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Friday, May 19, 2017

सिगरेट और शराब में कौन ज्यादा ख़राब --

हमने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर लोगों से सिगरेट और शराब में कौन ज्यादा ख़राब विषय पर सबका जवाब माँगा था।  अधिकांश लोगों ने सिगरेट को ज्यादा ख़राब बताया , हालाँकि जैसा कि अपेक्षित था, कई महिला मित्रों ने शराब को ज्यादा ख़राब बताया।  आइये देखते हैं क्यों सिगरेट ज्यादा ख़राब है।

* लत : सिगरेट और शराब , दोनों की ही लत बहुत ख़राब होती है।  लेकिन जहाँ सिगरेट की लत बहुत आसानी से लग जाती है , वहीँ शराब की लत हज़ारों में किसी एक को लगती है। दोनों की शुरुआत अक्सर कॉलेज की दिनों में यार दोस्तों के साथ होती है।  लेकिन यदि एक बार आपने सिगरेट पीना सीख लिया , यानि इन्हेल करना आ गया , तो उसका नशा भले ही हल्का सा होता है , लेकिन ऐसी आदत पड़ जाती है कि फिर छोड़ना बहुत मुश्किल होता है। किसी ने कहा है -- it is very easy to stop smoking , and I have done it so many times .

* स्वास्थ्य प्रभाव :  सिगरेट के धुंए में सैकड़ों ऐसे केमिकल्स होते हैं जो हानिकारक होते हैं।  इसमें सबसे ज्यादा है निकोटीन जो नशे का कारण बनती है जिससे हमारे दिल की धड़कन तेज होती है , बी पी बढ़ता है और हृदय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा तार जैसे अनेक हानिकारक पदार्थ होते हैं जिनसे कैंसर जैसी भयंकर बीमारी हो सकती है।  धूम्रपान से फेफड़े ख़राब होते हैं जिससे आपको टी बी , ब्रोंकाइटिस , दमा और कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं।  धूम्रपान असमय मृत्य का दूसरा सबसे बड़ा कारण होता है। लेकिन संयत मात्रा में शराब का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता , बल्कि फायदेमंद भी हो सकता है।  विशेषकर रैड वाइन को हृदय के लिए अच्छा माना गया है। सिर्फ क्रोनिक एल्कोहोलिज्म में लीवर ख़राब होने की सम्भावना होती है।

* सामाजिक प्रभाव  : सिगरेट पीने से २५ % धुआं आस पास खड़े या बैठे लोगों को प्रभावित करता है , जिसे पैसिव स्मोकिंग कहते हैं।  लेकिन शराब में ऐसा कोई दोष नहीं है। जो लोग शराब पीकर नालियों में पड़े रहते हैं , या घर आकर पत्नी के साथ मार पीट करते हैं , या पक्के शराबी होकर घर को बर्बाद कर देते हैं , उनका अपना व्यक्तित्व ही ख़राब होता है , इसमें शराब का दोष नहीं होता।

* यह बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज में धूम्रपान को आज भी सहजता से लिया जाता है , बल्कि गांवों में तो इसे इज़्ज़त का प्रतीक माना जाता है।  जबकि शराब को हीन भावना और नीची नज़र से देखा जाता है और शराब पीने वालों को विलेन की तरह देखा जाता है। सच तो यह है कि खराबी शराब में नहीं , बल्कि पीने वाले में होती है यदि शराब पीकर वह कोई हुड़दंग करता है।

अंत में यही कहेंगे कि यदि आप धूम्रपान करते हैं तो आज ही छोड़ दीजिये , क्योंकि जैसा कि एक कार्डिओलॉजिस्ट फ्रेंड ने लिखा , एक एक सिगरेट भी स्वास्थ्य को हानि पाहुंचाती है।  और यदि शराब नहीं पीते तो मत पीजिये , लेकिन यदि पीते हैं तो संयम से ही पीयें।      


Tuesday, May 9, 2017

अब डॉक्टर्स ताइकोंडो द्वारा मुकाबला करेंगे उपद्रवी तत्वों का ---


जब हम नए नए डॉक्टर बने थे , और हमारा शारीरिक व्यायाम का शौक पुनर्जीवित हुआ , तब हमने जे एन यू में देश में पहली बार आयोजित होने वाली ताइकोंडो ट्रेनिंग में भाग लेना शुरू कर दिया। करीब दो महीने तक बन्दर की तरह हा हू करते हुए बड़ा अच्छा लगने लगा था और हम खुद को ब्रूस ली का छोटा भाई समझने लगे थे। लेकिन इस बीच वहां छात्रों की हड़ताल हो गई और हमारा ट्रेनिंग प्रोग्राम बंद हो गया। हालाँकि इस बीच देश में पहली बार दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अखिल भारतीय ताइकोंडो चैम्पियनशिप का आयोजन हुआ जिसमे हमने बतौर डॉक्टर ड्यूटी की थी।

