Thursday, October 29, 2009

दोस्ती की एक अनोखी मिसाल है ये मूर्ती ---

पिछली पोस्ट में मैंने एक जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया था, इस सवाल के साथ की दिल्ली के नेहरु पार्क में लेनिन की मूर्ती क्यों स्थापित है.
ज़वाब में बहुत सारे दोस्तों ने टिपण्णी की। लेकिन लगभग सभी ने ज़वाब देने का ज़िम्मा हमी पर छोड़ दिया।
यानि आपने ने सवाल छेड़ा है, तो आप ही भुगतो।
अब हम ठहरे इतिहास, भूगोल और राजनीति शास्त्र में विशुद्ध अज्ञानी. भला पता होता तो पूछते ही क्यों.

भाई शरद कोकास से उम्मीदें जगी, लेकिन आखिर में उन्होंने भी हाथ उठा दिए. पर विश्वास दिलाया की ये पता लगा कर ही रहेंगे.
गुरुदेव समीर लाल जी ने भी कह दिया की पता है, लेकिन बताएँगे नहीं।

अब जब सभी ने पल्ला झाड़ लिया तो हम समझे की ये तो वही हो गया, की जिसका जूता उसी का सर.
हम तो सोच रहे थे की पकी पकाई मिल जायेगी पर अब तो खुद ही --.
खैर अब तक हम भी जोश में आ चुके थे की पता तो लगा कर रहना है. और शुरू हो गए अभियान पर.
सबसे पहले अपने साथी डॉक्टरों से पूछा. लेकिन वो तो हमसे भी ज्यादा अनाड़ी निकले.
भले ही पेट काटकर, ओपरेशन करके दोबारा टाँके लगा कर सील दें, लेकिन इस विषय में तो एक भी टांका नहीं लगा पाए।

कुछ गैर- डॉक्टर मित्रों से जानकारी लेनी चाही, तो सुनने को मिला की कौन सी मूर्ती, कैसी मूर्ती. हमें तो नून, तेल और लकडी की ही मूर्तियाँ नज़र आती हैं.
हमने भी परेशान आत्माओं को और परेशान करना उचित नहीं समझा।

फिर सोचा, नेट पर तो आजकल सब कुछ मिल जाता है. लेकिन बस यही पता चला की नेहरु जी लेनिन से बहुत प्रभावित हुए थे.
अब ये तो कोई वज़ह नहीं हो सकती मूर्ती लगाने की.
आदमी न जाने कितने लोगों से इम्प्रेस होता है, सब को घर में तो नहीं जमा लेता।

अब तक हम भी कमर कस चुके थे की कुछ भी करना पड़े पर पता तो लगा कर ही रहेंगे.
सोचा, अब तो एक ही तरीका है की फिर पार्क में जाया जाये , शायद कोई सुराग मिल जाये.
लेकिन वहां भी ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे कुछ जानकारी मिलती।

हाँ, इस चक्कर में हमारी एक और सुहानी शाम रंगीन ज़रूर हो गयी।

अब हमें याद आया, श्री के के यादव का कहना की ये तो मुनिस्पलिटी वाले ही बता सकते हैं।

खैर किसी तरह से नेट से सम्बंधित अधिकारी का फोन नंबर मालूम किया और फोन लगाया.
जिसने फोन उठाया वो हमारा सवाल सुनकर ऐसे परेशान हो गया जैसे बीबी ने रंगे हाथ पकड़ लिया हो.
बोला साब, ये तो मैंने कभी सोचा ही नहीं. बड़े साब से पूछकर बताएँगे.
अब रोज़ बार बार फोन मिलाते रहे, लेकिन बड़े साब कभी दौरे पर, तो कभी दफ्तर में , तो कभी लंच पर.
इस चक्कर में हम उनके ऑफिस में खूब मशहूर हो गए।

अब तो छोटे साब हमें और हमारी जिज्ञासा, दोनों को पसंद करने लगे थे।

खैर आखिरकार बड़े साब पकड़ में आ ही गए और जो जानकारी मिली वो आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

नेहरु जी पहली बार १९२७ में रूस गए थे, अक्तूबर क्रांति की दसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर. वहां जाकर वे लेनिन के समाजवादी विचारों से बहुत प्रभावित हुए. फिर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री बनने के बाद वे १९५५ और १९५७ में फिर रूस गए. उन दिनों भारत और सोवियत रूस, दोनों की एक जैसी हालत थी. दोनों ही देश कृषि प्रधान देश हैं, और दोनों में तब औद्धोगीकरण की शुरुआत ही हुई थी. ऐसे में देश के विकास के लिए चिंतित नेहरु जी ने लेनिन को अपना रोल मोडल बनाया.
बाद में १९७१ में भारत पाक युद्घ के दौरान भारत सोवियत २० वर्षीय मित्रता संधि श्रीमती इंदिरा गाँधी और मिखाइल गोर्बाचेव के बीच हुई.
मुझे याद है,
भारत पाक युद्घ के दौरान, अमेरिका ने अपना सातवाँ युद्घ पोत बीडा हिंद महासागर की तरफ रवाना कर दिया था। लेकिन उधर सोवियत रूस ने भी अपने समुद्री ज़हाज़, भारत की मदद के लिए रवाना कर दिए. जिसका नतीजा ये हुआ की अमेरिकन बीडा वहीँ रुक गया.

