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Thursday, July 12, 2012

फोटो खिंचवाना एक अदा है , लेकिन फोटो खींचना एक कला है --


फोटो खिंचवाने की अदा के बाद आइये अब जानते हैं , फोटो खींचने की कला के बारे में . यूँ तो हम कोई प्रोफेशनल फोटोग्राफर नहीं . लेकिन लोग कहते हैं , हम फोटो अच्छे खींचते हैं . अब आपने कहा और हमने मान लिया . इसलिए आपके साथ कुछ टिप्स शेयर करते हैं .

कैमरा :

अच्छा फोटो खींचने के लिए किसी प्रोफेशनल कैमरे की आवश्यकता नहीं होती . आजकल आम तौर पर छोटे छोटे डिजिटल कैमरे मार्केट में उपलब्ध हैं जो ५००० -१०,००० रूपये की रेंज में मिल जाते हैं . अच्छी फोटो का मेगा पिक्स़ल से कोई सम्बन्ध नहीं होता . मेगा पिक्स़ल बस फोटो का साइज़ तय करता है यानि आप कितना एनलार्जमेंट कर सकते हैं . हमारे मोबाइल के २ मेगा पिक्स़ल कैमरे से भी बढ़िया फोटो आते हैं . लेकिन कैमरे में लेंस कार्ल जीस का हो तो फोटो ज्यादा साफ आते हैं . ज्यादा ज़ूम का भी ज्यादा फायदा नहीं होता क्योंकि हाई ज़ूम पर बिना ट्राई पोड के फोटो खींचने पर शेक इफेक्ट की वज़ह से फोटो धुंधले नज़र आयेंगे .

सधा हुआ हाथ : अच्छी फोटो के लिए ज़रूरी है की फोटो खींचते समय हाथ स्थिर रहें . ज़रा सी हरकत भी फोटो को धुंधला कर सकती है . लेकिन यह अभ्यास से ही आता है .

प्रकाश :

फोटो लेते समय ध्यान रखें , सूरज आपके पीछे की ओर हो जिससे रौशनी सब्जेक्ट के ऊपर पड़े . अक्सर लोग फोटो लेते समय सूरज महाराज का ध्यान ही नहीं रखते .

सिमिट्री :

किसी भी सब्जेक्ट जैसे किसी भवन , मोनुमेंट या जगह की फोटो लेते समय फोटो फ्रेम की सिमिट्री जितनी सही होगी , फोटो देखने में उतना ही आनंद आएगा . अक्सर लोग सिमिट्री का ध्यान नहीं रखते , बस देखा और किल्क कर दिया . सब्जेक्ट के दायें , बाएं , ऊपर और नीचे --चारों ओर समान या एक अनुपात में स्थान रहना चाहिए . कहाँ कितना रिक्त स्थान रखना है , यह आपके अनुभव और पसंद पर निर्भर करता है .

फोरग्राउंड और बैकग्राउंड :


किसी प्राकृतिक द्रश्य जैसे झील का फोटो लेते समय फोरग्राउंड में पेड़ पौधे आदि लेने से द्रश्य की शोभा बहुत बढ़ जाती है . इसके बिना फोटो देख कर ऐसा लगेगा जैसे बिना नमक की दाल .

कलात्मक दृष्टि :

आम फोटो तो सभी खींच लेते हैं . फोटो में भी मॉडर्न आर्ट पैदा करना भी एक कला है . नए नए आइडियाज ट्राई करना में हर्ज़ भी क्या है .


स्पेशल इफेक्ट्स :

ज़रा सी कल्पना शक्ति का इस्तेमाल कर आप फोटो में स्पेशल इफेक्ट्स ला सकते हैं . पैवेलियन की इस तस्वीर को लेते समय एक सूखे पेड़ को बीच में लेने से फोटो की सुन्दरता में चार चाँद लग गए हैं . बिना इस पेड़ के फोटो बहुत ब्लैंड लगती .

आउटडोर यात्रा पर :

आसमान में छाये बादल फोटोग्राफर्स को हमेशा लुभाते हैं . इन्हें प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ ऐसे मिलाइये जैसे इनके बिना फोटो अधूरी सी लगे . लेकिन यहाँ भी सिमिट्री का सही होना ज़रूरी है .

