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Saturday, March 12, 2011

गोवा चित्रगीत --कैमरे की नज़र से ---अंतिम किस्त ....

गोवा यात्रा की अंतिम कड़ी में , आज प्रस्तुत हैं कुछ तस्वीरें --कुछ कहती हुई ।



लौट आई है इन पर , फिर से नई जवानियाँ ---



सागर किनारे , दिल ये पुकारे , तू जो नहीं तो मेरा , कोई नहीं है ---



दिल का सूना साज़ , तराना ढूंढेगा , मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेगा --- ( डोना पावला )



ये जो मोहब्बत है , ये उनका है काम -- अरे महबूब का जो , लेते हुए नाम ,मर जाएँ , मिट जाएँ ---



हाए रे हाए , ये तेरे हाथ में मेरा हाथ , रहे दिन रात , तो फिर क्या बात ---



कहीं दूर जब दिन ढल जाए , साँझ की दुल्हन बदन चुराए ---





किसका है ये तुमको इंतजार , मैं हूँ ना ---




दो बेचारे , बिना सहारे ---



आजा शाम होने आई ---


सूरज हुआ , मध्यम मध्यम ---

नोट : इसके साथ ही यह प्रकरण पूरा हुआ । कुछ अन्य तस्वीरें --चित्रकथा --पर उपलब्ध रहेंगी



Thursday, March 10, 2011

एक शाम --अंजुना बीच पर --फिरंगियों के बीच में ---

पिछली गोवा पोस्ट से आगे ---

पिछली पोस्ट में मैंने एक सवाल पूछा था --औड मैन आउट --के बारे में । भाई दीपक मशाल ने पहचान तो लिया लेकिन यह नहीं बताया कि इसमें औड क्या था ।
आधुनिकता और विकास का एक नकारात्मक पहलु यह भी है कि ४० के होते होते सबका पेट निकल आता है । फिर ५० के होते होते पेट के साथ वेट भी इतना बढ़ जाता है कि घुटने भी ज़वाब देने लग जाते हैं ।

नोर्थ गोवा टूर के अंतिम पड़ाव में हम पहुंचे --अंजुना बीच पर । लेकिन पार्किंग से बीच करीब आधा किलोमीटर दूर थी जहाँ तक पैदल ही चलना था । अब तक हमारी मित्र मंडली थक कर चूर हो चुकी थी । सब बैठ गए एक रेस्तरां में चाय पानी के लिए । अब कोई मूढ़ में नहीं था कि आगे चला जाए ।

लेकिन हमारा दम ख़म अभी बचा था । हमने पहल की और अकेले ही पहुँच गए , अंजुना बीच ।

शुरू में ही यह भूरे रंग की पथरीली जगह देखकर लगा कि यहाँ क्या मिलेगा । लेकिन दूर कुछ लाल रंग की छठा नज़र आई तो हम उत्सुकतावश आगे बढ़ लिए ।


और पास से देखा तो पाया कि यह तो फिरंगियों का स्वर्गलोक था । सैंकड़ों काउच लगे थे , एक लाइन में , जिनपर संतरी लाल रंग की छतरियां और उनके नीचे लेटे उसी रंग के फिरंगी सैलानी,धूप में सन टैनिंग करते हुए।

एक राउंड लगाने के बाद हमें लगा कि यहाँ तो हम स्वदेश में होकर भी अल्पसंख्यक नज़र आ रहे हैं ।

लेकिन देश भी अपना , बीच भी अपनी और समुद्र भी अपना ही था । इसलिए हमने भी एक काउच पर कब्ज़ा किया और पसर गए , एक हाथ में कोल्ड ड्रिंक और दूसरे में कैमरा पकड़ कर ।

और देखने लगे नज़ारा अंजुना बीच का ।

इस बीच मित्र मंडली भी हिम्मत जुटा कर हमारे साथ शामिल हो चुकी थी ।



साथ वाला काउच तो खाली ही रहना था । शायद मैंने पीछे बैठे दो गोरों के माल पर हाथ साफ़ कर दिया था ।
पीछे बैठे दो गोरों की कहानी बाद में ।


