क्या आपने कभी सोचा है कि हम सारी उम्र २४ घंटे साँस लेते रहते हैं और हमें पता भी नहीं चलता ।
लेकिन यदि साँस लेने का पता चलने लगे यानि कौनशिय्स ब्रीदिंग होने लगे तो समझ जाइये कि आपको साँस फूलने की बीमारी हो गई है ।
साँस फूलना :
यूँ तो साँस फूलने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे --
* हृदय रोग
* फेफड़ों का रोग जैसे --न्युमोनिया
* एनीमिया --खून की कमी
* हिस्टीरिया , नर्वसनेस आदि मानसिक रोग
लेकिन सबसे प्रमुख कारण है --अस्थमा या दमा ।
अस्थमा क्या होता है ?
यह स्वास नालियों का ऐसा रोग है जिसमे स्वास नालियां सिकुड़ जाती हैं और उनमे सूजन आ जाती है । इससे साँस लेने में रुकावट होने लगती है । अक्सर इसके अटैक आते हैं ।
अस्थमा क्यों होता है ?
आम तौर पर अस्थमा जन्मजात होता है । यानि यह एक अनुवांशिक रोग है । हालाँकि , अस्थमा कब शुरू होगा , यह बताना मुश्किल होता है । अक्सर यह बचपन में ही शुरू हो जाता है ।
यदि घर में मात पिता या किसी अन्य सम्बन्धी को अस्थमा है तो अगली पीढ़ी में बच्चों को होने की सम्भावना रहती है ।
ट्रिगर एजेंट्स :
अस्थमा हमेशा नहीं होता । आरंभ में अक्सर अस्थमा के एक या दो अटैक पड़ते हैं । लेकिन उचित इलाज न किये जाने पर अटैक की संख्या बढती जाती है ।
अक्सर अटैक आने के लिए कुछ तत्व जिमेदार हैं जैसे वाइरल इन्फेक्शन , ज्यादा ठंडे पदार्थों का सेवन , अत्याधिक व्यायाम , पोलेन , धूल , धुआं , फेब्रिक आदि वायु में महीन कण ।
इनको ट्रिगर एजेंट्स कहते हैं ।
इसीलिए अस्थमा से बचने के लिए इनसे बचाव रखने की सलाह दी जाती है ।
लक्षण :
अस्थमा का अटैक आते ही साँस लेने में कठिनाई होने लगती है । साँस फूलने लगती है । बेचैनी , घबराहट , मूंह का सूखना और लगता है जैसे दम निकल जायेगा ।
यदि समय पर चिकित्सा उपलब्ध न हो तो यह एक इमरजेंसी बन सकती है और मृत्यु भी हो सकती है ।
उपचार :
अस्थमा के उपचार में ऐसी दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं जिनसे स्वास नालियां खुल सकें और उनमे सूजन कम हो सके ।
ब्रोंकोडाईलेटर्स -- ये दवाएं साँस की नालियों को फैलाकर खोल देती हैं जिसे रुकावट कम हो जाती हैं ।
इन्हें इन रूपों में लिया जा सकता है --गोली , शरबत , इंजेक्शन , इन्हेलर और नेबुलाइज़र ।
गोली और शरबत आदि से ओ पी डी में उपचार किया जाता है और इन्हें हलके अटैक में प्रयोग किया जाता है ।
इमरजेंसी में इंजेक्शन और नेबुलाइज़र से तुरंत आराम आने की सम्भावना होती है ।
आजकल इन्हेलर्स का प्रचलन बहुत बढ़ गया है ।
इन्हेलर्स :
दो तरह के इन्हेलर्स इस्तेमाल किये जाते हैं ।
एक वो जो स्वास नालियों को खोलते हैं जैसे salbutamol inhaler
और दूसरे वो जो सूजन कम करते हैं जैसे steroid inhaler
इन्हेलर्स का सबसे ज्यादा फायदा यह है कि दवा सीधे साँस की नालियों में पहुँच जाती है और रक्त में बहुत कम जाती है । इसलिए साइड इफेक्ट्स का ख़तरा न के बराबर होता है ।
रोटाहेलर्स :
इसमें दवा कैप्सूल फॉर्म में होती है । उसे एक मशीन में लगाकर धीर धीरे सूंघा जाता है ।
