पिछली पोस्ट में मैंने शादियों में होने वाले फ़िज़ूल खर्चे और दिखावे पर एक सवाल उठाया था। करीब तीस ब्लोगर साथियों ने अपने विचार प्रकट करते हुए अपनी सहमति ज़ाहिर की।
चलिए ११७ करोड़ की आबादी वाले देश में कम से कम तीस परिवारों में तो ये बात पहुंची।
अब इस फ़िज़ूल खर्ची और दिखावे को कैसे रोका जाये , ये तो हम बाद में बात करेंगे। उससे पहले एक और अहम सवाल आपके मनन के लिए :
सवाल : क्या आप अपनी या अपने बच्चों की शादी, बिना दान- दहेज़ के कर सकते हैं ?
ज़वाब: जी नहीं।
मेरा ज़वाब तो पच्चीस साल पहले भी यही था, आज भी है और कल भी रहेगा।
क्यों और कैसे --इसका ज़वाब आप ही की टिप्पणियों में निकलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
आपके विचार जानने के लिए इंतज़ार रहेगा।
Thursday, December 24, 2009
Tuesday, December 22, 2009
क्या कोई बता सकता है ---इन शादी के कार्डों का क्या किया जाये ?
सर्दियों का मौसम , यानि शादियों का मौसम ।
शादियों का मौसम यानि परेशानियों का मौसम।
जी हाँ, दिल्ली की पौने दो करोड़ जनता और शादियों के लिए महज़ कुछ गिने चुने दिन।
क्या करें भाई, हम दिल्ली वाले हैं ही ऐसे की बिना पंडित की आज्ञा के शादी की तिथि निश्चित कर ही नहीं सकते।
नतीजा --एक एक दिन में सैकड़ों , हजारों शादियाँ।
कभी कभी तो एक ही दिन में दो या तीन निमंत्रण --कहाँ जाएँ कहाँ न जाएँ।
जाएँ भी तो कैसे --सभी तो जा रहे होते हैं शादियों में । अब सड़क कोई हमारे अकेले की थोड़े न है।
फिर सड़कों पर क्या शादियों में जाने वालों का ही अधिकार है ?
हमारे तो शौक भी ऐसे की शादी करेंगे तो सिर्फ फार्म हाउस में, फिर चाहे शहर से ३० किलोमीटर बाहर ही क्यों न हो। और अगर शादी में कोई वी आई पी नहीं आया तो क्या शादी हुई। ट्रैफिक जाम लगे तो लगे , क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी दिल्ली वालों के लिए जाम तो आम बात है।
उफ़ ! शुक्र है, इस बार शादियों का सीजन जल्दी ख़त्म हो गया। लिफाफों का जो पैकेट पहले पूरे साल चलता था, इस बार एक महीने में ही ख़त्म हो गया। ऊपर से दालों के रेट क्या बढे , लिफाफों के वेट भी बढ़ाने पड़ गए।
अपने तो सर पर दो बाल और कम हो गए।
वैसे भी श्रीमती जी का कहना है --सर पे चार बाल तो सारे हैं।
देखिये ज़माना कैसे बदल रहा है।
पहले शादी का निमंत्रण आता था , आपस के मेल से।
आजकल आता है, पोस्ट ऑफिस या कुरियर की मेल से।
जल्दी ही वो दिन भी आएगा, जब निमंत्रण आएगा
एस ऍम एस या इ-मेल से।
हमारे यहाँ तो आ भी चुका है, अलबत्ता अभी ये काम बच्चे ही कर रहे हैं।
निमंत्रण :
इसके भी अपने अपने तरीके हैं।
जो करीबी दोस्त या सम्बन्धी हैं, वो तो व्यक्तिगत तौर पर निमंत्रण देने आते हैं।
यहाँ करीब होने का अर्थ दिल से करीब नहीं, घर के करीब होना है।
अब क्या करें , दिल्ली में आना जाना क्या आसान काम है। इसलिए अक्सर तो लोग कार्ड भिजवाकर फोन कर देते हैं की भैया आना ज़रूर।
कुछ ऐसे भी होते हैं जो फोन भी नहीं करते --उनके लिए कार्ड भेजना , शादी का एलान करने जैसा होता है। अब आना हो तो आइये , वर्ना क्या फर्क पड़ता है।
लेकिन सबसे भ्रामक निमंत्रण होता है --किसी वी आई पी यानि ऍम एल ए या काउंसलर का ।
आप तो बड़े खुश होकर जायेंगे --भैया आज तो हम भी वी आई पी बन गए।
शादी में जाकर पता चलता है की वहां तो पूरी कोन्स्तिचुएन्सि के वोटर पहुंचे हुए हैं-- ये , वो , यहाँ तक की आपका दूध वाला , अखबार वाला भी ।
