Saturday, June 2, 2012

वो खिड़की जो कभी बंद , कभी खुली रहती थी --- एक संस्मरण .


पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा , किस तरह हम ३६ साल बाद अपने पुराने निवास पर पहुंचेअब आगे ---



बंद खिड़की को देखकर हम डूब गए ख्वाबों ख्यालों में । याद आया किस तरह हम खिड़की खोलकर बाहर का नज़ारा देखा करते थे । अक्सर बाहर बच्चे खेल रहे होते थे । लेकिन हमारा तो समय पढाई का होता था । कभी कभार काम ख़त्म कर थोडा समय मिलता तो बाहर निकल जाते । लेकिन खेलने के लिए नहीं बल्कि पैदल एक चक्कर लगाने के लिए । हमारे मास्टर जी बताते थे , किस तरह वो टॉयलेट में बैठ कर भी मन ही मन पाठ रटते रहते थे

याद आया किस तरह कोई दोस्त किताब लेने या होम वर्क में मदद लेने आता तो हम खिड़की में बैठकर ही उसे सब कुछ सुना देते थे । कभी कभी घंटों गप्पें मारते रहते थे । लेकिन घर के अन्दर नहीं बुलाते थे , जाने क्यों ।

पिताजी के दफ्तर में ही काम करने वाले एक सहकर्मी की बेटी -- टॉम बॉय जैसी , अक्सर वॉलीबॉल खेलकर आती और बॉल उछालती हुई घर में घुस जाती । उसे बॉल के साथ देख कर अज़ीब सा लगता । लेकिन पड़ोस वाली आंटी समझती , मैं उस पर लाइन मार रहा हूँ

और वो सरदार जी --सरदार अर्जन ( अर्जुन ) सिंह । सुबह सवेरे नहा धोकर दफ्तर के लिए तैयार होते -- बालों की छोटी सी जूड़ी बनाते -- बालों के साथ चेहरे पर भी तेल चुपड़ते और चल पड़ते कमीज़ और कच्छा पहन कर -- एक हाथ में जूते पकड़े और पैंट कंधे पर टांगे । बताते कि पैंट और जूते दफ्तर जाकर पहनेंगे वर्ना घिस जायेंगे

सामने वाले ब्लॉक की उपरी मंजिल पर एक बुजुर्ग रहते थे । मोटे से , सफ़ेद बाल और बड़ी बड़ी मूंछें । उन्हें ठाकुर साहब कह कर बुलाया जाता था । गर्मियों में रोज शाम को छत पर पानी का छिड़काव करते । एक सुराही , एक गिलास और एक बोतल जिसमे सफ़ेद से रंग का कोई द्रव्य होता -- लेकर छत पर पहुँच जाते । और घूम घूम कर सफ़ेद द्रव्य की घूँट भरते रहते । किसी ने बताया , वे स्पिरिट पीते थे -- हालाँकि उस तरह की दारू हमने आज तक नहीं देखी । उनके पास एक बड़ा सा सुन्दर सा ट्रांजिस्टर था , जिस पर सुबह के समय सीलोन से हिंदी फिल्मों के मधुर गाने चल रहे होते ।

उन्ही की छत पर कभी कभी हम अपने एक दोस्त के साथ पतंग उड़ाने का मज़ा लेते । पतंग तो दोस्त ही उड़ाता , हम तो खाली चरखी पकड़ कर ही खुश हो लेते थे । कभी कभी जब पतंग स्थिर होती तो मांजा हाथ में पकड़ कर थोड़ी देर थामकर हमारी भी पतंगबाज़ी हो जाती ।