नेबुलाइज़र :
इसमें दवा एक मशीन द्वारा जो बिजली या बैटरी से चलती है , ओक्सिजन में मिला कर दी जाती है । इसे मूंह पर मास्क लगाकर दिया जाता है जिससे दवा सूक्षम मात्रा में सीधे स्वास नालियों में लगातार मिलती रहती है । इससे तुरंत आराम आने की सम्भावना काफी ज्यादा रहती है । यह इमरजेंसी में राम बाण का काम करती है ।
अन्य दवाएं :
अस्थमा के severe अटैक में मरीज़ को अस्पताल में भर्ती करना अनिवार्य होता है । उसे ऑक्सिजन , steroids,
नेबुलाइज़र और आई वी ड्रिप की भी ज़रुरत पड़ सकती है । कभी कभी एंटीबायोटिक्स भी देनी पड़ती हैं ।
रोक थाम :
दमा एक ऐसा रोग है जिसे पूर्णतय : रोकना संभव नहीं होता । एक दो अटैक प्रति वर्ष होने की सम्भावना बनी रहती है । फिर भी खान पान और दिनचर्या में बदलाव से इसे काम किया जा सकता है ।
जिन वस्तुओं या खान पान की चीज़ों से एलर्जी हो , उनसे परहेज़ रखना चाहिए ।
धुएं , धूल मिट्टी , धूम्रपान से बचना चाहिए ।
नित्य प्रति इन्हेलर लेने से अटैक पड़ने से बचा जा सकता है ।
३ मई को हर वर्ष विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है । इस वर्ष इसका थीम है --यू कैन प्रिवेंट यौर अस्थमा ।
भारत में १०-१२ % लोग अस्थमा के शिकार रहते हैं ।
भले ही इस रोग का कोई उपचार नहीं, लेकिन ज़रा सी सावधानी से इसके दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है ।
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are bandhu ine 10% logo me mai bhee ek hoo.
ReplyDeletemujhe ye aksar mousam badalne par hota hai....janha jara barsat huee ki pareshanee shuru.....haa niymit inhailer bachae rakhata hai.......aapkee ye post bahut upyogee hai...hum logo ke liye.......
book likhiye par kabhee kabhee samay nikal kar post karte rahiye aise hee lekh.....
please.......
mera comment blog Id se nahee gaya iseese repeat kar rahee hoo .
ReplyDeletethanks again for this informative post .
ज्ञानवर्धक पोस्ट. यहाँ यु के में यह बीमारी बहुतायत में है बच्चों में खासकर पैदाइशी है.
ReplyDeleteज्ञानवर्धक पोस्ट
ReplyDeleteबीच-बीच में आप सचेत करते रहते हैं। धन्यवाद।
ReplyDeleteकाफी ज्ञानवर्द्धक जानकारी प्राप्त हुई ... पर्याप्त शुद्ध वायु ही इस रोग से बचा सकती है ... आभार
ReplyDeleteज्ञानवर्द्धक जानकारी !
ReplyDeleteदिल्ली जैसे शहर में तो अस्थमा नियति ही है आज
ReplyDeleteसरिता जी , शिखा जी , काजल जी , अस्थमा का कोई कारण नहीं होता । यह जींस में होता है । इसलिए पश्चिमी देशों में भी बहुतायत में पाया जाता है ।
ReplyDeleteधूम्रपान और प्रदूषण से क्रोनिक ब्रोंकाइटिस होती है जिसे COPD भी कहते हैं । हालाँकि इसमें भी लक्षण अस्थमा जैसे ही होते हैं ।
बहुत सर्तक पोस्ट --और बेहद गंदी बिमारी है ये --मेरी सहेली रेखा इससे पीड़ित है --आपकी पोस्ट से कई बाते पता चली --धन्यवाद डॉ. साहेब !
