Saturday, October 1, 2016

विश्व बुजुर्ग दिवस पर एक पेशकश ---


यह आधुनिक और विकसित जीवन की ही देन है जो बच्चे स्कूल की शिक्षा ख़त्म होते ही घर छोड़ने पर मज़बूर हो जाते हैं , और फिर कभी घर नहीं लौट पाते।
अक्सर सुशिक्षित समाज में मात पिता बुढ़ापे में अकेले ही रह जाते हैं। आज विश्व बुजुर्ग दिवस पर एक रचना , पिता का पत्र पुत्र के नाम :  


जीवन के चमन मुर्झा जायें , और अंग शिथिल पड़ जायें ।
तुम मुझे सँभालने काम छोड़कर ,  कहीं रहो, घर आ जाना ----

दुनिया का दस्तूर है ये , आखिर घर छोड़ा जाता है ,
पर बिना बच्चों के भी ,  आँगन सूना हो जाता है ।
तुम घर का अहसास दिलाने , इक दिन सूरत दिखला जाना ----

मात पिता का सारा जीवन , पालन में निकल जाता है ,
सपने पूरे होने तक यौवन , हाथों से फिसल जाता है ।
तुम यौवन का संचार कराने , ताकत बन कर आ जाना -------

जाने कितने व्रत रखे थे  , जाने कितनी मन्नत मांगी थी ,
तेरी खातिर तेरी माता भी , जाने कितनी रातें जागी थी ।
जीवन के अंतिम मोड़ पर , तुम अपना फ़र्ज़ निभा जाना ------

जीवन के चमन मुर्झा जायें , और अंग शिथिल पड़ जायें ।
तुम मुझे सँभालने काम छोड़कर ,  कहीं रहो घर आ जाना ----


( जब आँचल रात का लहराये -- इस ग़ज़ल / गीत पर आधारित )

Tuesday, September 27, 2016

ये रेहड़ी और खोमचे वाले .....


शाम के समय लोकल मार्किट के सामने मेंन रोड के फुटपाथ पर खड़े रेहड़ी और खोमचे वाले तरह तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनकी खुशबु वहां से गुजरने वाले लोगों को बेहद आकर्षित करती है। विशेषकर घी में तलती टिक्कियां , पकौड़े और चाऊमीन देखकर ही मुँह में पानी आने लगता है।  खाने वाले भी बहुत मिल जाते हैं , इसलिए धंधा धड़ल्ले से चलता है।

लेकिन सड़क से उड़ती धूल और गाड़ियों का धुआँ देखकर लगता है कि हम हाईजीन के मामले में कितने पिछड़े हुए हैं। अक्सर ये खोमचे वाले नालियों के ऊपर बैठे होते हैं।  एक गंदे से पीपे या जार में पीने का पानी भरा होता है जिसे लोग आँख बंद कर पी जाते हैं।  कड़ाही में डीप फ्राई होते पकौड़े तो फिर कीटाणुरहित हो सकते हैं लेकिन कुलचे छोले वाला छोले तो घर से ही बनाकर लाता है।  और वो किसी फाइव स्टार में नहीं बल्कि किसी अनाधिकृत कॉलोनी में झुग्गी झोंपड़ी में रहता होगा जहाँ न टॉयलेट की सुविधा होगी और न पीने के पानी की।

लेकिन हम हिंदुस्तानी लक्कड़ हज़म पत्थर हज़म होते हैं क्योंकि ज़रा ज़रा सा संक्रमण हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर देता है।  इसलिए छोटा मोटा संक्रमण हमें प्रभावित नहीं करता।  लेकिन विकसित देशों में रहने वाले लोगों में साफ सफाई होने के कारण एंटीबॉडीज न के बराबर होती हैं।  इसलिए उनको भारत जैसे देश में आते ही कुछ भी खाते ही दस्त लग जाते हैं , जिसे ट्रैवेलर्स डायरिया कहते हैं। लेकिन ऐसा ना समझें कि हम सुरक्षित हैं।  संक्रामक रोग सबसे ज्यादा हमारे जैसे देशों में ही होते हैं जिससे हर वर्ष लाखों लोग प्रभावित होते हैं।  आगे तो मर्ज़ी आपकी।    

Thursday, September 8, 2016

ताज़ -- कुछ बाहर से , कुछ अंदर से .....

