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Wednesday, August 11, 2010

कभी कभी सोचता हूँ ---क्या पाया डॉक्टर बनकर----जन्मदिन विशेष ---

मेडिकल कॉलिज का पहला दिन गेट पर ही सीनियर्स ने पकड़ लिया एक बोला --डॉक्टर क्यों बनना चाहता है ? जी , देश के मरीजों की सेवा करना चाहता हूँ एक जोरदार ठहाका इसे देखो ये मरीजों की सेवा करना चाहता है हा हा हा !

आज सोचता हूँ कि बचपन या लड़कपन भी कितना नादान होता है आज व्यवसायिकता और उपभोगता के इस दौर में , भला कौन देश की सेवा कर रहा है

डॉक्टर्स प्राइवेट सेक्टर में हों या सरकारी , या फिर निजी प्रैक्टिस ---जिसे देखो पैसा कमाने की होड़ में व्यस्त है

दिल्ली का मानसून उमस भरे दिन सुबह सुबह भी उमस इतनी कि हिलते ही पसीना आने लगता है अस्पताल पहुँचते ही नज़र आता है ये कॉरिडोर


तूफ़ान से पहले और तूफ़ान के बाद की शांति

इस कॉरिडोर से होकर प्रतिदिन ६००० मरीज़ और उनके इतने ही रिश्तेदार , इलाज़ के लिए इधर से उधर होते हैं

कॉरिडोर मरीजों से खचा खच रा हुआ मरीजों के पसीने की दुर्गन्ध , अस्पताल की हवा में मिलकर एक अजीब सी गंध छोडती हुई-- खों खों करते रोगी ---- कोई थूक रहा है ---कोई बच्चे को कोने में बिठाकर सू सू करा रहा है एक बुढिया को उसका बेटा हाथो में उठाकर हड्डी रोग विभाग ले जा रहा है एक पढ़ा लिखा व्यक्ति स्ट्रेचर के लिए मारा मारा फिर रहा है

मैं भीड़ में से रास्ता बनाने की कोशिश करता हुआ -- एक हाथ सामने लोगों को हटाते हुए --दूसरा हाथ पीछे पेंट की पॉकेट पर --जेब कतरों से पर्स को बचाते हुए --किसी तरह सांस रोककर , इस गलियारे से निकल पाता हूँ आखिर अपने कमरे में पहुँच कर ही साँस लेता हूँ

सेंट्रली एयर कंडीशंड रूम में आकर थोड़ी राहत मिलती है

फिर शुरू होता है मरीजों का सिलसिला --जितने मरीज़ अपनी स्पेशलिटी के देखता हूँ , उनसे ज्यादा दूसरों के देखे हुए देखता हूँ पी डी इंचाज हूँ --किसी की कोई भी शिकायत हो , मेरे पास ही आता है , निवारण के लिए


कभी कभी सोचता हूँ ---क्या पाया डॉक्टर बनकर

किसी एम् एन सी में काम करने वाला एक ग्रेजुअट भी कितने साफ़ वातावरण में काम करता है

सूटेड बूटेड -- सेंटेड -- लंच मीटिंग --डिनर मीटिंग --कभी फाइव स्टार होटल में --कभी विदेश में बाहर के संसार में कितना ग्लैमर है --- चमक धमक है ---- ऐशो आराम है

यहाँ तो पढ़े लिखे साफ सुथरे व्यक्ति से मिले हुए मुद्दतें हो जाती हैं

यहाँ सरकारी अस्पताल में वही आते हैं , जो गरीबी रेखा के पड़ोसी हैं
उनका दुःख दर्द सुनकर किसी का भी कलेजा हिल सकता है



बाहर बारिस हो रही है आज थोड़ी फुर्सत लगती है यादों का एक कारवां सा उमड़ने लगता है , मन में

याद आता है वो बुजुर्ग जो रिक्शा चलाता था , एक दिन किसी ने रिक्शा ही चुरा लिया मालिक ३००० मांग रहा था दमे का रोगी , भला कहाँ से लाता एस्थलिन इन्हेलर के लिए ही पैसे नहीं थे उसके पास उसे मिल गया , अब हर महीने आता है , साइन कराने के लिए

एक ८० वर्ष का बुजुर्ग -- उन्हें पता चला कि डॉक्टर साहब लाफ्टर शो में जीत कर आये हैं -- २० चुटकले लिख कर ले आये --पचास साल पुराने --साथ में एक पेन भी गिफ्ट---कार्डियोलोजिस्ट को दिखाना था अभी दो वर्ष से नहीं आये हैं , कहीं --- ओह नो

एक बुजुर्ग , ६० -६५ के लेकिन हलके फुल्के --वज़न इंडियन रेफरेंस विमेन से भी कम लेकिन बड़े फुर्तीले साइन कराने के लिए आते --इतना आशीर्वाद देकर जाते कि दिल खुश हो जाता कई महीने से दिखाई नहीं दिए तो चिंता सी हुई लेकिन फिर एक दिन आये --अच्छा लगा , कुशल पाकर