पता चला है कि आजकल डॉक्टरों पर रोजाना होने वाले हमलों से परेशांन होकर AIIMS ने अपने रेजिडेंट डॉक्टर्स को ताइकोंडो की ट्रेनिंग देना का विचार बना लिया है। अच्छा है , और कुछ नहीं तो इससे डॉक्टर्स का स्वास्थ्य भी सही रहेगा और उनमे आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। हालाँकि यह रोगियों के रिश्तेदारों के साथ होने वाले झगड़ों से कैसे बचायेगा , यह समझ में नहीं आ रहा। क्या अब डॉक्टर्स झगड़ा करने वाले रिश्तेदारों को मार्शल आर्ट्स द्वारा धूल चटाया करेंगे !

इस समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है। सुरक्षा की दृष्टि से यदि बाउंसर्स रखे जाएँ तो बेहतर होगा , क्योंकि उनकी उपस्थिति ही उपद्रवी लोगों को हतोत्साहित करेगी। मार पीट की नौबत ही नहीं आएगी। आखिर , कानून को कोई भी अपने हाथ में नहीं ले सकता। लेकिन इसके साथ साथ जनता को भी जागरूक करना होगा। यह समझाना होगा कि डॉक्टर्स भगवान नहीं होते। वे आपका बुखार उतार सकते हैं , आपका दर्द ठीक कर सकते हैं , किसी गंभीर बीमारी से दवाओं या ऑप्रेशन द्वारा निज़ात दिला सकते हैं , लेकिन विधाता ने जितने दिन आपके लिए लिखे हैं , उन्हें नहीं बढ़ा सकते। यदि ऐसा कर सकते तो दुनिया में किसी की मृत्यु ही नहीं होती। इसलिए रोगी की मृत्यु के लिए डॉक्टर्स को दोषी मानना सर्वथा अनुचित है।

दूसरी ऒर डॉक्टर्स को भी अपने व्यवहार में सावधानी बरतनी चाहिए। हमने जो अपने सीनियर्स से सीखा , वही हम अपने जूनियर्स को सदा बताते थे कि एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए तीन गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है :
१. Availability -- यानि आप अपने मरीज़ों के लिए हमेशा उपलब्ध रहें , विशेषकर जब उन्हें आपकी आवश्यकता सबसे ज्यादा हो जैसे एमरजेंसी में।
 २. Affability --- यानि मृदु व्यवहार। यदि आप रोगी से प्यार और सहानुभूति से बात करेंगे तो उसका आधा रोग तो तभी ठीक हो जायेगा।
 ३. Ability --- यानि योग्यता। बेशक एक डॉक्टर को अपने काम में निपुण और सुशिक्षित होना चाहिए । इस व्यवसाय में लापरवाही और अज्ञानता के लिए कोई जगह नहीं।
 यदि हमारे डॉक्टर्स इन तीन बातों का ध्यान रखें तो ये रोजाना होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं स्वात: ही बंद हो जाएँगी।

Saturday, May 6, 2017

हमारे सुन्दर शहर के गंदे नाले , कितने दूषित कितने बदबू वाले ---


कितने गंदे होते हैं शहर मे बहने वाले गंदे नाले !
जाने कैसे रहते हैं नाले के पडोस मे रहने वाले !!
इक अजीब सी दुर्गंध छाई रहती है फिजाओं मे ,
जाने कौन सी गैस समाई रहती है हवाओं मे !!!.

