :

२८ साल पहले भी यहाँ तिब्बतियों की अनेक दुकानें सजती थी जिन पर इम्पोर्टेड सामान मिलता था . दुकानों पर अक्सर १८-२० साल की युवा लड़कियां ही बैठती थी , मां के साथ. मर्द लोग बहुदा नदारद रहते.
अब भी इन दुकानों पर वैसा ही नज़ारा था . अब भी वहां वैसी ही युवा लड़कियां बैठी थीं . फर्क बस इतना था -- पहले जो युवा लड़की थी , अब वो मां थी और अब जो लड़की है वो उस लड़की की बेटी है .
हालाँकि , मर्द अब भी बहुत कम ही नज़र आये . लेकिन अब इन दुकानों पर स्थानीय लोग भी दुकानदारी में शामिल थे .



पर्यावरण :

समर्थता और सम्पन्नता के साथ साथ अब मिडिल क्लास आदमी भी पर्यटन पर पैसा खर्च करने की स्थिति में आ गया है . लेकिन इस बढ़ते ट्रैफिक का खामियाज़ा निश्चित ही पर्वतों और वातावरण को भुगतना पड़ रहा है . नंगे होते पहाड़ अब शीतल वायु की लहर प्रदान नहीं करते . यही वज़ह है की अब यहाँ भी कमरों में पंखे चलने लगे हैं . एक अपार्टमेन्ट की छत पर रखे दो ऐ सी देख कर दिल धक् से रह गया .

इस तस्वीर को देख कर लगता है --पर्यावरण विभाग तो अपना काम बखूबी कर रहा है . भूस्खलन से नंगे हुए पहाड़ पर फिर से पेड़ लगाकर हरियाली लाने का प्रयत्न सफल होता नज़र आ रहा है .

लेकिन क्या हम सभ्य, सुशिक्षित आधुनिक मानव अपना काम सही से कर रहे हैं ?

जगह जगह कूड़े के ढेर देखकर ऐसा तो नहीं लगता . बिना सोचे , बेदर्दी से हम पानी की बोतल , चिप्स के पेकेट , प्लास्टिक की थैलियाँ ऐसे फैंक देते हैं जैसे हमें पर्यावरण से हमें कोई लेना देना नहीं . यदि ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ताज़ा ठंडी हवा खाने के लिए पहाड़ों पर नहीं, घर में ही अपने कमरे में कैद रहकर ऐ सी की बासी हवा खाते रहना पड़ेगा .

नोट : मसूरी की कुछ दिलचस्प और मनभावन तस्वीरें देखने के लिए यहाँ और यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं .


Sunday, June 17, 2012

कुछ जानी पहचानी , कुछ अंजानी , पर्वतों की रानी --- मसूरी .


दिल्ली से करीब पौने तीन सौ और देहरादून से २५ किलोमीटर की लगातार चढ़ाई के बाद आती है क्वीन ऑफ़ हिल्स ( पर्वतों की रानी ) मसूरी. यहाँ पहली बार १९८४ में आना हुआ था शादी के बाद जिसे पहला हनीमून भी कह सकते हैं . वैसे तो इन २८ वर्षों के बाद भी मसूरी वैसी की वैसी है लेकिन वातावरण में बहुत परिवर्तन आ गया है . जहाँ पहले गर्मियों में भी लोग रंग बिरंगे स्वेटर्स पहने नज़र आते थे, अब सभी कम से कम कपड़ों में दिखाई देते हैं . यह परिवर्तन बदलते वातावरण के साथ साथ बदलती जीवन शैली के कारण भी है.पहले हिल स्टेशन पर भी लोग बन ठन कर थ्री पीस सूट पहन कर घूमते थे. अब लड़कियां भी हाफ पेंट्स में नज़र आती हैं .