इसीलिए कहते हैं, दोस्त वही जो मुसीबत के वक्त काम आये।

ये शुरुआत थी, भारत और रूस की दोस्ती की.
बाद में संधि के २० साल पूरे होने से पहले श्री राजीव गाँधी ने , जो उस समय प्रधान मंत्री थे, उस संधि को आगे करार दिया.
इसी के तहत १९८७ में स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी के निर्देशन में नेहरु पार्क में लेनिन की मूर्ती की स्थापना हुई।

ये मूर्ती प्रतीक है, भारत और रूस की मित्रता की।

इसी तरह महात्मा गाँधी की मूर्तियाँ भी विदेशों में कई जगह लगी हुई हैं।

और अब इसे देखिये :

उज्जवल भविष्य दिल्ली में दिवाली के अवसर पर आसमान से अवतरित आर्शीवाद की किरणें, कैमरे में कैद।

Sunday, October 25, 2009

पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके---



पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके---


इन्ही पंक्तियों को ध्यान में रखकर मैंने अपनी पिछली पोस्ट लिखी थी। एक सवाल उठाया था की जब सृष्टि के रचयिता ने ही अपनी कृतियों में कोई भेद भाव नहीं किया, तो आज मनुष्य क्यों देश, धर्म, प्रान्त और जात-पात के नाम पर एक दूसरे का गला काटने को तैयार रहता है.


इस विषय पर बहुत से दोस्तों ने अपनी सहमति जताते हुए विचार को समर्थन देकर मेरा मनोबल बढाया। मैं आभारी हूँ आप सब का-- पंडित किशोर जी, अविनाश वाचस्पति जी, गठरी वाले अजय कुमार जी, ऍम वर्मा जी, सुनीता शर्मा जी, पी अन सुब्रामनियम जी, दीपक मशाल जी, मुफलिस जी, बबली जी.


श्री समीर लाल जी ने एक शेर में ही सारी बात कह दी। शायद इसीलिए समीर भाई, लोग आपको गुरुदेव कहते हैं.

हरकीरत जी की टिप्पणियां तो हमेशा जिंदादिल होती हैं, और शेर भी लाज़वाब था।

खुशदीप भाई, हमारी तरह पुराने गानों के दीवाने हैं, ये पोस्ट उन्ही को सपर्पित रही।

क्षमा जी, पहली बार ब्लॉग पर आई, लेकिन टिपण्णी में तर्कसंगत गीतों का जिक्र कर अपनी सहमति जतायी.
शरद भाई और आदरणीया निर्मला जी ने अपने विचार विस्तृत रूप से प्रस्तुत कर सराहनीय योगदान दिया।


इस बार मैंने सभी टिप्पणीकारों का जिक्र सिर्फ इसलिए किया है ताकि ब्लोगिंग को हम एक सार्थक माध्यम बना सकें समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने का। अब भले ही सफल न रहें, किन्तु किसी भी सामाजिक बुराई को मिटाने में पहला कदम होता है, उसके बारे में आवाज़ उठाने का.

आज ही पता चला, दोस्तों की पोस्ट और सैकडों टिप्पणियां पढ़कर, इलाहाबाद में हुए ब्लोगर सम्मलेन में क्या क्या हुआ, जो नहीं होना चाहिए था और क्या क्या नहीं हुआ, जो होना चाहिए था.
यह जानकार एक ही बात समझ में आती है की देश, धर्म और समाज सुधार की बातें करने से पहले हमें अपने गिरेबान में झांकना पड़ेगा। पहले आईने में खुद को तो निहार लें, फिर समाज को सुधारने निकलें।

अब भले ही आपको इलाहाबाद आने का निमन्तरण न मिला हो, और अहमदाबाद, हैदराबाद या सिकंदराबाद में सम्मलेन हो या न हो, क्या फर्क पड़ता है. आइये हम आपको दिल्ली आने का निमन्तरण देते हैं.
और लोदी गार्डन के बाद, आज आपको सैर करवाते हैं, दिल्ली के एक और खूबसूरत पार्क--- नेहरु पार्क की।

नेहरु पार्क :


दिल्ली के राजनीय इलाके चाणक्य पुरी में स्थित ये पार्क भारत के प्रथम प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु के नाम पर बनाया गया है। ८० हैक्टेयर में फैले इस पार्क के पूर्व में सफदरजंग एयरपोर्ट, पश्चिम में कई देशों के उच्चायुक्त निवास , उत्तर में अशोक होटल और दक्षिण में चाणक्य सिनेमाघर और अकबर होटल, जो अब दोनों ही नहीं रहे. एक किलोमीटर लम्बे इस पार्क की छटा ही निराली है.


इस पार्क की विशेषता यह है की हर वीकएंड पर हजारों लोग पिकनिक मनाते हुए नज़र आयेंगे। उनमे से आधे फिरंगी होते हैं. यानि यहाँ आकर आपको लगेगा जैसे आप किसी विदेश में घूम रहे हैं.

हालाँकि वर्किंग डेस में ये यूवा प्रेमियों का स्वर्ग होता है।


यहाँ कहीं पेडों के झुरमुट मिलेंगे, तो कहीं पत्थरों के ढेर, कहीं मिटटी का टीला और कहीं गड्ढे। लेकिन सब जगह घनी हरियाली.


और यही झुरमुट, पहाडियां, टीले और गड्ढे साक्षी रहे होंगे कितनी ही प्रेम कहानियों के।


और इन्ही के बीच न जाने कितनी ही प्रेम कहानियां बन या बिगड़ गयी होंगी।


इन्ही पगडंडियों पर विचरण करते करते, भले ही हम जैसे न जाने कितनो के बालों में सफेदी उतर आई होगी, लेकिन इस पार्क की हरियाली हर साल बढती ही जा रही है।

सर्दियों की नर्म धूप और हरे भरे लाउन्स के किनारे फूलों की क्यारियां, रंग बिरंगे लिबास में फूल से चेहरे लिए बच्चे , चिडियों की तरह चहचहाते, उछलते , कूदते, शोर मचाते, जिन्हें देख पेरेंट्स के चेहरों पर ऐसी चमक उतर आये जैसे किसान को अपनी लहलहाती फसल को देखकर आती है.