उस वक्त सहसा आपको अपने वी ओ पी होने का अहसास होता है।
दिल्ली वालों का एक और शौक है --शादी के कार्ड ऐसे होने चाहिए की देखने वाला देखता ही रह जाये।
जी हाँ, एक एक कार्ड १००-५०० रूपये का। जितने पैसे लोग कार्डों पर खर्च करने लगे हैं, उतने में तो किसी स्वीकार के बच्चे की पूरी शादी ही हो जाये।
एक कार्ड हमें मिला --जो कम से कम २५० ग्राम वज़न का होगा, सिल्क के कवर में बना , ६ परतों वाला ये कार्ड कम से कम ५०० रूपये का होगा। मिठाई के डब्बे के साथ ऐसे बांटा गया जैसे चुनावों के वक्त नेता लोग नोट बांटते हैं।
अब ये भी समझ में नहीं आता की बाद में ऐसे कार्ड का किया क्या जाये।
दूसरी बेकद्री होती है , खाने की। --- १००-१५० आइटम्स खाने के --पांच पांच तरह के पुलाव, सैंकड़ों किस्म के अचार और सलाद --मिठाई की पूरी की पूरी दूकान। --- समझ में नहीं आता क्या खाओ क्या न खाओ ।
खाने वाला कोई होता भी नहीं ---शहर में सभी तो वेल-फेड होते हैं।
प्रस्तुत है, मेरी नयी कविता की कुछ अंतिम पंक्तियाँ :
इस भीड़ भाड़ में , कौन है अपना कौन पराया
किसने निमंत्रण स्वीकारा , कौन नहीं आया ।
दूल्हा कैसा दिखता है, दुल्हन की कैसी सूरत है
ये न कोई देखता है, न देखने की ज़रुरत है।
आजकल मेहमानों को वर-वधु से प्यारा , होता है खाना ,
और मेजबानों को , सम्बन्धियों से ज्यादा , लिफाफों का आना ।
इसी आवागमन की शिकार, प्रेम- संबंधों की ख्वाइश बन गयी है,
और शादियाँ आजकल काले धन की बेख़ौफ़, नुमाइश बन गयी हैं।
नोट : अगली पोस्ट में एक और अहम् सवाल , शादियों के बारे में, ज़वाब देना मत भूलियेगा।
शादियों का मौसम यानि परेशानियों का मौसम।
जी हाँ, दिल्ली की पौने दो करोड़ जनता और शादियों के लिए महज़ कुछ गिने चुने दिन।
क्या करें भाई, हम दिल्ली वाले हैं ही ऐसे की बिना पंडित की आज्ञा के शादी की तिथि निश्चित कर ही नहीं सकते।
नतीजा --एक एक दिन में सैकड़ों , हजारों शादियाँ।
कभी कभी तो एक ही दिन में दो या तीन निमंत्रण --कहाँ जाएँ कहाँ न जाएँ।
जाएँ भी तो कैसे --सभी तो जा रहे होते हैं शादियों में । अब सड़क कोई हमारे अकेले की थोड़े न है।
फिर सड़कों पर क्या शादियों में जाने वालों का ही अधिकार है ?
हमारे तो शौक भी ऐसे की शादी करेंगे तो सिर्फ फार्म हाउस में, फिर चाहे शहर से ३० किलोमीटर बाहर ही क्यों न हो। और अगर शादी में कोई वी आई पी नहीं आया तो क्या शादी हुई। ट्रैफिक जाम लगे तो लगे , क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी दिल्ली वालों के लिए जाम तो आम बात है।
उफ़ ! शुक्र है, इस बार शादियों का सीजन जल्दी ख़त्म हो गया। लिफाफों का जो पैकेट पहले पूरे साल चलता था, इस बार एक महीने में ही ख़त्म हो गया। ऊपर से दालों के रेट क्या बढे , लिफाफों के वेट भी बढ़ाने पड़ गए।
अपने तो सर पर दो बाल और कम हो गए।
वैसे भी श्रीमती जी का कहना है --सर पे चार बाल तो सारे हैं।
देखिये ज़माना कैसे बदल रहा है।
पहले शादी का निमंत्रण आता था , आपस के मेल से।
आजकल आता है, पोस्ट ऑफिस या कुरियर की मेल से।
जल्दी ही वो दिन भी आएगा, जब निमंत्रण आएगा
एस ऍम एस या इ-मेल से।
हमारे यहाँ तो आ भी चुका है, अलबत्ता अभी ये काम बच्चे ही कर रहे हैं।
निमंत्रण :
इसके भी अपने अपने तरीके हैं।
जो करीबी दोस्त या सम्बन्धी हैं, वो तो व्यक्तिगत तौर पर निमंत्रण देने आते हैं।
यहाँ करीब होने का अर्थ दिल से करीब नहीं, घर के करीब होना है।