एक छोर पर पिक्चर पैलेस और दूसरे छोर पर लाइब्रेरी चौक के बीच करीब दो किलोमीटर लम्बी माल रोड यहाँ का मुख्य आकर्षण है . आधे से ज्यादा रास्ते पर बड़ी बड़ी दुकाने और शोरूम शाम के समय बिजली की रौशनी में मसूरी की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं . सैलानियों से भरी माल रोड पर घूमकर ही आनंद आ जाता है . भारत में और किसी हिल स्टेशन पर ऐसा नज़ारा देखने को नहीं मिलेगा जब सुहानी धूप में चलते अचानक बादलों की सफ़ेद चादर आकर आपको लपेट लेती है और लगता है जैसे मौसम बहुत ख़राब हो गया है लेकिन फिर थोड़ी ही देर में सब बिल्कुल साफ . इसीलिए मसूरी को पर्वतों की रानी कहा जाता है .

पहली बार जब यहाँ आये तो एक होटल में १५ रूपये में कमरा मिला था . अब उसी होटल में वही कमरा २५०० में मिल रहा था . लेकिन अब हमारे पास थी स्टर्लिंग रिजोर्ट्स की बुकिंग जो लाइब्रेरी चौक से ढाई किलोमीटर की दूरी पर पाइन हिल पर बना है . पहली बार यहाँ १९९७ में आये थे . तब वहां तक जाने वाली पतली सी सड़क टूटी फूटी सी थी और घाटी की तरफ कोई रेलिंग न होने से ड्राईव करने में बड़ा डर लगा था . लेकिन अब सारी सड़क पक्की बनी है और पूरे रास्ते रेलिंग लगे होने से ड्राईव करना भी सुरक्षित हो गया है .


इसी सड़क के एक मोड़ से नज़र आ रहा है , खड़ी ढलान पर बना स्टर्लिंग रिजोर्ट. यहाँ बने १ बी एच के अपार्टमेन्ट में टी वी , फ्रिज , डाइनिंग टेबल और सोफा सेट से सुसज्जित सभी सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए एक सप्ताह के लिए घर जैसा बन जाता है .



घर की शानदार बालकनी से घाटी और दूर देहरादून नज़र आता है . दायीं ओर के पहाड़ को देखकर बड़ा भ्रम हो रहा था की इस पर बनी यह जिग जैग सड़क कहाँ जाती है . कोई घर भी नहीं दिखा . या फिर ये पहाड़ी खेत हैं ? बहुत देर तक सोचने पर समझ आया की वास्तव में यहाँ कभी भूस्खलन हुआ था . अब पर्यावरण विभाग ने यहाँ फिर से पेड़ लगाकर इसे हरा भरा बनाने का प्रयास किया है . जिग जैग सड़क दरअसल एक पगडण्डी थी जिस के साथ पेड़ लगाये गए थे . यानि मसूरी का पर्यावरण विभाग तो अपने काम में मुस्तैद है . बस हम दिल्ली वाले ही बुद्धि का इस्तमाल नहीं करते और जहाँ अवसर मिला प्लास्टिक की थैलियाँ फैंक देते हैं .


पहली बार मसूरी आने वालों के लिए यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं :
* केम्पटी फाल -- शहर से १०-११ किलोमीटर दूर जहाँ तक गाड़ी से ही जाया जा सकता है . ऊँचाई से गिरता झरना खूबसूरत तो लगता है लेकिन यहाँ होने वाले ट्रैफिक जाम और झरने में नहाते मोटे पेट वाले लोगों को देखकर मूड रोमांटिक तो नहीं रह सकता .
* लाल टिब्बा --- यहाँ का सबसे ऊंचा पॉइंट जहाँ से चारों ओर का नज़ारा देखा जा सकता है यदि मौसम साफ हो तो जो कभी नहीं होता . यहाँ गाड़ी और पैदल दोनों तरह से जाया जा सकता है.
* धनोल्टी -- मसूरी से २८ किलोमीटर दूर एक सुनसान पिकनिक स्पॉट होता था लेकिन अब वहां ढेरों होटल बन गए हैं . यहाँ का मुख्य आकर्षण है सुरखंडा देवी का मंदिर जिसके लिए घने जंगल से एक किलोमीटर ट्रेक कर ही पहुंचा जा सकता है . हालाँकि यहाँ भी बहुत भीड़ होती है लेकिन वापसी पर फ्री के लंगर में हलवा पूरी खाकर बड़ा आनंद आएगा .

इन सब जगहों पर कई बार जा चुके हैं इसलिए इस बार जाने का मूड नहीं था . लेकिन हमें तो प्रकृति से प्यार है इसलिए ऐसी जगह जहाँ से प्रकृति के समीप महसूस किया जा सके , हम जाना नहीं छोड़ते .