यह बहुत ही दुःख की बात है कि एक विकासशील देश होने के बाद भी हमारे शहरों में अभी भी घरों और व्यवसायिक भवनों का का सारा सीवेज खुले नालों में बहता है। खुले बहने वाले नाले न सिर्फ देखने में एक अवांछित दृश्य प्रस्तुत करते हैं , बल्कि दुष्प्रबंधन के कारण  स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव डालते हैं।  इनसे निकलने वाली गैसें दुर्गन्ध तो फैलाती ही हैं , हमारे फेफड़ों पर दुष्प्रभाव डालकर हमें बीमार भी कर सकती हैं।  

सीवर गैसों में मुख्यतया हाइड्रोजन सल्फाइड होती है जिसके कारण सड़े अंडे जैसी दुर्गन्ध आती है। इसके अलावा अमोनिआ , मीथेन , कार्बोन, सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइड भी होते हैं लेकिन ये सभी गंधरहित होती हैं। सिर्फ अमोनिआ में तेज गंध होती है लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम होती है।

ये गैस सीवेज में ऑक्सीजन के अभाव में एनारोबिक जीवाणुओं द्वारा सीवेज में मौजूद सल्फेट अणुओं पर पानी की रिएक्शन से बनती है। यह ताजे पानी में नहीं बनती लेकिन ठहरे हुए या धीरे बहाव वाले पानी में जहाँ पानी सड़ने लगे , वहां बनती है। इसलिए नालों में जहाँ पानी के बहाव में रुकावट होती है , वहां ज्यादा बनती है।  नालों में पड़े कूड़ा करकट , पॉलीथिन की थैलियां आदि रुकावट पैदा करती हैं। यदि नाला साफ हो , उसमे कोई रुकावट न हो और नाले के किनारों पर घास और पौधों से हरियाली हो तो पानी में प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन मिल सकती है।  ऐसे में ये गैस नहीं बनती।

लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है कि एक तो सरकार ने खुले नाले बना रखे हैं , दूसरे हमारे देश की जनता भी मूर्ख और अनपढों जैसी हरकतें करती है।  सभी नालों में सिर्फ सीवेज का पानी ही नहीं बहता , बल्कि शहर का बहुत सा कूड़ा करकट , विशेषकर पॉलीथिन की थैलियां भी भरा रहता है।  इससे न सिर्फ पानी के बहाव में रुकावट पैदा होती है , बल्कि ऑक्सीजन भी पैदा नहीं हो पाती। परिणाम होता है शहर की आबो हवा में दूषित गैसों का प्रदुषण। ज़ाहिर है , जैसा कर्म हम करते हैं , वैसा ही भरते हैं।

विश्व में शायद ही कोई विकसित देश हो जहाँ नाले खुले में बहते हों।  क्या यह प्रणाली इतनी मुश्किल है कि हम इसे नहीं अपना सकते। आखिर एक शहर में कितने नाले होते हैं जिन्हे ढका जाये तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। हालाँकि इसमें नागरिकों को भी जागरूक होना पड़ेगा ताकि नालों में कोई भी बाहरी वस्तु न डाली जाये।  नालों को प्रदूषित करना भी एक दंडनीय अपराध घोषित कर देना चाहिए। तभी हम विकास की दिशा में अग्रसर हो पाएंगे।   

Saturday, April 22, 2017

नारी की सुरक्षा में ही मानव जाति की सुरक्षा है ---


यह मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ लगभग आधी शताब्दी पूर्व मानव चरण चाँद पर पड़े थे , मंगल गृह पर यान उतर चुके हैं और अंतरिक्ष में भी मनुष्य तैरकर , चलकर , उड़कर वापस धरती पर सफलतापूर्वक उतर चुका है , वहीँ दूसरी ओर आज भी हमारे देश में विवाहित महिलाओं पर न सिर्फ दहेज़ के नाम पर अत्याचार किये जा रहे हैं , बल्कि उन्हें आग में झोंक दिया जाता है। यह अमानवीय व्यवहार किसी भी तरह क्षमा के योग्य नहीं है। इन कुकृत्यों के अपराधियों की  सज़ा कारावास से बढाकर फांसी कर देना चाहिए। शायद तभी ये शैतान रुपी लालची मनुष्य इंसान बन पाएंगे।

शिक्षा : लेकिन यहाँ यह सवाल भी उठता है कि कोई लड़की क्यों वर्षों तक ससुराल वालों के अत्याचार सहन करे। इसके मूल कारण हैं लड़कियों का अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य न होना। जब तक हमारी बेटियां सुशिक्षित होकर स्वयं सक्षम न होकर दूसरों पर निर्भर रहेंगी , तब तक इस समस्या का सामाजिक समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए सबसे पहला काम है बेटियों को पढ़ाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। जब अपने बलबूते पर जीवन जीने का आत्मविश्वास होगा , तभी महिलाओं में इन शैतानों से लड़ने का साहस आ पायेगा।  

