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Monday, July 19, 2010

डॉक्टर्स डे पर मिला चिकित्सा रत्न पुरस्कार ----

अक्सर यह देखने में आता है कि कोई भी एसोसिएशन अपने सदस्यों के लिए ही काम करती है । लेकिन दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन एक ऐसी संस्था है जो न सिर्फ अपने डॉक्टर सदस्यों के हित के लिए कार्य करती है , बल्कि समूचे समाज के उत्थान के लिए भी कार्यरत रहीं है ।

सन १९१४ में स्थापित दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन जल्दी ही १०० वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है

दिल्ली
मेडिकल एसोसिएशन में १०,००० से भी ज्यादा डॉक्टर्स सदस्य हैं ।डॉक्टर्स के लिए नवीनतम जानकारी जुटाने से लेकर , निजी क्लिनिक्स , नर्सिंग होम्स , प्राइवेट अस्पतालों के साथ साथ सरकारी डॉक्टर्स के हितों की खातिर कार्य करना , सभी सरकारी राजकीय और राष्ट्रिय कार्यक्रमों में हिस्सा लेना और समय समय पर तरह तरह के कैम्प लगाकर जनता की सेवा करना , इस संस्था के मुख्य कार्य रहे हैं ।

यूँ तो दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन हर वर्ष बेहतर कार्य करने वाले डॉक्टर मित्रों को समय समय पर सम्मानित कर प्रोत्साहित करती रहती है । किन्तु इस वर्ष डॉक्टर्स डे पर डी एम् ए ने दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ चुनिन्दा डॉक्टर्स को एक विशेष सम्मान से सुशोभित किया --चिकित्सा रत्न पुरस्का देकर ।

चिकित्सा रत्न अवार्ड प्राप्त करने वालों में दिल्ली के सभी बड़े बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों के विश्व विख्यात चिकित्सक और सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य विभागों के उच्च अधिकारियों समेत दिल्ली के कई जाने माने डॉक्टर्स शामिल थे ।समारोह में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के सभी हू हू उपस्थित थे ।

यह
मेरा सौभाग्य रहा कि यह सम्मान मुझे भी प्राप्त हुआ


दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ नरेंद्र सैनी पुरस्कार प्रदान करते हुए


ऐसे समारोह में अक्सर अवार्ड पाने वालों को कुछ बोलने का अवसर दिया जाता है । लेकिन समय की कमी होने की वज़ह से इसे नज़रअंदाज़ करना पड़ रहा था ।

पुरस्कार वितरण समारोह में जब हमारा नाम पुकारा गया और हम अवार्ड लेने मंच पर पहुंचे तब एक अज़ीबो ग़रीब स्थिति उत्त्पन्न हो गई । एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ सैनी ने अपने हाथ पीछे खींचते हुए कहा --आप तो लाफ्टर चैम्पियन हैं , आपको अवार्ड तब मिलेगा जब आप कुछ सुनायेंगे ।

अब इस अप्रत्याशित आक्रमण के लिए तो हम तैयार नहीं थे । फिर भी क्योंकि माइक हाथ में थमा दिया गया था , इसलिए बचने का कोई रास्ता भी नहीं था ।

सो
हमने कहा कि भाई --

जब समय की हो कमी
और सामने हो नेता या कवि
तो भूले से भी माइक न दो कभी ।

क्योंकि नेता तो फिर किसी और मीटिंग में जाने के लिए जल्दी से खिसक लेंगे , परन्तु एक कवि के हाथ में माइक आ गया तो फिर वापस लेना मुश्किल हो जायेगा ।
अब यह सुनकर वो भी घबरा गए और तुरंत माइक हम से लेकर अवार्ड हमें सौंप दिया ।

अब यह सम्मान प्राप्त करने के बाद हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है ।

लेकिन जिम्मेदारियों से क्या डरना । यही तो मनुष्य को मज़बूत बनाती हैं ।