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Monday, July 26, 2010

क्या आप जानना चाहेंगे आप किस प्रवृत्ति के मनुष्य हैं --सात्विक , राजसी या तामसी ---

पिछली पोस्ट में हमने विकास की बात की सब मित्रों की अमूल्य टिप्पणियां पढ़कर यही निष्कर्ष निकला कि भौतिक विकास कितना ही हो जाये, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे तब तक हम विकसित नहीं कहलायेंगे

अब सोच भी दो प्रकार की होती है । एक व्यवहारिक , दूसरी आध्यात्मिक । जहाँ व्यवहारिक सोच हमें एक अच्छा नागरिक बनाती है वहीँ आध्यात्मिक सोच हमें एक अच्छा इंसान बनाती है ।

गीतानुसार मनुष्य की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है --सात्विक , राजसी और तामसी । आइये देखते हैं कैसे उत्तपन्न होती है यह प्रवृत्ति।

कर्म करने से ही मनुष्य की प्रवृत्ति का पता चलता है

गीतानुसार --पूजा करने की श्रद्धा , आहार , यज्ञ , तप और दान --मनुष्य की प्रवृत्ति दर्शाते हैं । ये सब तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी।

पूजा करने की श्रद्धा :

सात्विक : एक ही भगवान को सर्वव्यापी मान कर श्रद्धा रखते हैं ।
राजसी : देवी देवताओं की पूजा करते हैं ।
तामसी : शरीर को कष्ट देकर , भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।


आहार :

सात्विक : जिसके खाने से देवता अमर हो जाते हैं मनुष्य में बल पुरुषार्थ आये आरोग्यता , प्रीति उपजे दाल,चावल , कोमल फुल्के , घृत से चोपड़े हुए , नर्म आहार

राजसी : खट्टा , मीठा , सलुना , अति तत्ता , जिसे खाने से मुख जले , रोग उपजे , दुःख देवे

तामसी : बासी , बेस्वाद , दुर्गन्ध युक्त , किसी का झूठा भोजन

यज्ञ :

सात्विक : शास्त्र की विधि से , फल की कामना रहित , यह यज्ञ करना मुझे योग्य है , यह समझ कर किया गया यज्ञ सात्विक कहलाता है
राजसी : फल की वांछा करते हुए , भला कहाने को , दिखावा करने को किया गया यज्ञ
तामसी : बिना शास्त्र की विधि , बिना श्रद्धा के , अपवित्र मन से किया गया यज्ञ

दान :

सात्विक : बिना फल की आशा , उत्तम ब्राह्मण को विधिवत किया गया दान
राजसी : फल की वांछा करे , अयोग्य ब्राह्मण को दान करे
तामसी : आप भोजन प्राप्त कर दान करे , क्रोध या गाली देकर दान करे , मलेच्छ को दान करे

तप :

सात्विक : प्रीति से तपस्या करे , फल कुछ वांछे नहीं , इश्वर अविनाशी में समर्पण करे
राजसी : दिखावे के लिए , अपने भले के लिए तप करे , अपनी मानता करावे
तामसी : अज्ञान को लिए तप करे , शरीर को कष्ट पहुंचाए , किसी के बुरे के लिए तप करे


यहाँ तप चार प्रकार के बताये गए हैं --देह , मन , वचन और श्वास का तप।

देह का तप : किसी जीव को कष्ट पहुंचाए
स्नान कर शरीर को स्वच्छ रखे , दन्त मंजन करे
गुरु का सम्मान , मात पिता की सेवा करे
ब्रह्मचर्य का पालन करे

ब्रह्मचर्य : यदि गृहस्थ हो तो परायी स्त्री को छुए यदि साधु सन्यासी हो तो स्त्री को मन चितवे भी नहीं

मन का तप : प्रसन्नचित रहे मन को शुद्ध रखे भगवान में ध्यान लगावे

वचन का तप : सत्य बोलना मधुर वाणी --हाँ भाई जी , भक्त जी , प्रभु जी , मित्र जी आदि कह कर बुलावे
गायत्री पाठ करे अवतारों के चरित्र पढ़े

श्वास तप : भगवान को स्मरण करे भगवान के नाम का जाप करे


इस तरह मनुष्य के सभी कर्म तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी
इन्ही कर्मों का लेखा जोखा बताता है कि आप सात्विक हैं , राजसी हैं या तामसी प्रवृत्ति के मनुष्य हैं

तो क्यों आज यह अंतर्मंथन हो जाये और आप जाने अपने बारे में किसी को बताने की ज़रुरत नहीं है , बस अपने लिए ही