अब क्या करें , दिल्ली में आना जाना क्या आसान काम है। इसलिए अक्सर तो लोग कार्ड भिजवाकर फोन कर देते हैं की भैया आना ज़रूर।
कुछ ऐसे भी होते हैं जो फोन भी नहीं करते --उनके लिए कार्ड भेजना , शादी का एलान करने जैसा होता है। अब आना हो तो आइये , वर्ना क्या फर्क पड़ता है।
लेकिन सबसे भ्रामक निमंत्रण होता है --किसी वी आई पी यानि ऍम एल ए या काउंसलर का ।
आप तो बड़े खुश होकर जायेंगे --भैया आज तो हम भी वी आई पी बन गए।
शादी में जाकर पता चलता है की वहां तो पूरी कोन्स्तिचुएन्सि के वोटर पहुंचे हुए हैं-- ये , वो , यहाँ तक की आपका दूध वाला , अखबार वाला भी ।
उस वक्त सहसा आपको अपने वी ओ पी होने का अहसास होता है।
दिल्ली वालों का एक और शौक है --शादी के कार्ड ऐसे होने चाहिए की देखने वाला देखता ही रह जाये।
जी हाँ, एक एक कार्ड १००-५०० रूपये का। जितने पैसे लोग कार्डों पर खर्च करने लगे हैं, उतने में तो किसी स्वीकार के बच्चे की पूरी शादी ही हो जाये।
एक कार्ड हमें मिला --जो कम से कम २५० ग्राम वज़न का होगा, सिल्क के कवर में बना , ६ परतों वाला ये कार्ड कम से कम ५०० रूपये का होगा। मिठाई के डब्बे के साथ ऐसे बांटा गया जैसे चुनावों के वक्त नेता लोग नोट बांटते हैं।
अब ये भी समझ में नहीं आता की बाद में ऐसे कार्ड का किया क्या जाये।
दूसरी बेकद्री होती है , खाने की। --- १००-१५० आइटम्स खाने के --पांच पांच तरह के पुलाव, सैंकड़ों किस्म के अचार और सलाद --मिठाई की पूरी की पूरी दूकान। --- समझ में नहीं आता क्या खाओ क्या न खाओ ।
खाने वाला कोई होता भी नहीं ---शहर में सभी तो वेल-फेड होते हैं।
प्रस्तुत है, मेरी नयी कविता की कुछ अंतिम पंक्तियाँ :
इस भीड़ भाड़ में , कौन है अपना कौन पराया
किसने निमंत्रण स्वीकारा , कौन नहीं आया ।
दूल्हा कैसा दिखता है, दुल्हन की कैसी सूरत है
ये न कोई देखता है, न देखने की ज़रुरत है।
आजकल मेहमानों को वर-वधु से प्यारा , होता है खाना ,
और मेजबानों को , सम्बन्धियों से ज्यादा , लिफाफों का आना ।
इसी आवागमन की शिकार, प्रेम- संबंधों की ख्वाइश बन गयी है,
और शादियाँ आजकल काले धन की बेख़ौफ़, नुमाइश बन गयी हैं।
नोट : अगली पोस्ट में एक और अहम् सवाल , शादियों के बारे में, ज़वाब देना मत भूलियेगा।
Saturday, December 19, 2009
एल्गोन्क़ुइन कैम्प में उठा एक सवाल ---आप सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं ---
पिछली पोस्ट से आगे ----
कैम्प का दूसरा दिन हँसते गाते खाते पीते गुजर गया।
इस बीच करीब ४ बजे हम पास के जंगल में एक ट्रेल पर ट्रेकिंग के लिए पहुँच गए। लेकिन मुश्किल से १०० मीटर ही जा पाए क्योंकि वहां के निवासी विदेशी मच्छर हमपे ऐसे टूट पड़े जैसे दिल्ली में फिरंगियों को देखकर भिखारी बच्चे चिपट जाते हैं।
फर्क बस इतना था की जहाँ स्वदेशी भिखारी मैले कुचैले , पतले दुबले और कुपोषित नज़र आते हैं, वहीँ कनाडियन मच्छर वहां के लोगों की तरह खाते पीते और ओबीज़ दिखते हैं। इसलिए उनको हमारा खून पीने की इच्छा नहीं थी,
बल्कि उनकी सीमा में घुसपैठ करने पर एतराज़ था।
रात १२ बजे के करीब पार्क का केयरटेकर आया और बोला -ज़नाब, अब सो भी जाइए। आपने तो पटियाला माहौल बना रखा है। अब हम कोई अंग्रेज़ तो थे नहीं की बैठ गए एक जगह और तकते रहे शून्य में घंटों तक, और हो गई पिकनिक। भई, शुद्ध हिन्दुस्तानी बन्दे थे सब के सब ।
तो बिना रोला पाए कैम्पिंग का क्या मज़ा।