किसी की पाक मोहब्बत की दास्ताँ है ये , या कुछ हट कर ख़ास कर दिखाने का ज़नून , यह हम नहीं जानते। लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि विश्व के सात अज़ूबों में यूँ ही नहीं शामिल कर लिया गया है ताज़महल को। ताज़ का अनुपम सौन्दर्य  सिर्फ अंदर ही नहीं ,  बल्कि बाहर से भी देखने वालों को भाव विभोर कर देता है।

यमुना किनारे बना ताज़ , यदि आगरा फोर्ट से देखा जाये , जहाँ से सुना है कि शाहजहाँ कभी देखा करता था , आज भी बहुत खूबसूरत नज़र आता है।


शाहजहां के पास तो बस दूरबीन ही होती होगी देखने के लिए , लेकिन आजकल हाई ज़ूम वाले कैमरे से एक किलोमीटर दूर बने किले से भी ताज़ की खूबसूरती की एक एक लकीर आसानी से देखी जा सकती है।




पर्यटकों के लिए लगाई गई रेलिंग से ताज़ जैसे सामने ही दिखाई देता है।




ताज़ और फोर्ट के बीच यमुना के किनारे किनारे अच्छी और गहरी हरियाली न सिर्फ देखने में अच्छी लगती है बल्कि ताज़ की प्रदुषण से भी रक्षा करती है।




हालाँकि आस पास बस्ती भी नज़र आती है लेकिन पेड़ों की हरियाली उन्हें छुपा लेती है।




ताज़ के अहाते में प्रवेश करते ही यह नज़ारा सदियों से एक जैसा ही दिखाई देता है।  सैंकड़ों सैलानी ताज़ की खूबसूरती को आँखों और कैमरे में कैद करने में लगे रहते हैं।



ठीक सामने बने डायना बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवाने के लिए तो जैसे लाइन ही लगी रहती है और आपका नंबर आने में घंटों में लग सकते हैं।



आजकल यहाँ मरम्मत का काम चल रहा है।



सूर्यास्त के साथ ही परिसर को खाली करने के लिए सुरक्षा गार्ड्स की सीटी बजने लगती है।




उधर यमुना के ऊपर सूर्यदेव पल पल रंग बदलते हुए नेपथ्य में विश्राम करने चले जाते हैं।




यही वो समय होता है जब आप सूर्य देव से आँख मिलाने का साहस कर सकते हैं।




धीरे धीरे सूर्य महाराज क्षितिज में पृथ्वी की गोद में समां जाते हैं , किसी और जहाँ को रौशन करने के लिए और हमें अगले एक और सुनहरे दिन का इंतज़ार करने हेतु छोड़ते हुए । और हम निकल पड़ते हैं , गार्ड की तेज होती सीटी के साथ निकास द्वार की ओर , मन में ताज़ और आस पास के वातावरण की मनमोहक छवि लिए हुए।


Thursday, July 28, 2016

मौसम की मार , डेंगू बुखार :


