Wednesday, December 9, 2009
दिल्ली का निगम बोध घाट --एक अन्तिम पड़ाव ---दी अल्टीमेट डेस्टिनेशन.
जी हाँ, निगम बोध शमशान भूमि, कश्मीरी गेट के सामने , रिंग रोड पर यमुना के पश्चिमी किनारे पर बना है।
मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही आप एक ऐसे वातावरण में पहुँच जाते हैं, जहाँ पहुंचते ही आपके चेहरे के भाव स्वत: ही बदल जाते हैं। मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों का ताँता एक बारगी ठप सा हो जाता है।
कुछ पलों के लिए मस्तिष्क शून्य हो जाता है।
यहाँ का माहौल ही कुछ ऐसा है।
एक तरफ़ वातावरण में लाउड स्पीकर पर गूंजते भजन, शब्द और धार्मिक गीत आपके विचलित मन को शांत करने का काम करते हैं, वहीं वायु में फैली लकड़ियों और मानव मृत शरीर के हाड -मांस के जलने की मिश्रित गंध , आपको आभास दिलाती हुई की संसार में सब मिथ्या है। जीवन की यही सच्चाई है की एक दिन हम सबको इसी गंध का हिस्सा बन जाना है।
यहाँ से बाहर ये गंध आपको कहीं नही मिलेगी। यही तो विशेषता है इस जगह की --क्योंकि यही अन्तिम पड़ाव है।
बाहरी संसार में रहते हुए हम ये कभी सोच भी नही पाते की इस संसार में कुछ भी स्थायी नही है, सब कुछ नश्वर है।
फ़िर किस बात का झगडा, किस बात की लड़ाई।
क्या तेरा है, क्या मेरा है।
सब यहीं तो रह जाना है।
फ़िर भी हम रेगिस्तान के मृग की तरह अंधाधुंध दौड़ते रहते हैं, एक अनजानी पिपाषा में।
आज फ़िर उस द्वार जाना हुआ ,
आज फ़िर इक दोस्त रवाना हुआ।
नोट : यह पोस्ट लिखी गई है , पंजाब केसरी के वरिष्ठ पत्रकार , श्री कैलाश भारद्वाज की स्मृति में , जिनका २७ नवम्बर को असामयिक निधन हो गया। आज उनकी रस्म- पगड़ी थी।
कैलाश जी एक लंबे अरसे से बीमार थे , और हमारे यहाँ ही इलाज़ करा रहे थे। अस्पताल से जब छुट्टी हुई , तो मुझसे मिलकर गए और विशेष रूप से धन्यवाद कर के गए , उनका पूरा ध्यान रखने के लिए । लेकिन वही हमारी अन्तिम मुलाकात थी।
इश्वर से प्रार्थना है की उन्हें अपने चरणों में जगह प्रदान करे और शोक संतप्त परिवार को इस क्षति को सहन करने की शक्ति दे।
Sunday, December 6, 2009
यदि अंग अंग पर रंग बसंती छा जाए तो क्या हो ---
ये प्रसिद्ध गाना तो सबने सुना होगा।
अंग बसंती, संग बसंती, रंग बसंती छा गया।
ये भी आपने सुना होगा।
अब ज़रा सोचिये , यदि कपड़ों के बजाय ये बसंती रंग , अंग अंग पर छा जाए तो क्या हाल होगा।
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ , जौंडिस यानि पीलिया की , जिसमे शरीर के अंग पीले हो जाते हैं। विशेषकर नवजात शिशुओं में, जिनका पूरा शरीर पीला हो जाता है, यदि जौंडिस हो जाए।
जौंडिस या पीलिया कोई बीमारी नही है, बल्कि एक बीमारी का लक्षण है, जिसे हिपेताईतिस ( hepatitis) कहते हैं।
यूँ तो जौंडिस के कई कारण होते हैं, लेकिन वाइरल हिपेताईतिस सबसे प्रमुख कारण है।
वाइरल हिपेताईतिस के प्रकार : ऐ, बी, सी, डी, और इ।
क्यों होती है वाइरल हिपेताईतिस ?