लेकिन गोरा छोरा जाते जाते एक बात कह गया जिसने हम सब को हिला दिया। बोला --ज़नाब सोने से पहले गार्बेज को ज़रूर ठिकाने लगा देना, वर्ना यहाँ भालू भी आ जाते हैं। और वो खाने की गंध से ही आकर्षित होते हैं।
यहाँ पर हमने एक गलती कर दी। गार्बेज का बोरा उठाकर १०० मीटर दूर जंगल के किनारे रख आये ताकि भालू आये और खाकर चला जाये।
सुबह गोरे जी फिर आ धमके और बोले -हे आई ऍम नोट यौर गार्बेज बॉय। शुक्र है की भालू नहीं आया वर्ना वो आपके सारे टेंट्स को उजाड़ देता। गार्बेज के लिए एक सिक्योर्ड जगह है जहाँ भालू नहीं आ पाता।
खैर हमने राहत की सांस ली की आज तो बच गए और अगले प्रोग्राम के लिए तैयार हुए।
तीसरा दिन :
पिछले दिन के असफल प्रयास के बाद , आज हमारा प्रोग्राम बना , ट्रेल पर जाने का। करीब दस किलोमीटर दूर , एक ट्रेल थी, जिसका नाम था --विस्की रैपिड्स ट्रेल। २.१ किलोमीटर की ये ट्रेल घने जंगल से होती हुई एक नदी तक पहुंचती है।
कैम्प कमांडर डॉ वर्मा , ट्रेल पर मार्गदर्शन करते हुए ---
करीब एक किलोमीटर चलने के बाद , १०० मीटर नीचे उतरकर हम पहुंचे इस नदी के किनारे --
नदी के पार घना जंगल था। ऐसा लग रहा था जैसे अभी कोई शेर पानी पीने आ जायेगा।
इस बीच बारिस फिर आ गयी थी। इसलिए आगे न जाने का ही फैसला हुआ, और हम मुड लिए वापस कैम्प की ओर।
उस शाम हलकी हलकी बारिस होती रही। ये आखरी शाम थी, इसलिए सभी एन्जॉय करने के मूड में थे। फिर फिरंगी बारिस से कौन डरने वाला था। सो महफ़िल जम गई एक टेंट में जो डबल साइज़ का था। और जम गए २५ हिन्दुस्तानी, एक बार फिर कनाडा के जंगल में।
महफ़िल शुरू होने से पहले फैसला किया गया की यदि आज भालू आ जाता है तो सब मिल कर शोर मचा देंगे। ऐसा करने से भालू डर कर भाग जायेगा। ये बात गोरे केयरटेकर ने बताई थी।
कविताओं , जोक्स और गप-शप के बाद कैम्प की स्प्रिचुअल लीडर अमिता जी ने एलान किया की--- आज वो एक सवाल पूछना चाहती हैं।
और उन्होंने सवाल पूछा -- आप जिंदगी में सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं ?
क्योंकि हम ग्रुप में मेहमान थे, इसलिए सबसे पहले हमी से कहा गया ज़वाब देने के लिए।
मैंने कहा ---मैं अपनी बेटी से सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ।
सब एक बार चुप हो गए। बेटे ने तो ऐसे देखा जैसे उसके साथ धोखा हो गया हो।
खैर मैंने बताया की भई मुझे एक कवि के बोल याद आ रहे हैं, जिसने कहा था की ---
उस घर में घर का अहसास नहीं होता
जिस घर में बेटी का वास नहीं होता।
साथ ही मैंने कहा की जिनके बेटी नहीं है, बस बेटे हैं, वो निराश न हों। उन्हें बहु को ही बेटी समझकर प्यार देना चाहिए। इस बात पर अनिल भाई , जिनके दो बेटे हैं, सुनकर खुश हो गए।
अब बारी आई श्रीमती जी की। उन्होंने बताया की वो अपने माता -पिता को सबसे ज्यादा प्यार करती हैं।
जब बेटे की बारी आई , तो उसने बड़े दिप्लोमेतिकली कहा --मैं अपनी फैमिली को प्यार करता हूँ।
इसके बाद तो जैसे ये स्टेंडर्ड ज़वाब बन गया। सभी को यही ज़वाब सेफ लगा।
अभी इसी बात पर बहस हो ही रही थी की अचानक कुछ सरसराहट सी हुई। फिर टेंट का एक हिस्सा थोडा हिला।
थोड़ी देर बाद गुर्राने की आवाज़ --बिलकुल साफ़, सभी ने सुनी।
अचानक गुर्राहट तेज़ हो गई। अब तो सब का ये हाल की काटो तो खून नहीं। एक पल के लिया सब स्तब्ध रह गए। डॉ वर्मा ने तो गाडी का रिमोर्ट सायरन पकड़ा और बजाने के लिए तैयार।
उस वक्त सब भूल गए की कौन किसे प्यार करता है।
डर के मारे सब की घिग्घी बंध गई थी। अगर सचमुच भालू आ गया तो किसको पहले पकड़ेगा ?