हालाँकि बीच पर सैंकड़ों लोग थे । लेकिन कोई कोलाहल नहीं था ।
समुद्र का पानी शांत भाव से रेतीले किनारे से टकराता और समा जाता वापस समुद्र में
सूर्य देवता ठीक सामने ही चमक रहे थे । जैसे सिर्फ हमारे लिए ही चमक रहे हों ।
हमने भी उन्हें कैमरे में कैद करने का प्रयोजन बना लिया ।
कुछ इस तरह --

एक गोरी लड़की , देसी स्टाइल में चुटिया बनाये हुए --
पीछे बैठे दो गोरे अब पानी में उतर चुके हैं । अगले दो घंटे तक हम इनका भी तमाशा देखते रहे ।



पैर भले ही कब्र में लटके हों , कमर झुककर धनुष बन चुकी थी लेकिन यह सरदार जी भी अकेले ही बीच के बीचों बीच टहल रहे थे , मानो स्वर्ग का रास्ता तलाश रहे हों



यह महाशय तो ऐसे डिप्रेस्ड दिख रहे थे जैसे बीबी ने घर से निकाल दिया हो वैसे क्या पता वह भी हमारी तरह मजबूरी का मारा रहा हो



लम्बा गोरा अब भी पानी में है


अब ज़नाब का सिग्रेट ब्रेक हो गया है ।
इन महाशय ने खाना भी इसी स्पॉट पर खड़े होकर खाया ।


एक अच्छी बात यह लगी कि हम स्वतंत्र भारत की सर ज़मीं पर थे

इसलिए बीच पर इंडियंस पर कोई पाबंधी नहीं थी
यह अलग बात है कि वे हरकतें लंगूरों जैसी करते नज़र आये



यहाँ कुत्तों पर भी कोई रोक नहीं थी
आजाद हवा में तो सभी साँस ले सकते हैं ना



इस अंग्रेज़ के बच्चे को देशी कुत्तों में इतनी दिलचस्पी क्यों --



शुरू में जिन सरदार जी को देखा था , अब वह हमारे पीछे बने ढाबे में पहुँच चुके थे ।
इनके चेहरे की चमक तो सूरज की पड़ती किरणों की वज़ह से है । लेकिन आँखों की चमक का राज़ तो कुछ और ही लगता है ।

यहाँ की आबो हवा ही ऐसी है कि किसी मुर्दे को यहाँ रख दें तो एक बार वह भी खड़ा होकर एक चक्कर लगाकर वापस अर्थी पर लेट जाए

गोरी और गाय ---
यहाँ सिर्फ इंसानों को ही नहीं , बल्कि कुत्तों और गाय भैंसों को भी गोरी चमड़ी में आकर्षण नज़र आता है

एक विचार --
अंत में हम बैठकर सोच रहे थे कि संसार में कितनी विविधता है । एक तरफ ये गोरी चमड़ी वाले जो यहाँ लेटकर सन टैनिंग कर रहे हैं ताकि थोड़े काले हो जाएँ ।
दूसरी तरफ अफ्रीकन देशों के लोग जो इतने काले कि रात में नज़र भी न आयें ।
बीच में हम हिन्दुस्तानी/एशियन जिन्हें ब्राउन कहा जाता है । कहीं न कहीं हमें भी शौक रहता है गोरा होने का । तभी तो फेयर एंड लवली जैसी क्रीम का आविष्कार हुआ

हमें भी तो श्रीमती जी ने आते समय सन लोशन देकर कहा था कि लगा लेना वर्ना काले हो जाओगे
नोट : यहाँ एक बार देखकर ज़रूर लगा था कि ये निर्लज्जता क्यों । लेकिन फिर याद आया कि इससे ज्यादा नग्नता तो आजकल टी वी पर फिल्मों और विज्ञापनों में दिखाते हैं ।
कम से कम अख़बारों की मैगजीनों में छपने वाली तस्वीरों से तो कम ही नग्नता दिखी ।

इंटरनेट और एम् एम् एस के ज़माने में लज्ज़ा नाम की चीज़ बची ही कहाँ हैफिर क्यों इन्हें दोष दिया जाए वैसे भी दोष देखने वाले की आँखों में होता है