एक रिटायर्ड सज्जन --हमेशा कोई कोई , किसी किसी की शिकायत लेकर आते अक्सर झगडा कर के ही जाते शायद घर से नाखुश थे बच्चे परवाह नहीं करते --बीबी थी नहीं प्रोब्लम तो समझ आती लेकिन क्या कर सकते थे एक बार सचमुच डांटना ही पड़ा --तब से अब तक नहीं आये हैं पहले दिख जाते थे , अब कई महीने से दिखाई भी नहीं दिए --- वक्त किसी के लिए कहाँ रुकता है

एक अधेड़ उम्र की महिला---विधवा -- डायबिटिक --उसका ४० साल का मेंटली रिटारडेड लड़का --वह भी डायबिटिक ---दवाएं सारी मिलती नहीं --- उन्हें देखकर धरती पर ही नर्क का अहसास होता ---मन मसोसकर रह जाना पड़ता ---भगवान ऐसी जिंदगी किसी को ने दे ---अभी डेढ़-दो साल से नज़र नहीं आई शायद मुक्ति ---?

अक्सर एस्थमा के रोगी आते हैं --इन्हेलर लेने के लिए नियमानुसार मिल नहीं सकता था बड़ा दुःख होता था देखकर कि सांस नहीं रहा लेकिन हम होते हुए भी दे नहीं सकते

बड़ी कोशिशों के बाद , आखिर कामयाबी मिली ---अब सबको उपलब्ध है

बड़ी
संतुष्टि मिलती है चेहरे के भाव देखकर --जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो

जी हाँ , सरकारी अस्पताल में रोगी को दवा मिल जाये तो खज़ाना ही मिल जाता है

उनके चेहरे पर संतोष और राहत के मिले जुले भाव देखकर, हमें भी सुकून का अनुभव होता है

कहते हैं पैसा तो हाथ का मैल है निश्चित ही दो रोटी लायक तो सरकार हमें देती ही है

अब इस उम्र में और कितनी रोटियां चाहिए खाने को

परन्तु जाने क्यों , यह बात सबको समझ नहीं आती

सामने घड़ी तीन का समय दिखा रही है मीटिंग का समय हो गया है
दीवार पर हिप्पोक्रेटिक ओथ फ्रेम में ज़ड़ी लगी है

मैं एक नज़र उस पर डालता हूँ --और मीटिंग के लिए निकल पड़ता हूँ --अस्पताल की तीसरी मंजिल की ओर

Sunday, August 8, 2010

अंडमान निकोबार की सैर ---

बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीप समूह , यूँ तो दूसरी सदी से पहचान में है । लेकिन यहाँ रिहायस का प्रथम प्रयास किया अंग्रेजों ने १७८९ में , जिन्होंने वर्तमान के पोर्ट ब्लेयर की जगह अपनी छांवनी स्थापित की । तद्पश्चात , १८५८ में उन्होंने यहाँ कैदियों के लिए जेल की स्थापना की , वाइपर आईलेंड पर ।

वाइपर आईलेंड पर आज भी वह फांसी का फंदा लटकता नज़र आता है , जहाँ राजनीतिक कैदियों को फंसी दी जाती थी । यह पोर्ट ब्लेयर से १५ मिनट की दूरी पर है , बोट द्वारा ।

बाद में सन १८९६ में अंग्रेजों ने सेल्युलर जेल की नीव रखी , जो १९०६ में बनकर पूरी हुई

पोर्ट ब्लेयर चेन्नई से समुद्र के रास्ते ११९० किलोमीटर दूर है , जबकि हवाई ज़हाज़ से यही दूरी १३३० किलोमीटर है । कोलकता से भी जाया जा सकता है जिसकी दूरी क्रमश: १२५५ और १३०३ किलोमीटर है।

आइये आपको सैर कराते हैं यहाँ के कुछ द्वीपों की ।

रॉस आईलेंड :

इस द्वीप पर अंग्रेजों ने अपना शासन स्थापित कर पूरे द्वीप समूह की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी । लेकिन १९४२ में यहाँ जापानियों ने कब्ज़ा कर लिया । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे यहाँ साढ़े तीन साल तक रहे ।


रॉस आईलेंड अंडमान द्वीप समूह का सबसे छोटा द्वीप है जिसका क्षेत्रफल मात्र . किलोमीटर है ।

रॉस आईलेंड में पुरानी गिरिजाघर जो अब खँडहर बन चुकी है ।




रॉस आईलेंड का किनारा



द्वीप के पीछे का एक दृश्य--यहाँ समुद्र का पानी एकदम नीला और स्वच्छ नज़र आता है ।

नोर्थ बे आईलेंड : यह भी एक छोटा सा द्वीप है जो पोर्ट ब्लेयर के काफी नज़दीक है । यहाँ कोरल्स देखने के लिए स्नौरकलिंग कराई जाती है । --दूर दिखाई दे रहा है --लाईट हाउस


लाईट हाउस --आते जाते समुद्री ज़हाज़ों को दिशा निर्देशन करने के लिए बनाया गया था । काफी ऊंचे टावर पर रौशनी जलाकर इशारा किया जाता था ।