आँखें खुली रखिये :

किसी अंजानी जगह पर विचरण करते समय सतर्क रह कर चहलकदमी करेंगे तो अनेक ऐसे द्रश्य देखने को मिल जायेंगे जिन्हें आप कैमरे में कैद करना चाहेंगे . यह टेढ़ा मेढ़ा पेड़ और उस पर बैठा बन्दर --यह द्रश्य पलक झपकते ही ओझल हो सकता है .

अवसर को हाथ से न जाने दें :

क्योंकि फोटो खींचने का ऐसा अवसर संयोगवश ही मिलता है .


सूर्योदय या सूर्यास्त :

फोटो देख कर कहना मुश्किल है , यह सूर्योदय की फोटो है या सूर्यास्त की . लेकिन यदि दिल से खींची जाए तो इफेक्ट एक जैसा ही आता है -- मनभावन .

नोट : ब्लॉगजगत में कई अच्छे फोटोग्राफर हैं जैसे देवेन्द्र पाण्डे जी , सतीश सक्सेना जी , संदीप पंवार और नीरज जाट . हाल में ही श्री इन्द्रानील भट्टाचार्जी के फोटो देखकर बहुत आनंद आया . अब आपके सुन्दर फोटोज का इंतजार रहेगा .

Sunday, July 8, 2012

फोटो खींचना ही नहीं , खिंचवाना भी एक कला है ---


फोटोग्राफी एक कला है , यह तो हम सब जानते हैं . यानि फोटो खींचना एक कला है . लेकिन हम यह मानते हैं , फोटो खिंचवाना भी एक कला है . ऐसा देखा गया है , हमारे देश में अधिकांश लोग कैमरा कौन्सियस या शाई होते हैं . कैमरे के सामने आते ही उनके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आते हैं जैसे किसी ने पीट कर बिठा दिया हो . जबकि विदेशों में विशेषकर विकसित देशों में लोग फोटो खिंचवाते समय न सिर्फ बिल्कुल सहज महसूस करते हैं , बल्कि ऐसा पोज बनाते हैं जिसे देख कर देखने वाला भी प्रसन्न हो जाता है .

शायद ऐसा इसलिए है , हमारे यहाँ कुछ वर्ष पहले तक कैमरा रखना एक लग्जरी होता था . कभी कोई फॉर्म भरते वक्त स्टूडियो में जाकर फोटो खिंचवाते थे , जहाँ खींचे गए फोटो में चेहरे भावहीन दिखाई देते थे . इसीलिए अक्सर लोगों को फोटो खिंचवाने का अनुभव बहुत कम ही होता था . यदि गौर से देखें तो , उस समय के क्रिकेटर्स भी अधिकतर शर्मीले ही नज़र आते थे . मोहम्मद अजहरुद्दीन जब तक क्रिकेट खेलते रहे , कैमरा कौन्सियस ही रहे . अब एम् पी बनकर थोडा सुधार हुआ है . हालाँकि , अब कुछ वर्षों से मोबाइल कैमरे आने से युवा पीढ़ी के लोग सहज रूप से फोटो खिंचवाते हैं , जबकि पुरानी पीढ़ी के लोग अभी भी कैमरे के सामने तनावग्रस्त हो जाते हैं .

जब हमने पहली बार फोटो खिंचवाया :

प्राथमिक शिक्षा गाँव से पूरी कर छठी कक्षा में जब दिल्ली शहर आया , तब कक्षा का सामूहिक फोटो खींचा जाना था . निश्चित दिन और समय पर समस्त कक्षा एक स्थान पर एकत्त्रित हो गई . सबको पंक्तियों में खड़ा कर दिया गया . फोटोग्राफर ने सबको साँस लेकर रोकने के लिए कहा जैसे एक्स रे खींचते समय कहा जाता है . वह हमारा प्रथम अवसर था फोटो खिंचवाने का . हमने एक लम्बा साँस लिया और रोक लिया . सावधान की मुद्रा में साँस रोक कर खड़े रहे . लेकिन फोटोग्राफर ने फोटो उतारने में देर लगा दी . इसलिए वह साँस बेकार गया . एक बार फिर यह प्रक्रिया दोहराई गई. इस बार ठान लिया था , साँस को टूटने नहीं देंगे . गाल फूलकर गुब्बारे की तरह हो गए , लेकिन हमने फूंक निकलने नहीं दी . लेकिन यह वार भी खाली गया . आखिर तीसरी बार सफलता मिली और हमें बताया गया , फोटो हो गया .