Tuesday, March 8, 2011

क्यों होती हैं महिलाएं घरेलु हिंसा की शिकार --अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक विचार --

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है
आइये देखते हैं क्या है आज महिलाओं का स्टेटस हमारे समाज में ।

सैक्स रेशो : पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या काफी कम । दिल्ली में अभी भी १००० पुरुषों पर सिर्फ करीब ८५० महिलाएं ।

शिक्षा : २००१ की जनगणना के अनुसार देश में ७५ % पुरुष और ५३.७ % महिलाएं शिक्षित हैं । ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या मात्र ४६ % है ।
व्यवसाय : ५१.७ % पुरुष और २५.६ % महिलाएं रोजगार में हैं ।

ज़ाहिर है , अधिकांश महिलाएं आज भी हर क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले पीछे हैं

महिलाओं के विरुद्ध अपराध :

११८ करोड़ आबादी वाले देश में जहाँ ७१ % लोग गावों में रहते हैं , ३८ % गरीबी रेखा से नीचे और बड़ी संख्या में अशिक्षित लोग हैं , वहां महिलाओं के साथ अत्याचार भी दिन पर दिन बढ़ रहे हैं ।

बलात्कार , अपहरण , छेड़खानी , दहेज़ उत्पीड़न और अत्याचार जैसे जघन्य अपराध समाज में फैले हैं

लेकिन एक और अपराध जिसे अकसर नज़रअंदाज़ किया जाता है , वह है महिलाओं के प्रति घरेलु हिंसा

घरेलु हिंसा यानि पति या घर के किसी अन्य सदस्य द्वारा महिला का उत्पीड़न ।
ऐसा नहीं है कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा सिर्फ कम पढ़े लिखे या गरीब परिवारों में ही देखने को मिलती है । घरेलु हिंसा हर वर्ग , समुदाय और धर्म के लोगों में बराबर व्याप्त है ।

क्यों होती है घरेलु हिंसा ?

इसके लिए जिम्मेदार है हमारी सोच ।
पुरुष प्रधान समाज में अभी भी महिलाओं का दर्ज़ा पुरुषों से नीचे ही समझा जाता है ।
पति के लिए पत्नी उसकी एक प्रोपर्टी है , जिसे वह जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है ।
पति गृह मालिक है , दाता है , बलशाली है, वह मर्द है ।
पति के लिए पत्नी को पीटना अपना आधिपत्य स्थापित करने का साधन समझा जाता है ।

घरेलु हिंसा के प्रकार :

१) शारीरिक
२) मानसिक
३) यौन शोषण
४) भावनात्मक शोषण
५) आर्थिक अत्याचार

इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ मैनेजमेंट रिसर्च , जयपुर और स्वास्थ्य सेवा निदेशालय, दिल्ली द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में बताया गया कि डोमेस्टिक वायलेंस ( घरेलु हिंसा ) की शिकार महिलाओं के लिए भारत सरकार ने एक अधिनियम लागु किया है --प्रिवेंशन ऑफ़ डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट २००५ --जिसके अंतर्गत निम्नलिखित सेवाएँ प्रदान करने का प्रायोजन है :

* राज्य के हर जिले में एक प्रोटेक्शन ऑफिसर की नियुक्ति , जो पीड़ित महिला को कानूनी सहायता लेने में सहायता करेगा ।
* पीड़ित महिला , या उसका कोई भी प्रतिनिधि या प्रोटेक्शन ऑफिसर कोर्ट से महिला के लिए कानूनी सहायता मांग सकता है ।
* मजिस्ट्रेट पीड़ित महिला के लिए एक सर्विस प्रोवाईडर नियुक्त कर सकता है ।
* कोर्ट शोषण करने वाले पति या अन्य व्यक्ति को अवरुद्ध और पीड़ित महिला को आर्थिक राहत प्रदान कर सकता है ।

घरेलु हिंसा से पीड़ित महिलाओं के उपचार में डॉक्टर्स की भी अहम् भूमिका है । क्योंकि इनके साथ अतिरिक्त सहानुभूति , संयम और संवेदना की ज़रुरत होती है ।

साथ ही अस्पताल में भी उन्हें सभी कानूनी जानकारी प्रदान करने के लिए जोर दिया गया है ।