एक बार यहाँ आइये तो सही, धरती पर ज़न्नत की सैर हो जायेगी।

और ये देखिये :
पार्क के बीचों बीच बनी लेनिन की ये भव्य मूर्ती।





और अब एक सवाल.
नेहरु पार्क में लेनिन की मूर्ती.
क्या आप बता सकते हैं, इसका राज़ ?



नोट: नेहरू पार्क की पूरी सैर करने के लिए विसित करे --- चित्रकथा पर।

Thursday, October 22, 2009

क्या आप बता सकते हैं, ये चाँद देश का है या परदेस का ???

आजकल ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले की घटनाएँ बहुत सामने आ रही हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं, यह बात साफ़ तौर पर तो समझ नही आ रही। क्या रंग भेद का मामला है? ऐसा तो पहले कभी नही हुआ। वैसे भी भारत में नियुक्त ऑस्ट्रेलिये के हाई कमिशनर श्री पीटर वर्घीज़ ख़ुद भारतीय मूल के हैं। पता चला है की उनके पूर्वज केरल से गए थे, उनका जन्म केन्या में हुआ और पले बढे -पढ़े ऑस्ट्रेलिया में। अब भारत में एच सी बनकर कार्यभार संभाला है। फ़िर ये कैसे सोच लिया जाए की ये रंग भेद का मामला है।

तो क्या भारतीय मेधावी छात्र वहां के लिए खतरा बन गए हैं?

वज़ह कोई भी हो ,लेकिन इंसानों में इस तरह का बर्ताव इसी बात का संकेत देता है की अभी भी मनुष्यों में आदि मानव के गुण या अवगुण शेष बचे हैं।

स्कूल में इंग्लिश की बुक में एक कविता पढ़ी थी :

नो मेन इज फोरेन, नो कंट्री इज स्ट्रेंज।
नो कंट्री इज फोरेन, नो मेन इज स्ट्रेंज।


बहुत अच्छी लगी थी, आज भी लगती है। क्योंकि बात सही है। यह सही है की मानव किसी भी देश, धर्म या प्रान्त के हों, सबकी बाहरी बनावट अलग हो सकती है। रंग-रूप , नयन- नक्श, डील-डौल, भाषा, रीति-रिवाज़, रहन-सहन, खान-पान, मान्यताएं और धारणाएं अलग हो सकती हैं।

लेकिन सबकी एनाटोमी ( शारीरिक रचना ), फिजियोलोजी ( शरीर क्रिया विज्ञानं ), बायोकेमिस्तरी ( जीव रसायन विज्ञानं ) , पेथोलोजी ( विकृति विज्ञानं ), यहाँ तक की फार्मेकोलोजी ( भेषजगुण विज्ञानं ) भी एक जैसी ही होती हैं।

जब ऊपर वाले ने ही हमें अलग नही बनाया, तो फ़िर इंसान ने ही क्यों धर्म, देश, प्रान्त और जात-पात बना कर घृणा और द्वेष की भावना को जाग्रत कर इंसान को इंसान का दुश्मन बना दिया?

अब ज़रा सोचिये :

क्या आसमान में उड़ते पंछियों की उड़ान की कोई सीमा निर्धारित हो सकती है?

क्या पर्वतों से बहती नदियों के बहाव को सरहदें रोक पाई हैं ?

क्या पवन के झोंके सीमाओं की सीमा में सिमट कर रह सकते हैं ?

क्या चाँद, सूरज और सितारों की रौशनी पर किसी मुल्क का प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है ?

नही ना, तो फ़िर इंसान क्यों इंसान का दुश्मन बन बैठा है, इस नश्वर संसार के सांसारिक मसलों को लेकर?

बहुत पहले जगजीत सिंह की गायी एक ग़ज़ल याद आती है :

हम तो हैं परदेस में
देश में, निकला होगा चाँद
अपने घर की छत पर कितना
तन्हा होगा चाँद, हो ----


अब ज़रा इसे देखिये :

क्या आप बता सकते हैं, ये चाँद देश का है या परदेस का ???

Sunday, October 18, 2009

बधाई. दिल्ली वालों ने दिवाली समझदारी से मनाई.

बधाई. दिल्ली वालों ने दिवाली समझदारी से मनाई.
अब इसे सरकार द्वारा पटाखों की बिक्री पर अंकुश लगाने का परिणाम कहें या अखबारों में इनके विरूद्व प्रचार, या फिर जन जागृति, वज़ह कोई भी हो, पर ये देखकर अच्छा लगा की इस वर्ष दिवाली पर पटाखों का शोर और वायु प्रदुषण, दोनों में कमी रही. इसके लिए सभी दिल्ली निवासियों को बधाई.

सत्य, धर्म, न्याय और सदाचार का प्रतीक, इस पर्व का स्वरुप अब काफी बदल सा गया है. एक ज़माना था, जब मित्र लोग बड़े शौक से एक दुसरे को बधाई देने, एक दुसरे के घर जाते थे, मिठाई का डिब्बा लेकर. आजकल दिवाली इतनी हाई टेक हो गयी है की सारी बधाईयाँ बिना मिले, दूर संचार से ही हो जाती हैं.

हमारा भी सैकडों मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचितकों से बधाई सन्देश का आदान प्रदान हुआ , एस ऍम एस, इ- मेल या फिर ब्लॉग द्वारा. कितनी अजीब बात है की, इनमे से बोलना किसी से भी नहीं हुआ. वैसे भी एक दिन पहले ही तो प्री- दिवाली मीट में सबसे मिल ही चुके थे. शायद सबके मन में यही विचार रहा होगा.

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनसे फोन पर बात हुई.
सबसे पहले, सुबह सुबह, मेरे पास फोन आया डॉ बलविंदर सिंह का ( सिख) ,
दोपहर को हमारे दोस्त शाहनवाज़ जी ने फोन किया. शाम को डॉ आदर्श ( बौध धर्म के अनुयायी) , का फोन आया.
और रात को ११ बजे डॉ गुलशन अरोरा ( हिन्दू) ने फोन पर बधाई दी.
धर्म निरपेक्षता का ऐसा उदाहरण देखकर मन बाग़ बाग़ हो गया.