तभी ग्रुप के युवा बच्चों ने जोर जोर से हँसना शुरू कर दिया।
और हमें मालूम पड़ा की ये हरकत संजय भाई की थी, जो न जाने कब टेंट से बाहर खिसक गया था।
गज़ब की मिमिकरी थी संजय भाई की।
अब तो सबकी सांस में सांस आई।
अंत में यही फैसला हुआ की सब खुद से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।
हमने भी यही माना --
आदमी को खुद से प्यार करना चाहिए, ताकि वो इस लायक बन सके की अपने सम्बन्धियों को, समाज को और अपने देश को प्यार कर सके। उनके प्रति अपना फ़र्ज़ पूरा कर सके।
इस विषय में आपका क्या कहना है --बताइयेगा ज़रूर।
कैम्प का दूसरा दिन हँसते गाते खाते पीते गुजर गया।
इस बीच करीब ४ बजे हम पास के जंगल में एक ट्रेल पर ट्रेकिंग के लिए पहुँच गए। लेकिन मुश्किल से १०० मीटर ही जा पाए क्योंकि वहां के निवासी विदेशी मच्छर हमपे ऐसे टूट पड़े जैसे दिल्ली में फिरंगियों को देखकर भिखारी बच्चे चिपट जाते हैं।
फर्क बस इतना था की जहाँ स्वदेशी भिखारी मैले कुचैले , पतले दुबले और कुपोषित नज़र आते हैं, वहीँ कनाडियन मच्छर वहां के लोगों की तरह खाते पीते और ओबीज़ दिखते हैं। इसलिए उनको हमारा खून पीने की इच्छा नहीं थी,
बल्कि उनकी सीमा में घुसपैठ करने पर एतराज़ था।
रात १२ बजे के करीब पार्क का केयरटेकर आया और बोला -ज़नाब, अब सो भी जाइए। आपने तो पटियाला माहौल बना रखा है। अब हम कोई अंग्रेज़ तो थे नहीं की बैठ गए एक जगह और तकते रहे शून्य में घंटों तक, और हो गई पिकनिक। भई, शुद्ध हिन्दुस्तानी बन्दे थे सब के सब ।
तो बिना रोला पाए कैम्पिंग का क्या मज़ा।
लेकिन गोरा छोरा जाते जाते एक बात कह गया जिसने हम सब को हिला दिया। बोला --ज़नाब सोने से पहले गार्बेज को ज़रूर ठिकाने लगा देना, वर्ना यहाँ भालू भी आ जाते हैं। और वो खाने की गंध से ही आकर्षित होते हैं।
यहाँ पर हमने एक गलती कर दी। गार्बेज का बोरा उठाकर १०० मीटर दूर जंगल के किनारे रख आये ताकि भालू आये और खाकर चला जाये।
सुबह गोरे जी फिर आ धमके और बोले -हे आई ऍम नोट यौर गार्बेज बॉय। शुक्र है की भालू नहीं आया वर्ना वो आपके सारे टेंट्स को उजाड़ देता। गार्बेज के लिए एक सिक्योर्ड जगह है जहाँ भालू नहीं आ पाता।
खैर हमने राहत की सांस ली की आज तो बच गए और अगले प्रोग्राम के लिए तैयार हुए।
तीसरा दिन :
पिछले दिन के असफल प्रयास के बाद , आज हमारा प्रोग्राम बना , ट्रेल पर जाने का। करीब दस किलोमीटर दूर , एक ट्रेल थी, जिसका नाम था --विस्की रैपिड्स ट्रेल। २.१ किलोमीटर की ये ट्रेल घने जंगल से होती हुई एक नदी तक पहुंचती है।
कैम्प कमांडर डॉ वर्मा , ट्रेल पर मार्गदर्शन करते हुए ---
करीब एक किलोमीटर चलने के बाद , १०० मीटर नीचे उतरकर हम पहुंचे इस नदी के किनारे --
नदी के पार घना जंगल था। ऐसा लग रहा था जैसे अभी कोई शेर पानी पीने आ जायेगा।
इस बीच बारिस फिर आ गयी थी। इसलिए आगे न जाने का ही फैसला हुआ, और हम मुड लिए वापस कैम्प की ओर।उस शाम हलकी हलकी बारिस होती रही। ये आखरी शाम थी, इसलिए सभी एन्जॉय करने के मूड में थे। फिर फिरंगी बारिस से कौन डरने वाला था। सो महफ़िल जम गई एक टेंट में जो डबल साइज़ का था। और जम गए २५ हिन्दुस्तानी, एक बार फिर कनाडा के जंगल में।
महफ़िल शुरू होने से पहले फैसला किया गया की यदि आज भालू आ जाता है तो सब मिल कर शोर मचा देंगे। ऐसा करने से भालू डर कर भाग जायेगा। ये बात गोरे केयरटेकर ने बताई थी।
कविताओं , जोक्स और गप-शप के बाद कैम्प की स्प्रिचुअल लीडर अमिता जी ने एलान किया की--- आज वो एक सवाल पूछना चाहती हैं।
और उन्होंने सवाल पूछा -- आप जिंदगी में सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं ?