ReplyDeleteबहुत उम्दा जानकारी...
ReplyDeleteअच्छी जानकारी के लिए आभार डॊक्टर साहब॥
ReplyDelete.
ReplyDeleteआम नज़रिये से जानकारीपरक पोस्ट !
मैंने चिकित्सा विषयों पर कई बार पोस्ट लिखने का प्रयास किया, किन्तु असफ़ल रहा इतना सुघड़ सरलीकरण मुझसे न बन पड़ा । इन दिवसों को मनाये जाये का दुःखद पहलू यह भी है, कि फार्मा कम्पनियों ने अपने उत्पाद को बढ़ावा देने की गरज़ से इन्हें हाईजैक कर लिया है ।
अति उत्तम जानकारी दी है आपने डॉ, साहब.इसके लिए बहुत बहुत आभार.थोड़ी जानकारी वाई पेप मशीन के बारे में भी दें.
ReplyDeleteनई पोस्ट जारी की है.मेरे ब्लॉग पर आकर अपने सुविचारों से आनंद वृष्टि कीजियेगा.
atyant upyogi post ........
ReplyDeletemere liye khaaskar.
main bhi asthma se peedit hoon......
aapki salaah ke liye saadhuvaad
डॉ अमर कुमार जी , हमारे अस्पताल में जन उपयोगी व्याखान माला का आयोजन किया जाता है । उसमे किसी फार्मा कंपनी का सहयोग नहीं लिया जाता । फिर भी एक नज़रिया यह भी हो सकता है ।
ReplyDeleteअगर घर मे कलीन हो तो भी उस से धुल कण उडते हे, जिस से आस्त्मा का अटेक पड जाता हे, दुसरा स्विमिंग पुल या आईस खाने से भी इस का अटेक पड सकता हे, मेरी बीबी को जुलाई अगस्त मे हर साल इस का अटेक होता हे, लेकिन हम ने पहले ही बचने की दवा तेयार रखी होती हे, ओर घर मे सारा कलीन निकाल बाहर फ़ेंक दिया, लकडी का फ़र्श हे जिस पर धुल कर नही उडते, पर्दे हर छ महीने मे एक बार धुल जाते हे... इन चीजो से भी बहुत फ़र्क पडा हे, बहुत अच्छी जानकारी
ReplyDeleteसही किया है भाटिया जी । इनसे काफी फर्क पड़ता है ।
ReplyDeleteडॉ० साहब बहुत ही सुंदर और जनोपयोगी पोस्ट बधाई |
ReplyDeleteउपयोगी जानकारी !
ReplyDeleteअस्थमा के विषय में बहुत ही अच्छी जानकारी दी....कई बार आकाश में बादल छा जाने पर भी...आस्थमा के अटैक के विषय में सुना है....अस्थमा के रोगियों को एकदम शुद्ध हवा की ही जरूरत पड़ती है..
ReplyDeleteबहुत अच्छी जानकारी ....उपयोगी जानकारी के लिए आभार
ReplyDeleteआपका यह लेख मैंने किसी को मेल में भेजा है ...बिना आपसे अनुमति लिए ...इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ..
ReplyDeleteडॉक्टर साहिब, बहुत बढ़िया जानकारी दी आपने इस विषय पर... मेरे लगभग चार वर्षीय नाती के दादाजी का देहांत दमा के कारण ही हुआ (लगभग ८० वर्ष की आयु में)... और उसे भी छुटपन से ही तकलीफ होती है कभी कभी सांस लेने में, जिस कारण डा. की सलाह पर, अपने दादा के लिए लिया गया नैब्युलाइज़र कभी कभी काम में लाया जाता है, यद्यपि उसे समय लगा मास्क की आदत पड़ने में.
ReplyDeleteधन्यवाद आपका ...