हमने भी अपने कई अप्रवासी भारतीय मित्रों को फोन कर दिवाली की बधाई देते हुए, पटाखों की आवाज़ फोन पर सुनाकर उनको इस सेलिब्रेशन में शामिल कर लिया. जो घर से बाहर थे, उनकी रिकॉर्डिंग मशीन पर पटाखों की आवाज़ रिकार्ड कर दी, बाद में इत्मीनान से सुनने के लिए.

दोस्तों, हमारे पर्व हमें यही भाईचारे का सन्देश देते हैं, की हम सब मिलकर जश्न मनाएं और आपसी रंजिशों को भूल जाएँ.
रोज़मर्रा की नीरस जिंदगी में, मिठास घोल देते है, ये त्यौहार, फिर भले ही मिठाई को बाई बाई.

Thursday, October 15, 2009

कहिये, कैसे मनाना चाहेंगे आप दिवाली ???

उस साल भी दीवाली की रौनक पूरे शबाब पर थी। हर साल की तरह, इस बार भी चड्ढा परिवार पूरे जोर शोर के साथ दीवाली की तैयारियों में जुटा था. --- इस बार पटाखे पूरे १० हज़ार के आयेंगे. -- हज़ार वाली लड़ी में अब उतना मज़ा नहीं आता. ---तो तय हुआ की इस बार लड़ी की लम्बाई दुगनी होगी. --

बेटे की नयी नयी शादी ---बहु की तो पहली दिवाली थी।

इस बार वो धमाका, की सब देखते रह जायेंगे।

तभी दीवाली से एक हफ्ता पहले चड्ढा साहब को हार्ट अटैक आ गया.--- इमरजेंसी में भरती करवाना पड़ा.--- पांच दिन सी सी यु में रहने के बाद, आज ही जनरल वार्ड में शिफ्ट हुए थे.
साथ वाली बेड पर नाथू लाल, जो क्रोनिक स्मोकर हुआ करता था,--- अब दमे का सर्टिफाइड मरीज़ बन चुका है,--- आज ही आई सी यु से शिफ्ट होकर आया है। ताउम्र बीडी पीता रहा, जब सांस आना ही बंद हो गया, तो डॉक्टर के कहने पर छोड़ी.--- लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.--- अब आये दुसरे दिन अस्थमा के अटैक पड़ जाते हैं.

डॉक्टर राउंड पर आये हैं। दोनों की एक ही गुजारिश -- आज छोटी दीवाली है,--- अगर छुट्टी मिल जाये तो दीवाली घरवालों के साथ मना लें.

डॉक्टर समझाते हैं,--- अभी घर जाने लायक हालत नहीं है।---- तबियत ज्यादा खराब हो सकती है.

लेकिन दीवाली का पर्व --अधर्म पर धर्म , अन्याय पर न्याय, पाप पर पुण्य और दुराचार पर सदाचार की जीत का प्रतीक ,--- ये पर्व-- भारत वासियों का नंबर वन त्यौहार। ---भला हॉस्पिटल में कैसे पड़े रह सकते हैं.

दोनों को डिस्चार्ज ओन् रिक्वेस्ट कर दिया गया।

चड्ढा परिवार ने राहत की सांस ली। सारे दिन मिलने वालों का तांता लगा रहा. --इस बार घर में मिठाई वर्जित --वैसे भी नकली घी और नकली खोया , टी वी पर देख देख कर किसकी हिम्मत हो सकती थी मिठाई खाने की.

दीवाली का शुभ दिन ---शाम होते होते , लाइटों से जगमगा उठा, चड्ढा साहब का अपार्टमेन्ट ब्लॉक।

फिर धीरे धीरे, पटाखे --फिर बम --बमों की आवाज़ में बढ़ता दम।---- चड्ढा साहब को बेचैनी सी होने लगी.--- डॉक्टर ने आराम की सलाह दी थी.

एक तगड़ा सा बम फूटता --उनके दिल में धम सा होता।

बम भी चाइनीज़ -- देश को हिला कर रख दें --फिर चड्ढा के ब्लॉक की क्या बिसात।

सारे खिड़की दरवाजे बंद कर दिए गए, ---लेकिन ये बमों की आवाज़ ---कोई मच्छर थोड़े ही है, जो खिड़की बंद कर काम चल जाये.
अब तो धमाके के साथ, खिड़कियों की खनखनाहट भी गूंजने लगी.
बमों की आवाज़ अब लगातार तेज़ होती जा रही थी. --तभी एक लड़ी --एक या दो नहीं ---पूरे पांच हज़ार की ---जो शुरू हुई, तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं.
चड्ढा साहब के दिल की रफ़्तार अब राजधानी एक्सप्रेस की तरह हो रही थी।---- शाम की दवा, डबल डोज़ ले चुके हैं.--घबराहट है की कम होने का नाम ही नहीं लेती.

चढ्डा साहब अब क्या करें? --- जाएँ तो कहाँ जाएँ ?

उधर नाथू लाल, जे जे कालोनी में उसकी अपनी झोंपडी थी ---अभी हाल में ही, ईटों का एक पक्का कमरा डाला है. यहाँ बच्चे छोटे पटाखे चला रहे हैं ---
चट चट, पट पट की आवाज़ --लेकिन ज्यादा शोर नहीं.
एक बच्चा सुर्रा चला रहा है ---लाल लाल धुआं फैलता हुआ. --- बच्चे का चेहरा , ख़ुशी से लाल.
दूसरा सांप वाली गोली जला रहा है ---एक दम काला धुआं -- एक हवा का झोंका , सारा धुआं नाथू लाल के कमरे में.
धीरे धीरे खांसी उठने लगती है --फिर धीरे धीरे तेजी पकड़ने लगती है.
नाथू लाल घबरा कर दरवाज़ा और खिड़की बंद करने की कोशिश करता है, लेकिन एयर टाइट तो नहीं.
धुआं तो अब भी आ रहा है.
सांस खिंच कर आने लगी है.
लगता है, फिर एक अटैक पड़ने वाला है।

नाथू लाल करे तो क्या करे ?--- जाये तो कहाँ जाये ?