तलाक : हमारे देश में आज भी पति पत्नी का साथ सात जन्मों का माना जाता है , जबकि विकसित देशों में कभी कभी एक ही जन्म मे महिलाएं सात शादियां कर डालती हैं। इसका कारण है सहनशीलता के नाम पर अत्याचार सहते हुए साथ रहना जो एक मज़बूरी सी होती है।  लेकिन यदि महिला आर्थिक और शैक्षिक रूप से सक्षम हो तो इस आवश्यकता से अधिक सहनशीलता की आवश्यकता नहीं होती।  यदि सभी प्रयासों के बावजूद आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा तो पति पत्नी का अलग होना ही दोनों के लिए हितकारी है। निसंदेह , तलाक के बाद सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव बच्चों पर पड़ता है और अक्सर बच्चों के कारण पति पत्नी तलाक के बारे में नहीं सोच पाते , लेकिन बच्चों को प्रतिदिन के पति पत्नी के झगड़ों का सामना करना पड़े , इससे बेहतर तो दोनों का अलग होना ही है।
समाज को भी तलाकशुदा पति पत्नी की ओर अपना रवैया बदलना होगा।  आखिर यह दो इंसानों के बीच का आपस का मामला है जिसमे किसी भी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप सही नहीं।

कानून और समाज  : शादियों में दहेज़ मांगना तो एक अपराध होना ही चाहिए , साथ ही दहेज़ देने को भी हतोत्साहित करना चाहिए।  अक्सर पैसे वाले लोग अपनी शान शौकत दिखाने के लिए शादियों में करोड़ों रूपये तक खर्च कर डालते हैं , जो अन्य व्यक्तियों के लिए एक गलत सन्देश पहुंचाता है। लोगों को इस दिखावे और झूठी शान का मोह छोड़ना होगा।  लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता , इसलिए सरकार को ही ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसमे शादियों पर होने वाले खर्च की सीमा निर्धारित हो।  हालाँकि यह काम सामाजिक संस्थायें बेहतर कर सकती हैं। सादगी और सरलता में जो बात है वह बनावटी चमक धमक में कहाँ !

किसी भी रूढ़िवादी परम्परा को बदलने में समय लगता है।  लेकिन समय के साथ साथ परिवर्तन भी अवश्यम्भावी है। बस हम थोड़ा सा प्रयास सक्रीय होकर करें तो शायद हमारे आपके समय में ही यह सामाजिक परिवर्तन आ सकता है जो मानव जाति के हित में होगा। नारी की सुरक्षा में ही मानव जाति की सुरक्षा है।  

   

Saturday, April 15, 2017

बाघ जो देखन मैं चला, बाघ मिला ना कोय ---

बाघ जो देखन मैं चला, बाघ मिला ना कोय,
जो तुमको देखा प्रिये , याद आया न कोय ।

जिन लोगों के पास फालतु पैसा होता है , वो शादी की सालगिरह पर विदेश जाते हैं या जश्न मनाने कम से कम फाइव स्टार होटल में जाते हैं । जिनके पास काम ज्यादा और पैसा कम होता है , उनके लिए सालगिरह भी बस एक और दिन ही होता है।  हमारे पास फालतु पैसा तो कभी नही रहा लेकिन वक्त की कमी कभी नहीं रही।  इसलिए हम हर साल सालगिरह पर बाहर ज़रूर जाते हैं। लेकिन लगभग पिछले दस सालों से हम सिर्फ जंगलों में ही जाते हैं। हालाँकि इसका वानप्रस्थ आश्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।

इस बार भी जाना हुआ जिम कॉर्बेट के जंगल में बसा एक गाँव मरचुला जहाँ बना है स्टर्लिंग रिजॉर्ट्स।