कैमल बैक रोड

मसूरी के उत्तर की ओर ढाई किलोमीटर लम्बी यह समतल सड़क पहाड़ के साथ साथ चलती है और घाटी के मनोरम दृश्यों के दर्शन कराती है .


इस दर्शक दीर्घा में बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए पहाड़ों की चोटियों को निहारने हुए घंटों गुजर सकते हैं लेकिन फिर भी दिल नहीं भरेगा .


यहाँ पैदल चलना ही एक मेडिटेशन जैसा लगता है .



इस तस्वीर को ध्यान से देखिये , इस सड़क को कैमल बैक रोड क्यों कहते हैं , यह अपने आप समझ आ जायेगा .

लेकिन यह जादू सिर्फ एक पॉइंट से ही नज़र आता है .


गनहिल : एक और पहाड़ की चोटी जहाँ से चारों ओर नज़र आता है . लेकिन यहाँ भी मौसम साफ होने पर ही जाने का फायदा है वर्ना बस पिकनिक बन कर रह जाता है . यहाँ जाने के लिए हम जैसे शौक़ीन तो पैदल मार्ग की खड़ी चढ़ाई कर लेते हैं लेकिन जिनके घुटने हल्के और जेब भारी होती है , वे यहाँ ट्रॉली द्वारा ही जाते हैं .



मसूरी से तीन किलोमीटर दूर है कंपनी गार्डन. हरा भरा यह बाग़ अब एक बढ़िया फैमिली पिनिक स्पॉट बन गया है .

बाग की शोभा बढ़ा रहा था यह फव्वारा .


यहाँ बना यह कृत्रिम झरना पर्यटकों को बहुत लुभा रहा था .



अंत में यह कृत्रिम झील बच्चों और बड़ों सभी के लिए सुन्दर आकर्षण थी जिसमे सभी तरह की रंग बिरंगी बोट्स में बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है .
अब यहाँ एक फ़ूड कोर्ट भी खुल गया है जिसमे सेल्फ सर्विस के साथ अच्छा खाना उचित दाम पर मिल रहा था .

ये थी मसूरी की कुछ आम बातें . अगली और अंतिम किस्त में पढियेगा कुछ खास और दिलचस्प बातें जिनका हमें भी पहली बार अनुभव हुआ .





Wednesday, June 13, 2012

हाईवे हो या हिल्स , लेन ड्राईविंग इज सेन ड्राईविंग -- लेकिन सुनता कौन है !

एक समय था जब दिल्ली जैसे बड़े शहर में सड़क पर वाहनों के लिए कोई गति सीमा नहीं थी । नियम अनुसार सबसे तेज वाहन दायीं लेन में चलते थे , मध्यम गति वाले वाहन बीच की लेन में और सबसे धीमे वाहन बायीं लेन में । लेकिन हकीकत में होता उल्टा था । यानि धीमे चलने वाले दायीं लेन में चलते थे । यदि किसी को ओवरटेक करना होता था तो वो या तो हॉर्न बजाकर साईड मांगता था या बायीं ओर से रोंग साईड से निकल जाता था ।

फिर शहर में गति सीमा निर्धारित कर दी गई । अब लेन ड्राईविंग को अपनाने पर जोर दिया जाने लगा । लेकिन लेन ड्राइविंग का अर्थ क्या होता है , यह कभी नहीं बताया गया । इसलिए अभी भी अधिकांश ड्राइवर्स को शायद यह नहीं पता कि लेन ड्राईविंग क्या होती है ।
हालाँकि शहर हो या हाईवे , अब सब जगह सडकों पर इस तरह की लाईनें देखने को मिलेंगी :