बेचारा नाथू लाल !!

जाने कितने चड्ढा साहब होंगे, जिनके दिल का दम , बम के धमाके में निकल जाता होगा.
जाने कितने नाथू लाल होंगे , जिनकी साँसों की बागडोर दीवाली के धुएं से लिपटती, कमज़ोर पड़ती , टूट जाती होगी, कच्चे धागे की तरह।


कौन है ये चड्ढा साहब , कौन है ये नाथू लाल ?

कोई भी हो सकते हैं ---आपके पडोसी ---रिश्तेदार ---या फिर हम और आप !!!


सड़क पर पुलिस ने बैरिकेड लगा रखे हैं --- आतंकवादियों को पकड़ने के लिए.--- दिवाली पर डर ज्यादा ही होता है.
एक स्कूटर वाले को पकडा हुआ है --- १०० रूपये निकालो, रेड लाईट जम्प करने के.
लड़के का दावा है की वो तो यैल्लो में निकला था --चल फिर 50 ही निकाल।--- भई दो दिन से यहाँ खड़े हैं, हमें भी तो मनानी है दिवाली.

डॉ अविनाश की इमरजेंसी ड्यूटी लगी है कैजुअल्टी में. ---वैसे तो सीनियर हो चुके है, अब नाईट नहीं लगती.
पर जबसे दिवाली पर असली बम छूटे है, जिनमे कई लोगों की जान गयी,--- तबसे स्पेशल रोस्टर बनता है.
----अभी आधी रात के बाद कुछ राहत मिली है। --- कितने ही जले हुए हाथ, कुछ की आँख में चोट, उफ़ ये हाथ में बम छोड़ने का शौक.

मैं अपनी बालकनी में बैठा, देख रहा हूँ, एक और उड़ता बम --- सीधे आसमान में ---- अचानक फटता है ---सारी बिल्डिंग हिल जाती है ---धुएं का एक और गुब्बार.
मन्न खिन्न हो जाता है ---

दिवाली के दीप अब, हो गए हैं धुआं धुआं
खो गए हैं रंग जाने, चकरी और अनार कहाँ
नहीं लगती अब पटाखों की आवाज़ मधुर
जब से धमाकों में घुली है, राम रहीम के रक्त की चीख पुकार यहाँ


कहिये, कैसे मनाना चाहेंगे आप दिवाली ???
ज्योति की जगमगाहट में, या पटाखों की खडखडाहट में ??

Monday, October 12, 2009

घर चार दीवारों से नहीं , इंसानों से बनता है

फैस्टिवल सीजन पूरे ज़ोर पर है। दीवाली बस आने ही वाली है। ऐसे में धर्म कर्म, ज्ञान अज्ञान , चर्चा प्रतिचर्चा, ईर्षा द्वेष, मान अपमान आदि आदि सब भूलकर चलिए कुछ समय के लिए ब्लोग्स पर ज़रा सीरियस बातें बंद करें। इस पोस्ट को यही ध्यान में रखकर लिख रहा हूँ। कृपया, इसे सीरियसली ना लें।


दीवाली या दीवाला --समझ ना पाए घरवाला। अब देखिये दीवाली और घरवाली में खाली नाम की ही समानता नहीं है, काम की भी समानता है. दोनों ही घरवाले का दीवाला निकाल देती हैं. और जब दोनों मिल जाएँ, तब बेचारे गृहपति का क्या अंजाम होता होगा, ये सभी विवाहित लोग जानते हैं.

घरवाली:

पत्नी वर्किंग हो या नॉन-वर्किंग, उसकी नज़र हमेशा पति की जेब पर रहती है. अब भले ही कभी रोमांटिक मूड में आप पार्क में टहलते हुए पत्नी की कमर में हाथ डाल कर चलें, उस समय भी पत्नी का हाथ कमर के बजाय आपकी जेब में ही होगा.

एक कवि से किसी ने पूछा --आपको अपनी पत्नी पर सबसे ज्यादा गुस्सा कब आता है। वो बोला-- जब वो मेरी जेब टटोल रही होती है. एक तो वैसे ही हम कवियों की जेब में कुछ ख़ास नहीं होता , ऊपर से वो छुट्टे भी नहीं छोड़ती.


दीवाली:

पहले भले ही दीवाली अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक रही हो, लेकिन अब तो ये बॉस की चमचागिरी, नेताओं से संपर्क बनाये रखने , बिजनेस पार्टनर्स को खुश रखने और पड़ोसियों से हेलो हाय कहने का साधन मात्र रह गयी है.

पर दीवाली
का एक और रूप सताता है। और वो है घर का सारा कूड़ा करकट निकाल, घर की सफाई करना, फिर चाहे मन कितना ही मैला रह जाये।

अब घर का हाल तो गाँव की नई नवेली बहु जैसा होता है, जब तक घूंघट में रहती है, तब तक सुन्दर लगती है। घूंघट हटते ही असलियत सामने आ जाती है। घरों का भी यही हाल होता है, भले ही घर कितना ही साफ़ दिखे, कार्पेट या पर्दे हटाइये, तो धूल ही धूल मिलेगी. रोज सफाई होती रहे, लेकिन फिर भी ढेरों धूल इक्कट्ठी हो जाती है.

