दिल्ली में महरौली बदरपुर रोड पर साकेत के करीब बना है , गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसिज। दिल्ली टूरिज्म ने यहाँ १९-२१ फरवरी तक गार्डन टूरिज्म फेस्टिवल का आयोजन किया था । क्योंकि यही एक पार्क है जो हमने अभी तक नहीं देखा था , इसलिए शनिवार को हम पहुँच गए इस फूलों के मेले में।
ढूढने में कुछ समय लगा। ऍम बी रोड से गार्डन तक की रोड कच्ची सी थी , मेट्रो का काम चल रहा था । पार्क के सामने भी उमड़ पड़ी भीड़ के लिए इतनी पार्किंग नहीं थी। इसलिए गाँव की कच्ची जमीन में पार्किंग बना रखी थी।
बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले दिल्ली के रईसजादों की नाक भों सिकुड़ रही थी , क्योंकि अपने प्यारे देश की सोंधी मिटटी की टनों धूल गाड़ियों और साड़ियों से लिपटी जा रही थी।
लेकिन द्वार से प्रवेश करते ही सारी थकान और परेशानी उड़न छू हो गई।
कैसे --- आप भी देखिये ---
प्रवेश द्वार के अन्दर ।
फूलों से बनी हैंगिंग बास्केट ---
ये फूल इतने बड़े थे की इनकी रक्षा के लिए बड़ी बड़ी मूछों वाला गार्ड खड़ा करना पड़ा।

यह गमलों का समूह बहुत खूबसूरत दिख रहा था ।
यहाँ तो ढेरों ढेर बने हुए थे । 
पंक्ति में देखिये ।

ये गेंदे के फूल बहुत दिनों बाद दिखाई दिए । और इनमे खुशबू भी थी।

इस फ्लोरल अरेजमेंट में क्या दिख रहा है , ये तो आपको पता चल ही गया होगा।
ये बोनसई , कितना बड़ा --कितना छोटा । 
एक पुष्प ऐसा भी ।

मेले में घूमता नज़र आया ---चार्ली चैपलिन ---राजू चैपलिन , एक आर्टिस्ट।

और ये राजस्थानी डांसर्स , लोगों को दखते ही ठुमके लगाना शुरू कर देते थे।

स्टेज पर रंगारंग कार्यक्रम ---ये मयूर नृत्य वास्तव में बड़ा मनभावन था ।

अंत में , ये हरियाणवी लोक नृत्य ---मेरा दामण सिला दे हो , ओ नन्दी के बीरा ---इस लोक गीत के साथ --सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रहा।

गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसिज की एक और छवि देखने के लिए --विजिट कीजिये --चित्रकथा पर।
नोट : कभी फूलों को देखिये , देखते रहिये ---एक मेडिटेशन सा होने लगता है।

