top hindi blogs

Sunday, June 13, 2021

Corona

 कोरोना काल मे जुदा हम और सरकार हो गये,

लॉकडाउन में खाली घर रहकर बेकार हो गये।

बेकार हो गये अब भैया जब रिटायर भये दोबारा,

अब न कोई सुनता न किसी पर चलता वश हमारा।

कह डॉक्टर कविराय अब किस पर हुक्म चलावैं,

बस चुप रह कर निस दिन बीवी का हुक्म बजावैं।

Thursday, June 10, 2021

लॉक डाउन और सेवा निवृति --

अभी तो टायर्ड हुए भी नही थे,
कि हम फिर से रिटायर्ड हो गये।
रिटायर्ड होकर घर मे ही बैठे बैठे,
निष्काम रह रह कर टायर्ड हो गये।

मूड कुछ डाउन रहने लगा जब,
टाउन सब लॉक डाउन हो गए।
लोग जब घरों में निश्चल न बैठे तो,
हम अपने घर मे रनडाउन हो गये।

लॉक होकर अनलॉक होने लगे,
थे जो सपने कहीं लॉक हो गए।
बंद थे कभी वक्त की पाबंदी में,
उन बंदिशों से अनलॉक हो गये।

अब काम हैं कम और वक्त है ज्यादा,
काम भी अब वक्त से आज़ाद हो गए।
मर्ज़ी के लिए लगानी पड़ती थी अर्जी,
अब अपनी मर्ज़ी के सरताज़ हो गये।

बस्ते में बंद पड़े थे कुछ छंद और लेख,
वेंटिलेटर से ज्यों निकल जीवंत हो गये।
एक दौर जिंदगी का खत्म हुआ तो क्या,
एक नयी ज्वाला से हम प्रज्वलंत हो गये।

Friday, May 21, 2021

जब डर नहीं लोगों में तो कोरोना भी क्यों डरे --

 

नंदू बिना मास्क के चार चक्कर लगा आया,
न किसी ने पकड़ा न पुलिस ने डंडा बजाया।
जब डर नहीं लोगों में तो कोरोना भी क्यों डरे,
सेकंड वेव का राज़ हमें अब समझ मे आया।

ब्लैक फंगस के केस बहुत नज़र आने लगे हैं,
डॉक्टर्स अब सबको ये बात समझाने लगे हैं।
स्टीरॉयड्स एक राम बाण दवा है सही हाथों में,
किंतु लोग बिना सलाह के खुद ही खाने लगे हैं।

अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर हो जाता है,
कमज़ोर हो जाये तो शेर भी ढेर हो जाता है।
कोरोना डायबिटीज स्टिरॉयड हैं कमज़ोर कड़ी,
ऐसे में ब्लैक फंगस सेर पर सवा सेर हो जाता है।

इम्युनिटी कम हो तो फंगस पर ताला नही होता,
मुंह पर सूजन होती आंख में उजाला नही होता।
हर गोल्डन दिखने वाली चीज गोल्ड नही होती,
ब्लैक फंगस भी वास्तव में काला नही होता।।

ना कोई दवा ना दुआ ही काम आती है,
बस कोरोना की दया असर दिखाती है।
ईश्वर की इच्छा के आगे नही चलता वश,
केवल उसकी मर्जी ही जिंदगी बचाती है।

Friday, April 9, 2021

कोरोना से जंग --

चेहरा मास्क से ढका हुआ ,  

मास्क के ऊपर से झांकती दो आँखें, 

आँखों में अक्सर 

दिखती है एक बेबसी।  

बाकि त्योरियों से भरा मस्तक।  

आजकल इंसान की 

बस यही पहचान रह गई है। 


वो दिखता नहीं है , 

न ही कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह, 

उसमे कोई गंध है न रंग।  

एक अदृश्य दुश्मन की तरह, 

घात लगाकर करता है आक्रमण। 

एक अणु ने परमाणु शक्ति को भी , 

शक्तिविहीन बना दिया है।  


नादाँ सभी जानते तो हैं , 

किन्तु मानते नहीं।  

इस सूक्षम शत्रु से लड़ने के 

तौर तरीके।  

शत्रु जो सीमा पार से नहीं, 

न ही देश के जंगलों से आता है।  

वो रहता है आपके ही हाथों में, 

गले लगने को तत्पर, 

गले लगा तो गले पड़ने को तैयार।  


माना कि जिंदगी आजकल अधूरी है, 

परन्तु जो है तो  , 

कभी पूरी भी होगी। 

बस संयम और संतुलन चाहिए,

टैस्ट, रैस्ट और वैक्स 

तीनों मिलकर लगाएंगे बेडा पार।  

 

