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Tuesday, April 21, 2009

आज सोचा तो ---

वो उसके दिल का राजा था, वो उसके दिल की रानी थी।
शिरी फरहाद से ऊंची, उनकी प्रेम कहानी थी।
वो उसको छोड़ कर भागा कोई तो थी ये मजबूरी ,
उस चाँद पे था दाग फ़िजा, तुझ पे खिजा तो आनी थी।

कोई लैला कोई मजनू , कोई शिरी कोई फरहाद।
मुहब्बत में हुए कुर्बान , ज़माना रखे उनको याद।
सींच कर खून से अपने बचाएं जो वतन की लाज ,
उन गुमनाम शहीदों को, भुलाये क्यों वतन ही आज।

कोई आंसू बहाता है , तो कोई मुस्कराता है।
कोई संसार आता है, तो कोई छोड़ जाता है।
फंसा रहता है इस आवागमन में तू मानव ,
तेरे जैसे कर्म बन्दे , तू वैसा फल ही पाता है।

Tuesday, March 10, 2009

कहीं रावण भी जल न पाये --

कुछ वर्ष पहले दिल्ली में होली के अवसर पर पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया था।उसी वक्त की ये पंक्तियाँ --

जनता को चिंता सता रही थी ,
होली करीब आ रही थी,
और पानी की टंकियां थी खाली ,
फ़िर कैसे मनाएंगे होली?

ऊपर वाले ने झाँक कर देखा,
धरा पर उड़ती धूल, तलों में सूखा।
नाजुक पौधे धूप से झुलस रहे थे ,
मेंढक भी बिना पानी के फुदक रहे थे।

मैली होकर सूख रही थी गंगा,
जमना का तल भी हो रहा था नंगा।
नल के आगे झगड़ रही थी ,
शान्ति,पारो और अमीना।
नाजुक बदन कोमल हाथों में लिए बाल्टी ,
मिस नीना चढ़ रही थी जीना।

ये तो कलियुग का प्रकोप है , उपरवाले ने सोचा,
और करूणावश पसीजने से अपने मन को रोका।
पर कलियुग पर आपके कर्मों का पलडा था भारी ,
इसीलिए धरती पर उतरी इन्द्र की सवारी।

फ़िर छमछम बरसा पानी , धरती की प्यास बुझाई ,
पर होलिका दहन में बड़ी मुसीबत आई।
छतरी के नीचे, मिट्टी के तेल से, मुश्किल से जली होली,
मैंने सोचा इस बरस होली तो बस होली।

पर देखिये चमत्कार, कुदरत ने फ़िर से बदला रूप,
और होली के दिन बिखर गई, नर्म सुहानी धूप।
फ़िर जेम्स, जावेद, श्याम और संता ने मिल कर खेली होली,
और शहर में धर्मनिरपेक्षता की जम कर तूती बोली।

नादाँ है कलियुग अभी, कहीं जवां हो न जाए,
और मानव के जीवन में इक दिन ऐसा आए,
कि होलिका तो होलिका, रावण भी जल न पाये।
सत्कर्मों को अपनाइए, यही है एक उपाय ,यही है एक उपाय।

जल मानव को प्रकृति की एक अद्भुत देन है, इस प्राकृतिक सम्पदा को व्यर्थ न करें।
वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाएं।

Friday, March 6, 2009

स्लमदोग्स कौन ?

बिहार में कोसी नदी का पानी
जब कहर ढ़ा रहा था ।
दिल्ली में एक पशु प्रेमी वर्ग ,
तब कुत्तों का स्वयम्बर रचा रहा था।
जहाँ मेधापुर वासियों के अरमान तो ,
कोसी के पानी में बह गए ।
वहीं इस सामूहिक विवाह में ,
अधिकाँश कुत्ते भी कुंवारे ही रह गए।
यूँ तो मंडप में सजे बैठे सैंकडों ,
जर्मन शेफर्ड , बुल्दोग और दाल्मेसियन मादा थी।
पर पंडित बेचारे क्या करते,
क्योंकि मनुष्यों की तरह कुत्तों में भी नरों की संख्या ज्यादा थी।
मैंने एक आयोजक से पूछा , मित्र
बिहार के बाढ़ पीड़ित तो भूख प्यास से ,
कराह रहे हैं।
ऐसे में आप कुत्तों का ब्याह रचा रहे हैं?
वो बोला दोस्त ये हिन्दुस्तान है ,
यहाँ इंसान तो फ़िर मुफ्त में लाखों पैदा हो जायेंगे।
किंतु गर ब्याह नहीं रचाया ,
तो ये एक एक लाख के बुल्दोग और दाल्मेसियन कहाँ से आयेंगे?
मैंने कहा वाह रे हिन्दुस्तान ,
यहाँ कुत्ते मंहगे और सस्ता इंसान ,
फ़िर भी मेरा भारत महान!

