top hindi blogs
Showing posts with label सतीश सक्सेना. Show all posts
Showing posts with label सतीश सक्सेना. Show all posts

Saturday, May 19, 2012

हम बुलबुल मस्त बहारों की , हम मस्त कलंदर धरती के --मेरे गीत ( सतीश सक्सेना )



श्री सतीश सक्सेना जी की प्रथम पुस्तक -- मेरे गीत -- प्रकाशित होकर हमारे बीच आ चुकी है । ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित १२२ प्रष्ठों की इस पुस्तक में सतीश जी के ५८ गीत शामिल किये गए हैं । हालाँकि अधिकतर गीत उनके ब्लॉग पर पढ़े जा चुके हैं , कुछ गीत ऐसे भी हैं जो या तो पहली बार सामने आए हैं या पिछले कुछ सालों में नहीं पढ़े गए ।


श्री सतीश सक्सेना जी एक बेहद सुलझे हुए व्यक्तित्त्व के स्वामी हैं जिनके दिल में जिंदगी से जुड़ी मानवीय संवेदनाएं कूट कूट कर भरी हैं। यह उनके गीतों में साफ झलकता है । बचपन में ढाई वर्ष की अबोध आयु में माँ को खोकर, पिता के साये से भी उन्हें बचपन में ही वंचित होना पड़ा । बड़ी बहन ने पाला पोसा , पढाया और अपने पैरों पर खड़ा होने में सहायता की । पूर्णतय: अपने बल बूते पर जीवन की खुशियाँ हासिल कर आज वो एक लविंग और केयरिंग पति होने के साथ साथ एक आदर्श पिता भी हैं जिन्होंने अपने बच्चों में एक अच्छा इन्सान बनने के सारे गुण विकसित करने का भरपूर प्रयास किया है । लेकिन जो बात सबसे ज्यादा प्रभावित करती है , वह है पुत्रवधू के प्रति उनके विचार । उनका कहना है , जब हम अपनी बेटी के लिए सभी सुखों की कामना करते हुए उसके ससुराल वालों से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं, तो क्यों न अपनी बहु को भी बेटी का दर्ज़ा देते हुए उसे उतना ही प्यार और सम्मान दें जितना अपनी स्वयं की बेटी को देते हैं ।
श्री सक्सेना जी के यही विचार उनकी कविताओं और गीतों में पढने को मिलेंगे इस पुस्तक में ।

मेरे गीत :

सक्सेना जी के गीतों की एक विशेष शैली है । या यूँ कहिये सभी प्रकार की शैलियों से अलग उन्होंने एक अलग ही पहचान बनाई है ।
बचपन में माँ को खोकर , माँ के प्यार से वंचित रहकर जो भाव मन में आते हैं, उन्हें वही समझ सकता है जिस पर बीती हो

हम जी न सकेंगे दुनिया में
मां जन्मे कोख तुम्हारी से
जो दूध पिलाया बचपन में
यह शक्ति उसी से पाई है
जबसे तेरा आँचल छूटा , हम हँसना अम्मा भूल गए ,
हम अब भी आंसूं भरे , तुझे टकटकी लगाए बैठे हैं ।

मात पिता का प्यार और अभाव उनकी कई रचनाओं में समाया हुआ है ।

पिता के बारे में लिखते हैं --

पिता पुत्र का रिश्ता तुमको
कैसे शब्दों में समझाउं !
कुछ रिश्ते अहसासों के हैं
समझाने की बात नहीं !
जीवन और रक्त का नाता , नहीं बनाने से बनता है
यह तो विधि की देन पुत्र , समझाने की है बात नहीं ।

एक पिता की सबसे बड़ी कमजोरी होती है , बेटीसतीश जी ने बेटी से बिछुड़ने के दर्द को बहुत खूबसूरती से पिरोया है इस गीत में --

पहले घर के हर कोने में
एक गुडिया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका
को संग खिलाया करती थी
जबसे गुड्डे संग विदा हुई , हम ठगे हुए से बैठे हैं ,
कव्वे की बोली सुनने को , हम कान लगाए बैठे हैं ।

लेकिन बेटी को पिता द्वारा जो नसीहतें दी जाती हैं , उनका भी बेहद उपयोगी और सार्थक वर्णन है यहाँ -- पिता का ख़त पुत्री को -- इस गीत में