जब काली घटायें छाती हैं ,
और टिप टिप बारिश आती है।  

मौसम भीगा भीगा होता है ,
सब गीला गीला सा होता है।

जब भोर के उजाले होते हैं ,
कुछ नन्हे शेर निकलते हैं।  

जो नंगे हाथों की चमड़ी में ,
अपना तीखा डंक घुसेड़ते हैं।

फिर वो खून तुम्हारा पीते हैं ,
और गिफ्ट में वायरस देते हैं।

जब ये रक्त का दौरा करता है ,
तब सारा बदन कंपकपाता है।

आप बदन दर्द से कराहते हैं ,
इसी को डेंगू बुखार कहते हैं।    
 
ना कोई दुआ काम आती है ,
ना दवा ही असर दिखाती है।

ना खाने को मन करता है ,
दिन भर पसीना टपकता है।

फिर सारा फैट झड़ जाता है ,
जब डेंगू बुखार चढ़ जाता है।

मत होने दो जमा पानी को ,
यूज करो मच्छरदानी को ।

फुल स्लीव्ज के पहनो कपडे ,
फिर तो डेंगू कभी ना पकडे।

बस एक गोली पैरासिटामोल ,
और पीओ पानी नीम्बू घोल।

ले लो एक सप्ताह की छुट्टी ,
तभी हो पायेगी डेंगू से कुट्टी।  
   

Monday, July 18, 2016

सावन की फुहार और वायरल फीवर की मार ---


सावन का महीना यूँ तो बड़ा रोमांटिक होता है , सभी बारिश का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से कर रहे होते हैं। छोटे छोटे जीव जंतुओं से लेकर , मेढक , मयूर यहाँ तक कि इंसानों का भी मन हिलोरें लेने लगता है। लेकिन दुनिया के सबसे सूक्ष्म जीव वायरस भी इन दिनों बहुत सक्रीय होकर मनुष्यों पर हल्ला बोलकर हमला कर देते हैं।  नतीजा होता है वायरल बुखार जिसका न कोई सर होता है न पैर , फिर भी सर से लेकर पैर तक आपके बदन को तोड़ मरोड़ कर , धोकर , निचोड़ डालता है। वैसे तो यह बुखार एक दिन में भी उतर सकता है लेकिन सब वायरस की मर्ज़ी पर निर्भर करता है कि उसे आपसे कितना प्यार है। वह चाहे तो सन्डे से सन्डे तक भी आपका मेहमान बना रहकर मुफ्त की रोटियां तोड़ सकता है , जबकि आप पूरे सप्ताह एक रोटी भी नहीं खा पाते।

इसकी एक खासियत यह भी है कि बुखार देने वाला वायरस डॉक्टर्स से भी नहीं डरता। इसलिए यह न जाने कितने डॉक्टर्स की इज़्ज़त दांव पर लगा देता है क्योंकि जब रोगी का बुखार उतरेगा ही नहीं तो डॉक्टर तो हो गया ना नाकाम। यदि एक सप्ताह चल गया तो आप कम से कम तीन डॉक्टर तो बदल ही लेंगे।  आखिर फ़तेह उस डॉक्टर की  होती है जो सातवें दिन देखता है। उस डॉक्टर की दवा तो जैसे रामबाण साबित होती है। हालाँकि यह घटना क्रम यूँ ही चलता रहता है और कभी एक डॉक्टर का नाम तो कभी दूसरे का नाम रौशन होता रहता है।

अब नज़र डालते हैं वायरस की कारिस्तानियों पर।  वायरस एक बार नाक या गले में आया नहीं कि महबूब की खुशबू की तरह सांसों में समा जाता है। फिर खांसी खुर्रा , नज़ला जुकाम , सर दर्द , बदन दर्द  और भी न जाने क्या क्या शारीरिक प्रतिक्रियाएं होने लगती हैं जो आपके बदन को हल्दीघाटी का मैदान समझ लेती हैं। वायरस की प्रजनन क्षमता भी ऐसी होती है कि हमारे देशवासियों की प्रजनन क्षमता भी शरमा जाये। २४ घंटे में एक से बढ़कर एक मिलियन होना इनका बाएं हाथ का खेल है। फिर रक्त स्नान करते हुए ये वायरस जब शरीर के हर अंग में प्रवेश करते हैं तब पूरा शरीर कंपकपाने लगता है , दांत किटकिटा कर तबला बजाते हैं , नाक सीटी बजाकर आने वाले आहार रहित स्टेशन के आने की सूचना देने लगते हैं।

एक सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें डॉक्टर्स का भी कोई अस्त्र शस्त्र काम नहीं आता है।  बल्कि पैरासिटामोल के अलावा कोई और यंत्र है तो वो है सादे पानी में कपडा भिगोकर सारे शरीर को हौले हौले से सहलाते हुए पुचकारना। वायरस बस इसी अर्चना को पसंद करता है।  यदि गलती से भी आपने कोई और बाण चलाने की कोशिश की तो ये आपके खून को पानी पानी कर सकता है जिससे लाले की जान को ही लाले पड़ सकते हैं।  