स्नौरकलिंग की तैयारी---


१९०६ में बन कर तैयार हुई सेल्युलर जेल में कैदी रखे जाते थे जिनमे राजनीतिक और सेनाओं के विरोधी सिपाही होते थे । इस जेल में गोलाई में बनी जेल की कोठरियों की कतारें हैं । ये तीन मंजिल की हैं ।

सेल्युलर ज़ेल का एक दृश्य----

दूसरी मंजिल की सबसे दायीं वाली कोठरी में वीर सावरकर को रखा गया था । इसके ठीक नीचे दायीं ओर फांसीघर था जहाँ कैदियों को फांसी लगाईं जाती थी । फांसी का तख्ता और फंदा आज भी वहां मौजूद है अपने भयानक भूतकाल का हाल बयाँ करते हुए ।

सेल्युलर ज़ेल की म्यूजियम में --एक भयानक दृश्य



पोर्ट ब्लेयर से करीब ३८ किलोमीटर दूर बड़ा ही खूबसूरत द्वीप है --हैवलॉक आईलेंड

हैवलॉक आईलेंड की ओर --काला पानी --सचमुच काला दिखता हुआ ।





हैवलॉक पर खेती बाड़ी होते हुए देखकर हैरानी हुई ।



हैवलॉक आईलेंड की राधानगर बीच --सचमुच बहुत खूबसूरत है ।



यहाँ एक और बीच है , जो प्राइवेट बीच है ।

विजय नगर बीच । यह एक रिजोर्ट की प्राइवेट बीच है । दूर तक फैला पानी जैसे आमंत्रित करता है , पानी में घुसने के लिए ।

पोर्ट ब्लेयर की सैर कर एक अजीब सा रोमांच महसूस होता है । कुछ इतिहास का दर्द , कुछ मुख्य भूमि से इतना दूर होने का अहसास । बीच समुद्र में बसा यह शहर अंडमान निकोबार की राजधानी है । आज यहाँ मुख्य रूप से पूर्वी पकिस्तान से आये बंगाली और सेना से सेवा निवृत सेनानियों को बसाया गया है ।

लेकिन यहाँ घूमते हुए आपको बिल्कुल भी अहसास नहीं होगा कि आप अपने घर से हजारों मील दूर पानी के बीच हैं । देश के हर कोने से आये लोग आपको यहाँ रहते हुए नज़र आयेंगे एक परिवार की तरह ।

Friday, August 6, 2010

हम वो हैं जो हम है नहीं ---

हम

हम
वो हैं,
जो
खेल
करवा सकते हैं,
खेल
कर सकते हैं,
पर
खेल सकते नहीं

दे सकते हैं
पर
मेडल,
ले सकते नहीं


बन सकते हैं
किरायेदार,
पर
खरीदार
हो सकते नहीं


हम
वो हैं,
जो
हम हैं नहीं,
और
हो सकते नहीं

Monday, August 2, 2010

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे---ये भी खूब रही

दिल्ली का ट्रैफिक । साठ लाख वाहन । जिंदगी की भाग दौड़ । सुबह सुबह सब भागने में व्यस्त। ऐसे में क्या क्या दृश्य देखने को मिलते हैं । ज़रा आप भी देखिये ।


द्रश्य १ :

एक चौराहे पर एक गाड़ी वाले ने तीन स्कूटर्स , चार मोटर साईकल्स , दो साईकल रिक्शा और पांच पैदल आदमियों को टक्कर मार दी ।

गाड़ी वाला ग्रीन लाईट ( हरी बत्ती ) जम्प कर रहा था ।

दृश्य २ :

एक चौराहे पर एक युवक ने रैड लाईट जम्प की और ग्रीन लाईट पर दूसरी ओर से आती एक महिला की गाड़ी ठोक दी ।
पुलिस दोनों को पकड़ कर थाने ले गई । थाने में युवक के नेता पिता ने महिला को डांट पिलाई --मैडम आपको दिखता नहीं है । जब वो रैड लाईट जम्प कर रहा था , तो आप रुकी क्यों नहीं ।

दृश्य ३ :

अमेरिका , कनाडा जैसे देशों में लाइसेंस बड़ी मुश्किल से मिलता है । नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है ।
ऐसे देश का नियम पालक लाइसेंस धारी पूर्वी दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी एक किलोमीटर भी नहीं चला सकता , यह मेरा दावा है ।

दृश्य ४ :

चौराहे पर एक स्कूटर वाले ने एक भिखारी को एक रुपया भीख में दिया । भिखारी बिगड़ कर बोला --बाबू इसे आप ही रखो । मेरा दिवालिया निकलवाओगे क्या ।

अंत में :

एक बूढ़े भिखारी से मैंने कहा , बाबा
आज दायाँ , कल तो बायाँ हाथ बढाया था ।
भिखारी बोला बेटा , बूढा हो गया हूँ
अब याद नहीं रहता , कल किस हाथ में पलस्तर चढ़ाया था ।

कहिये , कैसी रही ।