Monday, November 28, 2011

दिल और दिमाग की द्वंद्ध में किसकी सुनें ?

अक्सर किसी को कहते सुना होगा--क्या करें , दिल नहीं मानताइन्सान के दिल और दिमाग में एक द्वंद्ध हमेशा चलता रहा हैदिल कुछ और कहता है , दिमाग कुछ औरऔर हम सोचते रहते हैं कि दिल की माने या दिमाग की

वैसे तो हमारे शरीर में दिल यानि हृदय का काम शरीर में रक्त का संचार बनाये रखना हैलेकिन यहाँ दिल से तात्पर्य है --अंतर्मन , ज़ेहन , या हमारी चेतना

इस दिल का काम है हमें सही दिशा दिखानाहमें सही रास्ते पर चलाना


लेकिन दिमाग यानि मष्तिष्क एक कंप्यूटर की तरह काम करता है जिसमे भावनाएं होती हैं , संवेदनाएंवह नाप तोल कर कुछ का कुछ बनाने में सक्षम होता हैइसीलिए दिमाग सच को झूठ , झूठ को सच --सत्य को असत्य और असत्य को सत्य बना सकता है

यह दिमाग ही है जिसकी वज़ह से आज तक कोई बड़ा आदमी कोई भी जुर्म करके भी जीवन भर जेल में नहीं रहायहाँ वकीलों का दिमाग काम करता है

दिमाग ही मनुष्य को बुरे कामों की ओर ले जाता हैऔर तर्क वितर्क से उसे सही भी ठहरा देता है

लेकिन दिमाग प्रैक्टिकल भी होता हैवह भावनाओं के आवेश में नहीं बहतावह स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता रखता है
जबकि दिल अक्सर भावनाओं में बहकर कभी कभी गलत निर्णय ले सकता है

ऐसे में सवाल उठता है कि --दिल की माने या दिमाग की

आम तौर पर तो यही कहा जाता है कि जो दिल कहे , वही काम करना चाहिए
लेकिन कहते हैं --दिल तो पागल होता हैहमेशा दिल की मानने में हानि भी हो सकती है

अब आप ही बताइए , क्या किया जाये --दिल की माने या दिमाग की ?

Friday, November 25, 2011

दिल्ली दर्शन में आज --अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला २०११ की सैर --


१९७२ में पहली बार दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन किया गया था । तब से अब तक लगभग हर वर्ष हम मेले का आनंद उठाते रहे हैं । लेकिन पिछले कुछ वर्ष से बढ़ते ट्रैफिक और भीड़ की वज़ह से मेले में जाना भी टेढ़ी खीर हो गया है । लेकिन इस बार हमने दृढ निश्चय कर लिया था जाने का । अत : रविवार को सुबह ही पहुँच गए सपत्निक मेले में ।

टिकेट बूथ पर तो ज्यादा समय नहीं लगा क्योंकि लेडिज की लाइन छोटी थी लेकिन प्रवेश द्वार पर लम्बी लाइन में लग कर ही एंट्री मार पाए ।

सुरक्षा सम्बन्धी औपचारिकताओं के बाद हम पहुँच गए गेट नंबर दो के अन्दर जिसके सामने है हॉल नंबर ६ ।



हॉल नंबर ६ के लिए जाते हुए ।


रेड कारपेट वेलकम भला किसको अच्छा नहीं लगेगा ।


इसी रास्ते बाएं ओर हैं हॉल नंबर २-५ ।


हॉल नंबर ६ के अन्दर घुसते ही । सच मानिये , हमने बिल्कुल नहीं छुआ , बस देखा , खींचा और चल दिए ।



पिछली बार तो हमने श्रीमती जी को ९०० रूपये में नौलखा हार दिलवा दिया था । लेकिन इस बार सख्त हिदायत थी कि बस घूमने आए हैं । अब हम तो पूर्णतय: तृप्त और संतृप्त महसूस करते हैं लेकिन महिलाओं की इच्छापूर्ती कभी नहीं होती । हर स्टाल पर हर कपडे या वस्तु को छूकर देखे बिना उन्हें चैन नहीं आता ।

लेकिन यहाँ ये तिलपट्टी देखकर तो अपना भी दिल कर आया खरीदने का ।


यहाँ हमने राहुल सिंह जी को बहुत ढूँढा लेकिन वे कहीं नहीं दिखे ।


इसलिए फोटो खींचकर ही संतुष्टि करनी पड़ी ।



हॉल ५ से निकलकर चौक में आए तो यह मानसरोवर झील नज़र आई ।



सरस पेवेलियन ।


साथ वाले हॉल में यह डाक्टर की दुकान देखकर हम सोचने लग गए कि इनमे से कोई बीमारी हमें तो नहीं ताकि इलाज़ करवाया जा सके ।