ऐसी महिलाओं को सही मार्गदर्शन की ज़रुरत होती है , क्योंकि यहाँ प्रताड़ित करने वाला स्वयं उसका पति होता है । इसलिए बहुत संभल कर कदम उठाने की ज़रुरत होती है ।

लेकिन सबसे ज्यादा ज़रुरत है अपने अधिकारों के बारे में जानना

इसलिए जितना हो सके इस विषय पर बहस और विचार विमर्श की ज़रुरत है ताकि समाज में फैले इस अमानवीय कृत्य को समाप्त किया जा सके

Saturday, March 5, 2011

पर्यटकों का स्वर्ग --गोवा --एक चित्रावली सैर

दो दिन की कॉन्फेरेन्स में देश विदेश से आए करीब २५० डेलिगेट्स ने भाग लिया जिनमे तकरीबन १०० ला के छात्र भी थे । विभिन्न देशों में चिकित्सा क्षेत्र में होती लापरवाही के मामलों में कानून व्यवस्था और सजा पर खुल कर बात हुई । यहाँ भी जब से चिकित्सक सी पी एक्ट के दायरे में आए हैं , तब से डॉक्टरों में एक दहशत सी फ़ैल गई है । कॉन्फेरेन्स में इस बात पर जोर दिया गया कि यदि आप अपनी जगह सही हैं तो डरने की कोई बात नहीं ।

अधिकतर डॉक्टर्स पत्नी समेत आए थे । इसलिए गोवा घूमने के लिए दो दिन अतिरिक्त रुकने का कार्यक्रम था । दुर्भाग्यवश हमें श्रीमती जी का एन वक्त पर टिकट रद्द कराना पड़ा

लेकिन हमने इसे वनवास न समझ , अपने पिछले अनुभवों का भरपूर उपयोग करते हुए , एक टूरिस्ट गाइड का काम संभाल लिया और अपने साथी डॉक्टर्स के लिए घूमने का इंतजाम कर दिया ।

कभी कभी मैं सोचता हूँ यदि मैं डॉक्टर होता तो या तो फोटोग्राफर होता या टूरिस्ट गाइड

आइये आपको भी घुमाते हैं --गोवा मुफ्त में ।

पहला पड़ाव था --फोर्ट अगुआडा

मांडवी नदी के किनारे , एक पहाड़ी पर बना यह किला , १६१२ में पुर्तगालियों द्वारा बनाया गया था । वे यहाँ से समुद्र के रास्ते नदी से होकर आने वाले दुश्मनों के ज़हाज़ों पर नज़र रखते थे ।
यहाँ एक लाईट हाउस भी है । सुना है अब यह फोर्ट सेन्ट्रल जेल है । हालाँकि हमें तो कोई कैदी नज़र नहीं आया ।



फोर्ट से एक दृश्य--दूर मांडवी नदी दिखाई देती हुई


हमारा
अगला पड़ाव था --ओल्ड गोवा की चर्च


से कैथेड्रल चर्च और म्यूजियम




ओल्ड चर्च--बासिलिका ऑफ़ बोम जीसस

यह चर्च सोलहवीं सदी में बनी थी । यहाँ सेंट फ्रांसिस जेवियर का मम्मीफाइड पार्थिव शरीर एक चांदी के ताबूत में रखा गया है । इसे हर दस साल में जनता के दर्शन के लिए रखा जाता है । पिछली बार हमने दिसंबर १९९४ में देखा था ।
अब २०१४ में दोबारा देख सकते हैं


चर्च के अन्दर

यहाँ से हम पहुंचे , पणजी से तीन किलोमीटर दूर-डोना पावला --जहाँ मांडवी नदी अरब सागर में समा जाती है ।
कहते हैं यहाँ एक छोटी सी पहाड़ी से एक अंग्रेज़ युवती ने अपने प्रेमी के लिए समुद्र में कूदकर अपनी जान दे दी थी । आज यहाँ उसका स्मारक बना है ।

डोना पावला



डोना पावला से एक दृश्य

सामने अरब सागर से आती हुई शीतल पवन में हमारे सर पर बचे आठ बालों में से चार ऐसे नाच कूद कर रहे थे जैसे समुद्र में उठती लहरें किनारे से टकराकर अठखेलियाँ करती हैं ।