क्योंकि हम ग्रुप में मेहमान थे, इसलिए सबसे पहले हमी से कहा गया ज़वाब देने के लिए।
मैंने कहा ---मैं अपनी बेटी से सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ।
सब एक बार चुप हो गए। बेटे ने तो ऐसे देखा जैसे उसके साथ धोखा हो गया हो।
खैर मैंने बताया की भई मुझे एक कवि के बोल याद आ रहे हैं, जिसने कहा था की ---
उस घर में घर का अहसास नहीं होता
जिस घर में बेटी का वास नहीं होता।
साथ ही मैंने कहा की जिनके बेटी नहीं है, बस बेटे हैं, वो निराश न हों। उन्हें बहु को ही बेटी समझकर प्यार देना चाहिए। इस बात पर अनिल भाई , जिनके दो बेटे हैं, सुनकर खुश हो गए।
अब बारी आई श्रीमती जी की। उन्होंने बताया की वो अपने माता -पिता को सबसे ज्यादा प्यार करती हैं।
जब बेटे की बारी आई , तो उसने बड़े दिप्लोमेतिकली कहा --मैं अपनी फैमिली को प्यार करता हूँ।
इसके बाद तो जैसे ये स्टेंडर्ड ज़वाब बन गया। सभी को यही ज़वाब सेफ लगा।
अभी इसी बात पर बहस हो ही रही थी की अचानक कुछ सरसराहट सी हुई। फिर टेंट का एक हिस्सा थोडा हिला।
थोड़ी देर बाद गुर्राने की आवाज़ --बिलकुल साफ़, सभी ने सुनी।
अचानक गुर्राहट तेज़ हो गई। अब तो सब का ये हाल की काटो तो खून नहीं। एक पल के लिया सब स्तब्ध रह गए। डॉ वर्मा ने तो गाडी का रिमोर्ट सायरन पकड़ा और बजाने के लिए तैयार।
उस वक्त सब भूल गए की कौन किसे प्यार करता है।
डर के मारे सब की घिग्घी बंध गई थी। अगर सचमुच भालू आ गया तो किसको पहले पकड़ेगा ?
तभी ग्रुप के युवा बच्चों ने जोर जोर से हँसना शुरू कर दिया।
और हमें मालूम पड़ा की ये हरकत संजय भाई की थी, जो न जाने कब टेंट से बाहर खिसक गया था।
गज़ब की मिमिकरी थी संजय भाई की।
अब तो सबकी सांस में सांस आई।
अंत में यही फैसला हुआ की सब खुद से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।
हमने भी यही माना --
आदमी को खुद से प्यार करना चाहिए, ताकि वो इस लायक बन सके की अपने सम्बन्धियों को, समाज को और अपने देश को प्यार कर सके। उनके प्रति अपना फ़र्ज़ पूरा कर सके।
इस विषय में आपका क्या कहना है --बताइयेगा ज़रूर।
Friday, December 18, 2009
आइये आपको सैर कराते हैं, कनाडा के एल्गोन्क़ुइन पार्क की --
दो पोस्ट --पहली ---परिवार के मुखिया के जन्मदिन की शुभकामनाएं ---दूसरी ---ब्लॉग परिवार के एक सदस्य की कुशल क्षेम । दोनों के ४०० से ज्यादा पाठक और ५० से ज्यादा शुभकामनाएं। सारा ब्लॉग जगत एकजुट होकर एक साथ। यही है ब्लोगिंग का एसेंस। यही है ब्लोगिंग का उद्देश्य । ब्लोगिंग महज़ एक मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि देशवासियों को एक करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
और इसके लिए आभार नहीं, आप सभी बधाई के पात्र हैं।
इसी ख़ुशी में चलिए आज आपको सैर कराते हैं ओंटारियो कनाडा में स्थित एल्गोन्क़ुइन प्रोविंसियल पार्क की।
प्रस्तुत है इस पार्क में बिताई तीन रातों का विवरण ---कैम्पिंग इन एल्गोन्क़ुइन पार्क।
टोरोंटो से करीब ३०० किलोमीटर दूर, ७७०,००० हैक्टेयर में फैले इस पार्क में जाने के लिए टोरोंटो से नोर्थ की ओर हाइवे नंबर ४०० से होते हुए , हंट्सविले होकर जाया जा सकता है। इस पार्क के दक्षिण छोर से होता हुआ एकमात्र हाइवे नंबर ६० , पार्क के अन्दर से होता हुआ जाता है। बाकी सारा पार्क खाली जंगल है।
जंगल में भालू, भेड़िये , हिरन और मूज़ नाम के जंगली जानवरों की भरमार है।
हम ६ दोस्तों की मंडली, ६ कारों में परिवार समेत , रवाना हुए, कैम्प के लिए जहाँ हमारी ३ दिन की बुकिंग थी।
हाइवे नंबर ६० पर , कैम्पिंग साईट की ओर जाते हुए।
लेकिन रास्ते में भारी बारिस होने लगी। ऐसे में कैम्प साईट पर जाना उचित नहीं लगा। इसलिए फैसला हुआ की पहली रात एक गाँव के किनारे बने रिवरव्यू मोटल में गुजारी जाये।
मोटल के बाहर। बारिस में ट्रेकिंग ---रेनकोट ---नायग्रा फाल्स की टिकेट पर रिटर्न गिफ्ट थी।
तो पहली रात हमने यहीं गुजारी। रात में बोनफायर हुई, गाने, चुटकले, कवितायेँ और मौज मस्ती।
अगले दिन सुहानी धूप खिली थी। दोपहर तक सब पहुँच गए , कैम्प साईट पर।
कनाडियन लोग कैम्पिंग पर जाने के लिए ये पिकनिक वैन रखते हैं। इनमे ठहरने का पूरा इंतजाम होता है --बेडरूम, किचन, बाथरूम, ड्राइंग रूम , यहाँ तक की बालकनी भी।
लेकिन हम ठहरे शुद्ध हिन्दुस्तानी --जाते ही केयरटेकर से कहा, भैया हम तो तम्बू गाड़ेंगे ---जगह बता दो।
वहां तम्बू गाड़ने के लिए प्लाट बने हुए थे । जी हाँ, बिजली और पानी की सप्लाई के साथ।

तो भई , तम्बू गड़ गए और खटोला भी बिछ गया।---- पीछे घना जंगल।

फिर धीरे धीरे शाम होने लगी और होने लगा जंगल में मंगल।--- महिलाएं खाना बना रही थी ।

और मर्द लोग बोनफायर जला कर हाथ सेक रहे थे। बाएं से--- संजय, प्रदीप, डॉ वर्मा , डॉ दराल और राज।
और फिर चाँद निकल आया। जून -जुलाई में वहां दिन साढ़े नौ बजे छिपता है और अँधेरा दस बजे तक होता है।

किसी ने गाना सुनाया --
निकला है गोरा गोरा चाँद से सजनवा , कर के जतन कोई आजा।
जागूं सारी सारी रात रे सजन, मैं तो घड़ी घड़ी देखूं दरवाज़ा।
वो रात तो कट गयी, लेकिन अगली रात क्या हुआ ?
