कॉलेज के दिनों में अक्सर शाम को दोस्तों के साथ मार्किट की ओर निकल जाते थे , मटरगश्ती करने। खरीदारी करने की न कोई वज़ह या ज़रुरत होती थी , न हैसियत। जेब में दस रूपये डालकर जाते थे और दस के दस सुरक्षित वापस लाकर रख देते थे। उस पर यह कह कर खुश हो लेते कि ऐसा करने से इच्छा शक्ति बढती है। लेकिन ऐसा करते करते ऐसा लगता है कि इच्छा शक्ति शायद इतनी दृढ हो गई कि अब चाह कर भी पैसे खर्च करने की चाहत नहीं होती। लगता है , जब काम चल ही रहा है तो खर्च कर के भी क्या हासिल कर लेंगे। इसलिए अब भी जब मार्किट जाते हैं तो जो एक पांच सौ का नोट जेब में होता है, वह दिनों दिन सलामत रहता है। यह अलग बात है कि जिस दिन श्रीमती जी के साथ मार्किट जाना होता है , उस दिन न जाने कितने ऐसे बेचारे स्वाहा होकर मार्किट की भेंट चढ़ जाते हैं।
अब एक विशेष अंतर तो यह आ गया है कि अब युवा लोग मटरगश्ती करने मार्किट नहीं जाते बल्कि मॉल्स के एयरकंडीशंड और चमक धमक के वातावरण में इकोनोमिक लिब्रलाइजेशन से आए आर्थिक विकास का मज़ा लेते हुए मस्ती करते नज़र आते हैं। लेकिन मॉल्स में यह देखकर घबराहट सी होने लगती है कि हमारी उम्र के लोग बहुत ही कम नज़र आते हैं। जिधर भी देखिये , बच्चे , युवा और युगल ही दिखाई देते हैं। इक्के दुक्के मियां बीबी छोटे बच्चों के साथ चिल पों करते हुए मिल सकते हैं , लेकिन ५० से ऊपर के परिपक्व लोग न के बराबर नज़र आते हैं।
अचानक आए इस परिवर्तन से विचलित होकर हमने गहन विचार किया तो यह समझ आया कि २०११ में हुई जनसँख्या गणना के अनुसार देश में लगभग ५ ० % लोग २५ वर्ष से कम आयु के हैं और लगभग दो तिहाई ३५ से कम। करीब एक तिहाई १४ से कम , दो तिहाई १५ से ६४ के बीच और केवल ५ % लोग ६५ वर्ष से ज्यादा आयु के हैं। यानि हम तो १० - १५ % लोगों में ही आते हैं। इस से ज़ाहिर होता है कि हमारा देश कैसे दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहा है।
मॉल्स :
देश में आर्थिक विकास हुआ है , यह तो निश्चित है। इसका सबसे ज्यादा फायदा देश का मध्यम वर्ग समाज ही उठा रहा है। आज दिल्ली जैसे शहरों में बने मॉल्स विश्व के किसी भी बड़े और सुन्दर मॉल्स का मुकाबला कर सकते हैं। आम युवक युवतियों को हाथ में हाथ डाले मॉल्स में घूमते देख कर नई पीढ़ी की किस्मत पर रास आता है। एक दशक पहले जो सुविधाएँ सिर्फ विदेशों में कुछ ही भाग्यशाली लोगों को उपलब्ध होती थी , अब हमारे आम नागरिकों को उपलब्ध हैं। इन मॉल्स में दुकाने या शोरूम्स भी विश्व के हर ब्रांड के सामान से भरे मिलेंगे। वास्तव में देसी और विदेशी मॉल्स में शायद ही कोई अंतर नज़र आये। खाने पीने के पदार्थ भी विदेशी ब्रांड्स के मिलते हैं जिन्हें समझना भी पुरानी पीढ़ी के बस का नहीं होता।
आप शायद अभी भी नुक्कड़ पर बनी पुरानी किसी जान पहचान के टेलर की दुकान से कपड़े सिलवाते हों , लेकिन आप के बच्चे अवश्य ही ऐसे ही किसी शोरूम से शॉपिंग करते होंगे। हमें तो अक्सर इन पुतलों को देखकर धोखा हो जाता है कि असली बन्दे खड़े हैं या पुतले।
लेकिन इन मॉल्स में एक बड़ी समस्या आती है बैठने की। किसी भी शोरूम में बैठने के लिए कोई जगह नहीं होती। जहाँ बच्चे तो दौड़ दौड़ कर एक के बाद एक पोशाक ट्राई कर रहे होते हैं , वहीँ हम जैसे बुजुर्गों को खड़े खड़े बोर होना पड़ता है। कभी किसी कपड़े को हाथ लगाया नहीं कि आ गया / गई एक ३० किलो का / की सेल्समेन / सेल्स गर्ल -- मे आई हेल्प यू । हेल्प करने को तो ऐसे तैयार रहते हैं जैसे मुफ्त में माल मिल रहा हो। अक्सर रेट देखकर अपना तो सारा मूड ही खराब हो जाता है। लेकिन बच्चों को जैसे रेट से कोई मतलब नहीं होता। सबसे महँगी चीज़ पर हाथ रखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।
बात जब खाने की आती है तो हम ढूंढते हैं समोसा , पकोड़ा या छोले बठूरे। लेकिन वहां मिलता है -- बस पूछिए मत क्या मिलता है -- बताने में भी शर्म आती है, क्योंकि खुद हमें उनका नाम नहीं पता होता। आखिर में बच्चों को ही आगे करना पड़ता है और वो जितनी भी जेब कटाएँ , सब सहना पड़ता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि धरती पर अगर जन्नत है तो क्या अलग होगी। लेकिन सब के लिए नहीं , सिर्फ उनके लिए जो इतने समर्थ हैं। वर्ना अभी भी देश में करीब २२ % ( २६ करोड़ ) लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं जिनके लिए जन्नत का अर्थ बस दो वक्त की रोटी मुहैया होना ही होता है।