उन दिनों पतंग लूटने की बड़ी रिवाज़ थी । एक दिन स्कूल से घर आते समय बिजली के तार में फंसी एक पतंग छूटकर हमारे सामने आ गिरी । हमने भी आव देखा न ताव , उठाया और घर ले आए । कुछ ही दिन बाद गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली थी । उसे अच्छी तरह संभाल कर रखा और छुट्टियों में अपने साथ गाँव लेकर गया । लेकिन समस्या आई मांजे की । घर में ढूंढकर सारे धागे इक्कट्ठे किये और एक रस्सी बनाई गई । फिर बड़े शौक से सभी बच्चों को एकत्रित कर पतंग उड़ाने की कला का प्रदर्शन किया । लेकिन अफ़सोस , पहली बार में ही तेज हवा के झोंके के साथ पतंग का तिया पांचा हो गया और शो फ्लॉप हो गया

दो तीन मकान की दूरी पर एक साहब रहते थे । चकाचक सफ़ेद कपड़ों में नेताजी लगते । किसी दफ्तर में बाबु थे । लेकिन रोज सुबह इंदिरा गाँधी जी के घर पर जाकर शीश नवाते । आखिर , एक दिन उनकी मेहनत रंग लाई । उन्हें सेनिटेशन डिपार्टमेंट में किसी कमिटी का चेयरमेन बना दिया गया । अगले दिन से ही उनकी कायापलट हो गई । घर के आगे चार दीवारी कर दी गई , लॉन बन गया और रोज सुबह घर के आगे दरबार लगने लगा । यकायक रंक से राजा बन गए । चबूतरे पर बस एक कुर्सी होती जिस पर साहब विराजमान होते और सामने दरी पर जनता बैठती ।

उन दिनों सडको पर गुंडागर्दी भी बहुत होती थी । मनचले लड़कों का फेवरिट टाइम पास होता था -- लड़कियां छेड़ना । बेल बॉटम नई नई फैशन में आई थी । उस पर धर्मेन्द्र की स्टाइल में चौड़ी बेल्ट । इस तरह के कई रोमियो सड़कों पर घूमा करते । लड़कियों का सड़क पर चलना दूभर हो जाता ।

टी वी पूरी कॉलोनी में बस एक घर में होता था जो हमारे स्कूल के पास था । अक्सर उनकी खिड़की पर भीड़ लगी रहती । लेकिन समुदाय भवन में एक सरकारी टी वी हर रविवार को फिल्म और बुधवार को चित्रहार दिखाता । अपना गुजारा तो उसी से हो जाता । लेकिन जिंदगी की पहली फिल्म हमने तब देखी जब मैदान में टेंट लगाकर ५० पैसे टिकेट लगाकर एक शो किया गया । हम तो टेंट फाड़कर घुसे थे । फिल्म थी -- नई उम्र की नई फसल । फिर स्कूल में दिखाई गई गाईड और एक दिन ऐसा भी आया जब टी वी पर स्कूल में नील आर्मस्ट्रोंग को चाँद पर उतरते हुए दिखाया गया जिसे सारे स्कूल ने देखा ।

अचानक किसी के प्रवेश ने हमारा ध्यान भंग किया । मकान मालिक ने आकर नमस्ते की । और एक ऐसे अनुभव की अनुभूति हुई जो न सिर्फ हम दोनों के लिए बल्कि उस अंजान मकान मालिक के लिए भी एक अविस्मर्णीय यादगार बन कर रह गई ।

अगली और आखिरी किस्त पढना मत भूलियेगा

53 comments:

  1. महज यादें ही नहीं यादों का जखीरा कहिये जनाब -और वो आर्मस्ट्रांग वाली टी वी खबर -क्या तब यहाँ टी वी प्रचलन में आ गया था ?

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    1. मिश्र जी , १९६९ में टी वी हमारे स्कूल में था । एक समुदाय भवन में । और सिर्फ एक किसी के घर में ।

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  2. भोली भाली खुशनुमा यादें !

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  3. इन यादों की किताब होनी चाहिए भाई जी ....