लेकिन अफ़सोस , वह फोटो आज तक नहीं मिला है .

जब हमने पहली बार फोटो खींचा :

हमारे हाथ कैमरा पहली बार तब आया जब हमारे ताऊ जी फ़ौज से रिटायर हुए और उन्हें एक आग्फा क्लिक थ्री कैमरा गिफ्ट में मिला . गर्मियों की छुट्टियों में किसी तरह एक फिल्म रोल का इंतज़ाम किया गया . खानदान के सारे भाई बहन नहा धोकर तैयार हो गए फोटो खिंचवाने के लिए . हम सबसे बड़े थे . इसलिए कैमरा हमारे ही हाथ में आया . कैमरे में रील डाली और हम तैयार हो गए फोटो उतारने के लिए . लेकिन यह क्या , फोटो खिंची ही नहीं . सोचा , शायद रील ठीक से फिट नहीं हुई . इसलिए दोबारा ठीक से डालने का विचार बनाया . विज्ञानं के छात्र होने के नाते यह जानते थे , रील को रौशनी में एक्सपोज नहीं करते . इसलिए घर की बैठक के सारे खिड़की दरवाजे बंद कर हमने बड़े ध्यान से कैमरा खोला , रील बाहर निकाली और फिर संभाल कर दोबारा डाल दी .
फिर शुरू हुआ , फोटो सेशन , हमारी जिंदगी की पहली फोटोग्राफी .

हिसाब लगाकर सबके फोटो खींचे गए . कैमरे से रील निकालकर रख दी गई . छुट्टियाँ ख़त्म होने पर जब शहर आए और रील को धुलवाया तो पाया , हम तो लुट चुके थे . फिल्म बिल्कुल साफ़ थी , एकदम स्पॉटलेस .

आज जब बच्चों को , युवाओं को डिजिटल कैमरे या मोबाईल कैमरे से फोटो खींचते देखता हूँ तो यही लगता है -- ज़माना कितना बदल गया है . हम अक्सर बच्चों को डांटते थे जब वो फोटो खींचने की जिद करते थे , यह कह कर -- एक फोटो खराब हो जाएगी . अब न फोटो ख़राब होती है , न रील पर खर्च करना पड़ता है . यहाँ तक की प्रिंट बनाने की भी ज़रुरत नहीं होती . पेन ड्राईव में डाला और लगा दिया कंप्यूटर या सीधे टी वी में . जिसे चाहा पोस्ट कर दिया ई मेल से , फेसबुक में या ब्लॉग पर .

लेकिन एक बात देख कर थोडा दुःख सा होता है -- बहुत कम लोग फोटो सही तरीके से खींचते हैं . यदि फोटो खींचते समय कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो कैमरा कैसा भी हो , परिणाम बढ़िया ही आयेंगे .



कैसे खिंचवायें फोटो :

अच्छा फोटो खिंचवाने के लिए भी थोड़ा अभ्यास की ज़रुरत है . पहली बात -- कैमरे को देखकर अनदेखा कर देना चाहिए . यदि आपकी आँखें झपक जाती हों तो आप कैमरे की तरफ देखिये ही नहीं . चेहरे पर मुस्कान बनाये रखने की आदत डालिए . यह आदत आपके दैनिक जीवन में भी बहुत काम आएगी . सावधान की मुद्रा में मत खड़े होइए . ज़रा सोचिये , जब स्कूल में पी टी करते समय कभी सही से सावधान मुद्रा में खड़े नहीं हुए तो अब क्यों . यदि आपको मुस्कान बिखेरने में शर्म आती हो या कंजूसी महसूस होती हो तो फोटो खींचने से पहले एक बार-- चीज़-- बोलिए -- आपके चेहरे पर फोटो में स्वत : मुस्कान आ जाएगी . पोश्चर भी रिलेक्स्ड होना चाहिए . हाव भाव जितने स्वाभाविक होंगे , फोटो उतनी ही अच्छी आएगी .
बाकि तो फोटो खींचने वाले पर भी निर्भर करता है -- वह आपको हीरो बना देता है यां विलेन .