ये एक वाइरल इन्फेक्शन होता है, जो लीवर की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। लीवर में इन्फेक्शन होने से लीवर बढ़ जाता है । इसके साथ साथ रक्त में बिलीरूबिन की मात्रा बढ़ने से पीलिया हो जाता है.
प्रारंभिक लक्षण :
सबसे पहले हल्का बुखार होता है। फ़िर धीरे धीरे आँखें पीली दिखने लगती
हैं और पेशाब भी पीला आने लगता है।
साथ में भूख न लगना , कमजोरी होना और उल्टियाँ भी हो सकती हैं।
इन्फेक्शन के मुख्यतय दो रूट होते हैं --
एक खाने -पीने के द्वारा --जिससे हिपेताईतिस ऐ और इ होती हैं।
दूसरा रूट है ---रक्त द्वारा। ---जिससे हिपेताईतिस बी, सी, और डी होती हैं।
इनमे सबसे खतरनाक होती है --हिपेताईतिस बी।
इसके मुख्य कारण हैं --
हिपेताईतिस बी पोजिटिव ब्लड ट्रांसफ्यूजन ।
संक्रमित रक्त से नीडल परिक या जख्म पर रक्त का संपर्क ।
असुरक्षित यौन सम्बन्ध।
गर्भवती माँ से शिशु को इन्फेक्शन।
कुछ तथ्य :
विश्व में २०० करोड़ लोग हिपेताइतिस से या तो पीड़ित हो चुके है या पीड़ित हैं, यानि विश्व की ३० % आबादी इससे प्रभावित होती है।
इनमे से ३५ करोड़ पूरी तरह से ठीक नही होते और क्रोनिक रोग के शिकार हो जाते हैं। यानि इनमे बीमारी के लक्षण और संक्रमण दोनों बने रहते हैं।
इन ३५ करोड़ लोगों में से 15-25 % को जीवन में लीवर कैंसर या सिरोसिस होने की संभावना रहती है।
प्रति वर्ष ६ लाख लोग अकाल इस रोग से काल के ग्रास बन जाते हैं।
एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है की जहाँ ५ साल से ऊपर के बच्चों और वयस्कों में सिर्फ़ ६ % को ही क्रोनिक हिपेताइतिस होने की सम्भावना रहती है, वहीं एक साल तक के शिशुओं में ९० % शिशु क्रोनिक रोग के शिकार होते हैं।
ज़ाहिर है की नवजात शिशुओं को बचाव की सबसे ज्यादा ज़रूरत है।
बचाव के तरीके :
यूँ तो ये रोग अपने आप ही ठीक हो जाता है, ४-६ सप्ताह में , लेकिन जैसा की हमने देखा , छोटे बच्चों में क्रोनिक होने की सम्भावना अधिक होती है। अगर ६ महीने में भी ठीक नही हुआ तो फ़िर ठीक नही होता और क्रोनिक फॉर्म हो जाता है।
बचाव में ही सुरक्षा है।
यदि ब्लड की ज़रूरत पड़े तो अधिकृत केन्द्र से ही ब्लड प्राप्त करें।
हिपेतातिस बी पोजिटिव व्यक्ति के रक्त से संपर्क न होने दें। न ही यौन सम्बन्ध बनायें ।
याद रखें :
खता बेवफा से ही नही होती , वफादार भी गुनहगार हो सकते हैं ।
यानि न सिर्फ़ अनैतिक यौन संबंधों से बचें, बल्कि यदि पति या पत्नी में एक को ये रोग हो गया हो तो , असुरक्षित सम्भोग से बचें। ऐसे में कंडोम का इस्तेमाल अनिवार्य है।
यदि गर्भवती माँ बी पोजिटिव है तो पैदा होते ही शिशु को हिपेताइतिस बी का टीका अवश्य लगवाएं।
बच्चों में टीकाकरण :
अपने नवजात शिशु को पैदाइश के २४ घंटे के अन्दर टीका लगवाएं। तद्पश्ताप, ६ सप्ताह और ६ महीने पर भी टीका लगवाएं ।
याद रखिये बचाव में ही सुरक्षा है।
दिल्ली सरकार हर वर्ष ४ दिसंबर को हिपेताइतिस दिवस मानती है। इस अवसर पर हमने भी जन जागरूकता के लिए एक पब्लिक लेक्चर का आयोजन किया था।
Friday, December 4, 2009
एक पहेली ---
अगली पोस्ट में , एड्स से १०० गुना ज्यादा संक्रामक बीमारी के बारे में बात करेंगे ।
क्या आप सोच सकते हैं, ऐसी कौन सी बीमारी है जो एड्स से भी १०० गिना ज्यादा संक्रामक हो सकती है ?