लेकिन कहते हैं कि हर बुराई में भी अच्छाई होती है। एक बार वायरल फीवर आपको हो जाये , फिर चाहे वो एक दिन रहे या एक सप्ताह , अन्जाने में आपके कई काम कर जाता है। आप जो वर्षों से सोचते रहते हैं कि एक दिन डाईटिंग शुरू करेंगे , लेकिन निष्क्रिय रहते हुए खा खा कर वेट और पेट दोनों बढ़ा लेते हैं , वायरल होने पर आपके तन और मन दोनों की सारी एक्स्ट्रा चर्बी झड़ जाती है और आप तन से स्लिम, कोमल और मन से निर्मल सा महसूस करते हैं। अब यदि ७ दिन तक आप सिर्फ पानी , शरबत या सूप ही लेते रहेंगे तो आ गई ना आपको आर्ट ऑफ़ लिविंग।

कभी कभी हमें लगता था कि वायरस और डॉक्टर का रिश्ता थोड़ा सा अलग होता है।  इसलिए कम से कम एक डॉक्टर को तो स्टाफ समझकर ही सही , कुछ कन्सेशन मिलता होगा।  लेकिन इस महंगाई के ज़माने में अब वायरस ने डॉक्टर्स को ये रियायत देनी बंद कर दी है। ज़ाहिर है , अब वायरस ने डॉक्टर्स से डरना बंद कर दिया है।  वैसे भी ये कौन से बच्चे हैं जो सफ़ेद कोट या डॉक्टर की सूई से डर जायेंगे।      



   

Sunday, July 3, 2016

भारत पाक सुचेतगढ़ सीमा दर्शन -- एक विशिष्ठ अनुभूति।


जम्मू से करीब ३० -३५ किलोमीटर दूर सियालकोट पाकिस्तान को जाने वाली सड़क पर बना है सुचेतगढ़ बॉर्डर। यहाँ से सियालकोट मात्र ११ किलोमीटर दूर है। सुचेतगढ़ भारतीय सीमा में हमारा एक गांव है जो बिलकुल सीमा से लगा हुआ है और सैनिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जब भी भारत पाकिस्तान में इस सीमा पर कोई तनाव होता है तो सबसे पहले गोलाबारी इसी गांव पर होती है। यहाँ प्रतिदिन सैंकड़ों सैलानी बॉर्डर के दर्शन करने के लिए जम्मू से आते हैं। सप्ताहंत पर तो ५०० से १००० की भीड़ भी हो जाती है।  जबकि पाकिस्तान का शहर सियालकोट मात्र ११ किलोमीटर है , फिर भी कोई इक्का दुक्का ही यहाँ आता है। ज़ाहिर है , हमारे देश में लोग टूरिज्म का मज़ा लेते हैं जबकि पाकिस्तान के लोग रोजी रोटी कमाने में ही लगे रहते होंगे।    




 इस बॉर्डर की सुरक्षा सीमा सुरक्षा बल को सौंपी गई है।  सर्दी हो या गर्मी या बरसात , हमारे जवान बड़ी मुस्तैदी से सीमाओं की रक्षा में तैनात रहते हैं। साथ ही पब्लिक के लिए भी बॉर्डर के दर्शन कराने का काम बखूबी करते हैं।     




बॉर्डर से करीब १०० मीटर पहले यह प्रवेश द्वार बनाया गया है।  इसके दोनों ओर एक ऊंची मिट्टी की दीवार सी है जिसके आगे पानी से भरी खाई है।  दीवार से पहले तारों की ऊंची दोहरी बाड़ लगाई गई है ताकि कोई अवैध रूप से बॉर्डर पार न कर सके। हमारे सिपाही दिन रात सीमा के साथ साथ कवायद करते रहते हैं।




सड़क पर बैरियर के नीचे दो समानांतर रेखाओं के बीच और दो तीरों के निशान के बीच जो रेखा नज़र आ रही है , वही सीमा रेखा है।  इसके बाएं वाला पिलर पाकिस्तान में और दायीं ओर एक एक पिलर भारत और पाक की सीमा में पड़ते हैं। सीमा रेखा बैरियर से करीब एक डेढ़ फुट पाकिस्तान की ओर है।  यानि उस ओर से कोई भी व्यक्ति यदि बैरियर तक आता है तो वो भारतीय ज़मीन पर कदम रखता है , जबकि भारतीय ओर से कोई भी बैरियर को पार नहीं करता।