ReplyDeleteबहुत उपयोगी पोस्ट लिखी है भाई जी ! कष्ट में डूबे तमाम लोगों के लिए निस्संदेह एक उपयोगी भेंट है आपकी और से और डाक्टर्स के लिए नींद न आने की गोली ! :-)
क्यों यार दोस्तों को नाराज़ करते हैं सर ! उनकी प्रैक्टिस पर असर पड़ने के चांस हैं !
आभार आपका !!
बहुत ही सुन्दर, शानदार और ज्ञानवर्धक पोस्ट रहा! धन्यवाद!
ReplyDelete@ डॉ, दराल,
ReplyDeleteऎसी व्याखानमालायें, जनसम्पर्क, भ्रम निवारण की मुहिम एक आदर्श स्थिति है, जिसके लिये आपका सँस्थान बधाई का पात्र है ।
पर, देख रहा हूँ कि पिछले डेढ़ दशक एक ऎसा ट्रेंड फलने फूलने लग पड़ा है, जिसमें फार्मा-हाउस अपने व्यापारिक हितों के लिये ऎसे जागरूकता कार्यक्रमों का उपयोग करने लगे हैं, मेडिकल समुदाय का इससे असँपृक्त / उदासीन रहना निश्चय ही चिन्ता का विषय है, मेरी पिछली टिप्पणी उपरोक्त सँदर्भ में ही है । आभार आपका
जब किसी की कुंडली में चंद्रमा का सम्बन्ध लग्न भाव से हो और शनि का भी सम्बन्ध लग्न तथा छठे भाव से हो तो दम होता है.अतः दम के रोगी शनि एवं चन्द्र ग्रहों की शांति कराएं और मेडिकेटेड गायत्री मन्त्र का उच्चारण करें शीघ्र लाभ होगा.
ReplyDeleteसही कह रहे हैं , डॉ अमर कुमार जी । लेकिन अक्सर इन फार्मा कंपनियों का यूज और मिसयूज हम डॉक्टर्स भी करते हैं । सब पैसे का खेल है ।
ReplyDeleteमाथुर जी , चिकित्सक की दृष्टि से प्राणायाम बहुत उपयोगी रहता है ।
बहुत उपयोगी जानकारी।
ReplyDeleteमैं कुछेक ऐसे रोगियों को जानता हूं जो कोई दवा नहीं लेते और औसतन बीस साल तक लगभग असाध्य दमा से पीड़ित रहने के बाद,विशेष प्रकार की आहार-व्यवस्था मात्र के बूते,दमा से एकदम मुक्त हो गए।
दूसरी तरफ,कुछ ऐसे रोगियों को भी जानता हूं,जो बहुत सक्षम हैं और क्या-क्या नहीं किया उन्होंने,पर दमा है कि दम लेने नहीं देता। कुछ समझ में नहीं आता।
बहुत ही जानकारी भरी है इस पोस्ट में.डॉ साहेब आज इस रोग के रोगियों की बढती तादात को देखते हुए इसके लिए जन-जागरण करने की जरूरत है.अभी भी जानकारी के आभाव में और नीम -हकीम के चक्करों में बहुत दमा वाले मरीज़ असमय काल कलवित हो रहे हैं.
ReplyDeleteदराल सर,
ReplyDeleteबेहद उपयोगी जानकारी...ये ब्लॉगिंग का सबसे सुखद पहलू है...राधारमण जी, डॉ प्रवीण चोपड़ा भी स्वास्थ्य पर जागरूकता लाने के लिए महत्ती कार्य कर रहे हैं....
डॉ अमर कुमार जी फॉर्मा कंपनियों के जिस खेल की तरफ इशारा कर रहे हैं, उसे एक्सपोज़ करना भी बहुत ज़रूरी है...किसी ज़माने में मैंने मेरठ में दवाइयों के होलसेल धंधे पर हाथ आजमाया था...तब इसे नज़दीक से जानने का मौका मिला था...और कहीं की नहीं यूपी की बात तो मैं जानता हूं, यहां जितने भी सीएमओ दफ्तर है लूटखसोट के अड्डे हैं...रिटेल से होलसेल लेकर तक लाइसेंस में ही खुले आम मोटी घूस का खेल चलता है...यूपी की जेलों में मेडिकल सुविधाओं के नाम पर अपराधियों को हर तरह की सुविधा मिलना आम बात है..यहां जो दवाओं की खरीद की जाती है वो फॉर्मा कंपनियों और भ्रष्ट अधिकारियों ने मिलकर सरकारी खजाने को लूटने का ज़रिया बनाया हुआ है...