ऊपर से हम सारे साल मस्त रहते हैं, लेकिन दीवाली पर सारे छोटे छोटे नुक्श दिखने लगते हैं और रिपेयर का काम शुरू।

कारीगर:

वैसे तो हिन्दुस्तान में कारीगरों की कोई कमी नहीं है. पर दीवाली पर कारीगर भी एक रेयर कोमोडिटी बन जाते हैं.
फिर उनसे रेट तय करना कौन सा आसान.समझ में नहीं आता की काम कराया कैसे जाये.
उनके तीन तरीके होते हैं, काम करने के।


१। दिहाडी पर -- लेकिन दिहाडी पर एक दिन का काम तीन दिन में पूरा होगा, ये निश्चित है.

२.ठेके पर: ---अगर ठेका सिर्फ लेबर का दिया, तो भी एक दिन का काम तीन दिन में ही होगा.
हाँ, ठेके की रकम तीन दिन की दिहाडी के बराबर होगी।


३. ठेका सामान सहित:-- यही रास्ता सबसे आसान लगता है, लेकिन इसमें भी एक दिन का काम तीन दिन में ही ख़त्म होता है. लेकिन पैसे वो आपसे ६ दिहाडी के कमा लेगा.
इनमे ज्यादातर तो अंगूठा छाप होते हैं, लेकिन इनके लिए एक अच्छे खासे पढ़े लिखे आदमी को बेवकूफ बनाना इनके बाएँ अंगूठे का काम है.
अब हमें तो यही सोचकर दिल समझाना पड़ता है की चलो इसी बहाने हमने एक अपने से भी ज्यादा गरीब इंसान की मदद कर दी।


अब भैया, लेबर तो लेबर है , उसे दिहाडी से ज्यादा कमाने की ज़रुरत ही नहीं है। इसलिए पूरे ठेके पर भी वो १० से ५ तक ही काम करते हैं. उन्हें कोई जल्दी नहीं होती.

अपनी व्यथा:

दीवाली से पहले का आखरी वीकएंड. दीवाली इतने पास, लेकिन घरवाली दूर.
जी हाँ, श्रीमती जी तो स्त्री रोग कार्यशाला ( गायनी कोंफेरेंस ) में चली गयी और हमें फरमान दे गयी की कारपेंटर, प्लंबर, इलेक्त्रिसियन और मेसन के सारे काम करा देना।


तो भई, आज मैडम तो स्त्री शक्ति के प्रदर्शन में लगी थी, और हम घर में मिस स्त्री ( मिस्त्री) के साथ घर की मरम्मत में जुटे रहे। वैसे ऐसे मौके पर कौन्फेरेंस!! मुझे तो ये लेडी डॉक्टरों की कौन्फेरेंस कम, कोंस्पिरेसी ज्यादा लगती है, अपने पतियों को काम में पेलने के लिए.

श्रीमती जी ने अब तो मायके जाना भी कम कर दिया है. जाती भी हैं तो ,एक दो घंटे के लिए.
उधर अब तो हॉस्पिटल में नाईट ड्यूटी भी ख़त्म। यानि अपनी तो सारी आज़ादी ही ख़त्म।


पर भैया, ब्लेसिंग इन डिस्गाइज भी तो कोई चीज़ होती है।

हमने भी इस आकस्मिक मिली आज़ादी का भरपूर फायदा उठाया. जब से ब्लोगिंग शुरू की है, तब से पहली बार हम सारे दिन कंप्यूटर पर बैठे रहे, बे रोक टोक.
और जाने कितने ही ब्लोग्स पर सर्वप्रथम टिप्पणीकार होने का इनाम पाया। और दिनों तो इस मामले में हम फिस्सड्डी ही रह जाते थे समय की कमी के कारण.


सरप्राइज तो ये की घर के सारे काम भी हो गए और जब श्रीमती जी घर आई तो घर, घर जैसा लग रहा था।

वैसे भी घर चार दीवारों से नहीं , इंसानों से बनता है. आपसी प्रेम से बनता है.

Friday, October 9, 2009

अजी देर किस बात की, आज से ही शुरू कीजिये ---


बचपन में एक कहानी सुनी थी ---
एक शरीफ आदमी रास्ते पर चला जा रहा था। अचानक उसके पैर में शूल घुस गई. बेचारा पैर पकड़ कर बैठ गया और रोने लगा. तभी वहां से एक दुष्ट किस्म का व्यक्ति गुज़रा, जो बड़ा खुश नज़र आ रहा था. पूछने पर पता चला की खुश इसलिए था क्योंकि उसे २००० रूपये का खजाना मिला था. इतने में एक साधू वहां से गुज़रा. उसने शरीफ आदमी से पूछा-- भाई क्यों रो रहे हो?


आदमी बोला-- मैं सारी जिंदगी अच्छे कर्म करता रहा, फिर भी मुझे ये मोटी सूल(शूल) गड़ गई, और ये पापात्मा, सारी जिंदगी कुकर्म करता रहा है, फिर भी इसे खजाना मिल गया. ये कैसा इन्साफ है?


इस पर साधू ने कहा-- भले आदमी, ये पुराने जन्म के कर्मों का फल है।

तेरे पिछले जन्म के कर्म इतने ख़राब थे की तुझे तो आज सूली टूटनी थी। लेकिन तेरे इस जन्म के कर्म इतने अच्छे हैं की तेरी सजा घट कर सिर्फ सूल रह गयी है.