दोनों ओर एक एक गार्ड रूम बने हैं।  बाएं वाला कक्ष हमारा है जिस पर इंग्लिश में लिखा है -- वी आर प्राउड टू बी इंडियन।  दायीं ओर पाकिस्तानी कक्ष पर लिखा है -- मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा।  सोच अपनी अपनी।  दोनों पर अपने अपने देश के झंडे पेंट किये गए हैं। दायीं ओर ही दोनों देशों की अपनी अपनी सीमा में एक एक चबूतरा बना है जहाँ से जब भी आवश्यकता होती है , दोनों देशों के सैनिक अधिकारी खड़े होकर वार्तालाप या आपसी समझौता करते हैं।



यदि बैरियर से अपने देश की ओर देखें तो दूर प्रवेश द्वार नज़र आता है।  करीब ५० कदम दूर तारों की बाड़ लगी है।  आम तौर पर आगुंतकों को यहीं तक आने दिया जाता है।  लेकिन उस दिन लगभग खाली होने से और विशिष्ठ मेहमान के दर्ज़े से हमें बैरियर तक ले जाया गया और बहुत अच्छे से सीमा के बारे में बताया गया। दरअसल यहाँ आकर एक बड़ी अजीब सी फीलिंग आती है जिसमे देशभक्ति की भावना और मन में दुश्मन के प्रति शंका और संदेह की मिली जुली प्रतिक्रिया आने की सम्भावना रहती है।  इसलिए विशेषकर जब दोनों ओर से आगुंतक आमने सामने होते हैं तब किसी अनहोनी का ध्यान रखना पड़ता है।  इसलिए अधिकतर  लोगों को पीछे ही रोक दिया जाता है।  





हमसे पहले भारतियों का एक ७-८ हाई फाई लोगों का समूह था जिन्हे वहीँ से वापस कर दिया गया।  उधर पाकिस्तान से भी कोई एक युवा नेता विशिष्ठ मेहमान के रूप में आया हुआ था।  सच मानिये , किसी ने भी एक दूसरे से नज़र मिलाने का प्रयास नहीं किया। जब तक वो चले नहीं गए , एक अजीब सी ख़ामोशी वातावरण में छाई रही। उनके जाने के बाद हमने जमकर फोटोग्राफी की। हमारे साथ सीमा सुरक्षा बल के एक सब इन्स्पेक्टर गाइड के रूप में थे जिन्होंने बहुत अच्छे तरीके से सब जानकारी दी।     



सड़क के दोनों ओर तारों की बाड़ लगी है।  दोनों और खेत हैं जिनमे किसान खेती करते हैं।  वास्तविक सीमा एक काल्पनिक रेखा के रूप में है जिसकी पहचान हर १०० मीटर पर गाड़े गए और नम्बर किये गए पिल्लर्स से होती है।  पिल्लर्स के बीच में कोई निशानदेही नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार सीमा के 100 मीटर तक किसी भी निर्माण कार्य की अनुमति नहीं है।  इसलिए सीमा भी एक काल्पनिक रेखा ही होती है। एक अजीब बात यह लगी कि पाकिस्तान साइड के खेत जोते गए थे जबकि हमारे खेत यूँ ही पड़े थे। हालाँकि जब भी किसान खेती बाड़ी का काम करते होंगे , तब निश्चित ही दोनों आमने सामने ही होते होंगे। दूसरी अजीब बात यह भी थी कि सारा इंतज़ाम हमारी साइड ही था जबकि उनकी ओर ऐसा कोई ताम झाम नहीं था। ज़ाहिर है , सीमा पार गुसपैठ की चिंता हमें ही सताती है। भूखे नंगों को किस बात की फ़िक्र !       



यदि गौर से देखें तो पाएंगे कि मिट्टी की दीवार में जगह जगह बंकर बनाए गए हैं जहाँ से विपक्ष की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है। ये बंकर बहुत मोटी दीवारों से बने होते हैं जिनपर छोटे मोटे गोले का कोई असर नहीं होता।  यहाँ से सिपाही दुश्मन पर गोली भी चला सकते हैं और शांति के समय आराम करने का भी प्रबंध होता है।