कौन आया ?
ये जानने के लिए अगली पोस्ट पढना मत भूलियेगा।
नोट : यह पोस्ट समर्पित है --डॉ विनोद वर्मा और मीना वर्मा को --जिनकी आज शादी की सालगिरह है।
आप चाहें तो उन्हें अपनी शुभकामनाएं यहाँ दे सकते हैं।
और इसके लिए आभार नहीं, आप सभी बधाई के पात्र हैं।
इसी ख़ुशी में चलिए आज आपको सैर कराते हैं ओंटारियो कनाडा में स्थित एल्गोन्क़ुइन प्रोविंसियल पार्क की।
प्रस्तुत है इस पार्क में बिताई तीन रातों का विवरण ---कैम्पिंग इन एल्गोन्क़ुइन पार्क।
टोरोंटो से करीब ३०० किलोमीटर दूर, ७७०,००० हैक्टेयर में फैले इस पार्क में जाने के लिए टोरोंटो से नोर्थ की ओर हाइवे नंबर ४०० से होते हुए , हंट्सविले होकर जाया जा सकता है। इस पार्क के दक्षिण छोर से होता हुआ एकमात्र हाइवे नंबर ६० , पार्क के अन्दर से होता हुआ जाता है। बाकी सारा पार्क खाली जंगल है।
जंगल में भालू, भेड़िये , हिरन और मूज़ नाम के जंगली जानवरों की भरमार है।
हम ६ दोस्तों की मंडली, ६ कारों में परिवार समेत , रवाना हुए, कैम्प के लिए जहाँ हमारी ३ दिन की बुकिंग थी।
हाइवे नंबर ६० पर , कैम्पिंग साईट की ओर जाते हुए। लेकिन रास्ते में भारी बारिस होने लगी। ऐसे में कैम्प साईट पर जाना उचित नहीं लगा। इसलिए फैसला हुआ की पहली रात एक गाँव के किनारे बने रिवरव्यू मोटल में गुजारी जाये।
मोटल के बाहर। बारिस में ट्रेकिंग ---रेनकोट ---नायग्रा फाल्स की टिकेट पर रिटर्न गिफ्ट थी। तो पहली रात हमने यहीं गुजारी। रात में बोनफायर हुई, गाने, चुटकले, कवितायेँ और मौज मस्ती।
अगले दिन सुहानी धूप खिली थी। दोपहर तक सब पहुँच गए , कैम्प साईट पर।
कनाडियन लोग कैम्पिंग पर जाने के लिए ये पिकनिक वैन रखते हैं। इनमे ठहरने का पूरा इंतजाम होता है --बेडरूम, किचन, बाथरूम, ड्राइंग रूम , यहाँ तक की बालकनी भी।लेकिन हम ठहरे शुद्ध हिन्दुस्तानी --जाते ही केयरटेकर से कहा, भैया हम तो तम्बू गाड़ेंगे ---जगह बता दो।
वहां तम्बू गाड़ने के लिए प्लाट बने हुए थे । जी हाँ, बिजली और पानी की सप्लाई के साथ।

तो भई , तम्बू गड़ गए और खटोला भी बिछ गया।---- पीछे घना जंगल।

फिर धीरे धीरे शाम होने लगी और होने लगा जंगल में मंगल।--- महिलाएं खाना बना रही थी ।

और मर्द लोग बोनफायर जला कर हाथ सेक रहे थे। बाएं से--- संजय, प्रदीप, डॉ वर्मा , डॉ दराल और राज।
और फिर चाँद निकल आया। जून -जुलाई में वहां दिन साढ़े नौ बजे छिपता है और अँधेरा दस बजे तक होता है।

किसी ने गाना सुनाया --
निकला है गोरा गोरा चाँद से सजनवा , कर के जतन कोई आजा।
जागूं सारी सारी रात रे सजन, मैं तो घड़ी घड़ी देखूं दरवाज़ा।
वो रात तो कट गयी, लेकिन अगली रात क्या हुआ ?