पृष्ठ भूमि में मांडवी नदी पणजी के किनारे किनारे

पहले दिन का अंतिम पड़ाव था --सन सेट क्रूज़
पणजी शहर में मांडवी नदी पर शाम को ६ बजे से ७ बजे तक फेरी के अपर डेक पर संगीत के साथ नाचते गाते , सैलानी सूर्यास्त का निर्मल आनंद लेते हैं ।

एक तरफ स्टेज जहाँ नृत्य चलता रहता है , दूसरी तरफ --बियर बार -और बीच में सैकड़ों कुर्सियां --जिन पर बैठकर नृत्य , संगीत और प्रकृति का अनोखा मिलन देख कर मन आत्म विभोर हो जाता है ।



सन सेट क्रूज़ --पंजिम ( मांडवी नदी पर )



अगले दिन पूरा दिन नोर्थ गोवा के टूर के लिए रखा था ।

नोर्थ गोवा में सबसे पहले प्रस्थान किया मयेम लेक के लिए । पणजी से ३५ किलोमीटर दूर , गोवा के देहात में हरे भरे गावों से होकर यहाँ तक का सफ़र अपने आप में एक स्वर्गिक अनुभव है ।


मयेम लेक


सुन्दर , सौम्य और शांत झील के दृश्य देखकर यहीं बस जाने को जी चाहेगा

गोवा में एक लाइन में कई बीच हैं जहाँ आजकल विदेशी सैलानियों का ज़मावड़ा लगा रहता है ।


वैगाटोर बीच: मेरी पसंदीदा बीच

बायीं ओर --फिरंगी बीच




दायीं ओर --देशी बीच --घरेलु पर्यटकों के लिए। ज्यादातर लोकल टूरिस्ट यहीं होकर आगे निकल जाते हैं ।

बेशक बला की खूबसूरती है , इस बीच में ।


अब यदि आप गोवा आयें और समुद्र में नहाकर , नमकीन न हो जाएँ तो क्या बात हुई । तो लो भाई हम सब भी कूद पड़े पानी में ।

क्या यहाँ आप एक औड मेन आउट ढूंढ सकते हैं ?

अंजुना बीच--एक रेड हॉट बीच


इसके बारे में विस्तार से अगली पोस्ट में पढ़िए ।


बाघा बीच--यहाँ रात के बारह बजे भी रेत में बेंचों पर बैठ कर खाना पीना चलता रहता है ।

लेकिन हमने यहाँ दिन में बोट में बैठकर समुद्र की सैर की , डरते डरते क्योंकि उस वक्त समुद्र बड़ा रफ था ।



कोंडोलिम बीच--यह हमारे होटल से पैदल की दूरी पर थी । लेकिन यहाँ रात में जाने से मना किया गया था ।


साउथ गोवा:

वापसी वाले दिन सुबह ही एयरपोर्ट के लिए निकल लिए । रास्ते में स्पाइस गार्डन पड़ा । यहाँ पहाड़ों में हरी भरी वादियों के बीच अनेक बगीचे हैं जहाँ मसाले उगाये जाते हैं । हल्दी , काली मिर्च , धनिया , इलाइची , काजू , किशमिस आदि के बगान हैं । यहाँ ४०० रूपये का टिकेट लेना पड़ता है जिसमे आपको लंच भी कराया जाता है ।

क्या आप जानते हैं --सबसे महंगा मसाला कौन सा है ?



स्पाइस गार्डन




अंत में हम पहुंचे मंगेश जी मंदिर जिसे लता मंगेशकर के पिता श्री दीनानाथ मंगेशकर ने बनवाया था ।

मंगेश जी टेम्पल

और इस तरह पूरा हुआ , गोवा का सफ़र ।

नोट : भाई अरविन्द मिश्रा जी की फरमाइश पर गोवा की तस्वीरों को बिना सेंसर किये छापा गया है
अगली पोस्ट में --एक दिन फिरंगियों के बीच --देखना भूलें

विशेष नोट : गोवा में से मार्च तक गोवा कार्निवल चल रहा हैजाना चाहेंगे ?