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Saturday, July 2, 2011

डॉक्टर साहब , गैस सर में चढ़ जाती है --

एक चिकित्सिक के पास प्रतिदिन ऐसे रोगी भी आते हैं जिनकी स्वास्थ्य समस्या कुछ और होती है और रोगी बयाँ कुछ और करता है ऐसी स्थिति में डॉक्टर का अनुभव ही होता है जो गलत उपचार से बचाता है

आइये देखते हैं ये कैसी कैसी स्थितियां होती है :

१) गैस सर में चढ़ जाती है :

अक्सर मरीज़ शिकायत करते हैं --डॉक्टर साहब , पेट में गैस बनती है और सर में चढ़ जाती है

असलियत में iऐसी कोई गैस होती है , कोई स्थिति यह या तो मरीज़ का वहम होता है या उसे कोई और मानसिक तौर पर समस्या होती है जैसे एन्जाईटी

पेट में गैस दो तरह से पैदा होती है । एक -- खाने के साथ हवा का प्रवेश । यह डकार के रूप में बाहर आती है ।
दूसरी खाने की पाचन क्रिया में और आंतों में मौजूद जीवाणुओं की प्रतिक्रिया से बनती है ।
इसके निष्कासन के बारे में फिल्म दबंग में सलमान खान द्वारा बोले गए डाय्लोग्स में सम्पूर्ण जानकारी मिलती है

पेट में अत्याधिक गैस बनना खाने की किस्म और मात्रा पर बहुत निर्भर करता है ।
लेकिन सबसे ज्यादा कॉमन कारण हैं --पेट में संक्रमण
अक्सर पेट में या तो कीड़े होते हैं या अमीबिक इन्फेक्शन होता हैहमारे देश में अधिकतर लोगों को यह शिकायत होती है
आखिर गोल गप्पे या चाट पापड़ी तो सभी खाते हैं


) हड्डियों में बुखार रहता है

यह शिकायत ओ पी डी में बहुत सुनने को मिलती है । विशेष रूप से निम्न आय वर्ग की महिलाओं में ।

हकीकत : ऐसा कोई बुखार नहीं होता बुखार होने पर त्वचा का तापमान बढ जाता है । आंतरिक सोफ्ट टिस्युज का तापमान भी बढ़ता है ।
लेकिन ऐसा नहीं होता कि हड्डियों का तापमान बढ़ जाए और त्वचा का सामान्य रहे ।

कारण : अक्सर ऐसे मरीजों को सामान्य कमजोरी होती है , या हाथ पैर में दर्द रहता हैविटामिन्स की कमी भी हो सकती है

) बुखार में ठंडे पानी की पट्टियाँ करना : इसे कोल्ड स्पॉन्जिंग या हाइड्रोथेरपी कहते हैं

अक्सर यह सलाह दी जाती है कि बुखार में ठंडे पानी की पट्टियाँ करनी चाहिए ।

भ्रान्ति : I--ठंडा पानी

दरअसल बुखार में ठंडा पानी इस्तेमाल नहीं करना होता । स्पॉन्जिंग के लिए कक्ष के तापमान वाला सादा पानी लेना चाहिए ।

कुछ लोग अत्याधिक ठंडा पानी या बर्फ का प्रयोग करते हैं जो सर्वथा अनुचित हैइससे त्वचा की नसें सिकुड़ जाती हैं और लाभ की बजाय हानि हो सकती है

बुखार में स्पोंजिंग से त्वचा पर पानी की जो पर्त बनती है , वह शरीर से ऊष्मा लेकर वाष्पित होती हैयह वाष्पन ही त्वचा को ठंडा कर बुखार उतारने में सहायक होता है

भ्रान्ति II --पानी की पट्टी

स्पोंजिंग के लिए लोग अक्सर रुमाल या कोई कपडा लेकर पानी में भिगोकर , तह बनाकर माथे पर रख देते हैंयह तरीका आंशिक रूप से ही फायदेमंद होता है

सही तरीका है --कपडे को सादे पानी में भिगोकर , हल्का सा निचोड़कर पूरे शरीर को पोंछेंइसे लगभग १० मिनट तक बार बार करने से बुखार नीचे जायेगा

स्पॉन्जिंग करने से निश्चित ही आराम मिलता है । हालाँकि दिन में कई बार करना पड़ सकता है ।

अब एक काम की बात :