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    1. सतीश जी , वह तो ऑटोबायोग्राफी हो जाएगी । हम इतने बड़े कहाँ हुए है कि ऑटोबायोग्राफी लिखें ! :)

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  4. यादों का खूबसूरत गलियारा

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  5. घर की स्मृतियाँ धीरे धीरे रोचक होती जा रही हैं।

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  6. यादों की रोचक स्मृतियाँ,

    RESENT POST ,,,, फुहार....: प्यार हो गया है ,,,,,,

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  7. बढिया धारावाहिक चल रहा है…… स्मृतियों की पोटली खुल चुकी है तो चलने दीजिए। वैसे स्प्रिट पर सरकार ने बैन लगा दिया है। नहीं तो बहुत सस्ती मिलती थी। पहले फ़र्नीचर की पॉलिश उसी से होती थी और पॉलिश वाले दिन भर टुन्न रहते थे,सस्ता सौदा था जगाधरी-1 जैसा।

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    1. तभी तो ! हम भी सोच रहे थे --अब कहाँ गई !

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  8. वाह...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  9. खट्टी-मीठी यादें....!!

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  10. जैसे पिटारा खुल गया यादों का..और चुन रहे हैं आप एक एक नगीना.

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  11. संस्मरण की यही तो खूबी है न सिर्फ लिखने वाला ,पढने वाला भी उन यादों से बा -वास्ता होने लगता है तदानुभूति उसे भी होने लगती है .पात्र उभरने लगतें हैं उसके मन मस्तिष्क में ब्योरा बांधे रहता है .कमाल लिखने वाले का तो होता ही है पढने वाला भी , सहृदय होना चाहिए .बढिया चल रहा हैं संस्मरण लेकिन इसका चरम बिंदु अभी प्रतिक्षीत है ..
    कृपया यहाँ भी पधारें -
    साधन भी प्रस्तुत कर रहा है बाज़ार जीरो साइज़ हो जाने के .
    गत साठ सालों में छ: इंच बढ़ गया है महिलाओं का कटि प्रदेश (waistline),कमर का घेरा
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    लीवर डेमेज की वजह बन रही है पैरासीटामोल (acetaminophen)की ओवर डोज़
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

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  12. ...छोटे से संस्मरण में कई पात्र शामिल हैं |सबसे रोचक बात यह है कि इससे उस समय का रहन-सहन और समाज का चलन पाता चलता है.

    @अचानक किसी के प्रवेश ने हमारा ध्यान भंग किया..
    यह लाइन खटकती है,क्या अभी जब आप संस्मरण लिख रहे थे क्योंकि उस वक़्त तो ऐसा कोई दृश्य नहीं था,जिसमें आप का अचानक ध्यान-भंग हुआ हो ?

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    1. संतोष जी , दृश्य तो उसी वक्त का है । यह अगली किस्त में साफ होगा ।

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  13. आप के संस्मरण न जाने क्या क्या याद दिलाते जा रहे हैं।

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  14. वाक़ई आप को कि‍सी दूसरी ही दुनि‍या में ले गए

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  15. अच्छा लगता है पुरानी यादे याज़ा करना.............
    ये यादें आपकी हैं मगर हमे लगा हम भी हिस्सा हैं इनका.....

    सुंदर लेखन सर
    सादर.
    अनु

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  16. @ मास्साब ,
    पक्का कह नहीं सकते कि आपके मास्साब पाठ रटने की मजबूरी में टायलेट में बैठते थे याकि टायलेट में बैठने की मजबूरी उनसे वहां पाठ रटवाती थी :)

    वैसे डाक्टर होने जाने के बाद आपको , मास्साब के 'हाजमें को पढ़ने' वाले एंगल से देखना बंद कर देना चाहिये :)

    @ खिड़की से बाहर रखे गये दोस्त ,
    पड़ोस वाली आंटी आप पे यूं हीं शक नहीं करती थी कि आप टाम बॉय लड़की पे लाइन मारते हो , उसकी एक वज़ह ये भी है कि लड़की के अलावा आप अपने तमाम दोस्तों को खिड़की से बाहर रखते थे :)