सोचिये सोचिये----
तब तक हम एक ब्रेक लेते हैं और देखते हैं, ये तस्वीर।

अब ज़रा बताइए इन बालिकाओं ने हाथों में क्या दबा रखा है।
दोनों का उत्तर आसान है, क्योंकि ज़वाब इसी तस्वीर में दिखाई दे रहा है।
फ़िर भी अगर मुश्किल लगे तो एक हिंट दिए देते हैं।
ये तस्वीर जिस जगह ली गई है, बाएं वाली बालिका ने हाथ में वही दबा रखा है।
दूसरा, ये की ये जगह श्री समीर लाल जी के निवास से करीब १०० किलोमीटर की दूरी पर है।
सही ज़वाब बताने वाले को मिलेगा ---सॉरी, ये तो ज़वाब देने के बाद ही बताएँगे।
वैसे श्री समीर लाल जी से अनुरोध है की स्वदेश आते समय , इनाम जीतने वाले के लिए , यही इनाम लेते आयें।
आपके ज़वाब का इंतज़ार रहेगा।
Tuesday, December 1, 2009
आज वर्ल्ड एड्स डे पर ---अपना बचाव, अपनों का बचाव ---
वो मुश्किल से १८-२० साल की सुकन्या थी। सुंदर गोल चेहरा, अश्रुओं में भीगा हुआ । मेरे कमरे के बाहर बैठी थी, गुमसुम, उदास, चुपचाप आंसू बहाती हुई। किसी का रेफरेंस लेकर आई थी, ऐ आर टी क्लिनिक में इलाज़ कराने के लिए । ज़ाहिर था, वो एड्स से पीड़ित थी। उसका खूबसूरत , मासूम चेहरा देखकर, और स्थिति का आभास होते ही, किसी का भी कलेजा मूंह को आ सकता था।
लेकिन एक डॉक्टर को इमोशनल होना नही होता। क्या करें, वी आर ट्रेंड लाइक देट।
सोचता हूँ, किस ने दी उसको ये भयंकर बीमारी ?
कहाँ से पकड़ा ये नाईलाज रोग ?
क्या मजबूरी रही होगी ?
कौन है उसका गुनाहगार?
कुछ इसी तरह के सवाल उठते हैं जहन में , एड्स का ख्याल आते ही।
क्या है एड्स :
एड्स का पूरा नाम है -- अक्वायेर्ड इम्यूनो- डेफिसियेंसी सिंड्रोम।
ये एक ऐसी बीमारी है, जिसमे शरीर में बाहरी संक्रमण से लड़ने की कुदरती ताकत ख़त्म हो जातीहै।
और इसका जिम्मेदार है, एक नानो साइज़ का वायरस --जिसे एच आई वी कहते हैं---यानि ह्युमन इम्यूनो देफिसियंसी वाइरस।
ये वाइरस शरीर में प्रवेश करने के बाद रक्त की सी डी -४ नाम की कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं, जिससे शरीर की संक्रमण से लड़ने की ताकत ख़त्म हो जाती है। और तरह तरह के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
क्या एच आई वी और एड्स एक ही बात है ?