सीमा सुरक्षा का काम वास्तव में बड़ा साहस , धैर्य और समझ बूझ का काम है। यहाँ कब क्या हो जाये , कोई खबर नहीं होती। हालाँकि संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा समय समय पर प्रेक्षक दल निरीक्षण के लिए भेजा जाता है, फिर भी तस्करी और आतंकवाद की समस्या को ध्यान में रखते हुए हमारे जवानों को सदैव मुस्तैद रहना पड़ता है।
कुल मिलाकर भारत पाकिस्तान बॉर्डर यात्रा एक विशेष अनुभव रहा जिसमे इतिहास और भूगोल को ध्यान में रखते हुए इंसानी रिश्तों पर रोमांच और भय मिश्रित गुदगुदाने वाली अनुभूति रही। अंत में सीमा सुरक्षा बल के सब इन्स्पेक्टर श्री राकेश धोबल जिन्होंने भयंकर गर्मी में बिजली न होते हुए भी हमारा विशेष ध्यान रखते हुए न सिर्फ हमें अच्छी तरह से बॉर्डर के दर्शन कराये , बल्कि सम्पूर्ण जानकारी देते हुए चाय पानी से भी हमारी आवभगत की, का आभार व्यक्त करते हैं। जवानों को शत शत नमन।        


Thursday, June 30, 2016

पटनीटॉप -- एक मिनी कश्मीर।


जब बात कश्मीर की आती है तो श्रीनगर की डल लेक , पहलगाम , और गुलमर्ग की खूबसूरती ही ज़ेहन में आती है। लेकिन जम्मू से मात्र १०० किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर १ पर एक वर्णनातीत जगह है पटनीटॉप। विशेषकर सर्दियों में यह जगह बर्फ से ढकी होती है , इसलिए स्कीइंग और बर्फ में खेलने का आनंद लेने के लिए यह जगह बहुत उपयुक्त और पास है।
नेट पर ढूँढ़ने पर पटनीटॉप में होटल्स तो बहुत दिखाई देते हैं , लेकिन यदि कस्बे का नक्शा देखने लगें तो कुछ पता ही नहीं चलता कि इसका ख़ाका क्या है।  इसलिए जब यहाँ पहुंचे और टैक्सीवाले ने गाड़ी एक छोटी सी सड़क पर मोड़ी तो हमें लगा कि गलत  मुड़ गए हैं।  इसलिए वापस मुड़कर हाईवे पर थोड़ा और आगे जाकर जब रेलवे गैस्टहाऊस का बोर्ड नज़र आया तो लगा जैसे जंगल में पहुँच गए हैं। निश्चित ही यह जंगल जैसा ही था क्योंकि गैस्टहाऊस वहां से करीब दो किलोमीटर अंदर था और रास्ते में सिर्फ देवदार के पेड़ ही पेड़ दिखाई दे रहे थे। गैस्टहाऊस पहुंचकर भी ऐसा लगा जैसे जंगल के बीच मंगल मानाने आये हैं।

    
ऊंचे ऊंचे दरख़्तों के बीच लॉन के तीन तरफ एक घेरे में बने ये बंगले बहुत खूबसूरत दिखते हैं।


गेस्टहाऊस को आने वाली सड़क जब आगे जाती है तो सड़क के दोनों ओर बहुत पुराने देवदार के पेड़ों की कतार मन को मोह लेती है।  सड़क के एक ओर मकान बने हैं , दूसरी ओर घने पेड़ों से आच्छादित घाटी है। यहाँ सुबह सुबह पैदल वॉक करने में बड़ा मज़ा आया।  यही सड़क आगे जाकर हाईवे में ही जा मिलती है। यानि यह एक सर्कुलर रोड है। इस के किनारे किनारे बीच बीच में सरकारी ऑफिस और टूरिज्म विभाग की टूरिस्ट हट्स बनी हैं।  लेकिन अधिकांश होटल उस सड़क पर बने हैं जिस पर हम शुरू में आ गए थे और वापस मुड़ लिए थे। यह सड़क सर्कुलर रोड में आकर मिलती है। लेकिन यह देखकर बड़ा अफ़सोस हुआ कि जगह की कमी के कारण सभी होटल्स एक संकरी सी सड़क पर ही बने थे जिससे गाड़ियों के आने जाने में बड़ी दिक्कत हो रही थी।  हालाँकि हमारा गेस्ट हाऊस खुले में था और भीड़ भाड़ से दूर था।  