Sunday, February 15, 2009

वो वैलेंटाइन डे कब आएगा--

ये कैसी भेड चाल है, ये कैसा भ्रम जाल?
क्यों अपनी चाल को भूल कर , हंस चला कव्वे की चाल।
अपना देश, धर्म और संस्कृति को क्यों छोड़े जाते हो,
वैलेंटाइन तो याद है, पर खून के रिश्तों को तोड़े जाते हो!

क्यों भूल गए न ,
भूल गए न उस जननी को,
सर्व कष्ट हरनी को,
जो हर नाजों नखरे उठाती है,
राजा कह कर बुलाती है ,
फ़िर बेटा चाहे जैसा हो।
दो प्यार के बोल और दो पल अपनों का साथ ,
गर उसे भी मिले तो कैसा हो!

क्यों भूल गए न ,
भूल गए न उसको जो जन्म दाता है ,
ख़ुद एक कोट में जीवन काटे ,
पर हर वर्ष रीबोक के नए शूज दिलाता है।
ख़ुद झेले ब्लू लाइन के झटके ,
पर आपको नैनो के सपने दिखाता है।
फ़िर अपनी नई वैलेंटाइन की अकड़ में ,
क्यों भूल गए उसको ,
जीवन के पतझड़ में?

और भूल गए न ,
भूल गए न ,
कलाई पर बहन की राखी का नर्म अहसास ,
भूल गए भाई भाई के खून के रिश्ते की मिठास,
और भूल गए वो धरती माँ, वो सूर्या, वो आकाश।
और मैला कर दिया न गंगा मैय्या को,
मैली हुई गंगा मैय्या और मैले पवन के झोंके,
फ़िर भी आप खुश हैं ,
अपनी नई वैलेंटाइन के साथ होके!

अरे वैलेंटाइन तो हैं ये पाँच तत्व ,
जो हैं जीवन के मूल आधार ,
पर वो वैलेंटाइन डे कब आएगा ,
जब मानव को होगा इन सबसे प्यार?
वो वैलेंटाइन डे कब आएगा---?

Saturday, February 14, 2009

वलेंटाइन डे ---

काम वाली बाई ,
जब दस बजे तक न आई,
मैडम को गुस्सा आया,
उसका मोबाईल मिलाया,
तो वो बोली ,
बीबी जी , आज हम
वेलन्ताइन डे मना रहे हैं।
हमारे पतिदेव हमें
एक रोमांटिक फ़िल्म दिखा रहे हैं।
स्ल्म्दोग ---
पत्नि बोली, तुम्हे उसमे
रोमांस नजर आता है?
वो बोली नही,
चांस नजर आता है।
करोड़पति बनने का,
मालूम है नही बनने का,
पर ख्वाब देखने में क्या जाता है।
और इस तरह कामवाली तो सिनेमा घर में ,
वेलन्ताइन डे मनाती रही ,
और घरवाली घर में झाडू पोछा लगाती रही।
जय हो।

