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Thursday, June 10, 2021

लॉक डाउन और सेवा निवृति --

अभी तो टायर्ड हुए भी नही थे,
कि हम फिर से रिटायर्ड हो गये।
रिटायर्ड होकर घर मे ही बैठे बैठे,
निष्काम रह रह कर टायर्ड हो गये।

मूड कुछ डाउन रहने लगा जब,
टाउन सब लॉक डाउन हो गए।
लोग जब घरों में निश्चल न बैठे तो,
हम अपने घर मे रनडाउन हो गये।

लॉक होकर अनलॉक होने लगे,
थे जो सपने कहीं लॉक हो गए।
बंद थे कभी वक्त की पाबंदी में,
उन बंदिशों से अनलॉक हो गये।

अब काम हैं कम और वक्त है ज्यादा,
काम भी अब वक्त से आज़ाद हो गए।
मर्ज़ी के लिए लगानी पड़ती थी अर्जी,
अब अपनी मर्ज़ी के सरताज़ हो गये।

बस्ते में बंद पड़े थे कुछ छंद और लेख,
वेंटिलेटर से ज्यों निकल जीवंत हो गये।
एक दौर जिंदगी का खत्म हुआ तो क्या,
एक नयी ज्वाला से हम प्रज्वलंत हो गये।

Tuesday, June 4, 2013

ये दफ्तर की बात है, घर में तो डांट हम खुद ही खाते हैं ---



सरकारी नौकरी में सेवा निवृति की आयु ६० वर्ष की है। हालाँकि कई बार लगा जैसे यह बढ़कर ६२ हो जाएगी लेकिन अभी दिल्ली दूर नज़र आ रही है। बहरहाल , ६० की आयु में सेवा निवृत होना ऐसा लगता है जैसे भरी ज़वानी में घर बिठा दिया गया हो। आखिर अब तो लाइफ़ एक्स्पेकटेंसी भी ७० के करीब है। अक्सर जब कोई हमारे यहाँ रिटायर होता है तो हम बड़ी धूम धाम से उसका फेयरवेल करते हैं। हमारे रहते फेयरवेल जैसे संजीदा माहौल में भी हास्य का पुट होना स्वाभाविक सा लगता है। प्रस्तुत है , इसी विषय पर पहली बार लिखी गई एक हास्य कविता :     
  
१)
एक बात हमको, बिल्कुल भी नहीं भाती है,
कि साठ की उम्र, इतनी जल्दी आ जाती है।

कहते हैं लोग सब साठ में सठियाने लगते हैं , 
पर पाण्डेय जी तो अभी तक ज़वान लगते हैं।  

सरकार ने वफादारी का ये कैसा सिला दिया है ,
भरी ज़वानी में जो परमानेंट तबादला किया है।  

जीवन भर तो करते रहे सरकार की नौकरी ,
अब करनी पड़ेगी घरेलु सरकार की चाकरी।  

जो रौब दफ्तर में अक्सर मारते थे सब पर ,
अब देखते हैं किस का हुक्म चलेगा घर पर।  

एक दिन पाण्डेय साब की पी ऐ जब ज्यादा लेट आई, 
साहब ने सबके सामने उसको जमकर डांट लगाईं।  

हमने कहा ज़नाब , क्यों बेचारी महिला को डांट लगाते हैं , 
वो बोले ये दफ्तर की बात है, घर में तो डांट हम खुद ही खाते हैं।   

सेवा निवृति के बाद साब खुद को डांट से बचा पायें , 
इसीलिए हम देते हैं सेवा निवृति पर शुभकामनायें।  


२)

इस सरकार ने रोजी दी ,
उस सरकार ने रोटी दी। 

इस रोजी ने घर गाँव छुड़ाया ,
उस रोजी ने घर बार बसाया।   

अब पाण्डेय जी को अपना फ़र्ज़ निभाना है , 
अब जीवन भर की रोटी का क़र्ज़ चुकाना है।  

पूर्ण हुई पाण्डेय जी की सरकारी जिम्मेदारी, 
अब घर परिवार और समाज की है बारी।  

आखिर जीवन के सब उपवन जब मुरझा जाते हैं , 
तब पति पत्नि ही इक दूजे का साथ निभाते हैं।  


नोट : पाण्डेय भी कोई भी हो सकते हैं लेकिन ये हालात सभी पर लागु होते हैं।