जी नही, एच आई वी पोजिटिव होने का मतलब है --आपके शरीर में एड्स के वाइरस प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन ये ज़रूरी नही की रोग उत्पन्न हो गया हो।
एड्स --का मतलब है की वाइरस की वजह से शरीर में विकार उत्पन्न होने लगे हैं, यानि रोगों के लक्षण प्रतीत होने लगे हैं।
क्या हैं एड्स के लक्षण ?
१। लगातार वज़न का घटना।
२। लगातार हल्का बुखार रहना।
३। महीनो तक दस्त लगे रहना।
४। मूंह में छाले बने रहना।
५। शरीर में लिम्फ नोड्स का उभरना।
एड्स क्यों होती है ?
इसके ४ मुख्य कारण हैं ---
१- अनैतिक , असुरक्षित यौन संबध ।
यानि असुरक्षित प्री-मेराईतल या पोस्ट- मेराईतल सेक्स।---
समलैंगिक सम्बन्ध।--- वेश्यावर्ती ।--- एच आई वी पोजिटिव पति या पत्नी से असुरक्षित यौन सम्बन्ध।
२ -एच आई वी पोजिटिव ब्लड ट्रांसफ्यूजन।
३ -नशा करने के लिए उपयोग की गई सूई , विशेषकर जब एक ही सूई से कई लोग नशा करते हों।
४ -एच आई वी पोजिटिव गर्भवती महिला से शिशु को एड्स हो सकती है।
कैसे बचा जाए एड्स से ?
ब्रहमचर्य का पालन। जी हाँ, यदि आप कुंवारे हैं तो बेहतर है, दादा- परदादा की बात माने और २५ साल तक ब्रहमचारी रहें। बात पुरानी ज़रूर है, लेकिन बात में दम है। अब तो विकसित देशों में भी इसका अनुसरण होने लगा है।
और यदि आप विवाहित हैं तो गीता में श्री कृष्ण द्वारा दिए ज्ञान का पालन करें, यानि परायी औरत पर नज़र मत डालें।
ये विचार मन में भी न लायें ---की बोर हो गया हूँ घर का खाना खाते खाते।
ब्लड यानि रक्त की आवश्यकता पड़ जाए तो किसी अधिकृत केन्द्र से ही रक्त प्राप्त करें जहाँ इसे अच्छी तरह से जांच कर ही दिया जाता है।
किसी तरह का नशा न करें, विशेषकर सूई लगाने वाली दवा का । नशेड़ियों को कहाँ होश रहता है ,अपनी सेहत का।
यदि गर्भवती मां को एच आई वी पोजिटिव निकल आता है, तो घबराएँ नही। किसी भी पास के अस्पताल में जाकर इलाज़ कराएँ। खाने से शिशु सुरक्षित रहेगा।
सभी बड़े अस्पतालों में वी सी टी सी यानि स्वैच्छिक परामर्श एवम जांच केन्द्र खुले हैं, जहाँ टेस्टिंग मुफ्त की जाती है।
ऐ आर टी क्लिनिक : यानि एंटी रित्रोवाइरल क्लिनिक। यहाँ एड्स के रोगियों को मुफ्त एड्स की दवा दी जाती है। लेकिन इसे उमर भर खाना ज़रूरी होता है।
याद रखिये :
भारत में करीब २.५ मिलियन लोग एच आई वी / एड्स से पीड़ित हैं।
एड्स का कोई इलाज़ नही है। दवा से सिर्फ़ वाइरस को कंट्रोल करके सामान्य जीवन गुजारा जा सकता है ।
ठहरिये, सोचिये, आप क्या करने जा रहे हैं। कही क्षणिक शारीरिक आनंद आपको जीवन भर के लिए आंसुओं में न डुबो दे।
उपरोक्त जानकारी --साभार, सौजन्य से --प्रोफ़ेसर श्रीधर द्विवेदी --इंचार्ज , ऐ आर टी क्लिनिक, जी टी बी हॉस्पिटल, दिल्ली।
वर्ल्ड एड्स डे के अवसर पर जी टी बी अस्पताल में एक पब्लिक लेक्चर का आयोजन किया गया, डॉ द्विवेदी के मार्गदर्शन में ।
इस अवसर पर एक पुस्तिका का भी विमोचन किया गया।
प्रस्तुत है डॉ द्विवेदी द्वारा लिखी एक कविता इस विषय पर--
यह लेख आपको कैसा लगा, बताईएगा ज़रूर.