 उत्तराखंड के रामनगर शहर से करीब ३२ किलोमीटर की दूरी पर चारों ओर हरे भरे पहाड़ों से घिरा यह रिजॉर्ट दो साल पहले ही बना है और हम तभी से यहाँ जाने का कार्यक्रम बना रहे थे। इसके ठीक सामने बहती है रामगंगा नदी जिसका सम्बन्ध रामायण काल से जुड़ा है। सुना है यहीं कहीं कभी सीता मैया भी रही थीं। शहर से दूर एकदम शांत , सुन्दर , स्वच्छ वातावरण लेकिन सभी सुविधाओं से परिपूर्ण यह स्थान मन को मोह लेता है।  यहाँ गाड़ियों का शोर और प्रदुषण नहीं होता बल्कि सुबह शाम चिड़ियों की चहचाहट , रंग बिरंगी चिड़ियाँ जो शहर में कभी देखने को नहीं मिलती , नदी के बहते पानी की कर्णप्रिय कलकल करती आवाज़ और एक ठहरा हुआ सा समय , मानो जिंदगी स्थिर सी हो गई हो।  सब मिलकर तनावग्रस्त तन और मन को पूर्ण रूप से विषमुक्त कर देते हैं। सिर्फ दो दिन का वास ही मन को हर्ष और उल्लास से भर देता है।  




मरचुला गाँव , यहाँ तक आने के लिए रामगंगा नदी पर एक पुल बनाया गया है।  पुल से बलखाती नदी का एक दृश्य।    




मरचुला गाँव की हरी भरी वादियों के बीच बहती नदी किनारे यह एक नंगी पहाड़ी भी दिखी जिससे कई बार भूस्खलन हुआ लगता है।  इसके ठीक नीचे बने एक रिजॉर्ट को देखकर लगा मानो बहुत खतरनाक जगह है।  लेकिन बताया गया कि यह ज़रा हटकर है , इसलिए रिजॉर्ट को कोई खतरा नहीं है।




गाँव की सड़क पर बनी यह दुकान देखने में शराब की दुकान जैसी लगी।  लेकिन पास जाकर देखा तो पाया कि कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों को बड़े करीने से सजाया गया था जिससे यह एक बार जैसी दिख रही थी। यहाँ बैठकर चाय पीना भी एक सुखद अहसास था।  




स्टर्लिंग रिजॉर्ट के सामने सड़क से नीचे उतरकर करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर नदी का पानी कलकल करता बहता नज़र आता है। यहाँ नदी किनारे कई और रिजॉर्ट्स भी बने हैं।  हालाँकि यह क्षेत्र अभी विकसित हो रहा है।  इसलिए एक गाँव जैसा मह्सूस होता है।




चारों ओर पहाड़ और बीच में बहती नदी हो । नदी का किनारा हो , अपना कोई पास हो , और दिन कोई खास हो , तो वातावरण स्वयं ही रोमांचित हो जाता है।




नदी का कलकल करता बहता पानी , शांत वातावरण में जिसे संगीत सा घोल देता है।




सभी सुविधाओं से सुसज्जित इस रिजॉर्ट में स्विमिंग पूल भी है , जिससे यहाँ की खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं।

यदि संभव हो तो शादी की सालगिरह पर सभी को एक दो दिन के लिए घर से बाहर कहीं दूर निकल जाना चाहिए। शहर के कंक्रीट जंगल से दूर किसी प्राकृतिक जंगल में रहकर आप गुजरे साल के सारे गिले शिकवे ( यदि कोई हों तो ) भूल जायेंगे और अगले एक साल तक के लिए तन मन में एक मीठा मीठा सा अहसास भर जायेगा जब आप होंगे , आपकी खास होगी और तीसरा कोई पास नहीं होगा।

Monday, April 10, 2017

आराम करो , आराम करो : एक बिलकुल नया प्रयोग ---



एक मित्र बोले भैया आजकल किस चक्कर में रहते हो ,
इस महंगाई में बिना जॉब के कैसे गुजर बसर करते हो !
क्या रखा है बेवज़ह घूमने में, कुछ तो काम काज करो,
कब तक खाली घर बैठोगे, कुछ तो शर्म लिहाज़ करो।
हम बोले तुमने भी किया काम ताउम्र , अब तो पूर्ण विराम करो ,
इस भाग दौड़ में क्या रखा है , आराम करो , आराम करो।

आराम स्वस्थता की कुंजी , इससे ना थकावट होती है ,
आराम उत्कंठा की एक दवा , तन मन का तनाव खोती है।
आराम शब्द में राम छिपा, जो पुरुषों में उत्तम होता है,
आराम आराम रटने से ही तो प्रभु राम का दर्शन होता है।
इसलिए मैं कहता हूँ , तुम मत हमको यूँ बदनाम करो ,
पल दो पल के यौवन जीवन, आराम करो आराम करो।