और ये जो मूर्ख २००० पाकर खुश हुआ जा रहा है, इसे तो अपने पिछले अच्छे कर्मों की वज़ह से आज दो लाख मिलने थे, लेकिन इसने इस जन्म में इतने बुरे कर्म किये की इसका इनाम घटकर सिर्फ २००० ही रह गया.
इसलिए बच्चा, दुखी मत हो.
आदमी ने कहा, ये बात है और फ़ौरन खींचकर कांटे को निकाल दिया।


पिछली पोस्ट से क्रमश:


यूँ तो लोदी गार्डन घर से ज्यादा दूर नहीं है, और अक्सर पास से आना जाना होता रहता है. लेकिन पार्क में घुसते ही अहसास हुआ की पिछली बार हम वहां १५ साल पहले गए थे , अपने चुन मुन के साथ. इस बीच बच्चे भी बड़े हो गए और पार्क में भी बहुत बदलाव आ चुका था. बांस के पुराने पेड़ अभी भी हैं, लेकिन छोटे बड़े नयी नयी किस्म के सजावटी पेडों की बहुतायत आ गयी है ।


सुबह शाम, बुजुर्गों के दर्शन अभी भी हो जाते है टहलते हुए।


लेकिन जहाँ पहले झाडियों से कबूतर कबूतरी की घूटरघुन की आवाजें आती थी, आजकल खुले आम चोंच से चोंच टकराते नज़र आते हैं।


खैर, हम उस स्पॉट पर खड़े थे जहाँ ३० साल पहले काला पत्थर के गाने की शूटिंग हुई थी। एक पल के लिए हम अतीत में पहुँच गए. आँखों के आगे धुंद सी छाने लगी. अपनी नंदनी, जीवन संगिनी, अर्धांगनी हमें प्रवीण बेबी सी नज़र आने लगी. मन में आया की चलो आज बाथरूम से निकल कर पार्क में गाना गाया जाये अपनी सपना के साथ. अभी गला वला दुरस्त कर ही रहे थे की तभी --


उस स्पॉट पर ये मेहमान आ कर बैठ गए।





शेर जैसा ये कुत्ता, शायद मादा थी. इसके लिए कोई और शब्द मैं इस्तेमाल नहीं करना चाहता. अपने बच्चे के साथ आई थी, ज़ाहिर है मादा ही होगी. अब कुत्ते इंसान जैसे सोफिस्तिकेतेड तो हो नहीं सकते, की पहले शादी करें फिर बच्चे, फिर कुछ साल बाद तलाक का केस लड़ें और बच्चे भी आधे आधे।


इन्हें देखते ही रोमांस तो रफूचक्कर हो गया, उसकी जगह रोमांच हो आया.
अनायास ही मैंने उनकी तस्वीर ली, लेकिन दिल नहीं माना और सोचा की पास से ली जाये. लेकिन उसका डील डोल देखकर हिम्मत नहीं पड़ी।


पास बैठे कुछ लोग ताश खेल रहे थे, शायद पार्क के कर्मचारी थे. उनसे इनके मालिक के बारे में पूछा तो देखकर दंग रह गया. वहां मालिक नहीं, दो नौकर बैठे थे जो उनको घुमाने लाये थे।

मौसम सुहाना था , फिर भी कुत्ता छाँव में बैठा जीभ निकालकर हांफ रहा था। ज़ाहिर है , उसे गर्मी लग रही थी. भई, किसी अंग्रेज़ का चहेता था, ऐ सी में रहने की आदत होगी.


सारी हालात जानकार अब शुरू हुआ --अंतर्मंथन---मन में विचारों की उठक पटक।


इस कुत्ते ने क्या किस्मत पाई है. जहाँ हम १५ साल बाद आये हैं, ये वहां रोज़ आता होगा. ज़रूर पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे।


अगर अच्छे कर्म किये होते तो कुत्ते का जन्म क्यों मिलता।


बात तो ये भी सही है. पर हुआ यूँ होगा की पहले तो कर्म बुरे रहे होंगे, लेकिन देह त्यागने से पहले यानी वानप्रस्थ अवस्था में कर्म सुधार लिए होंगे. इसलिए विधाता ने कहा होगा ---जा तेरे अच्छे कर्मों की वज़ह से तू इंसानों से भी ज्यादा सुख भोगेगा।


अगर कर्म इतने ही अच्छे हो गए थे तो जन्म भी इंसान का ही मिलना चाहिए था.

विधाता ने कहा होगा, बेटा अच्छे कर्म करने में तुमने थोडी देर कर दी, क्योंकि तब तक तुम्हारा जन्म अलोट हो चूका था. अब जन्म तो तुम्हे कुत्ते का ही लेना पड़ेगा, लेकिन तुम्हारे अच्छे कर्मों की वज़ह से तुम इंसानों से भी बेहतर जिंदगी जीयोगे।


मोरल ऑफ़ स्टोरी :


अच्छे कर्म करने के लिए किसी मुहूर्त की ज़रुरत नहीं है. आज से ही शुरू करें.
इट इज नेवर तू लेट।


और अब --एक सवाल :

इस कुत्ते की नस्ल क्या है?

ज़वाब:

भई, हमें तो पता नहीं, क्या आप बता सकते है?

Friday, October 2, 2009

अतीत के झरोखे से ---






















जिंदगी में हम इतना व्यस्त रहते हैं की अक्सर छोटी छोटी खुशियों का आनंद लेना ही भूल जाते है। आचार्य रजनीश (ओशो ) ने कहा था --तुमने कभी किसी फूल को देखा ? डाल पर लगे , हवा के हलके से झोंके से लहराते फूल को देखिये एक टक, आपको शकून मिलेगा। किसी पेड़ की शीतल छाया में बैठकर , आँखे मूंदकर , पक्षियों की चहचाहट को सुनिए, आपको परम शान्ति का अहसास होगा।






डॉक्टरों का भी यही कहना है की , रोज सुबह सैर को जाइए, वॉकिंग करिए, जॉगिंग करिए , या फ़िर सबसे बढ़िया --वॉगिंग करिए। वौगिंग मतलब-- ब्रिस्क वॉकिंग। अब कितने लोग ये सलाह मानते हैं, ये तो इसी से पता चलता है --४० से ऊपर के आम लोग तो क्या , ख़ुद डॉक्टरों के पेट बाहर निकले होते हैं। बौलीवुड के एक्टर्स को छोड़कर भला कितने लोग दिखाई देते हैं लीन एंड थिन।