वैसे भी डॉक्टरों को सेट कर सबस्टैंडर्ड कंपनियां भी मार्केट में अपनी घटिया दवाएं खपा देती हैं...डॉक्टरों को इतना तृप्त कर दिया जाता है कि वो स्टैंडर्ड कंपनियों की जगह इन्हीं घटिया दवाओं को धड़ल्ले से प्रेस्क्राइब करते हैं...वो भी स्टैंडर्ड कंपनियों की दवाओं से ज़्यादा कीमत पर...क्या वजह है कि आइबूप्रोफेन का सौ गोलियों का जो डिब्बा तीस रुपये ज़्यादा से ज़्यादा लागत में बन जाता है, वो बाज़ार में दो सौ रुपये तक का बिकता है...
सबसे बड़ी बात है कि देश में दवाओं को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है...मरीज को जो भी कीमत छपी होती है बिना ना-नुकर देनी ही पड़ती है...इस फील्ड में लोगों को जागरूक करना बहुत ज़रूरी है...
इसलिए आप के योगदान को साधुवाद...डॉ अमर कुमार जी और आप मिल कर आगे भी हम सब की आंखें खोलते रहेंगे...
जय हिंद...
खुशदीप जी , दवाओं के मामले में निसंदेह काफी हेरा फेरी है ।
ReplyDeleteलेकिन जहाँ तक कीमतों का सवाल है वह मार्केटिंग पर निर्भर करता है । ब्रेंड नेम से जो दवा १० रूपये में मिलती है , वही जेनेरिक नेम से एक या दो रूपये में मिल जाती है ।
इसीलिए सरकार ने जन औषधि भंडार के नाम से कई जगह दवाइयों की दुकाने खोली हैं जहाँ सभी स्टेंडर्ड दवाएं जेनेरिक नेम से मिलती हैं मार्केट से आधे दाम पर ।
इनका भरपूर उपयोग करना चाहिए । जानकारी के लिए हमारे अस्पताल में यह दुकान खिली है ।
अस्थमा आज एक गंभीर समस्या है..इसका इलाज बहुत मुश्किल हो रहा है और नीम-हकीम इसका फ़ायदा उठाते जा रहे है..बहुत बढ़िया और सार्थक पोस्ट आपने लिखी है...बहुत जानकारी मिली....आप ब्लॉग के ज़रिए बहुत ही हितकारी काम कर रहे है...बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteएक और लाजवाब पोस्ट ... लगता है आधे डाक्टर तो बन ही जाएँगे हम भी ... आपकी पोस्टों से जागरूकता बढ़ रशी है ब्लॉगेर्स में ... धन्यवाद ...
ReplyDeleteइसे काल का प्रभाव ही कह सकते हैं शायद... जब हम छोटे थे, स्कूल में थे और नयी नयी आज़ादी मिली थी, तब हमारे एक टीचर हुआ करते थे, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बंटवारे के कारण पंजाब से आये थे, वो गलती करने से छड़ी से पिटाई करते थे और दोहराते जाते थे, "डंडा पीर है बिगड़ीयां तिगड़ीयां दा" !
ReplyDeleteहमेशा की तरह अच्छी जानकारी। धन्यवाद।
ReplyDeleteज्ञानवर्धक पोस्ट|धन्यवाद|
ReplyDeleteअच्छी जानकारी के लिये धन्यवाद
ReplyDeleteInformative and useful post.
ReplyDeleteअच्छी जानकारी दी है आपने! शुक्रिया!
ReplyDeleteदराल जी,
ReplyDeleteअस्थमा पर एक अति उत्तम लेख के लिये आपका आभार