Sunday, November 29, 2009
लीजिये घर बैठे ही सैर कीजिये, अंतर्राष्ट्रीय व्यपार मेले की ---
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला देखने का अपना द्विदिवसीय कार्यक्रम आख़िर कामयाब रहा। द्विदिवसीय इसलिए की एक दिन तो मेले में एंट्री करने का जुगाड़ करने में ही निकल गया। हालाँकि मैं तो रिसर्च कहूँगा। हुआ यूँ की पहले दिन जब हम मेला पहुंचे तो पार्किंग के गेट पर अटेंडेंट ने बताया---- ज़नाब, पार्किंग फीस ७० रूपये है और एंट्री का टाइम भी ख़त्म हो चुका है। मैंने कहा भाई, पार्किंग के लिए ७० हमारे पास होते तो क्या हम ऐसे होते। शुरू में ही बिजनेस टिकेट लेकर न एंट्री मारते। खैर , पहला दिन हमने जानकारी जुटाने में लगाया और पूरी तरह से जानकारी से लैश होकर , हमने अगले दिन का प्रोग्राम बनाया।
अगले दिन ---टिकेट पेट्रोल पम्प से लेकर, इंडिया गेट पर ३० रूपये में गाड़ी पार्क करके, पार्क एंड राइड सुविधा का फायदा उठाया और मेले की गाड़ी में बैठकर , पहुँच गए । लगा अरे, ये तो बड़ा आसान था। लेकिन गेट तक पहुँचते ही पुलिस वाले की आवाज़ सुनाई दी --- अरे गेट बंद करो, टाइम हो गया है। शायद उस गेट से घुसने वाले हम आखरी सेनानी थे।
अब आगे का हाल, सचित्र ---
अन्दर आते ही सड़कों पर जो भीड़ का हांल देखा तो लगा की पवेलियंस के अन्दर तो जाना ही मुश्किल होगा। लेकिन बाद में पता चला की सारी भीड़ बाहर ही थी , पवेलियंस तो खाली पड़े थे।
शायद मंदी की मार मेले पर भी पड़ी थी।
पति: बहुत हो गया, चलो अब घर चलते हैं।
पत्नी: क्या बहुत हो गया। अभी तो कुछ भी नही देखा।
पति: इतना टाइम नही है मेरे पास।
पत्नी: लेकिन मेरे पास बहुत टाइम है।
पति- पत्नी का आपस का मामला समझ हम तो आगे बढ़ गए।
ओपन एयर थियेटर में , लक्षद्वीप का लोक नृत्य ---
रंगों की ये छटा तो इतनी मनभावन थी की अब तक की सारी थकान इसे देखकर छूमंतर हो गई।
हस्त- शिल्प पर्दार्शिनी से बाहर निकले तो पहुँच गए इन वादियों में ---
जी हाँ, मेले के बीचों बीच ये मानसरोवर झील , थके मांदे पर्यटकों को शकुन प्रदान करती हुई।
वैसे डाइटिंग पर हैं, इसलिए कॉफ़ी पीकर ही काम चला लिया। ऐसे मौके पर डाइटिंग का बहाना बड़ा किफायती रहता है।
शुक्र रहा की आर्टिफिशियल जयुएलरी की ही दूकान थी, तो बस ९०० का ही चूना लगा।
कर्नाटक पेवेलियन
आन्ध्र प्रदेश पेवेलियन
लेकिन हमने तो अपने लिए खरीदा बस एक शीशी आयुर्वेदिक तेल , बालों के लिए।
क्योंकि मुझे इस दुनिया में दो ही चीज़ों के घटने की चिंता लगी रहती है ---
एक हिमालय के ग्लेशियर्स की और दूजे हमारे सर के बाल ।
बाकि सब तो बढ़ ही रहे हैं, फ़िर चाहे वो आबादी हो या महंगाई, प्रदुषण हो या भ्रष्टाचार , आतंकवाद हो या अलागवाद।
Saturday, November 28, 2009