    @ सरदार अंकल ,
    अपनी स्टूडेंट लाइफ में हम शौकिया तौर पर अहाते में कुछ दूर की बोरिंग ( वो फ़ार्म हॉउस जैसा था ) में नहाने चले जाते थे , एक रोज़ मैंने देखा कि वहां पर कोई औरत बाल धो रही है , मुझे बड़ी कोफ़्त हुई कि अब मैं वहां जाकर कैसे नहाऊं ? मैं मन ही मन उस औरत पे भुनभुनाते हुए ठहर गया ! कुछ देर बाद पड़ोस की कन्डोला आंटी ने पूछा , तू इतनी देर से यहां क्यों खड़ा है , नहाने जाता क्यों नहीं ? मैंने कहा आंटी अगर आप यहां हैं तो फिर वहां कौन है ? :)

    @ दारू पार्टी ,
    देखने सुनने में माहौल बड़ा रोमांटिक लगता है पर अपना कोई अनुभव नहीं , इसलिए हम कुश नहीं बोलेगा :)

    @ पतंग बाज़ी ,
    अफ़सोस कि इस शाही शौक को पूरा नहीं कर पाये आप , हमने तो इसे डिग्री की तरह से अपने प्रोफाइल में जड़ रखा है :)

    @ बाबू साहब ,
    सबक ये कि दूसरों के घर की सफाई से रंक , राजा बनते हैं :)

    @ गुंडा गर्दी , स्कूल वाली फिल्में ,मकान मालिक ,
    अब सभी बातों पे मैं ही कमेन्ट कर डालूंगा तो बाकी दोस्त क्या करेंगे ,बहरहाल शमा-ए-महफ़िल , जे.सी.जी के आगे खिसका रहा हूं :)

    वैसे शाम सतीश भाई को सौंपने का था , पर वो पहले ही खिसक चुके हैं :)

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  17. हा हा हा ! लेकिन अली सा , मास्साब का फंडा हमारे बड़े काम आया । हम सैर करते हुए यही काम करते थे ।
    आंटियों का तो काम ही होता है शक करना !
    यानि दारू और पतंगबाज़ी में हम उलटे हैं । :)
    जे सी जी बस अब आने ही वाले हैं । ज़वाब के लिए तैयार रहिये ।

    अली सा , शुक्रिया ।

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    1. JCJune 02, 2012 8:55 PM
      :) :) ;) अली साहिब ने हर नुक्ते पर इतनी बढ़िया टिप्पणियाँ दी हैं कि उन्हें दाद देनी पड़ेगी!
      बचपन में जब वे होम मिनिस्टर थे तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त के विषय में सुनते थे कि पंडित नेहरु काम के लिए उन्हें मिलने उन के घर पर पहले से ही बता कर आते थे, फिर भी वो अधिकतर टॉयलेट में ही बैठे पाए जाते थे!
      उन्होंने वहाँ अपनी लायब्रेरी बना रखी थी! उस स्थान का कुछ न कुछ महत्त्व अवश्य ही रहा होगा, जैसा राजा विक्रमादित्य के सिंहासन के विषय पर भी मान्यता है (सिंहासन बत्तीसी में), क्यूंकि अपने समय के वो पहुँच हुए राजनेता माने जाते थे... और आम आदमी को भी कई प्रश्नों का उत्तर कभी कभी टॉयलेट में ही मिलता है...:)