उपरोक्त बातें तो कोई सरकारी डॉक्टर बताएगा प्राइवेट डॉक्टर सरकारी डॉक्टर के पास टाइम नहीं होता और प्राइवेट तो कमाता ही ऐसे मरीजों से है लेकिन इसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग करते हैं--क्वैक्स ( नीम हकीम यानि नकली डॉक्टर )।


Monday, June 27, 2011

इन्सान में बुढ़ापा सबसे पहले घुटनों में ही आता है---

पिछली पोस्ट में हमने कहा था कि यदि घूम घूम कर आपके घुटनों में दर्द होने लगा हो तो अगली पोस्ट ज़रूर पढ़िए । लेकिन लगता है कि दर्द के डर से ही आपने घूमने का विचार त्याग दिया । ताकि न रहे बांस न बजे बांसुरी । लेकिन यह तो और भी बड़ा कारण हो सकता है घुटने दर्द करने का ।

जी हाँ , इन्सान में बुढ़ापा सबसे पहले घुटनों में ही आता हैइसीलिए :
* ४० + होते होते आपके घुटनों की व्यथा एक्स रेज समझने लगते हैं ।
* ५० + होने पर आपको भी आभास होने लगता है ।
* ६० + होने पर सब को पता चल जाता है कि आपके घुटने ज़वाब दे चुके ।
* ७० + होकर आप भी भाइयों में भाई बन जाते हैं क्योंकि अब तक सब एक ही किश्ती के सवार बन चुके होते हैं ।

अब तक आप समझ ही गए होंगे कि हम घुटनों में ओस्टियोआरथ्राईटिस की बात कर रहे हैं ।
चलने के लिए घुटनों की सबसे ज्यादा ज़रुरत पड़ती है क्योंकि शरीर का सारा भार इन्ही पर पड़ता है ।
और घुटने ही सबसे पहले बोल जाते हैं उम्र के साथ ।
कैसे --यह देखिये इन चित्रों में ।


बायाँ चित्र स्वस्थ घुटने का है । सफ़ेद रंग की परत --हड्डियों पर कार्टिलेज की सुरक्षा कवच है ।
लेकिन उम्र के साथ साथ इनमे वियर एंड टियर यानि टूट फूट होने लगती है और इनके टूटने से घुटने की हड्डियाँ आपस में रगड़ खाती हैं जिसे दर्द होता है ।

दायें चित्र में देखिये --कार्टिलेज टूट चुकी है , हड्डी ऊबड़ खाबड़ हो गई है और ज्वाइंट स्पेस कम हो गई है ।
यही होती है ओस्टियोआरथ्राईटिस।

अब यह होना तो तय हैआखिर उम्र का तकाज़ा है

लेकिन जब तक आप नियमित रूप से चलना , घूमना फिरना और व्यायाम करते रहते हैं , तब तक इसका असर आपको तकलीफ़ नहीं देता । जहाँ आप आराम में आए यानि लाइफ सिडेनटरी हुई , समझो इसे सर उठाने का अवसर मिल गया ।

अफ़सोस तो यह है कि इसका कोई इलाज भी नहीं है

* सबसे पहले सोकर या काफी देर तक बैठ कर उठने पर घटनों में दर्द होता है और जकड़न सी महसूस होती है । लेकिन थोडा चलने पर आराम आ जाता है ।
यह है पहली चेतावनी ।

* इसे नज़र अंदाज़ करिए --रोग बढ़ने पर चलने से आराम नहीं बल्कि दर्द बढ़ता है और आराम करने से आराम आता है । यानि अब आप चाहें भी तो ज्यादा चल नहीं सकते ।

* यदि अभी भी नहीं सचेते तो --आराम करने पर भी आराम हराम हो जाता है । तब तो नींद से भी जग जाते हैं दर्द के मारे ।
इस स्टेज में बस ऑपरेशन ही आराम दिला सकता है --अधिकांश मामलों में टोटल नी रिप्लेसमेंट ।

इसलिए आवश्यक है कि शारीरिक गति विधियाँ चलती रहनी चाहिए ।
मोटापा , निष्क्रियता , डायबिटीज , घुटने के पास चोट --इनसे यह समस्या जल्दी सामने आ सकती है ।
इसलिए इन से बचें या उचित इलाज कराएँ ।