पीया मैं जांगी मेले में ---गोरी तू मत जा मेले में ---
लेकिन दो नाकामियां ऐसी रही की दस बार कोशिश करने पर भी कामयाबी हासिल नही हुई।
पहली : एक काम जो मैं इस दशक में नही कर पाया, वो है ---सर्दियों की नर्म धूप में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान में आरामदायक कुर्सियों पर बैठकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच देखना। इसकी एक वज़ह तो ये है की पोने दो करोड़ की आबादी वाले शहर में कोटला मैदान की कैपेसिटी मात्र ४०,००० है, वो भी अभी कुछ साल से। पहले तो ये सिर्फ़ २०-२५,००० ही होती थी। इसलिए टिकेट कभी मिल ही नही पायी।
दूसरी बात ये की टिकटों के रेट , हमारी जेब में पैसों के वेट से हमेशा ज्यादा ही रहे। जब हम ५० खर्च कर सकते थे, तो टिकेट १०० की होती थी। जब १०० के लायक हुए, तो टिकेट २०० की हो गई। अब तो ये १५००-२००० की हो गई है।
वैसे भी हम दिल्ली वालों को हर शो मुफ्त में मिले पास से ही देखने की आदत है।
लेकिन अब हमारा कोई चाचा, मामा या और रिश्तेदार न तो ऍम पी है, न ही ऍम अल ऐ । बी सी सी आई में भी कोई सम्बन्धी नही। पास मिले तो कैसे।
अब कई मिडियाकर्मी ब्लोगर मित्र बन गए हैं, तो हो सकता है अगले मैच के पास ---! कोई सुन रहा है ?
सो भाई , टी वी के सामने सन्डे के दिन कार्पेट पर गर्म रजाई में लेटकर ही मैच देखकर संतुष्टि कर लेते हैं।
वैसे क्रिकेट का शौक तो बचपन से ही रहा ---लेकिन खाली देखने का। खेलना तो कभी आया ही नही। कभी बैट पकड़ने का मौका मिला भी तो कभी बैट का बॉल से संपर्क ही नही हो पाया।
जिंदगी में एक बार तो छक्का मारने का बड़ा दिल करता है।
दूसरी नाकामी रही : प्रगति मैदान में हर साल लगने वाले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में जाना।
इसकी एक वज़ह तो ये है की भई हमें भीड़ भाड़ से वैसे ही डर लगता है, जैसे लारा दत्ता को पानी से लगता था। अब लारा दत्ता का डर तो फ़िल्म ब्ल्यू की शूटिंग करके ख़त्म हो गया। लेकिन दिल्ली में बढती भीड़ से अपना डर तो बढ़ता ही जा रहा है।
ऊपर से मेले के टाइमिंग्स ऐसे की बिना छुट्टी किए आप जा ही नही सकते। हमने भी जब अपने बॉस से छुट्टी मांगी ---वैसे तो हम ख़ुद ही बॉस हैं, लेकिन कहते है न की हर शेर का सवा शेर भी होता है, तो भई , बॉस तो अपना भी है---हमने अति आवश्यक कार्य के लिए आकस्मिक अवकास की अर्जी दी तो बॉस ने पूछाकी ऐसा क्या ज़रूरी काम है। और जब हमने बताया की मेला देखने जाना है, तो वो ऐसे ठहाका लगाकर हँसे जैसे मैंने लाफ्टर चेलेंज का सबसे बढ़िया जोक सुना दिया हो।
खैर अनुमति नही मिली और हम उदास, मूंह लटकाए हुए, मन में ऐसा सूनापन लिए हुए घर लौटे, जैसा प्रगति मैदान का ये मेन गेट १४ नवम्बर से पहले दीखता था।