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    2. डॉक्टर साहिब, अली जी, यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि यदि आप ने संस्मरण के शीर्षक, "वो खिड़की जो कभी बंद , कभी खुली रहती थी", को एक्यूपंक्चर की मान्यता के सन्दर्भ में देखा होता, तो संभवतः प्रकृति के संकेत भी देखे होते... क्यूंकि हजारों साल से मान्यता है कि मानव शरीर को शक्ति के बहाव की बारह (१२) नालियों/ नलिकाओं द्वारा समझा गया है जो शरीर के बारह मुख्य अंगों, ह्रदय, आदि तक आवश्यक शक्ति को प्रति क्षण पहुंचाने का काम करती रहती हैं... और शरीर स्वस्थ तभी रह सकता है जब इस बहाव में (शरीर के दोनों, दांये और बायें, बारह-बारह अंगों से जुड़े) शरीर कि चमड़ी में कोई खिड़की बंद न हो... जिस कारण वातावरण से सही ऊर्जा शारीरिक अंगों को न मिल पाए, और परिणाम स्वरुप किसी बीमारी के लक्षण प्रतीत होने लगे... और इस का सही इलाज बंद खिडकियों में सुई चुभा उनके माध्यम से आवश्यक शक्ति को उन अंगों तक पहुंचाना है...
      यह विधि आर्थिक रूप से सबसे सस्ती और सरल होने के कारण सभी आर्थिक वर्ग को उपलब्ध कराई जा सकती है... किन्तु दूसरी ओर इस के लिए सही खिडकियों का पता भी होना आवश्यक है...

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    3. This comment has been removed by the author.

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    4. और यदि वर्तमान में वैज्ञानिकों द्वारा शोध से प्राप्त ज्ञान की ओर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि सबसे ज्ञानी व्यक्ति भी मस्तिष्क में अरबों सेल होते हुए भी उन में से केवल नगण्य का ही उपयोग कर पाता है!
      और इसे समझने के लिए सहायता लेनी होगी प्राचीन 'हिन्दू' मान्यता से, अर्थात उन भारतीयों से जो शिव के माथे पर इंदु अर्थात चन्द्रमा परम्परानुसार दिखाते आ रहे हैं अनादि काल से... और चंद्रमा के चक्र के अनुसार तिथि, त्यौहार आदि का निर्धारण करते आते हैं... और मान्यता है कि मानव कि क्षमता युग पर निर्भर करती है - यदि क्षमता सैट युग के आरंभ में १००% थी तो कलियुग में वो केवल २५ से ०% के बीच ही रह जाती है...

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    5. और यदि योगियों / सिद्धों द्वारा तपस्या द्वारा प्राप्त ज्ञान का कोई अनुमान लगायें तो पा सकते हैं कि उन्होंने मानव शरीर को सूर्य से ले कर शनि तक 'नवग्रहों' के सार से बना जाना...
      जिसमें से शनि ग्रह के सार को स्नायु तंत्र. अर्थात नर्वस सिस्टम, के निर्माण में और इस प्रकार इस तंत्र के द्वारा शक्ति को आठ अन्य शक्ति पीठों, चक्रों, से ऊपर अथवा नीचे बहना जाना - मस्तिष्क से सीट अर्थात मूलाधार तक, जहां क्रमशः चन्द्रमा और मंडल ग्रह के सार को उपलब्ध जाना - अथवा मूलाधार से सहस्रार तक ऊपर...
      जबकि पेट में सूर्य के सार अर्थात जठराग्नि को...
      सम्पूर्ण ज्ञान के लिए किन्तु निरंतर अभ्यास और व्यायाम द्वारा सभी आठ चक्रों में उपलब्ध शक्ति और सूचना को मस्तिष्क तक उठाना ही मानव का कर्तव्य समझा...
      किन्तु वर्तमान में काल की प्रकृति के कारण क्षमता लघाग शून्य अथवा इस के निकट होने के कारण हम अपने पूर्वजों को ही मूर्ख और अंधविश्वासी कहते हैं... "हाय रे इंसान की मजबूरी/ पास रह कर भी दूरियां..."... :)

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  18. यह समृतियाँ और जीवन .....वैसे हर पल संजीदगी से जिया जाए तो कई संस्मरण तैयार हो सकते हैं .....सब कुछ रोचक और शैली उतनी ही अपनी सी लाजबाब ....!

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  19. अब तो उत्सुकता काफ़ी बढ गयी है, एक पुराना गीत भी याद आया। इतने मुद्दत बाद मिले हो, किन सोचों में गुम रहते हो ...

