Sunday, November 29, 2009

लीजिये घर बैठे ही सैर कीजिये, अंतर्राष्ट्रीय व्यपार मेले की ---

पिछली पोस्ट से आगे ---

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला देखने का अपना द्विदिवसीय कार्यक्रम आख़िर कामयाब रहा। द्विदिवसीय इसलिए की एक दिन तो मेले में एंट्री करने का जुगाड़ करने में ही निकल गया। हालाँकि मैं तो रिसर्च कहूँगा। हुआ यूँ की पहले दिन जब हम मेला पहुंचे तो पार्किंग के गेट पर अटेंडेंट ने बताया---- ज़नाब, पार्किंग फीस ७० रूपये है और एंट्री का टाइम भी ख़त्म हो चुका है। मैंने कहा भाई, पार्किंग के लिए ७० हमारे पास होते तो क्या हम ऐसे होते। शुरू में ही बिजनेस टिकेट लेकर एंट्री मारते। खैर , पहला दिन हमने जानकारी जुटाने में लगाया और पूरी तरह से जानकारी से लैश होकर , हमने अगले दिन का प्रोग्राम बनाया।

अगले दिन ---टिकेट पेट्रोल पम्प से लेकर, इंडिया गेट पर ३० रूपये में गाड़ी पार्क करके, पार्क एंड राइड सुविधा का फायदा उठाया और मेले की गाड़ी में बैठकर , पहुँच गए । लगा अरे, ये तो बड़ा आसान था। लेकिन गेट तक पहुँचते ही पुलिस वाले की आवाज़ सुनाई दी --- अरे गेट बंद करो, टाइम हो गया है। शायद उस गेट से घुसने वाले हम आखरी सेनानी थे

अब आगे का हाल, सचित्र ---


परेशान भीड़, भीड़ से हम परेशान

अन्दर आते ही सड़कों पर जो भीड़ का हांल देखा तो लगा की पवेलियंस के अन्दर तो जाना ही मुश्किल होगा। लेकिन बाद में पता चला की सारी भीड़ बाहर ही थी , पवेलियंस तो खाली पड़े थे।

शायद मंदी की मार मेले पर भी पड़ी थी


थोड़ा आगे चलने पर ये ओपन एयर विश्राम्ग्रह नज़र आया, जहाँ थके हारे लोग टांगों को आराम और विश्राम दे रहे थे। यहाँ एक पति- पत्नी में हुए संवाद प्रस्तुत हैं ---

पति: बहुत हो गया, चलो अब घर चलते हैं
पत्नी: क्या बहुत हो गयाअभी तो कुछ भी नही देखा
पति: इतना टाइम नही है मेरे पास
पत्नी: लेकिन मेरे पास बहुत टाइम है

पति- पत्नी का आपस का मामला समझ हम तो आगे बढ़ गए



ओपन एयर थियेटर में , लक्षद्वीप का लोक नृत्य ---

ग्रामीण दस्तकारों द्वारा बनाई गई ये ये भव्य कलाकृति देखने लायक थी

रंगों की ये छटा तो इतनी मनभावन थी की अब तक की सारी थकान इसे देखकर छूमंतर हो गई


हस्त- शिल्प पर्दार्शिनी से बाहर निकले तो पहुँच गए इन वादियों में ---
जी हाँ, मेले के बीचों बीच ये मानसरोवर झील , थके मांदे पर्यटकों को शकुन प्रदान करती हुई


अब तक हमको भी थोड़ी थकान महसूस होने लगी तो , गर्मागर्म कॉफ़ी पीकर फ़िर तारो ताज़ा हो गए।
वैसे डाइटिंग पर हैं, इसलिए कॉफ़ी पीकर ही काम चला लिया ऐसे मौके पर डाइटिंग का बहाना बड़ा किफायती रहता है

लेकिन जो लोग डाइटिंग पर नही थे, उनके लिए खाने पीने का अच्छा इंतजाम था यहाँ देखिये खाते- पीते लोग , खाते और पीते हुए और अपने हिन्दुस्तानी होने की छाप भी छोड़ते हुए