पत्नी /प्रेयसी पर लिखने का अंदाज़ तो रूमानी होना अपेक्षित ही था . सतीश जी का यह रूप भी बहुत निखर कर सामने आया है कुछ ऐसे ---

प्रथम प्यार का प्रथम पत्र है ,
लिखता , निज मृगनयनी को ।
उमड़ रहे जो , भाव हृदय में
अर्पित , प्रणय संगिनी को
इस आशा के साथ, कि समझें भाषा प्रेमालाप की
प्रेयसी पहली बार लिख रहा , चिट्ठी तुमको प्यार की ।

पुस्तक के आखिरी पन्नों में शायद उनकी युवावस्था में लिखी रचनाएँ हैं , हालाँकि अभी भी किसी युवा से कम नहीं हैं . लेकिन शादी से पहले और शादी के बाद की युवावस्था में थोडा अंतर होना तो स्वाभाविक ही है . अल्हड़ ज़वानी की बातें कुछ इस प्रकार की हैं --

सोचता था बचपन से यार
बड़ा जल्दी कर दे भगवान
मगर अब बीत गए दस साल
ज़वानी बीती जाए यार !
किसी नारी के संग सिनेमा जाने का दिल करता है ।

सतीश जी ने आतंकवाद , भ्रष्ट और जालिमों पर भी खूब तीर चलाये हैं --

तुम मासूमों का खून बहा
खुद को शहीद कहलाते हो
और मार नमाज़ी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो
जब मौत तुम्हारी आएगी , तब बात शहादत की छोडो
मय्यत में कन्धा देने को , अब्बू तक पास न आएंगे ।

कुल मिलाकर यह पुस्तक आपको एक अति संवेदनशील हृदय स्वामी लेखक के मनोभावों के दर्शन करायेगी । जिंदगी के उतार चढाव और संघर्ष से गुजरकर जब आप एक खास मुकाम तक पहुंचते हैं , तब जीवन मूल्यों का सही आंकलन कर पाते हैं । जो इस संघर्ष से बचे रहते हैं , वे जिंदगी की हकीकतों से सदा दूर ही रहते हैं ।

पुस्तक देखने में थोड़ी मोटी लगती हैलेकिन यह उसमे प्रयोग किये गए उत्तम कागज़ की वज़ह से हैएक बार पढने लगेंगे तो आप भी ख़त्म कर के ही दम लेंगे

(कीमत मात्र १९९/-)

यह एक छोटा सा परिचय है -- मेरे गीत -- की समीक्षा लिखना हमारे बस की बात नहींइसके लिए इंतजार करना पड़ेगा एक अच्छे साहित्यकार की समीक्षा का


Thursday, July 28, 2011

कुछ लोग होते हैं जिनसे दिल से मिलने का दिल करता है --

एक कार्यक्रम में शामिल होने गए तो नाम पता पूछने के बाद एक आयोजक युवक ने पूछा --सर आपकी उम्र क्या लिखूं । मैंने कहा भैया , यदि लिखना ज़रूरी है तो लिख लो २५ +। यह सुनकर चौंककर उसकी आँखें ऐसे फ़ैल गई जैसी हाइपरथायरायडिज्म के रोगी की होती हैं । बोला --सर आपको नहीं लगता कि आप कुछ उल्टा बोल रहे हैं । मैंने कहा भैया मैं बिल्कुल सुलटा बोल रहा हूँ । मैंने अभी हाल ही में अपने जन्मदिन की रजत जयंती ( सिल्वर जुबली ) मनाई है ,----- दूसरी बार । अब पहली हो या दूसरी , सिल्वर जुबली तो पच्चीस साल में ही होती है

पिछले दिनों दो बार सिल्वर जुबली मना चुके ऐसे ही कुछ नौज़वानों से मुलाकात का अवसर मिला जब श्री अरविंद मिश्र जी का दिल्ली आगमन हुआ । अरविन्द जी दो तीन बार दिल्ली आये भी तो मुलाकात न हो सकी । इसलिए इस बार जब पता चला कि उनका तीन दिन रुकने का कार्यक्रम है तो हमने भी मिलने का कार्यक्रम बना ही लिया ।

सतीश सक्सेना जी से बात हुई और मिलने का दिन , समय और स्थान निश्चित हो गया । तय हुआ कि ब्लोगर मिलन न होकर व्यक्तिगत रूप से मिलना करने के लिए बस दोनों ही चलेंगे ।