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  20. हमेशा याद आता हैं वो बचपन सुहाना ----
    वो झूले पर झुलना ..
    वो पतंगो को उड़ाना ...
    वो नावों को बहाना....
    वो लगड़ी का खेलना ...
    वो खो -खो पर भागना ...
    चटकारे लेकर यू गोलगप्पो को खाना ..
    कनखियों की कोरो से लडको को ताकना..
    वाह ! कितना प्यारा था वो बचपन सुहाना ..!

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  21. यादों के सुनहरे संस्मरणों से भरी दोनो पोस्टों को आज पढ़ने का अवसर मिला। अच्छा लिखा है आपने। मेरा खयाल है कि जो भी थोड़ा बहुत भी लेखन से जुड़े हों उनको अपने संस्मरण जरूर लिखने चाहिए। संस्मरण किसी बड़े या प्रसिद्ध साहित्यकार का पेटेंट नहीं है। चाहे वह बड़ा हो या छोटा सभी को अपने जीवन से जुड़ी कहानियाँ/संस्मरण जरूर लिखने चाहिए। सतीश जी ने सही सलाह दी है। इससे एक तो उन्हें अच्छा लिखना आ जायेगा दूसरे वे भले सच न लिख पायें लेकिन सच महसूस करके, आत्मावलोकन कर सकेंगे कि जीवन में उन्हें क्या नहीं करना चाहिए था और कहाँ-कहाँ वे चूके। एक और सबसे अच्छी बात यह होगी कि वे अपने बच्चों को अपने पिता के आस पास के परिवेश और अपने बारे में एक खुली किताब का तोहफा दे कर जायेंगे । अपने माता-पिता के बारे में जानने की हर बच्चे में गहरी उत्सुकता होती है खासकर तब जब वे नहीं रहते।

    आगे के किश्तों की (तीसरी नहीं) प्रतीक्षा रहेगी।:)

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  22. पोस्ट में मर्म को सही पहचाना है आपने पाण्डे जी . बेशक संस्मरण की यही अहमियत होती है . आभार .

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  23. वाह दोस्तों के साथ के हर लम्हे यादगार होते हैं ।

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  24. ये यादेँ ही हैं ....जिन्हें हम पीछे छोड़ आते हैं ....
    पर वो हमेशा साथ-साथ चलती हैं ....हमेशा हमारा साथ देने के लिए !!!
    सुहानी यादेँ मुबारक हों ....

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  25. आप अपनी बात को अपने अंदाज़ में कहने में सफल रहे हैं , ऐसे संसमरण बार बार पढने को मन करता है.

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  26. आप अपनी यादों के झरोखे से कुछ बता रहे हैं या दूसरों की यादों के झरोखे में तीली मार रहे हैं ...
    कुछ पुरानी यादें हमारी भी ताज़ा हो गईं ... पतनक उदाना, लट्टू और कंचे खेलना ... पड़ोसियों के यहां जा कर टी वी देखना ... यादगार लम्हों की दास्ताँ ...
    आकरी किश्त में धमाका होने वाला है ... कोई राज खुलने वाला है ...

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    1. नासवा जी, राज़ तो नहीं लेकिन एक महत्त्वपूर्ण बार ज़रूर सामने आएगी.

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  27. बहुत खूबसूरत है आपकी यादों का सफर.... :-) हमारे जमाने में टीवी तो घर-घर आ गया था। मगर हर बुधवार को फिल्म और चित्रहार देखने का मज़ा ही कुछ और हुआ करता था और जब कभी फ़िल्म फैयर एवार्ड आते थे, तो हम लोगों का खाना ऊपर मम्मी पापा के बेडरूम में हुआ करता था क्यूंकि उन दिनों हम जिस घर में रहा करते थे वहाँ रसोई और बैठक नीचे और हम लोगों के बडरूम ऊपर की मंज़िल में हुआ करते थे इस सबके चलते हम लोगो चुपके-चुपके टीवी ना देखे इसलिए उन्होने टीवी जानबूचकर अपने कमरे में रखा हुआ था। :) आपकी इस पोस्ट के बाहने हामरी भी कुछ यादें ताज़ा हो गयी डॉ साहब आभार :-)

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    1. पल्लवी जी , बेशक बचपन की यादें और यादों में बचपन बहुत थ्रिल करता है . कभी कभी इन यदों में डूबना मेडिटेशन जैसा अहसास देता है.

