कोरोना काल मे जुदा हम और सरकार हो गये,
लॉकडाउन में खाली घर रहकर बेकार हो गये।
बेकार हो गये अब भैया जब रिटायर भये दोबारा,
अब न कोई सुनता न किसी पर चलता वश हमारा।
कह डॉक्टर कविराय अब किस पर हुक्म चलावैं,
कोरोना काल मे जुदा हम और सरकार हो गये,
लॉकडाउन में खाली घर रहकर बेकार हो गये।
बेकार हो गये अब भैया जब रिटायर भये दोबारा,
अब न कोई सुनता न किसी पर चलता वश हमारा।
कह डॉक्टर कविराय अब किस पर हुक्म चलावैं,
चेहरा मास्क से ढका हुआ ,
मास्क के ऊपर से झांकती दो आँखें,
आँखों में अक्सर
दिखती है एक बेबसी।
बाकि त्योरियों से भरा मस्तक।
आजकल इंसान की
बस यही पहचान रह गई है।
वो दिखता नहीं है ,
न ही कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह,
उसमे कोई गंध है न रंग।
एक अदृश्य दुश्मन की तरह,
घात लगाकर करता है आक्रमण।
एक अणु ने परमाणु शक्ति को भी ,
शक्तिविहीन बना दिया है।
नादाँ सभी जानते तो हैं ,
किन्तु मानते नहीं।
इस सूक्षम शत्रु से लड़ने के
तौर तरीके।
शत्रु जो सीमा पार से नहीं,
न ही देश के जंगलों से आता है।
वो रहता है आपके ही हाथों में,
गले लगने को तत्पर,
गले लगा तो गले पड़ने को तैयार।
माना कि जिंदगी आजकल अधूरी है,
परन्तु जो है तो ,
कभी पूरी भी होगी।
बस संयम और संतुलन चाहिए,
टैस्ट, रैस्ट और वैक्स
तीनों मिलकर लगाएंगे बेडा पार।
कोरोना से जग ने खुद को बचाना सीख लिया है ,
कलियुग में सात्विक बनकर दिखाना सीख लिया है।
सीख लिया है सबने कम में गुजारा करना ,
भौतिक इच्छाओं को दबाना सीख लिया है।
ना लगे मेले ना मिले किसी से साल भर ,
बुजुर्गों ने एकाकी जीवन बिताना सीख लिया है।
पार्टियां रहीं बंद और बंद सब सैर सपाटा ,
युवाओं ने भी खाना पकाना सीख लिया है।
ना पार्क ना कॉलेज ना सिनेमा हॉल की मस्ती,
आशिकों ने डिजिटल इश्क़ फरमाना सीख लिया है।
शादियां भी होने लगी बिन बैंड बाज़ा बारात के ,
लोगों ने अरमानों पर रोक लगाना सीख लिया है।
हॉल पंडाल पड़े रहे खाली पूरे साल, कवियों ने ,
मुफ्त में ऑनलाइन कविता सुनाना सीख लिया है।
यार दोस्त नाते रिश्तेदार सब रहे साल भर दूर,
इंसान ने खुद का खुद से नाता निभाना सीख लिया है।
कनाड़ा के एल्गोन्क़ुइन जंगल में कैम्पिंग :
सर्दियों में वेट बढ़कर पेट अक्सर निकल जाता है,
क्या करें, दावत का रोज ही अवसर मिल जाता है।