अंतर्राष्ट्रीय पेवेलियन की चकाचोंध तो गज़ब की थी

फ़िर शाम होने आई और बत्तियां जल आई

एक मनोरम द्रश्य ---

अब तक हम श्रीमती जी को सफलता पूर्वक बाहर ही घुमाते रहे थे। लेकिन अब तक उनकी स्त्री सुलभ शक्ति जाग उठी थी। जैसे ही कर्नाटक का पेवेलियन आया, मेडम एक्सिट गेट से ही अन्दर घुस गई, और हम खड़े खड़े लोगों का बाहर आना देखते रहे। उधर आगे आगे श्रीमती जी और पीछे पीछे सिक्युरिटी गार्ड। लेकिन बेचारे गार्ड की क्या बिसात थी। आख़िर लास्ट वाली स्टाल से कुछ खरीदकर ही निकली। बाद में पता चला वो स्टाल जयुएलरी की थी।
शुक्र रहा की आर्टिफिशियल जयुएलरी की ही दूकान थी, तो बस ९०० का ही चूना लगा
कर्नाटक पेवेलियन


आन्ध्र प्रदेश पेवेलियन



राजस्थान पेवेलियन में , चूड़ियों की खनखनाहट ---

अंत में , गर दिल्ली का पेवेलियन नही देखा तो क्या देखा

और इस तरह पूरी हुई , मेले की सैर। इस बीच श्रीमती जी तो छोटी मोटी खरीदारी करती रही, मोटी तो खैर नही।
लेकिन हमने तो अपने लिए खरीदा बस एक शीशी आयुर्वेदिक तेल , बालों के लिए
क्योंकि मुझे इस दुनिया में दो ही चीज़ों के घटने की चिंता लगी रहती है ---
एक हिमालय के ग्लेशियर्स की और दूजे हमारे सर के बाल

बाकि सब तो बढ़ ही रहे हैं, फ़िर चाहे वो आबादी हो या महंगाई, प्रदुषण हो या भ्रष्टाचार , आतंकवाद हो या अलागवाद

21 comments:

  1. बढिया सैर करवाई है, हमने पिछली बार की थी इस बार नई नई क्या चीजें आई हैं वो जरुर बताईयेगा।

    ReplyDelete
  2. तलवार के धनी राजस्थान का पैवेलियन अब चूड़ियाँ पहुँचा रहा है।
    मेले की अच्छी प्रस्तुति! पाबला जी तो खास इसी मेले के लिए दिल्ली पहुँचे थे। पर तब तक आम प्रवेश बंद था। ब्लागर मीट कर के ही वापस लौट लिए और हम भी।

    ReplyDelete
  3. वाह वाह क्या तस्वीरें हैं देख कर मन म्न्त्रमुग्ध हो गया तो आपने जुगाड फिट कर ही लिया। अब आपकी पोस्ट देख कर तो अपना भी मन हो गया कोई जुगाड फिट करने का। क्या आप हमे टिकेट दिलवा सकते हैं? बहुत बहुत धन्यवाद इस जानकारी के लिये

    ReplyDelete
  4. डा. दराल जी ~ अनेकानेक धन्यवाद् ! बहुत बढ़िया ! जो शायद स्वयं जाने पर भी नहीं आता! और यहाँ पर में क्षमा चाहूँगा कहते या लिखते कि मैं इस वर्ष नहीं २-३ वर्ष पहले मेट्रो से गया था अपने पडोसी छोटे भाई के और उसकी पत्नी के भी साथ, क्यूंकि अब उनके दोनों जवान बेटे उनके साथ नहीं रहते 'पापी पेट' के कारण...

    मुझे साथ- साथ यह भी याद आ रहा है कि किसी ने, जो बनारस विश्वविद्यालय में पढ़े, कभी कहा था मुझे कि रंगीन चित्र तो बनारस के घाट के भी अच्छे लगते हैं !

    ReplyDelete
  5. डाक्टर साहब आपके आभारी हैं जो आपने बिना धक्का मु्क्की मुफ़्त मे मेले के सैर करवा दी, धन्यवाद

    ReplyDelete
  6. द्विवेदी जी, ये पोस्ट ख़ास आपके, पाब्ला जी और निर्मला जी के लिए लिखी है. लेकिन चूड़ियाँ तो स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं, और इनकी अहमियत को नकारा नही जा सकता.