अब शुरू हुई सैर विभिन्न राज्यों के पेवेलियंस की ।


हरियाणा पेवेलियन के बाहर ।



दिल्ली वाले दिल्ली पेवेलियन में न घुसें , यह कैसे हो सकता था । लेकिन सभी ऐसा सोच रहे थे । इसलिए अन्दर दिल्ली वाले ही दिखे और कुछ भी नहीं देख सके ।



पंजाब पेवेलियन के बाहर ।



यू पी पेवेलियन --या माया नगरी । हाथी यहाँ भी विराजमान थे ।



हेंडीक्राफ्ट्स हाउस के अन्दर का नज़ारा ।



केरल का पेवेलियन बाहर से सबसे ऊंचा और बड़ा था ।



घूम घूम कर जब थक गए तो इन पेड़ों की ठंडी छाया में सामूहिक विश्राम का नज़ारा ।



टेकमार्ट ।



टेकमार्ट के अन्दर का दृश्य ।



छूकर करेंट खाना था क्या ?



अंतर्राष्ट्रीय पेवेलियंस हॉल के अन्दर ।



एक और दृश्य ।



डिफेंस पेवेलियन के बाहर ।



घूमते हुए चार घंटे हो गए थे । अब सबको घर की याद आने लगी थी । एक और मेला पूर्ण हुआ ।



बाहर गेट पर एंट्री बंद कर दी गई थी क्योंकि अन्दर एक लाख से ज्यादा लोग पहुँच चुके थे । अभी भी सैंकड़ों लोग उम्मीद लगाये खड़े थे । लेकिन पुलिस वाले भी क्या करते --सबको कल आने की दावत दे रहे थे ।

और इस तरह हमने इस उम्र में भी चार घंटे में सारा मेला घूमकर देख लिया , अलबत्ता बाहर से ही । किसी भी पेवेलियन में अन्दर जाने की हिम्मत जल्दी ही ख़त्म हो गई थी , भीड़ के कारण ।

लेकिन हमारे जैसे फोटोग्राफी का शौक रखने वाले को भला क्या ग़म । जो आनंद बाहर आया , वह अन्दर कहाँ आ सकता था ।

Wednesday, November 23, 2011

दिल्ली में आयोजित हुआ --काईट फेस्टिवल --एक झलक .



नई
दिल्ली की शताब्दी मनाने के लिए आजकल दिल्ली में तरह तरह के समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं कहीं कव्वाली , तो कहीं संगीत और कहीं नृत्य के कार्यक्रम

पिछले रविवार को इण्डिया गेट पर आयोजित किया गया --काईट फेस्टिवल जिसमे विभिन्न प्रकार की पतंगों की प्रतियोगिता का आयोजन किया गया ।

प्रस्तुत हैं इस शाम की कुछ झलकियाँ :

इण्डिया गेट जहाँ हम पहुंचे शाम होने परतब तक प्रतियोगिता तो ख़त्म हो चुकी थी लेकिन शाम रंगीन हो चली थी


काईट फेस्टिवल का आयोजन किया दिल्ली टूरिज्म ने



एक पेड़ पर टंगी थी अनेक चरखियांपृष्ठभूमि में इण्डिया गेट रौशनी में नहाया हुआ



दूसरे एंगल सेपृष्ठभूमि में बस नीला आसमान


एक स्टाल पर पर्दर्शित रंग बिरंगी पतंगें



रात में पतंगों की यह लड़ी आकर्षण का केंद्र बनी



यह चाटवाला भी फेस्टिवल का आनंद ले रहा थाश्रीमती जी को यह चाट बहुत पसंद है , विशेषकर खट्टी खट्टी अमरक के साथ


खाने का विशेष प्रबंध भी था , एक मशहूर केटरर द्वारा

ऐसे में हम तो भल्ला पापड़ी और मेडम आलू टिक्की ही पसंद करती हैं



इस बीच इण्डिया गेट की पृष्ठभूमि में बने मंच पर रंगारंग कार्यक्रम चल रहे थे ।
पहले जादूगर ने जादू दिखाया ।
फिर शुरू हुआ पंजाबी अकादमी के कलाकारों द्वारा भांगड़ा और गीत संगीत ।
पंजाबी गानों की धुनों पर स्वयं ही श्रोताओं के पैर थिरकने लगते हैं ।
साथ में लेज़र शो भी समारोह में चार चाँद लगा रहा था ।




मंच को बड़ी बड़ी रंग बिरंगी पतंगों से सजाया गया था



उधर मैदान में अभी भी कुछ शौक़ीन अँधेरे में भी पतंग उड़ा रहे थे



कार्यक्रम के अंत में बाहर आइसक्रीम वालों की कतार लगी थी । लेकिन खाकर ऐसा लगा जैसे आइसक्रीम नकली हो ।