कौन आया ?
ये जानने के लिए अगली पोस्ट पढना मत भूलियेगा।
नोट : यह पोस्ट समर्पित है --डॉ विनोद वर्मा और मीना वर्मा को --जिनकी आज शादी की सालगिरह है।
आप चाहें तो उन्हें अपनी शुभकामनाएं यहाँ दे सकते हैं।
Wednesday, December 16, 2009
मैं हैरान हूँ, थोड़ा परेशान भी हूँ --ज़रा मदद करें ---
हिन्दी ब्लॉग जगत को जन्मे भले ही कुछ ही अरसा हुआ है । लेकिन इस थोड़े से समय में ही पूरा ब्लॉग जगत एक परिवार जैसा हो गया है।
भले ही ब्लोगर्स आपस में मिल न पाते हों, लेकिन एक दूसरे के लेख, कवितायें और विचार पढ़कर काफी हद तक एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में जान जाते हैं।
अगर विचारों और पसंद में समानताएं दिखें , तो अपने आप एक रिश्ता सा कायम हो जाता है।
ऐसे ही एक मित्र हैं, मुमुक्ष की रचनाएँ वाले श्री चंदर मोहन गुप्ता जी ,जो करीब दो साल से नियमित रूप से लिख रहे हैं।
मुझे ब्लॉग पर एक साल होने वाला है, और गुप्ता जी उन ब्लोगर्स में से एक हैं जो सबसे पहले मेरे ब्लॉग पर आए , फ़िर नियमित रूप से अपना योगदान देते रहे हैं।
गुप्ता जी ने उस वक्त भी मेरा उत्साह बढाया जब में किसी कारणवश हतोत्साहित महसूस कर रहा था।
लेकिन आज मैं हैरान हूँ। थोड़ा परेशान भी हूँ। क्योंकि हर सोमवार को नियमित रूप से लिखने वाले श्री गुप्ता जी ने अचानक लिखना बंध कर दिया।
पिछले डेढ़ महीने से न तो मैंने उनकी कही टिपण्णी देखी, न ही उन्होंने कोई पोस्ट लिखी।
उनकी लास्ट पोस्ट ३१ ओक्टूबर को छपी थी।
आख़िर ऐसी क्या वज़ह हुई की गुप्ता जी ने अचानक लिखना छोड़ दिया।
उनका कोई इ-मेल या कोंटेक्ट नंबर न होने से पता भी नही चल रहा।
मैं अनुरोध करता हूँ , राजस्थान के ब्लोगर बंधुओं से, विशेषकर जयपुर में रहने वाले ब्लोगर्स से , की वो पता लगाकर बताएं की गुप्ता जी आजकल कहाँ है, और लिख क्यों नही रहे हैं।
एक ब्लोगर मित्र की अनुपस्थिति का खलना स्वाभाविक है।
भले ही ब्लोगर्स आपस में मिल न पाते हों, लेकिन एक दूसरे के लेख, कवितायें और विचार पढ़कर काफी हद तक एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में जान जाते हैं।
अगर विचारों और पसंद में समानताएं दिखें , तो अपने आप एक रिश्ता सा कायम हो जाता है।
ऐसे ही एक मित्र हैं, मुमुक्ष की रचनाएँ वाले श्री चंदर मोहन गुप्ता जी ,जो करीब दो साल से नियमित रूप से लिख रहे हैं।
मुझे ब्लॉग पर एक साल होने वाला है, और गुप्ता जी उन ब्लोगर्स में से एक हैं जो सबसे पहले मेरे ब्लॉग पर आए , फ़िर नियमित रूप से अपना योगदान देते रहे हैं।
गुप्ता जी ने उस वक्त भी मेरा उत्साह बढाया जब में किसी कारणवश हतोत्साहित महसूस कर रहा था।
लेकिन आज मैं हैरान हूँ। थोड़ा परेशान भी हूँ। क्योंकि हर सोमवार को नियमित रूप से लिखने वाले श्री गुप्ता जी ने अचानक लिखना बंध कर दिया।
पिछले डेढ़ महीने से न तो मैंने उनकी कही टिपण्णी देखी, न ही उन्होंने कोई पोस्ट लिखी।
उनकी लास्ट पोस्ट ३१ ओक्टूबर को छपी थी।
आख़िर ऐसी क्या वज़ह हुई की गुप्ता जी ने अचानक लिखना छोड़ दिया।
उनका कोई इ-मेल या कोंटेक्ट नंबर न होने से पता भी नही चल रहा।
मैं अनुरोध करता हूँ , राजस्थान के ब्लोगर बंधुओं से, विशेषकर जयपुर में रहने वाले ब्लोगर्स से , की वो पता लगाकर बताएं की गुप्ता जी आजकल कहाँ है, और लिख क्यों नही रहे हैं।
एक ब्लोगर मित्र की अनुपस्थिति का खलना स्वाभाविक है।
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