आइये देखते हैं , इन लाइनों का क्या मतलब होता है ।
साईड की लाइन -- यह लेन की बाहरी सीमा रेखा है । इससे बाहर नहीं जा सकते ।
बीच की लाइन --- अक्सर यह लाइन या तो सीधी होती है या टूटी होती है ( ब्रोकन लाइन ) । सीधी लाइन का मतलब है कि आप इसे क्रॉस नहीं कर सकते यानि दूसरी ओर नहीं जा सकते । ब्रोकन लाइन का अर्थ है कि आप चाहें तो लेन बदल सकते हैं । लेन बदलने के लिए पहले देखिये कि रास्ता साफ है या नहीं । फिर इंडिकेटर देते हुए लेन बदल लीजिये लेकिन ध्यान रखिये कि कोई गाड़ी उस लेन में तेजी से तो नहीं आ रही ।

ऊपर दिखाए गए फोटो में बीच में दो लाईनें हैं -- एक सीधी और दूसरी ब्रोकन । दायीं तरफ सीधी लाइन का अर्थ है कि आप दायीं से लेन बदल कर बायीं लेन में नहीं जा सकते । लेकिन सामने से आता हुआ ट्रैफिक लाइन बदल कर अपने बायीं वाली लेन में जा सकता है । यदि यह एक तरफ़ा सड़क होती तो बायीं लेन से दायीं लेन में आया जा सकता है लेकिन दायीं से बायीं लेन में नहीं ।
हालाँकि यह सड़क विदेश की है लेकिन लेन सिस्टम में लाइन का अर्थ सब जगह एक ही होता है ।
लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि हमारे प्यारे देशवासी लेन ड्राईविंग में विश्वास नहीं रखते । या फिर उन्हें इसका मतलब ही नहीं पता होता । इसीलिए यहाँ दुर्घटना होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । लेकिन यदि लेन ड्राइविंग की जाए तो न तो साईड मांगने की ज़रुरत पड़ेगी , न हॉर्न बजाने की ।

हाईवे ड्राईविंग :

कुछ वर्ष पहले तक जब हाईवे पर लेन सिस्टम नहीं बना था तब ओवरटेक करने के लिए या तो हॉर्न बजाते थे या फिर डिपर का इस्तेमाल कर साईड मांगी जाती थी । इससे धीमे चलने वाले वाहनों को बड़ी दिक्कत होती थी । उन्हें बार बार साईड देनी पड़ती थी । लेकिन अब लेन बनने से यह परेशानी ख़त्म हो गई है । अब न साईड मांगने की ज़रुरत है , न ही हॉर्न देने की ।

हिल ड्राईविंग :

पहाड़ों में ड्राईव करने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होता है । यहाँ भी अब लेन सिस्टम बना है । अपनी लेन में ही चलना चाहिए । लेकिन यहाँ एक सबसे बड़ी दिक्कत होती है सड़क का सीधा न होना । अक्सर पहाड़ों में हर ५०-६० मीटर पर एक मोड़ आ जाता है । इसलिए ओवरटेक करना बड़ा रिस्की रहता है । मोड़ पर हॉर्न बजाना ज़रूरी है ताकि सामने से आने वाले को आपकी मोजूदगी का अहसास हो जाए । मोड़ पर कभी ओवरटेक नहीं करना चाहिए। अपहिल ड्राईविंग धीमी रहती है लेकिन कंट्रोल बेहतर रहता है । ढलान पर उतरने में गाड़ी अपने आप दौड़ती है इसलिए स्पीड कंट्रोल बहुत ज़रूरी है ।

लेकिन हाईवे हो या पहाड़ , सड़क पर आधे से ज्यादा गाड़ियाँ कमर्शियल होती हैं इनके ड्राईवर अक्सर बहुत तेज ड्राईव करते हैं और नियमों का पालन नहीं करते । इसलिए दूसरों से भी बचकर चलना पड़ता है ।
अक्सर हम हिन्दुस्तानियों की आदत होती है कि ज़रा सी रुकावट आते ही हम अपनी लेन छोड़कर जहाँ जगह मिली वहीँ घुस जाते हैं । इसीलिए अक्सर पलक झपकते ही ट्रैफिक जाम हो जाते हैं । इस मामले में स्वयं ड्राईव करने वाले पढ़े लिखे लोग भी पीछे नहीं हैं ।