और हम पहुँच गए यू पी भवन जहाँ ४० साल से दिल्ली रहते हुए भी हम कभी नहीं गए थे ।
आखिर हम भी वी आई पी लोगों के अस्थायी निवास पर पहुँच गए
अरविंद जी से पहली बार मिलना हो रहा था हालाँकि ब्लॉग पर तो अक्सर मिलते ही रहते हैं । लेकिन वीरुभाई के नाम से ब्लॉग लिखने वाले श्री वीरेंदर शर्मा जी से तो कभी ब्लॉग पर भी मुलाकात नहीं हुई थी ।



















यू पी भवन की लॉबी में दोनों से प्रथम परिचय हुआ । परिचय के दौरान वीरुभाई ने अनायास ही वही सवाल किया जो अक्सर मुझसे किया जाता है --टी एस से क्या बनता है ?
चिर परिचित सवाल सुनकर हमें भी वही घटना याद आ गई जिसका जिक्र यहाँ है ।
लेकिन हम बस मुस्करा कर रह गए क्योंकि तब तक मन में एक विचार आ चुका था --बताने की बजाय दिखाने का ।



















और हम सब तैयार हो गए , पिकनिक पर जाने के लिए ।

पहला पड़ाव था --इण्डिया गेट
वहां तक पहुँचने में ड्राइव करते हुए बातों में मशगूल होते हुए सतीश जी ने दो बार यातायात के नियमों का उल्लंघन किया ।
लेकिन ब्लोगिरी का प्रभाव देखिये कि दोनों बार चार चार ब्लोगर्स को एक साथ देखकर बेचारे पुलिस वाले की हिम्मत ही नहीं पड़ी सिवाय हाथ जोड़कर राम राम करने के

























इण्डिया गेट पर सतीश जी ने अपने एस एल आर कैमरे से जम कर शूटिंग की । शानदार कैमरा देखकर ही सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई ।


घूम घाम कर और इण्डिया गेट पर वह स्थान देखकर जहाँ हमारा नाम अंकित है , वीरुभाई को बड़ा आनंद आया




















बाद में क्लब में बैठ बड़ी ही गंभीर मुद्रा में उन्होंने न जाने क्या सुनाया कि --




















सतीश जी खिलखिला कर हंस पड़े ।
लहलहाती घनी जुल्फों और काली मूंछों के साथ इस मुस्कान से उनके ही नहीं , सभी के चेहरे पर रौनक गई

इस बीच खान पान शुरू हो चुका था । आखिर क्लब में लोग जाते ही हैं गपियाते हुए खाना पानी ( खाने पीने ) का आनंद लेने ।

यहाँ अरविंद जी के साथ ब्लडी मेरी वाला प्रसंग बड़ा दिलचस्प रहा । लेकिन उन्होंने भी बखूबी ब्रह्मचर्य का पालन किया ( गीता अनुसार ) । अब यह समझ न आये तो टिप्पणियों में साफ किया जायेगा ।

अरविंद मिश्र :

हम अरविंद जी की शुद्ध और सुसंस्कृत हिंदी के तो हमेशा कायल रहे ही हैं । साथ ही पोस्ट और टिप्पणियों में उनकी स्पष्टवादिता से भी हमेशा आनंदित रहे हैं ।

ब्लोगिंग में बनावटीपन हमें भी नहीं भाता । उनके यही गुण बहुत प्रभावित करते हैं ।
क्योंकि यह ब्लोगर मीट नहीं थी , इसलिए ब्लोगिंग पर कम और व्यक्तिगत बातें ज्यादा हुई और हमारा ध्येय भी यही था ।

वीरुभाई :

उम्र में भले ही हमसे १० साल बड़े हों , लेकिन जिंदगी के प्रति उनका उत्साह देखकर हम भावी भूतपूर्व नौज़वानों को भी जिंदगी को जिन्दादिली से जीने की प्रेरणा मिली । बहुत ही हंसमुख इन्सान हैं । हों भी क्यों नहीं , आखिर लम्बे अर्से तक हरियाणा में कार्यरत जो रहे हैं ।
बस क्लब में शोर अधिक होने की वज़ह से हम उनकी कविता की फरमाइश पूरी नहीं कर सके । लेकिन वह फिर सही ।

सतीश सक्सेना :

क्या कहें ! बेशक यारों के यार हैं । ब्लॉग जगत में सबसे चहेते ब्लोगर्स में से एक हैं । कारण आप मिलकर थोड़ी देर में ही जान सकते हैं । मानवीय भावनाओं की कद्र करना तो कोई सतीश जी से सीखे ।


और इस तरह शानदार गुजरी दिल्ली की एक शाम , जो हम सबको हमेशा याद रहेगी


नोट : ब्लॉगजगत में और भी बहुत से लोग हैं जिनसे दिल से मिलने का दिल करता है . इंतजार रहेगा आपका .