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    2. @ ",, कभी कभी इन यादों में डूबना मेडिटेशन जैसा अहसास देता है..."... संकेत सा है भगवान् विष्णु का तथाकथित अनंत/ शेषनाग पर योगनिद्रा में लेटे रहने का, बाहरी संसार को भूले दीखते किन्र्तु वास्तव में बेखबर नहीं!...
      जिसे विष्णु के कानों की मैल से उत्पन्न दो राक्षसों के आकार में बढ़ने और उनके द्वारा खाए जाने की आशंका से भयभीत ब्रह्मा को, जिन्हें विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न होते माना जाता है, सही समय आने पर ही उन राक्षसों को दबोच लेने की कथा द्वारा दर्शाया जाता आया है...
      और ऐसे ही द्वापर में भी, 'महाभारत' में, सन्दर्भ आता है कर्ण के कुंती के कान से उत्पन्न होने का और इस प्रकार उसे वास्तव में पांच पांडवों का भाई होने का!!!
      ऐसी कथाएँ संकेत हैं सत्य तक पहुँचने के लिए मानव मस्तिष्क के सही उपयोग किये जाने की आवश्यकता का - युग विशेष की प्रकृति को ध्यान में रख, निरंतर अभ्यास और भौति व्यायाम के अतिरिक्त मानसिक और आध्यात्मिक व्यायाम द्वारा भी... क्यूंकि मानव जीवन का उद्देश्य शिव अर्थात सत्य को पाना है...:)

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  28. महके यादों के सुमन….. सुंदर स्मृतियाँ सर...
    सादर।

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  29. उन दिनों दूरदर्शन पर, बॉब कट वाली प्रस्तुतकर्ता साप्ताहिकी के सबसे अंत में, कितना इतराते हुए बताती थी कि रविवार को कौन सी फिल्म दिखाई जानी है,याद है?

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  30. जारी रहिये..जुड़े है साथ साथ खोये खोये से...अपनी यादों में...:)

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  31. राधारमण जी , हमें तो बस सलमा सुल्तान , मीनू ( तलवार ) और मंजरी जोशी याद हैं . :)

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  32. बढ़िया ऑटोबायोग्राफी डा० साहब ; कुछ बिंदु थे जिन पर हास-परिहास के गुंजाइश थी किन्तु लेट लतीफ़ पहुंचा, मेरे से पहले ही धुरंदरों ने बाजी मार ली ! :)
    हाँ, एक बिंदु अछूता है चलो उसी को टिपिया लेता हूँ ......... "लेकिन रोज सुबह इंदिरा गाँधी जी के घर पर जाकर शीश नवाते । आखिर , एक दिन उनकी मेहनत रंग लाई । उन्हें सेनिटेशन डिपार्टमेंट में किसी कमिटी का चेयरमेन बना दिया गया । " ...........लोग उनके वर्तन माझकर राष्ट्रपति बन गए, ये तो कुछ भी नहीं ! :)

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  33. बहुत ही सुंदर संस्मरण ...सुन्दर प्रस्तुति...हार्दिक बधाई...