यदि कुछ करना ही है तो स्वस्थ रहने की बात करो ,
सुबह शाम पार्क में जाकर , लम्बी लम्बी वॉक करो।
क्या रखा काम धाम में , जो मज़ा है जिम जाने में ,
जो वेट्स उठाने में लुत्फ़ है, वो कहाँ थैला उठाने में।
मुझसे पूछो मैं बतलाऊँ, है मज़ा सुस्त कहलाने में ,
काम काज में क्या रखा, जो रखा खिसक जाने में।


मैं यही सोचकर घर से बाहर, कम ही जाया करता हूँ ,
जो कामकाज़ी जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ। 
दफ्तरों की छुट्टी से पहले, बाहर जाया करता हूँ,
शाम अँधेरा होने पर ही, घर वापस आया करता हूँ।
मेरी वॉल पर लिखा हुआ, जो सच्चे योगी होते हैं ,
वे कम से कम बारह घंटे तो, फेसबुक के भोगी होते हैं।

अब वार्ड ना पी डी की चिंता, ये सोचकर आनंद आता है ,
रोग, रोगी , और दवा से , मन स्वच्छंद हो जाता है।
सुबह से शाम सारा समय , जब अपना नज़र आता है ,
तो सच कहता हूँ जीने का जैसे , मज़ा निखर आता है।
लेकर लैप में लैपटॉप मैं फिर फेसबुक की ओर मुड़ जाता हूँ ,
कविता , रचना , गीत , नज़्म , और नगमा से जुड़ जाता हूँ।

तुम को भी मैं सुखी जीवन का ये राज़ बता देता हूँ ,
एक दिन में बस एक काम करो, ये सीख सदा देता हूँ।
मैं आरामी हूँ मुझको तो बस, आराम में जोक्स सूझते हैं ,
उनको भी तो चैन कहाँ जो सोये बिना ही जाग उठते हैं।
इसीलिए मैं कहता हूँ तुम सुनो, मेरी तरह से काम करो , 
ये मोह माया का बंधन छोड़ो, और आराम करो आराम करो। 

Wednesday, March 15, 2017

इस शहर के लोग ---


लोग पैट पालने का शौक तो पाल लिया करते हैं ,
लेकिन पैट का पेट फुटपाथ पर साफ़ कराते हैं जिस पर खुद चला करते हैं।
फिर कहीं पैर में पैट का पेट त्याग न लग जाये ,
इस डर से इस शहर में लोग सर उठाकर नहीं , सर झुकाकर चला करते हैं।

लोग गऊ को गौ माता तो कह कर बुलाया करते हैं ,
लेकिन कूड़ा कचरा खाने को उन्हें सडकों पर आवारा छोड़ दिया करते हैं।
फिर कहीं पावन गोबर में गाड़ी के टायर न सन्न जाएँ ,
इस डर से इस शहर में लोग सडकों पर गाड़ी जिग जैग चलाया करते हैं।

लोग जंक फ़ूड खाने का शौक तो रख लिया करते हैं ,
लेकिन प्लास्टिक के रैपर और खाली बोतल सड़क पर ही फेंक दिया करते हैं।
फिर गंदगी से कहीं महामारी न फ़ैल जाये ,
इस डर से नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को ही सारा दोष दिया करते हैं।

लोग बड़ी बड़ी गाड़ियां तो सडकों पर चलाया करते हैं ,
लेकिन बेतरतीब चलाते ट्रैफिक के नियमों का पालन नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं ज़रा सा छूने पर इज़्ज़त न चली जाये ,
इस डर से इस शहर के लोग रोड रेज़ में मरने मारने पर उतर आया करते हैं।

लोग बड़े बड़े मंचों पर बड़ी बड़ी बातें तो बनाया करते हैं ,
लेकिन मुसीबत में फंसे किसी मुसीबत के मारे की मदद नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्कर में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग अक्सर नज़र बचाकर निकल जाया करते हैं।  

लोग बेटी बचाओ आंदोलन तो चलाया करते हैं ,
लेकिन बेटे की चाहत में अजन्मे बच्चे का लिंग परिक्षण कराया करते हैं।
फिर कहीं स्वास्थ्य विभाग की नज़र में न आ जायें ,
इस डर से इस शहर के लोग चोरी चुपके से गर्भपात भी कराया करते हैं।

इस शहर के लोग मौज मस्ती से जीया करते हैं ,
लेकिन इनकम टैक्स , सेल्स टैक्स और वैट की चोरी किया करते हैं।
फिर कहीं इनकम टैक्स विभाग की जाँच में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग बात बात पर रिश्वत लिया दिया करते हैं।