अब आपको बताते हैं घुटनों के दर्द से बचने का उपाययदि आप ४० पार कर चुके हैं तो यह आपके लिए ही है :
एक बेड या दीवान पर सीधे होकर पैर लटकाकर बैठ जाइये । अब पहले एक टांग को धीरे धीरे ऊपर उठाइए और बिल्कुल सीधा कर दस सेकण्ड तक रोके रखिये । इसके लिए धीरे धीरे दस तक गिनती गिनें । अब धीरे धीरे पैर को नीचे ले आइये ।

कुछ सेकण्ड के आराम के बाद दूसरी टांग के साथ यही करिए ।

यह प्रक्रिया दस बार कीजिये । दिन में ३-४ बार करें तो बेहतर है ।

यह काम आप ऑफिस में भी कर सकते हैं , अपनी सीट पर बैठे बैठे ।
ज़ाहिर है इसके लिए आपको न कहीं जाना है , न कोई साधन चाहिए , न कोई खर्चा करना है ।
बस चाहिए तो थोड़ी इच्छा शक्ति , नियमित रूप से करने के लिए ।

यदि इसे ४० + करेंगे तो दर्द होने से बचे रहेंगे ।
यदि ५० + करें तो दर्द में निश्चित आराम आयेगा ।
यदि ६० और ७० + करें तो रोग बढ़ने से बचेगा ।

हर हाल में आपकी जिंदगी खुशहाल रह सकती है और आप घूमने फिरने के लायक रह सकते हैं ।

नोट : इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए एक पुरानी पोस्ट पढने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये यदि अब घुटनों में आराम गया हो और थोडा सैर करने का मूढ़ बना हो तो यहाँ पर क्लिक कर आनंद लीजिये

Thursday, June 23, 2011

ऊटी की ब्यूटी --भाग -२

उत्तर में शिमला , सराहन, मसूरी , चंबा, नैनीताल, रानीखेत , कसौनी , कसौली, डलहौजी , धरमशाला , और मनाली --पूर्व में दार्जिलिंग और गैंगटॉक --दक्षिण में कोडाईकनाल और ऊटी -ये हैं भारत के मुख्य हिल स्टेशन इनमे बस ऊटी ही था जहाँ अब तक नहीं जा पाए थे लेकिन हमने ऊटी को इनमे सबसे सुन्दर जगह पाया

मुदुमलाई से करीब ५० किलोमीटर दूर ,एक तो साफ सुन्दर पहाड़ी सड़क जिसके दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ सुरक्षा का अहसास देते हुए घनी हरियाली के बीच मनमोहक घाटी के द्रश्य मन को लुभाते हुए नज़र आयेंगे

ऊटी की एक खासियत यह भी लगी कि यह शहर एक वैली में बसा है कि पहाड़ की ढलान पर इसलिए २२५० मीटर की ऊँचाई पर भी समतल ज्यादा नज़र आता है

पता चला यहाँ पानी की बहुतायत होने की वज़ह से अंग्रेजों ने यहाँ यूकेलिप्टस के पेड़ बहुत लगाये थे जो आज भी सारी पहाड़ियों और चोटियों पर घने जंगल के रूप में मौजूद हैं

एक और विशेष बात यह लगी कि जहाँ १० साल पहले तक दक्षिण में उत्तर भारतियों को अज़ीब सी निगाह से देखा जाता था , वहीँ अब ऐसा कुछ नज़र नहीं आया अब तो ज्यादातर लोग भी हिंदी बोलने लगे हैं और भाषा की कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई

यह अलग बात है कि वहां छोटे छोटे बच्चे भी अंग्रेजी बोलते हैं

ऊटी जाने के लिए जून का महीना सर्वोत्तम है क्योंकि इस समय यहाँ ऑफ़ सीजन शुरू हो जाता है इसकी वज़ह यह है कि एक तो यहाँ स्कूल जून में जल्दी खुल जाते हैं दूसरे मिड जून में बारिस जाती है इसलिए लोकल टूरिस्ट कम हो जाते हैं जिससे भीड़ भाड़ कम लगती है

मिड जून तक ज्यादा बारिस मिलेगी धूप बस होगा तो सुहाना मौसम और गर्मी से राहत देती ठण्ड