Tuesday, February 23, 2021

कोरोना ने हमें क्या क्या सिखा दिया ---

कोरोना से जग ने खुद को बचाना सीख लिया है , 

कलियुग में सात्विक बनकर दिखाना सीख लिया है।    


सीख लिया है सबने कम में गुजारा करना ,

भौतिक इच्छाओं को दबाना सीख लिया है।    


ना लगे मेले ना मिले किसी से साल भर , 

बुजुर्गों ने एकाकी जीवन बिताना सीख लिया है।  


पार्टियां रहीं बंद और बंद सब सैर सपाटा , 

युवाओं ने भी खाना पकाना सीख लिया है।  


ना पार्क ना कॉलेज ना सिनेमा हॉल की मस्ती, 

आशिकों ने डिजिटल इश्क़ फरमाना सीख लिया है।     


शादियां भी होने लगी बिन बैंड बाज़ा बारात के , 

लोगों ने अरमानों पर रोक लगाना सीख लिया है।  


हॉल पंडाल पड़े रहे खाली पूरे साल, कवियों ने , 

मुफ्त में ऑनलाइन कविता सुनाना सीख लिया है।     


यार दोस्त नाते रिश्तेदार सब रहे साल भर दूर, 

इंसान ने खुद का खुद से नाता निभाना सीख लिया है।  



Friday, January 29, 2021

इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है --

 

कनाड़ा के एल्गोन्क़ुइन जंगल में कैम्पिंग :



बात पुरानी है, २००९ में जब हम पहली बार कनाड़ा गए थे, अपने एक मित्र के निमंत्रण पर। तीन सप्ताह के निवास में मित्र ने हमारे सम्मान में एक तीन दिन के जंगल कैम्प का आयोजन किया था, एल्गोंक्विन फॉरेस्ट में। लगभग ६० मिलोमीटर लम्बे जंगल के बीच से होकर एक सड़क गुजरती थी जिस के किनारे जंगल में बने एक कैम्पिंग लॉज में हमारा कैम्प आयोजित किया गया था। घने जंगल के बीचोंबीच बने कैम्पिंग साइट पर हमारे टेंट लग गए।  कुल मिलाकर हम ५ परिवारों के लगभग २० लोग थे बच्चों समेत। जंगल में भालू पाए जाते थे।  इसलिए केयरटेकर की ओर से निर्देश था कि खाने का कोई भी सामान खुले में न रखा जाये क्योंकि भालू खाने की गंध से आकर्षित होते हैं और हमला कर सकते हैं। 

रात में खाना खाने के बाद और सब सामान समेटने के बाद सब लोग एक बड़े टेंट में एकत्रित हो गए और महफ़िल जम गई। कई तरह के कार्यक्रमों के बाद किसी ने सब से एक सवाल पूछा कि आप सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं। ज़ाहिर है, सबने अलग अलग जवाब दिए।  अभी बातचीत चल ही रही थी कि टेंट के पीछे जंगल की ओर से कुछ गुर्राने की आवाज़ आई। आवाज़ सुनकर सबके कान खड़े हो गए।  टेंट में चुप्पी छा गई। तभी दोबारा आवाज़ आई तो किसी ने कहा कि कहीं भालू तो नहीं आ गया। यह सुनकर सबके होश उड़ गए। सबको एक ही चिंता थी कि यदि भालू टेंट में घुस गया तो किस पर हमला करेगा। ज़ाहिर है, उस समय सबको अपनी जान की चिंता हो रही थी। 

असमंजस और भय के कुछ क्षणों के बाद आखिर एक बंदा हँसता हुआ अंदर आया और पता चला कि भालू के गुर्राने की आवाज़ वह निकाल रहा था। यह जानकर सबकी साँस में साँस आई।  और साथ ही सब ठहाका लगाकर हंस पड़े, क्योंकि अब सबको सवाल का सही जवाब मिल गया था कि इंसान सबसे ज्यादा स्वयं से प्यार करता है।     

कोरोना पेंडेमिक ने भी यही बात साबित करके दिखा दी कि इंसान को अपनी जान की चिंता सबसे पहले होती है। पिछले दस महीनों में लोगों ने यदि चिंता की है तो अपनी की है। दूसरा कोई जिन्दा है, सही सलामत है या नहीं, कोरोना संक्रमण हुआ तो नहीं, किसी ने किसी के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। बेशक सोशल मिडिया पर आपकी गतिविधियों से सबको एक दूसरे की जानकारी मिलती रहती है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर ऐसा बहुत ही कम देखने को मिला जब किसी ने फोन कर किसी का हाल पूछा हो। वो जो दम भरते थे दोस्ती का, साथ उठना बैठना, खाना पीना होता था, आज कहीं नज़र नहीं आते। ज़ाहिर है, हर कोई अपनी ही समस्याओं में इस कदर घिरा रहा कि किसी दूसरे के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला। निश्चित ही, एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है।                  


Tuesday, January 12, 2021

इंसान वो होता है जो वक्त रहते संभल जाता है --

सर्दियों में वेट बढ़कर पेट अक्सर निकल जाता है,

क्या करें, दावत का रोज ही अवसर मिल जाता है।


कम्बल रज़ाई में बैठे बैठे खाते रहते हैं सारा दिन,

हाथ पैर अकड़े होते हैं, परंतु ये मुंह चल जाता है।


ग़ज़्ज़क, पट्टी, गाजर का हलवा देख मन ललचाये,

खाते पीते नये साल का जश्न भी हिलमिल जाता है।


गर्म कपड़े अभी सम्भले भी नही होते अलमारी में,

पलक झपकते सर्दियों का मौसम निकल जाता है।


पल दो पल की जिंदगी है , जश्न मनाओ 'यारो',

देखते देखते जवां वक्त हाथों से फिसल जाता है।


कोरोना कष्टकाल कम हुआ है, पर बीता नही है,

इंसान वो होता है जो वक्त रहते संभल जाता है।