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Friday, July 16, 2021

इंसान की असलियत कागज़ देखकर ही पता चलती है --

 

ये बात हमें अभी तक समझ में नहीं आई , 

कि ६० तो क्या, ६५  की उम्र भी जल्दी कैसे चली आई।  


अब हम क्या बताएं आखिर ये किसकी गलती है, 

भई सरकारी काग़ज़ों में तो उम्र भी नकली ही चलती है।  


इंसान की असलियत भी चेहरे से कहां झलकती है , 

यह तो इंसान के कागज देखकर ही पता चलती है।  


गाड़ी के कागज़ ना हों तो पुलिसवाला भी तन जाता है, 

और ख़ामख़्वाह एक शरीफ इंसान मुज़रिम बन जाता है।  


लाख समझाते हैं बैंक मैनेजर को, पर वो नहीं पहचानता है,   

हम जिन्दा हैं , वो यह हमारे कागज देखकर ही मानता है।    


कागज़ की अहमियत तो सरकारें भी समझती है , 

तभी तो आधी सरकारी योजनाएं कागज़ पर ही चलती हैं।  


इन कागज़ों के चक्कर में तो हम भी धकाये गए , 

इसीलिए तो समय आने से पहले ही घर बिठाये गए।  


हट्टे कट्टे हो फिर भी बेचारगी का नाटक करते हो,

प्रमाणित बूढ़े हो फिर भी खों खों तक नहीं करते हो। 


हाथ पैर काम करते हैं , बाबा दांत भी असली रखते हो, 

कब तक निठल्ले घूमोगे, कुछ काम क्यों नही करते हो। 


सोचो बेचारे भिखारी भी रोज रोज कितने ताने सहते हैं,

इधर हम रिटायर हुए तो अब यही घरवाले हमसे कहते हैं।


Wednesday, October 12, 2011

जब तक अंतर्राष्ट्रीय लेबल न लगो हो , कवि की छवि ही नहीं बनती ---



मेडिकल प्रोफेशन में एक विशेष बात यह है कि एक डॉक्टर को जिंदगी भर पढ़ते रहना पड़ता है । वैसे भी चिकित्सा शिक्षा में सबसे ज्यादा समय और मेहनत लगती है । इसलिए एक डॉक्टर को अनेकों परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है ।
सब की तरह हमें भी इन परीक्षाओं का सामना करना पड़ता रहा है । लेकिन पिछले कुछ सालों से अपनी बढती गतिविधियों ( एक्स्ट्रा क्यूरिकुलर एक्टिविटीज ) की वज़ह से हमें तो और भी परीक्षाएं देनी पड़ जाती हैं ।

जी हाँ , जब आप कोई नया काम करने का जिम्मा लेते हैं तो वह एक परीक्षा ही होता है । क्योंकि आप पर दबाव होता है , अपेक्षाओं का । परफोर्मेंस एंजाईटी भी होती है ।

अब अपने लिए तो यह एक रोजमर्रा की बात बन गई है । यानि रोज कोई एक नया काम ।

पिछले दिनों अपने क्षेत्र के लॉयंस क्लब के एक पदाधिकारी का फोन आया --सर हम आपको ओनर करना चाहते हैं । मैंने पूछा --किस बात के लिए । उन्होंने बताया कि हम अपने क्षेत्र के चुनिन्दा कवियों को सम्मानित करना चाहते हैं । साथ ही हम आपकी कवितायेँ भी सुनना चाहेंगे ।

अब हमने सोचा कि ये महाशय शायद हमें साहित्यिक डॉक्टर समझ रहे हैं । वैसे भी हम वहां किसी को जानते भी नहीं थे । फिर लगा चलो इसी बहाने कुछ सुनने सुनाने का अवसर तो मिलेगा ।

वर्ना हम जैसे कवियों को तो जेब से खर्च करके भी श्रोता जुटाने मुश्किल होते हैं ।

निमंत्रण तो स्वीकार कर लिया लेकिन घबराहट भी होने लगी । पहले सम्मान फिर कविता सुनाना । कहीं वापस ही न करना पड़ जाए । वैसे भी यह निमंत्रण अप्रत्यासित था । भई हम कहाँ कवि , कैसे कवि !

खैर दिल कड़ा करके चले गए । और पहली बार हमारा एक वरिष्ठ कवि के रूप में परिचय कराया गया ।

अंतत : शुक्र रहा कि इज्ज़त बच गई । और हम सही सलामत ससम्मान लौट कर आ पाए।
चलिए अब हम भी मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय कवि तो बन ही गए ।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कवि तो हम तभी बन गए थे जब हमने विदेश का विस्तृत दौरा करते हुए टोरंटो , स्कार्बरा , एजेक्स , एल्गोन्क़ुइन , मोंटमोरेंसी और क्यूबेक जैसे देशों में कविता पाठ किया था । ( कनाडा वासियों से अनुरोध है कि कृपया इस विषय पर चुप्पी साधे रखें ) ।

अब यह अलग बात है कि सभी कवि सम्मेलनों में श्रोता हमारे मेज़बान मित्र और उनके बच्चे ही थे ।
लेकिन क्या हुआ , अंतर्राष्ट्रीय कवि तो बन ही गए ।

वैसे भी आजकल जब तक यह लेबल न लगा हो , कवि की छवि ही नहीं बनती ।



कविता पाठ करते हुए

आईये विदेश के दौरे में अर्जित ज्ञान पर कुछ प्रकाश डाला जाए :

अपनों के बसे हज़ार घर
घर भी दिखे अति सुन्दर।
पर पति पत्नी में कब बात बिगड़ जाए
हर घर में बसा बस यही डर ।

अठारह पर बच्चे होते ज़वान
फिर मात पिता से होते अंजान
देसी विचार और विदेशी व्यवहार में फंसकर
नादाँ अपनी खो जाते पहचान .

माना कि टेक्नोलोजी का अधिकारी जापान है
अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है।
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है
वह केवल अपना हिंदुस्तान है ।

नोट : भले ही आधुनिकता की छाप यहाँ भी नज़र आने लगी हो , लेकिन हमें गर्व है कि अभी भी हमारा पारिवारिक ढांचा बहुत मज़बूत है ।