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Monday, November 21, 2011

दिल्ली में विकास का एक उदाहरण --

इस वर्ष हम नई दिल्ली की शताब्दी मना रहे हैं नई दिल्ली का निर्माण कार्य १९११ में आरम्भ हुआ था । वैसे तो दिल्ली का इतिहास ५००० साल से भी ज्यादा पुराना है । पांडवों से लेकर मुग़ल सल्तनत और फिर अंग्रेजों के आधीन रहकर दिल्ली ने बहुत उतार चढाव देखे हैं ।

लेकिन आज जहाँ एक ओर पुरानी दिल्ली और कई पुरातत्व स्मारक हमारे इतिहास की धरोहर हैं , वहीँ आधुनिक विकास में भी दिल्ली ने अभूतपूर्व और अतुल्य उन्नति की है

प्रस्तुत है , इस कड़ी में पहली किस्त :

मनुष्य की प्रकृति रही है कि वह अपनी ज़रुरत पूरी करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहा है ।
लेकिन जो पहले ज़रुरत होती है , वह बाद में आदत बन जाती है और अंत में लत बनकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है

अब देखिये , सुबह उठते ही अख़बार के साथ चाय की लत , शाम को टी वी देखने की लत और एक ब्लोगर के लिए समय मिलते ही कंप्यूटर की लत ।

कंप्यूटर भी बिना इंटरनेट के ऐसा हो जाता है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी

अभी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ । हुआ यूँ कि पिछले महीने हमारा टेलीफोन का बिल नहीं मिल पाया । दीवाली की वज़ह से हमें भी ख्याल नहीं आया । पता तब चला जब एक दिन पाया कि फोन डेड पड़ा है । वैसे भी लेंड लाइन पर निर्भरता अब बिलकुल ही ख़त्म हो गई है ।

लेकिन असली शॉक तो तब लगा जब देखा कि उससे जुड़ा नेट कनेक्शन भी डेड हो गया है ।

अब सोचिये एक ब्लोगर के लिए इससे बड़ा शॉक और क्या हो सकता है ।
खैर , पता चलते ही हमने फ़ौरन डुप्लीकेट बिल बनवाया । लेकिन इत्तेफाक से जमा करने में कई दिन लग गए ।
आखिर किसी तरह समय निकालकर चेक जमा कर ही दिया ।

वैसे भी यहाँ बिल जमा करना भी हमारे लिए तो एक उपलब्धि जैसा ही लगता है

और फिर लगे इंतजार करने कनेक्शन रीकनेक्ट होने का । डर तो यही था कि चेक दो दिन में क्लियर होगा , फिर एक सप्ताह बाद जाकर कनेक्शन शुरू होगा ।

वैसे भी जिस फोन के बिल पर पता अंग्रेजी में लिखा हो --PPGIP EXT ( पतपरगंज आई पी एक्सटेंशन ) और उसका हिंदी में अनुवाद हो --पप्गिप एक्सटेंशन और तारीफ सिंह का अनुवाद टैरिफ सिंह हो , उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है

जिस दिन चेक जमा किया , हमने श्रीमती जी को अपनी दुविधा बताई तो वो बोली -अरे आपको कैश जमा करना चाहिए था । तब जल्दी शुरू हो जाता ।

बहुत अफ़सोस हो रहा था कि अब वीक एंड पर बहुत बोर होना पड़ेगा , बिना ब्लोगिंग के । आखिर लत जो पड़ गई है ।

लेकिन फिर दिल नहीं माना और आशा के विपरीत मन में आस लिए हमने नेट खोल ही लिया ।
और यह क्या , नेट तो चालू था । यानि चेक जमा करने के ४-५ घंटे के अन्दर फोन और नेट दोनों चालू हो गए थे ।

हम हैरान रह गए , टेलीफोन विभाग की तत्परता देखकर ।
पहली बार हमें भी विश्वास हुआ कि समय बदल गया है ।
सचमुच विकास जोरों पर है ।


एम् टी एन एल की इस उपलब्धि पर मैं इस विभाग को और दिल्ली वालों को बधाई देता हूँ
अब तो हम भी कह सकते हैं --दिल्ली है मेरी जान , दिल्ली है मेरी शान


नोट : शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में दिल्ली में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं हमसे जुड़े रहिये , आपको घर बैठे दिल्ली दर्शन कराते रहेंगे