नोट : यदि यह लेख पढ़कर आपके आत्म विश्वास में वृद्धि हुई हो तो अगला लेख पढना मत भूलियेगा .
अगली पोस्ट में -- कैसे बने अच्छे फोटोग्राफर, इसी पर विचार करेंगे .

Tuesday, January 10, 2012

दीवाने तो दीवाने हैं --उन्हें जान की परवाह कहाँ !

फोटोग्राफी का शौक तो हमें भी बहुत है । कई बार ऐसे ऐसे काम भी किये हैं जिन्हें याद कर आज भी हंसी भी आती है और हैरानी भी होती है । लेकिन किसी को फोटोग्राफी का शौक इस हद तक दीवाना बना सकता है , यह एक इ- मेल देखकर ही पता चला जो हमें एक मित्र ने भेजी थी ।

यहाँ एक फोटोग्राफर ने दूसरे फोटोग्राफर की फोटो खींचते हुए फोटो खींचीं हैं ।
यह अन्जान फोटोग्राफर अमेरिका के एरिजोना राज्य में स्थित ग्रांड केन्यन में एक चट्टान पर खड़ा है जहाँ से यह कैमरे को ट्राई पोड पर लगाकर सनसेट की फोटो खींच रहा है ।



इस बन्दे ने सैडल पहने हुए हैं । इस पॉइंट पर केन्यन की गहराई ९०० मीटर है । साथ वाली चट्टान बिल्कुल सुरक्षित है । फिर भी इसने इसी अकेली चट्टान को चुना ।

इसे यहाँ आते हुए किसी ने नहीं देखा था । इसलिए हैरानी थी कि वह यहाँ पहुंचा कैसे होगा ।

लेकिन अब सवाल था कि वह वापस कैसे आएगा !



सनसेट के बाद उसने अपना ट्राई पोड और कैमरा बाएं हाथ में पकड़ा और वापसी के लिए तैयार हो गया ।
साथ वाली चट्टान पर खड़े सभी सैलानी हैरान थे कि अब यह क्या करेगा ।



लेकिन इसने ग़ज़ब के साहस का परिचय देते हुए छलांग लगा दी ।



एक हाथ में कैमरा और ट्राई पोड और दूसरे हाथ से उसने चट्टान को पकड़ा और एक पैर चट्टान पर रखा । लेकिन हाथ और पैर खिसकने लगे ।
सभी साँस रोके खड़े यह तमाशा देख रहे थे ।
लेकिन उसने अपना बदन चट्टान के साथ चिपका लिया । फिर कुछ सेकंड्स रूककर सारा सामान ऊपर फेंका और चट्टान पर चढ़ गया ।
फिर वह अपने रास्ते चलता बना ।
लेकिन फोटो खींचने वाले फोटोग्राफर को बाथरूम जाना पड़ा , अपनी गीली हो गई पेंट को बदलने के लिए
अब यहाँ सवाल यह उठता है कि :

* क्या ये फोटो असली हैं ? या मोर्फ्ड किये गए हैं ?
* यदि असली हैं तो क्या कोई इतना सनकी भी हो सकता है ?
* वह ये फोटो साथ वाली सुरक्षित चट्टान से भी खींच सकता था। इसके लिए उसने इतना बड़ा जान का जोख़िम क्यों लिया ?

शायद इन सवालों के ज़वाब कभी नहीं मिलेंगेलेकिन यही कह सकते हैं कि मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से मिलता हैइसे यूँ जोख़िम में डालें

लेकिन एडवेंचर के दीवाने भला कहाँ सुनते हैं !