दिल्ली में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है ऐसे में हम हर वर्ष पहाड़ों की ओर रुख कर लेते हैं । ५-७ दिन के लिए ही सही , न सिर्फ गर्मी से निजात पा जाते हैं बल्कि पहाड़ों की शुद्ध हवा में पैदल सैर कर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता है । घर से बाहर निकलने के लिए तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है । साधन , समय और शौक । बहुत से लोगों के पास पैसा तो होता है लेकिन समय नहीं । या फिर समय और साधन तो होते हैं लेकिन शौक नहीं ।
हमारे पास कम से कम शौक की तो कोई कमी नहीं । इसलिए सीमित साधन होते हुए भी ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ते ।

इस बार पहली बार ऐसा हुआ कि गर्मियों में दोनों बच्चे घर से बाहर थे । इसलिए इस बार हम पति पत्नी ही चल पड़े मसूरी की ओर । पिछले बीस सालों में अक्सर पहाड़ों में अपनी गाड़ी से ही जाना हुआ है । मसूरी , शिमला , नैनीताल, चंबा और मनाली तक स्वयं ड्राईव किया है । सबसे लम्बा सफ़र तो मनाली तक का ही रहा -- १५ घंटे और ६६० किलोमीटर । रोहतांग पास तक १४००० हज़ार मीटर की ऊँचाई तक ड्राईव करना अपने आप में एक अत्यंत रोमांचक अनुभव था ।

लेकिन इन सब ट्रिप्स में एक बात कॉमन थी -- ये सब हिल स्टेशन किसी न किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ते हैं । इसलिए अक्सर सड़कें बहुत बढ़िया होती हैं । इसलिए ड्राईविंग भी बड़ी आनंद दायक रहती है । इस बार भी मेरठ बाईपास से लेकर मुजफ्फर नगर बाईपास का करीब ७०-८० किलोमीटर का रास्ता बहुत सुन्दर था । रूडकी से देहरादून भी सही है । लेकिन देहरादून के पहाड़ शुरू होते ही चढ़ाई पर देखा कि सड़क हर मोड़ पर बुरी तरह से टूटी थी । अंत में करीब ५-६ किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब ढलान आई तो पता चला कि यह चढ़ाई वाला क्षेत्र यू पी के सहारनपुर जिले में आता है । जबकि ढलान शुरू होते ही उत्तराखंड शुरू हो जाता है । और उत्तराखंड शुरू होते ही सड़क मक्खन मलाई जैसी नज़र आई ।

क्या इसमें भी कोई राजनीति है ?

नोट : अगली पोस्ट में मसूरी के कुछ दिलचस्प संस्मरण तस्वीरों के साथ

Wednesday, June 6, 2012

ठहाकों के बीच बहती अश्रु धारा और एक मधुर मिलन -- यादें गुजरे ज़माने की .


इंसान के जीवन में दो मुख्य दौर आते हैं एक शादी से पहले जो वो अपने मात पिता और भाई बहन आदि सम्बन्धियों के साथ गुजारता हैदूसरा दौर शादी के बाद आता है जब उसका स्वयं का परिवार होता है जिसमे पत्नी और बच्चे होते हैंअक्सर मनुष्य जो अपने अभिभावकों से सीखता है , वही अपनी संतान को सिखाने का प्रयास करता हैइसी सफल प्रयास के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य जाति निरंतर विकास की सीढ़ी चढ़ती रही है

जीवन के ३६ वर्ष गुजर जाने पर जब अपने अतीत की याद आई तो लगा कि बच्चों को भी इसका अहसास होना चाहिए कि हम किस दौर से निकल कर इस मुकाम तक पहुंचे हैं जहाँ वो संसार की सभी सुख सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैंलेकिन बच्चे अब बच्चे नहीं रहे , बड़े हो चुके हैं , अपने पैरों पर खड़े होने के संघर्ष में जुटे हैंअत: पत्नी को ही मनाया अपने पुराने घर के दर्शन करने के लिएवो घर जहाँ रहते हुए हमने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करते हुए , मेडिकल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त कियाऔर इस तरह हमारे भावी जीवन की सुदृढ़ नींव रखी गई