Thursday, January 13, 2011

जब ताऊ के दर्शन हुए --सपने में --

कल सतीश सक्सेना जी की पोस्ट पढ़कर हमारी भी ताऊ जी से मिलने की इच्छा प्रबल हो उठी । समीर लाल जी के सुपुत्र की शादी में जाने का सौभाग्य तो हमें भी मिला था । लेकिन जैसा कि सतीश जी ने लिखा कि ताऊ जी से मिलने को वंचित रह गए और राज़ राज़ ही रह गया कि आखिर ताऊ है कौन । और कैसे दिखते हैं ताऊ ?

हमें भी शादी में ताऊ के दर्शन होने का बेसब्री से इंतज़ार था । लेकिन ताऊ सबको चकमा दे कर अदृश्य ही रहे ।

लेकिन वो कहते हैं न कि यदि सच्चे दिल से मांगो तो खुदा भी मिल जाता है ।

तो भई हमने भी दिल में ठान लिया कि ताऊ के दर्शन करके ही रहेंगे ।

बचपन में दादाजी से सीखा था कि यदि रात में सोते समय राम का नाम लेते हुए सोयें , तो सारी रात भगवान के भजन का पुण्य मिलता है ।

इसलिए कल रात हमने राम राम राम की जगह ताऊ ताऊ ताऊ -राम राम राम --का जाप करना शुरू कर दिया । और देखिये चमत्कार हो गया । ताऊ ने सपने में आकर विशेष रूप से हमें अपने विराट रूप का दर्शन कराया । ठीक वैसे ही , जैसे गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कराया था ।


लेकिन यह क्या , दर्शन कर हम तो धर्मसंकट में फंस गए । हमें अपने पिताजी द्वारा सुनाया एक किस्सा याद आ गया ।

पिता जी के एक मित्र थे , रिटार्यड ब्रिगेडियर । जब पहली बार पिताजी उनसे मिले तो बोले --ब्रिगेडियर साहब , हम तो समझ रहे थे कि एक लम्बे चौड़े , बड़ी बड़ी मूंछों वाले , रूआबदार व्यक्तित्त्व वाले फौजी से सामना होगा । लेकिन आप तो पतले दुबले सीधे सादे से इंसान निकले ।


स्वपन में ताऊ जी से मिलकर हमें भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ । हम तो समझे थे कि धोती कुर्ता पहने , उस पर काले रंग की जैकेट पहने , एक कमज़ोर से वृद्ध से मुलाकात होगी जिनके न मूंह में दांत होंगे न पेट में आंत

ऊपर से बिना बात ठहाका लगते नज़र आयेंगे जैसे कि हरयाणवी लोग किया करते हैं ।

लेकिन सपने में हमने पाया एक शक्श जो कद में हमसे भी २-३ इंच लम्बा , उम्र में ३-४ साल बड़ा , ४-५ किलो ज्यादा वज़न वाला और ५-६ गुना ज्यादा हैंडसम नौज़वान निकला । और तो और दांत भी पूरे के पूरे सही सलामत । लेकिन बेहद गंभीर मुद्रा में । हमने कहा ताऊ एक हरयाणवी जोक ही सुना दो , वो भी नहीं ।

बस इतना ही कहा --हे भक्त , हम शादी में भी आए थे , फोटो भी खिंचवाए थे । लेकिन कोई हमें पहचान नहीं पाएगा ।




नोट
: फोटो सतीश सक्सेना जी के ब्लॉग से , बिना अनुमति लिए , इस विश्वास के साथ कि उन्होंने ज़रूर समीर लाल जी से अनुमति लेकर ही छापी होगी ।
साथ ही नव विवाहित युग्ल के लिए ढेरों आशीर्वाद सहित ईश्वर से प्रार्थना कि ये जोड़ी सदा सुखी रहे और लाल परिवार सदा फले फूले ।