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Friday, January 29, 2021

इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है --

 

कनाड़ा के एल्गोन्क़ुइन जंगल में कैम्पिंग :



बात पुरानी है, २००९ में जब हम पहली बार कनाड़ा गए थे, अपने एक मित्र के निमंत्रण पर। तीन सप्ताह के निवास में मित्र ने हमारे सम्मान में एक तीन दिन के जंगल कैम्प का आयोजन किया था, एल्गोंक्विन फॉरेस्ट में। लगभग ६० मिलोमीटर लम्बे जंगल के बीच से होकर एक सड़क गुजरती थी जिस के किनारे जंगल में बने एक कैम्पिंग लॉज में हमारा कैम्प आयोजित किया गया था। घने जंगल के बीचोंबीच बने कैम्पिंग साइट पर हमारे टेंट लग गए।  कुल मिलाकर हम ५ परिवारों के लगभग २० लोग थे बच्चों समेत। जंगल में भालू पाए जाते थे।  इसलिए केयरटेकर की ओर से निर्देश था कि खाने का कोई भी सामान खुले में न रखा जाये क्योंकि भालू खाने की गंध से आकर्षित होते हैं और हमला कर सकते हैं। 

रात में खाना खाने के बाद और सब सामान समेटने के बाद सब लोग एक बड़े टेंट में एकत्रित हो गए और महफ़िल जम गई। कई तरह के कार्यक्रमों के बाद किसी ने सब से एक सवाल पूछा कि आप सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं। ज़ाहिर है, सबने अलग अलग जवाब दिए।  अभी बातचीत चल ही रही थी कि टेंट के पीछे जंगल की ओर से कुछ गुर्राने की आवाज़ आई। आवाज़ सुनकर सबके कान खड़े हो गए।  टेंट में चुप्पी छा गई। तभी दोबारा आवाज़ आई तो किसी ने कहा कि कहीं भालू तो नहीं आ गया। यह सुनकर सबके होश उड़ गए। सबको एक ही चिंता थी कि यदि भालू टेंट में घुस गया तो किस पर हमला करेगा। ज़ाहिर है, उस समय सबको अपनी जान की चिंता हो रही थी। 

असमंजस और भय के कुछ क्षणों के बाद आखिर एक बंदा हँसता हुआ अंदर आया और पता चला कि भालू के गुर्राने की आवाज़ वह निकाल रहा था। यह जानकर सबकी साँस में साँस आई।  और साथ ही सब ठहाका लगाकर हंस पड़े, क्योंकि अब सबको सवाल का सही जवाब मिल गया था कि इंसान सबसे ज्यादा स्वयं से प्यार करता है।     

कोरोना पेंडेमिक ने भी यही बात साबित करके दिखा दी कि इंसान को अपनी जान की चिंता सबसे पहले होती है। पिछले दस महीनों में लोगों ने यदि चिंता की है तो अपनी की है। दूसरा कोई जिन्दा है, सही सलामत है या नहीं, कोरोना संक्रमण हुआ तो नहीं, किसी ने किसी के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। बेशक सोशल मिडिया पर आपकी गतिविधियों से सबको एक दूसरे की जानकारी मिलती रहती है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर ऐसा बहुत ही कम देखने को मिला जब किसी ने फोन कर किसी का हाल पूछा हो। वो जो दम भरते थे दोस्ती का, साथ उठना बैठना, खाना पीना होता था, आज कहीं नज़र नहीं आते। ज़ाहिर है, हर कोई अपनी ही समस्याओं में इस कदर घिरा रहा कि किसी दूसरे के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला। निश्चित ही, एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है।