ऊटी शहर तो पैदल ही घूमा जा सकता है लेकिन बाहर के इलाके घूमने के लिए टैक्सी या प्राइवेट कार बड़ी उपयोगी रहेगी रेट सबके एक जैसे ही हैं और कोई लूट पाट नहीं है

आइये सैर करते हैं ऊटी शहर की



ऊटी पहुँचने से पहले ढलान पर बने ये मकान बड़े अद्भुत लग रहे थे पीला रंग एक मोबाईल कंपनी ने किया हुआ है


जिस दिन पहुंचे , बस उसी दिन धूप खिली थी लेकिन बिना धूप के भी आपका गोरा रंग काला पड़ सकता है यदि आपने एंटी सन लोशन नहीं लगाया तो यहाँ के साफ वातावरण में अल्ट्रा वोय्लेट रेज़ अपना असर दिखाएंगी ही


ऊटी के मेन चौराहे पर बना है रेलवे स्टेशन यहीं पास में बस स्टेशन है और ऊटी लेक --बोट क्लब यहाँ पैडल बोट और मोटर बोट दोनों मिलती हैं बोटिंग के लिए



बोट क्लब के प्रवेश द्वार के सामने बना है यह थ्रेड गार्डन इसकी विशेषता यह है कि यहाँ प्रदर्षित सभी फूल पौधे रेशम के धागों से बने हैं इतने खूबसूरत कि यदि बताया जाए तो पहचान ही पायें इसीलिए इसका नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकोर्ड्स में शामिल है



खुद ही पढ़ लें


शहर के दूसरे सिरे पर बना है यह अत्यंत सुन्दर बाग --बोटेनिकल गार्डन

प्रवेश द्वार



महा वृक्ष



बाग का एक दृश्य



हरियाली और रंगों की बहार देखकर गर्मी तो वैसे ही उड़नछू हो गई ऊपर से झीनी झीनी पड़ती फुहार वातावरण को और रंगीन बना रही थी


शहर से १२ किलोमीटर दूर घने जंगल से होकर रास्ता जाता है ऊटी के सबसे ज्यादा ऊंचे स्थल पर --डोडाबेट्टा
२६०० मीटर की ऊँचाई पर बने इस व्यूइंग गैलरी से एक तरफ ऊटी शहर , दूसरी तरफ कुन्नूर शहर नज़र आता है


व्यूइंग गैलरी यहाँ एक दूरबीन भी रखी है



व्यूइंग गैलरी से ऊटी की तरफ का एक नज़ारा


शहर के एक किनारे यह रोज गार्डन भी बहुत बड़े क्षेत्र में फैला है

बहुत खूबसूरत ढंग से बना या गया यह गुलाब पार्क गुलाबों की अलग अलग किस्मों से भरा है




इसे बनाया भी बहुत आकर्षक ढंग से है


ऊटी के बस स्टेशन के सामने ही है यहाँ का रेस कोर्स मैदान जहाँ हर शनिवार और रविवार में घुडदौड़ होती हैं

क्या यह अरबी घोड़ा है ?



दिल्ली में रहते हुए हमने कभी होर्स रेस नहीं देखी लेकिन यहाँ पहली बार देखी और लोगों को दांव लगाते हुए भी एक बार तो किसी बात पर लड़ाई हो गई और लोग भड़क गए तब हमने वहां से खिसकना ही बेहतर समझा



ऊटी का मेन बाज़ार उत्तर भारत के हिल स्टेशंस के मॉल जैसा ग्लेमरस तो नहीं है लेकिन यहाँ पहुँच कर श्रीमती जी को यह आभूषण की दुकान नज़र गई फिर क्या था घुस गई और हम आधे घंटे तक पोस्टर में बनी तस्वीर को ही देखते रहे यह सोचते हुए कि यह तस्वीर किस हिरोइन या मोडल की है

वो तो शुक्र रहा कि मेडम ने आधे घंटे में सवा लाख के कड़े पसंद ही किये , खरीदे नहीं



पैदल घूमते हुए भूख लगने पर बीच बाज़ार में स्थित है यह --नाहर होटल -- जहाँ सभी तरह का स्वादिष्ट खाना उचित दाम पर मिलता है

आज के लिए बस इतना ही क्योंकि घूम घूम कर अब तक आपके भी घुटनों में दर्द होने लग गया होगा
अब अगली पोस्ट में पहले घुटनों के दर्द से छुटकारा पाएंगे , फिर आगे सैर पर बढ़ेंगे