पहली किस्त में आपने पढ़ा कि बच्चे हमें कमरे में बिठाकर पापा को बुलाने चले गएकरीब मिनट के इस इंतजार में हमने ३६ साल पहले की पूरी जिंदगी फास्ट फॉरवर्ड में जी लीहम श्रीमती जी को बताते जा रहे थे घर की एक एक दीवार के बारे में , और उन लम्हों के बारे में जिसे आप दूसरी किस्त में पढ़ चुके हैंऔर श्रीमती जी अत्यंत भावुक होकर अश्रु धारा बहाए जा रही थीअतीत की यादों से जिनसे उनका पहली बार सामना हुआ था , वातावरण अत्यंत भावुक हो गया थाहमारी भी पलकों के किसी कोने में अश्क का एक कतरा फंसा स्वतंत्र होने को छटपटा रहा था जिसे बड़ी मुश्किल से हम कैद किए हुए थे

समय के साथ काफी सुधार हुआ थाफर्श पर अब ग्लेज्ड टाइल्स लगी थींआँगन भी पक्का बना हुआ थालेकिन वह खिड़की अभी भी वैसी की वैसी थीइसी खिड़की से बाहर झांकते हुए पूरी जिंदगी रिवाइंड हो रही थी कि तभी ध्यान भंग हुआ --- मकान मालिक के प्रवेश के साथ
जी नमस्कार
नमस्कार जी , आइये आइयेक्या शुभ नाम जी आपका ?
जी गोपाल थोडा आश्चर्यचकित होकर उन्होंने बताया
कहाँ काम करते हैं ?
जी डी आर डी में
यहाँ कब से रह रहे हैं ?
जी यही कोई - साल सेअब उनकी उत्सुकता और हैरानी काफी बढ़ गई थी
हमें पहचानते हैं ? नहीं पहचानते होंगेकभी मिले ही नहींफिर हमने अपना परिचय देते हुए बताया कि हम दोनों डॉक्टर हैं , ये हमारा नाम है और यहाँ काम करते हैंअब तक गोपाल जी की उत्सुकता चरम सीमा पर पहुँच चकी थी
हमने भी अब रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा --गोपाल जी , ३६ साल पहले हम इसी मकान में रहते थेआज यही हम अपनी श्रीमती जी को दिखाने के लिए लेकर आए हैं

यह सुनकर उनके चेहरे पर जो भाव आए उन्हें देख कर हमें वो दिन याद गया जब एक दिन सवेरे सवेरे दिल्ली के भूतपूर्व मुख्य मंत्री स्वर्गीय साहब सिंह वर्मा जी का फोन आया और उन्होंने कहा -मैं साहब सिंह वर्मा बोल रहा हूँउस समय जो थ्रिल हमें महसूस हुई थी , ठीक वैसी ही गोपाल जी के चेहरे पर देखकर हमें भी अति प्रसन्नता हुई

बहुत देर तक हम सब मिलकर ठहाका लगाते रहेकभी आसूं पोंछते , कभी सर्दी में भी आया पसीना जो उत्तेजनावश गया थाइस बीच बच्चों ने चाय बना ली३६ साल बाद उस कमरे में मेहमान की तरह बैठकर चाय पीना एक अद्भुत अनुभव था जिसका शब्दों में वर्णन करना शायद संभव नहीं

हमने सरकारी स्कूल में पढ़कर यहीं से अपनी जिंदगी की एक अच्छी शुरुआत की थीबच्चों से पूछा तो पता चला कि वो एक एडेड स्कूल में पढ़ते थेज़ाहिर है , अब सरकारी कॉलोनी में रहने वाले बच्चे भी सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते हमें हमेशा अपने बड़ों से आशीर्वाद मिलता था , जिंदगी में सफल होने के लिएजाने क्यों , दिल भर आया और हमने भी एक बुजुर्ग की भूमिका निभाते हुए दोनों बच्चों को दिल से आशीर्वाद दिया
दिल ने फिर एक तमन्ना की कि फिर कोई बच्चा इस घर से डॉक्टर या इंजीनियर बनकर निकले

अंत में हमने अपनी सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करते हुए बच्ची के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और १०१ रूपये भेंट कर अपना कर्तव्य निभायागोपला जी ने भी भाव विभोर होते हुए अपने ऑफिस की एक सुन्दर डायरी उपहार स्वरुप हमें भेंट की

और इस तरह पूर्ण हुआ हमारा सामयिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एक ऐतिहासिक मिलन , मकान नंबर ३४५ से