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  34. गोदियाल जी ने सही कहा... प्राचीन मान्यतानुसार भी व्यक्ति से अधिक उसके नाम की महिमा अधिक होती है और 'इंदिरा' नाम देवताओं के राजा इंद्र समान भी सुनाई देता है, जो वर्षा के भी देवता हैं, अर्थात इसलिए सूर्य के प्रतिरूप कहे जा सकते हैं ...
    और, इंद्र देवता के लिए प्रसिद्द है कि वे गौतम ऋषि का रूप रख अहल्या के शिला में परिवर्तित होने का कारण भी बने... जिसे फिर से नारी बनाना धरा पर प्रकाश और शक्ति के स्रोत, सौर-मंडल के राजा सूर्य समान 'धनुर्धर' सूर्यवंशी राजकुमार राम के लिए ही संभव था! अर्थात इंद्र/ सूर्य देवता किसी भी साकार रूप में आ सकते हैं...
    और दूसरी ओर मान्यता भी है कि 'भगवान् किसी भी रूप में आ सकते हैं' और हमारी गैलेक्सी के केंद्र में अवस्थित 'ब्लैक होल' अर्थात 'कृष्ण' को भी बहुरुपिया कहा गया है!!!
    इन कारणों से कह सकते हैं कि मानव जगत में कुछ भी चित्र-विचित्र होता दिखाई दे सकता है - वो एक ड्रामा अर्थात शक्तिरूपी निराकार शिव द्वारा रचित 'रामलीला' अथवा 'कृष्णलीला' ही समझी जा सकती है...:)

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  35. लौटना फिर उन्हीं गलियों से ..

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  36. JCJune 06, 2012 7:01 AM
    मानव मस्तिष्क तो सभी को पता चल जाता है कि वो एक अद्भुत उपकरण तो है, किन्तु विचित्र भी है क्यूंकि हर व्यक्ति में यह एक सा काम नहीं करता... और जिस कारण हर व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न कार्य करता दिखाई देता है... जिसमें मुख्य कारण होता है भिन्न भिन्न विचारों के हरेक के मस्तिष्क पर आना - एक ही विषय पर... उदहारणतया, मैं लंच के बाद यदि कभी कहता कि चलो कोला पीलें तो मेरा मित्र कहता कि कोला नहीं केला खाते हैं, उस से सेहत अच्छी रहेगी और लम्बी उम्र पा देर तक पेंशन खायेंगे (और उदाहरण के लिए अपने किसी रिश्तेदार के विषय में बताता कि सर्विसे कम किन्तु पेंशन अधिक काल तक पाए)!...
    जब कोई छुट्टी निकट होती है, भले ही रविवार हो, तो मन में पहले से ही विचार आने लगते हैं कि उसे कैसे बिताएंगे (जैसे आपने ३६ वर्ष पूर्व अपने सरकारी निवास स्थान जाने का निर्णय लिया)... और यदि छुट्टी लम्बी हो तो कोई, गर्मियों में जैसे, किसी पहाड़ी क्षेत्र अथवा किसी विदेशी रमणीय स्थल में मजा करने का निर्णय लेता है, आदि आदि, और भले-बुरे अनुभव को सहेज कर मस्तिष्क में ही कहीं रख उन को मन में समय समय पर दोहराता है, जिस कारण प्रकृति की विविधता को दर्शाते विभिन्न प्रतिबिम्ब हर क्षेत्र में देखने को मिल जाते हैं...
    यहीं पर, गीता में जैसे, अपने ही पूर्वजों के प्राचीन विचार पढ़ आभास होता है कि इसी मिटटी में योगी, सिद्ध आदि, परोपकारी जीव, तपस्या कर मन में ही और अधिक गहराई में जा मानव शरीर का सही उद्देश्य जानने का प्रयास कर चुके हैं, और अन्य लोगों के हित में भी उपदेश दे गए... जिसकी झलक विबिन्न रीती-रिवाज, पूजा-त्यौहार आदि में प्रतिबिंबित होती है...

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  37. आपका भी मेरे ब्लॉग मेरा मन आने के लिए बहुत आभार
    आपकी बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना...
    आपका मैं फालोवर बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,......
    मेरा एक ब्लॉग है

    http://dineshpareek19.blogspot.in/

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