यह दिल्ली वालों का सौभाग्य है की यहाँ डी डी ऐ की हर कॉलोनी में कम से कम एक पार्क तो होता ही है। इसके आलावा नई दिल्ली में अनेको ऐसे पार्क है जहाँ लोह सैर और पिकनिक के लिए जाते हैं। इनमे प्रमुख हैं --नेहरू पार्क, डीअर पार्क, बुद्धा गार्डन, सी पी का सेन्ट्रल पार्क, इंडिया गेट के लोंस और नए पार्क जैसे मिलेनियम पार्क, गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसेस और जैपनीज पार्क। लेकिन इन सबसे पुराना और सुंदर पार्क है --लोदी गार्डन।

लोदी गार्डन


लोदी एस्टेट में बना ये पार्क , एक तरफ़ जोरबाग, दूसरी तरफ़ खान मार्केट और लोदी एस्टेट की वी आई पी जेन्ट्री का चहेता पार्क है। यहाँ सुबह शाम डिप्लोमेट्स, नेतागण और ब्यूरोक्रेट्स आपको घुमते नज़र आयेंगे, अक्सर अपने कुत्तों के साथ। हालाँकि दिन में , ये प्रेमी युगलों का अस्थायी वास बना रहता है।







लोदी गार्डन के मुख्य आकर्षण हैं, सिकंदर लोदी (१४७४-१५२६) के समय के बने गुम्बद। इनमे सबसे पहले नज़र आता है, बड़ा गुम्बद । आयताकार गुम्बद के चारों ओ़र चार द्वार नुमा झरोखे हैं, जिनसे पार्क का चारों दिशाओं का बेहद खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।






बड़ा गुम्बद




और ये है, शीश गुम्बद. इसमें ५०० साल पुराने नीले रंग के शीशे की टाइल्स अभी तक देखी जा सकती हैं. इस गुम्बद में आठ कब्रें बनी हैं, किसकी, ये कोई नहीं जानता.









अतीत के झरोखे से





आज से पूरे तीस साल पहले की बात है. उस समय मैं मेडिकल कोलिज के फाइनल ईअर में था. पता चला की लोदी गर्दन में फिल्म काला पत्थर के एक गाने की शूटिंग चल रही थी. तो भई, कोलिज से बंक मारा और पहुँच गए शूटिंग देखने. गाने के बोल थे:

बाहों में तेरी, मस्ती के घेरे


सासों में तेरी, खुशबू के ढेरे

मस्ती के घेरों में, खुशबू के ढेरों में

हम खोये जाते हैं ----




ये रोमांटिक गाना फिल्माया गया था , शशि कपूर और परवीन बेबी पर. मझे याद है शशि कपूर ने केमल कलर की हाफ शर्ट और काली पेंट पहनी हुई थी और गज़ब के स्मार्ट लग रहे थे. परवीन बेबी ने काला सूट और उसपर पिंकिश रेड कलर की सलवार और इसी कलर का मैचिंग दुपट्टा. मार्च की सुहानी नर्म धुप में उनका गोरा रंग , सोने की तरह दमक रहा था.
यह पहला और आखिरी मौका था जब मैंने किसी बोलीवु के हीरो हिरोइन को इतने करीब से देखा था.

और अब इस चित्र को देखिये. यही वो स्पॉट है, जहाँ इस गाने की शूटिंग हुई थी .
प्रष्ठ भूमि में किले नुमा दीवार, उसके आगे पेडों की कतार और इनके आगे खड़े थे हम पब्लिक में धक्का मुक्की करते हुए.










इस स्पॉट के बाएँ तरफ जो पेड़ दिखाई दे रहे हैं, इन्ही को गाने का बैक ग्राउंड रखा गया था. यानि इस तरफ पब्लिक नहीं जा सकती थी.
अभी कुछ दिन पहले यहाँ इत्तेफाक से जाना हुआ अपनी जीवन कंपनी की ५० % की पार्टनर, यानि जीवन संगिनी के साथ . इस स्पॉट पर खड़े खड़े वो पल याद आ गए . एक पल के लिए हम मुन्घेरी लाल बन गए और अतीत की यादों में खो गए.









कोलिज के दिनों में हम जब भी अमिताभ की फिल्म देखकर निकलते, तो खुद को भी अमिताभ समझने लगते थे. छाती फुलाकर और गर्दन को दो इंच ऊंची करके अन्दर से हीरो होने का अहसास सा होता था. लेकिन घर पहुँच कर शीशे में चेहरा देखते ही सारी हवा निकल फुस हो जाती थी. उस दिन भी एक पल हम खुद को शशि कपूर समझ बैठे और अभी गाना गाने का मूड बनाने ही लगे थे की तभी ----


आगे क्या हुआ, ये जानने के लिए अगला एपिसोड पढना मत भूलिए.


अंत में, देखिये ये छोटा सा बंगला नुमा कॉटेज , जो प्रवेश द्वार के पास बना हुआ है, घने पेडों के बीच. सामने छोटा लेकिन बहुत हरा भरा बगीचा, चारों ओ़र हरियाली. खिड़कियों में रखे पोधों के गमले, बहुत मनोरम द्रश्य प्रस्तुत करते हुए. कुल मिलकर बहुत ही सुन्दर.




एक सवाल :क्या आप सोच सकते हैं, यहाँ कौन रहता होगा?माली, मेनेजर या फिर पार्क निदेशक?
ज़वाब :
जी नहीं ये किसी का निवास नहीं. ये शौचालय है. न चाहते हुए भी आप एक बार इसका इस्तेमाल ज़रूर करना चाहेंगे. और यकीन करिए, शायद ये जीवन का सबसे अच्छा अनुभव होगा. काश, की ऐसे शौचालय बाहर भी सब जगह मिले ताकि २८ सितम्बर के हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी तस्वीरें तो न देखनी पड़ें.