    ReplyDelete
  7. अच्छी सैर हुई वो भी सचित्र. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  8. बढियां चित्रमय रपट !

    ReplyDelete
  9. बढियां चित्रमय रपट !

    ReplyDelete
  10. बहुत बढि़या। हम घर बैठे ही सैर कर लिए।

    ReplyDelete
  11. वाह डॉक्टर साहब, इतनी दूर बैठे आपने कमी नहीं महसूस होने दी. आपने इस बेहतरीन तरीके से शिरकत करा दी कि लगा, वहीं हैं.

    बहुत बहुत आभार!!

    ReplyDelete
  12. धन्यवाद जी आपने तो वाकई पूरी सैर करवा दी...बहुत बहुत धन्यवाद आपका...मैं नहीं गया था.

    ReplyDelete
  13. दराल सर,
    बड़े सालों से ट्रेड फेयर नहीं देखा था...आपने घर बैठे जानदार तस्वीरों के साथ दिखा दिया...

    वैसे शादी के बाद तो ऐसी जगहों पर परिवार के साथ जाने पर पतियों की हालत मोबाइल एटीएम जैसी ही रह जाती है...हां शादी से पहले हम भी दोस्तों के साथ ज़रूर ट्रेड फेयर का भरपूर आनंद लेते थे...स्टाल्स से ज़्यादा ध्यान खूबसूरत मॉ़डल्स पर ही रहता था...(अरे...अरे...डॉक्टर साहब आप भी न...क्या क्या समझ लेते हैं...मेरा मतलब स्टाल गाइड्स से नहीं कार, बाइक, एरो मॉडल्स से था...)

    समझा कीजिए कभी-कभी पत्नीश्री भी ब्लॉग्स पर नज़र दौड़ा लेती है...

    गुरुदेव के आने का पलक-पावड़े बिछा कर इंतज़ार कर रहा हूं...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  14. सुंदर चित्रों की झाँकियों के साथ पता नही किटनेस आलों बाद हमने भी देख लिया व्योपार मेला ...... आपने बीच बीच में इतना कमाल क लिखा की माले का भरपूर मनोरंजन भी ले लिया ........ आपका बहुत बहुत आभार .....

    ReplyDelete
  15. ट्रेड फेयर की सैर आपने घर बैठे ही करवा दी पर आप बढे कंजूस है अपनी धर्मपत्नी को सस्ते में ही टाल दिया। कभी हमारे उत्तराखण्ड भी तशरीफ लाइये। सभी चित्र सजीव जान पडते है अच्छे फोटोग्राफ के लिए बहुत ही बधाई ऎसे ही हंसाते रहिए सभी ब्लागर्स को।

    ReplyDelete
  16. खुश्दीप भाई, अच्छा है --पत्नी के सामने शरीफ बनकर रहना.
    ए टी एम वाली बात पसंद आई.

    सुनीता जी, जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज़ मे लेना बहुत ज़रूरी है.

    ReplyDelete
  17. आखिर आप सब को दर्शन करवा कर ही छोड़े..

    अगला दर्शन स्थल कौन होगा. ये पहले बता देंगे तो ठीक रहेगा.

    ReplyDelete
  18. मेले में घूमने के आकर्षण से कौन बच पाया है.. तस्वीरो को देख कर तो मेरा मन भी मचल रहा है ..। मै भी सोच रहा हूँ .. अकेले हो ही आऊँ.. आयुर्वेदिक तेल लेना है भाई !!!

    ReplyDelete
  19. `लेकिन हमने तो अपने लिए खरीदा बस एक शीशी आयुर्वेदिक तेल , बालों के लिए। '

    अच्छा किया बता दिया..वो बालों वाला तेल था :)
    दर्शन स्थल की सैर कराने के लिए शुक्रिया... नवाज़िश॥

    ReplyDelete
  20. हा हा हा ! परसाद जी , कोकास जी। ये भी खूब रही।
    लेकिन तेल तो बालों का ही खरीदा था।

    ReplyDelete
  21. आपकी और हमारी चिंता एक ही है....हिमालय के ग्लेशियर्स और सर के बाल तो घटते ही जा रहे हैं...:-(

    ReplyDelete