पूरे क्षेत्र में सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध थाइसलिए सब बेख़ौफ़ इण्डिया गेट पर रात देर तक पिकनिक मना रहे थे

ज़ाहिर है , यूँ ही नहीं दिल्ली देश का दिल है

नोट : काईट फेस्टिवल की कुछ और तस्वीरें चित्रकथा पर देखिये

Link

Monday, November 21, 2011

दिल्ली में विकास का एक उदाहरण --

इस वर्ष हम नई दिल्ली की शताब्दी मना रहे हैं नई दिल्ली का निर्माण कार्य १९११ में आरम्भ हुआ था । वैसे तो दिल्ली का इतिहास ५००० साल से भी ज्यादा पुराना है । पांडवों से लेकर मुग़ल सल्तनत और फिर अंग्रेजों के आधीन रहकर दिल्ली ने बहुत उतार चढाव देखे हैं ।

लेकिन आज जहाँ एक ओर पुरानी दिल्ली और कई पुरातत्व स्मारक हमारे इतिहास की धरोहर हैं , वहीँ आधुनिक विकास में भी दिल्ली ने अभूतपूर्व और अतुल्य उन्नति की है

प्रस्तुत है , इस कड़ी में पहली किस्त :

मनुष्य की प्रकृति रही है कि वह अपनी ज़रुरत पूरी करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहा है ।
लेकिन जो पहले ज़रुरत होती है , वह बाद में आदत बन जाती है और अंत में लत बनकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है

अब देखिये , सुबह उठते ही अख़बार के साथ चाय की लत , शाम को टी वी देखने की लत और एक ब्लोगर के लिए समय मिलते ही कंप्यूटर की लत ।

कंप्यूटर भी बिना इंटरनेट के ऐसा हो जाता है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी

अभी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ । हुआ यूँ कि पिछले महीने हमारा टेलीफोन का बिल नहीं मिल पाया । दीवाली की वज़ह से हमें भी ख्याल नहीं आया । पता तब चला जब एक दिन पाया कि फोन डेड पड़ा है । वैसे भी लेंड लाइन पर निर्भरता अब बिलकुल ही ख़त्म हो गई है ।

लेकिन असली शॉक तो तब लगा जब देखा कि उससे जुड़ा नेट कनेक्शन भी डेड हो गया है ।

अब सोचिये एक ब्लोगर के लिए इससे बड़ा शॉक और क्या हो सकता है ।
खैर , पता चलते ही हमने फ़ौरन डुप्लीकेट बिल बनवाया । लेकिन इत्तेफाक से जमा करने में कई दिन लग गए ।
आखिर किसी तरह समय निकालकर चेक जमा कर ही दिया ।

वैसे भी यहाँ बिल जमा करना भी हमारे लिए तो एक उपलब्धि जैसा ही लगता है

और फिर लगे इंतजार करने कनेक्शन रीकनेक्ट होने का । डर तो यही था कि चेक दो दिन में क्लियर होगा , फिर एक सप्ताह बाद जाकर कनेक्शन शुरू होगा ।

वैसे भी जिस फोन के बिल पर पता अंग्रेजी में लिखा हो --PPGIP EXT ( पतपरगंज आई पी एक्सटेंशन ) और उसका हिंदी में अनुवाद हो --पप्गिप एक्सटेंशन और तारीफ सिंह का अनुवाद टैरिफ सिंह हो , उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है

जिस दिन चेक जमा किया , हमने श्रीमती जी को अपनी दुविधा बताई तो वो बोली -अरे आपको कैश जमा करना चाहिए था । तब जल्दी शुरू हो जाता ।

बहुत अफ़सोस हो रहा था कि अब वीक एंड पर बहुत बोर होना पड़ेगा , बिना ब्लोगिंग के । आखिर लत जो पड़ गई है ।

लेकिन फिर दिल नहीं माना और आशा के विपरीत मन में आस लिए हमने नेट खोल ही लिया ।
और यह क्या , नेट तो चालू था । यानि चेक जमा करने के ४-५ घंटे के अन्दर फोन और नेट दोनों चालू हो गए थे ।

हम हैरान रह गए , टेलीफोन विभाग की तत्परता देखकर ।
पहली बार हमें भी विश्वास हुआ कि समय बदल गया है ।
सचमुच विकास जोरों पर है ।


एम् टी एन एल की इस उपलब्धि पर मैं इस विभाग को और दिल्ली वालों को बधाई देता हूँ
अब तो हम भी कह सकते हैं --दिल्ली है मेरी जान , दिल्ली है मेरी शान


नोट : शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में दिल्ली में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं हमसे जुड़े रहिये , आपको घर बैठे दिल्ली दर्शन कराते रहेंगे