आते आते हमें करीब ३५-४० साल पुराना ये हरियाणवी गीत याद आ गया----जिसमे पत्नी अपने पति से मेले जाने की इज़ाज़त मांग रही है, और पति उसे मना कर रहा है।
पत्नी ---
पीया मैं जान्गी मेले में ,
पीया मैं जान्गी मेले में ,
मने करने सें चारों धाम,
बीत गी उमर तमाम,
ओ पीया, जाण दे-------।
पति ---
गोरी तू मत जा मेले में,
गोरी तू मत जा मेले में,
उड़े जां सें मूरख लोग,
फ़ैल ज्या रोग,
रै गोरी, रहान दे ----।
ये हरयाणवी गीत जो एक दयुएत के रूप में था, आकाशवाणी पर ग्रामीण भाइयों के लिए , कार्यक्रम में अक्सर सुनाया जाता था। मुझे याद है, ये प्रोग्राम ६-२० पर शाम को आता था और हर गुरुवार को फरमाइश पर गीत सुनाये जाते थे।
फर्क सिर्फ़ इतना था की यहाँ हम मेले जाने की जिद कर रहे थे और पत्नी मना कर रही थी।
लेकिन हम भी धुन के पक्के निकले। शायद किसी जन्म में महाराणा प्रताप के वंशज रहे होंगे।
और एक जुगाड़ निकाल ही लिया , मेले में घुसने का।
मेले का मेन गेट, अन्दर से।
इसका पूरा विवरण , अगली पोस्ट में ।
आज सबको ईद मुबारक।
Wednesday, November 25, 2009
आइये ! आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक हाथ हम भी उठायें ---
वहां जाकर पता चला की २६/११ के अवसर पर जन आन्दोलन की तैय्यारियाँ चल रही थी, आतंकवाद के ख़िलाफ़ ।
एक तरफ़ लगी थी ये पेंटिंग ---
अलग अलग हाथ , कई रंगों में , कई साइजों में , सभी एक ही संदेश देते हुए की--- हम साथ हैं।
एक दूसरे बोर्ड पर, अपना समर्थन देते हुए --हम भी पीछे नही रहे।
दूसरी तरफ़ ये पेंटिंग ,---- पंछियों की परवाज़ें,---- शान्ति का संदेश देती हुई।
लेकिन जिस पेंटिंग ने हमें अचम्भे में डाल दिया, उसे आप भी देखिये।
वो तो ठीक है, पर इसमे आप दिखाना क्या चाहते हैं?
वो फ़िर अपने साथी के पास गई और आकर बोली --- जी ये जो लाल रंग है, ये खून- खराबा पर्दर्शित कर रहा है.
और ये जो मेडिटेशन की मुद्रा में आकृति दिख रही है, इसका क्या मतलब है?
जी ये तो वही बता सकती हैं, जिसने बनाई है।
इतने में आर्टिस्ट भी आ गई। उनसे भी वही सवाल किया हमने।
पता नही उन्हें हमारा सवाल समझ नही आया या एक दिन पहले बताना नही चाहती थी, सो कई सवाल मन में लिए ही हम वापस आ गए।
क्या खून खराबे से बचने के लिए मेडिटेशन करना चाहिए ?
क्या आतंकवाद का हल --- मेडिटेशन है ?
या ऐसे माहौल में शान्ति बनाये रखना ज़रूरी है? शायद !
लेकिन आतंकवाद को रोकने के लिए क्या करना चाहिए ?
क्या हमारी पुलिस पूरी तरह लैश है , --- आतंकवादियों से लड़ने के लिए ?
यही कुछ सवाल हैं, जो जहन में उठ रहे हैं।
आज २६/११ है । क्यों न आप भी आज इंडिया गेट जाएँ और एक दीप देश की सुरक्षा के लिए आप भी जलाएं।
और हाँ, इस पेंटिंग का राज़ भी बताएं, पता लगा कर , की ये क्या पर्दर्शित कर रही है ।
जय हिंद।