पटनीटॉप में घूमने के लिए दो ही जगह अच्छी लगी। हाईवे से करीब  ८-१० किलोमीटर दूर है नाथाटॉप। यह शायद यहाँ का सबसे ऊंचा स्थान है।  यहाँ से चारों ओर का ३६० डिग्री व्यू नज़र आता है। यहाँ एक टॉवर लगा है लेकिन टॉप तक जाने में कोई असुविधा नहीं होती।  आस पास गूजरों की एक दो  झोंपड़ी ही दिखी।  और कोई मकान नहीं था।



यहाँ का हाल मसूरी जैसा था।  यानि देखते देखते मौसम बदल गया और घनी धुंध ने हमें घेर लिया।  तेज हवा के साथ वाष्प युक्त बादल चारों ओर छा गए।  बड़ा अद्भुत दृश्य था।



यहाँ से करीब दस किलोमीटर आगे घास के मैदानों से होकर आप पहुँच जाते हैं एक और पिकनिक स्पॉट सनासर लेक। यहाँ एक बहुत बड़े मैदान के बीच एक प्राकृतिक झील बनी है।  इसके एक ओर पेड़ों के बीच सुन्दर ट्रेक है।  पास ही गॉल्फ कोर्स भी बना है।  यहाँ आप घुड़सवारी कर सकते हैं , बैलून राइड में लोटपोट हो सकते हैं या फिर पैराग्लाइडिंग भी कर सकते हैं।  यहाँ का नज़ारा वास्तव में बहुत खूबसूरत है।

नाथाटॉप और सनासर लेक के बीच का रास्ता ग्रीन मीडोज ( घास के मैदान ) से भरा पड़ा है।  इनकी स्लोप्स पर सर्दियों में जब बर्फ पड़ती है तो स्कीइंग का बड़ा मज़ा आता है।  इसलिए यदि बर्फ का आनंद लेना हो तो पटनीटॉप कश्मीर की उधमपुर डिस्ट्रिक्ट में एक अच्छी जगह है।  समुद्र तल से इसकी ऊँचाई करीब २००० मीटर है , इसलिए गर्मियों में भी मौसम सुहाना ही होता है।



पटनीटॉप का रेलवे गेस्ट हाऊस। अब रेलवे ने रेलवे कर्मचारियों के गेस्ट्स के लिए भी इसके द्वार खोल दिए हैं। इसलिए बाहर सस्ते में आपको एक शानदार जगह पर रहने का अवसर मिल जाता है। बहुत शांत और शीतल वातावरण में दो दिन रहना भी कायाकल्प कर देता है।




JKTDC की टूरिस्ट हट्स।  पटनीटॉप में एक यह ही ऐसी जगह है जहाँ खुले खुले मैदान हैं , चारों ओर हरियाली है और कई जंगल ट्रैक्स हैं जहाँ आप घोड़ों पर या पैदल ट्रेकिंग कर सकते हैं। दूसरे सभी होटलों के गेस्ट्स भी शाम को पिकनिक मनाने यहीं आते हैं।

पटनीटॉप एक छोटा सा लेकिन आरामदायक हिल स्टेशन है। पास होने के कारण यहाँ पंजाब और जम्मू से बहुत सैलानी घूमने के लिए आते हैं।  नाथाटॉप पर एक जश्न का सा माहौल होता है।  लोग गाड़ियों में ही खाने पीने का इंतज़ाम रखते हैं और कहीं भी बैठकर पिकनिक मनाने लगते हैं। फिर आप पंजाबी हों तो एक दो पैग के बाद पाँव तो स्वयं ही थिरकने लगते हैं। इस मामले में आजकल क्या लड़के और क्या लड़कियां , सभी मस्त हो जाते हैं।

हम तो यही कहेंगे कि आप आनंद अवश्य लीजिए , लेकिन पर्यावरण का ध्यान भी रखिये। अफ़सोस कि अधिकांश लोग मौज मस्ती के बाद जब जाते हैं तो अपने पीछे कूड़े कचरे का ढेर छोड़ जाते हैं।  उनका यह व्यवहार अक्षम्य अपराध लगता है।  साथ ही सरकार को भी ट्रैफिक पर कुछ प्रतिबन्ध लगाना चाहिए  ताकि इन खूबसूरत जगहों पर जाम न लगे और प्रदुषण से भी बचे रहें ।