Saturday, February 7, 2009

आदमी बनाम कुत्ता

पता चला है कि
इंग्लॅण्ड के आदमी और कुत्ते ,
काम में इतना मशगूल हो जाते हैं ,
कि मालिकों की तरह उनके कुत्ते भी,
बच्चे पैदा करना ही भूल जाते हैं।
अब तो ब्रिटिश सरकार को भी ,
ये सत्य सताता है,
कि वहां दोनों प्रजातियों में ,
बच्चे कम, और बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है।
अब इस विचार से हमारी सरकार तो,
बडी भाग्यशाली है,
क्योंकि यहाँ बच्चे और कुत्ते ,
दोनों के मामले में खुशहाली है।
और इस खुशहाली से ,
हमारी सरकार कुछ तो चिंतित नजर आ रही है,
पर ऐसा लगता है, अमेरिकन सरकार को ,
इसकी चिंता ज्यादा सता रही है।
और जब ज्योर्ज बुश को ,
चिंता ने अधिक सताया,
तो एक वैज्ञानिक आयोग बैठाया,
और उन्होंने पता लगाकर बताया ,
कि धरती पर १.३ मिलियन बिलियन ,
मनुष्य रह सकते हैं।
यानी अभी हम और दो लाख गुना ,
लोगों का बोझ सह सकते हैं।
अब ये जान कर उनकी तो ,
जान में जान आई,
पर उनके सामान्य ज्ञान पर ,
हमको बड़ी हँसी आई।
अरे हमें तो ये बात pahle ही पता थी,
तभी तो हम चैन से जिए जा रहे हैं,
और बेफिक्र होकर बेधड़क,
बच्चे पैदा किए जा रहे हैं।
जय , जय हो।

Monday, January 19, 2009

मोबाईल मैनिया

जैसे जैसे कम्युनिकेशन के साधन बढ़ते जा रहे हैं, वैसे वैसे कम्युनिकेशन ख़ुद घटता जा रहा है। आजकल जब दो दोस्त मिलते हैं तो एक कहता है - भाई कभी आइये। दूसरा दोस्त बोलता है- जी हाँ , आप भी कभी आइये। मैंने देखा है कि अक्सर वो कभी, कभी आता ही नही। और लोग पूछते ही रह जाते हैं कि भाई कब आओगे? हमारे एक जज मित्र हैं । जब भी मिलते हैं ,पूछते हैं भाई कब आओगे? अच्छा नही आओगे , ये लो गाड़ी का चालान , अब आओगे। हमारे मोहल्ले में मोबाईल पहली बार तब आया जब हमारे एक वकील मित्र ने ख़रीदा। अब देखने की बात ये थी कि दो महीने तक वो जनाब मोबाईल को हाथ में झंडे की तरह पकड़ कर रोज सुबह सैर को आते थे। फ़िर धीरे धीरे उनका हाथ थकने लगा तो उन्होंने मोबाईल को बेल्ट में लगाना शुरू कर दिया। लेकिन कुछ भी हो ३६०००/- का मोबाईल देखकर सभी सकते में आ जाते थे। फ़िर धीरे धीरे उसकी कीमत घटने लगी और मोबाईल कई लोगों के पास दिखने लगे। फ़िर भी उन दिनों मोबाईल रखना बड़े आदर के साथ देखा जाता था। लेकिन जब लोगों ने फ़िल्म मानसून वैडिंग में एक टेंट वाले को मोबाईल इस्तेमाल करते देखा तो लोगों को बड़ी हँसी आई। आज मोबाईल इतना आम हो गया है कि किसी के हाथ में देख कर हँसी नही आ सकती। पर इसका नाम तो है मोबाईल लेकिन समाज को कर दिया है इम्मोबाइल। अब तो लोग चैट भी करते हैं तो बिना मुहँ खोले। इसीका नतीजा है कि समाज में इतना बदलाव आ गया है कि जहाँ पहले शादी का निमन्तरण आता था आपस के मेल से, आजकल आता है पोस्ट ऑफिस या कुरियर की मेल से और एक दिन ऐसा आएगा कि निमंत्रण आएगा अस ऍम अस या ई- मेल से। सचमुच जैसे जैसे कम्युनिकेशन के साधन बढ़ते जा रहे हैं ,वैसे वैसे हम एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। और इसी का परिणाम है --जिदगी में तनाव, परेशानियां, तरह तरह की बीमारियाँ। इस भागती दौडती दुनिया में लोगों के पास समय ही नही है कि वो जिंदगी की छोटी छोटी बातों को एन्जॉय कर सकें। तनाव मुक्त रह सकें। ऐसे में जयजयवनती जैसी काव्य गोष्ठी समान विचारों वाले लोगों को मिलाने का काम करती है। धन्य हैं कविवर अशोक चक्रधर जी जो हर महीने काव्य गोष्ठी करते हैं और सद विचारों का आदान प्रदान करते हैं।