ज्ञानी से ज्ञानी मिले , तो ज्ञान चौगुना हो ।
मूर्ख से मूर्ख भिड़े , तो खोंसडम खोंसडा हो । ( लट्ठम लट्ठा )
इस जन्माष्टमी पर हमने भी कुछ ज्ञान अर्जित करने की सोची । जिस समय लोग मंदिर में संगीत मंडली की मधुर धुनों पर थिरक रहे थे , हम ने सोचा क्यों ना गीता का ज्ञान प्राप्त किया जाये --विस्तृत रूप में ।
इसलिए पढना शुरू किया --श्रीमदभगवद गीता --पहले अध्याय से अठारहवें अध्याय तक ।
जो थोडा बहुत समझ में आया , वह संक्षिप्त में आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।
अध्याय १ : विषाद योग
श्री व्यास जी ने धृतराष्ट्र के सारथी संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की । संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाने लगा। संजय ने दोनों सेनाओं की तैयारी के बारे में बताया । दोनों सेनाओं के योद्धाओं और उनके शस्त्रों के बारे में वर्णन सुनाया । पांडवों की सेना सात यक्षिणी और कौवों की सेना ग्यारह यक्षिणी बताई ।
तद्पश्चात अर्जुन ने श्रीकृषण को अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहा । वहां का नज़ारा देखकर अर्जुन को मोह उत्पन्न हुआ और उसने शास्त्र त्याग कर युद्ध न करने का ऐलान किया ।
अध्याय २ :
अर्जुन कहते हैं --हे श्रीकृष्ण जी , यहाँ तो मैं सब अपने ही देख रहा हूँ । इनको मार कर मैं कौन सा सुख प्राप्त करूँगा । अपने गुरुजनों को मार कर मैं पाप करूँगा । मुझे ऐसा राज्य नहीं चाहिए , जो अपने प्रियजनों को मार कर मिले ।
अर्जुन किसी भी तरह युद्ध के लिए तैयार नहीं होते ।
इस पर श्रीकृष्ण जी कहते हैं --हे अर्जुन , युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है । युद्ध न करना पाप है , अधर्म है ।
मनुष्य का सिर्फ शरीर मरता है । आत्मा तो अविनाशी है ।
अध्याय ३ : कर्म योग
श्रीकृष्ण जी कहते हैं --देहधारी को इन्द्रियों से कर्म करना है । लेकिन मन को इश्वर में लगाओ । सत्कर्म करना मनुष्य का धर्म है । काम और क्रोध मनुष्य के दुश्मन हैं ।
अध्याय ४ : कर्म सन्यास योग
हे अर्जुन , जब जब धर्म की हानि होती है , तब तब मैं प्रकट होता हूँ । मैं सर्वव्यापी सत्य रूप हूँ ।
जो लोग देवताओं की उपासना करते हैं , फल पाने की कामना लिए --वे फल पाते हैं । वह फल भी मैं ही देता हूँ ।
लेकिन जो लोग सीधा मुझ में ध्यान लगाते हैं , बिना फल की कामना किये --उन्हें ज्ञान प्राप्त होता है ।
पंडित कौन होता है --जिसने सभी कर्म त्याग दिए । मन को वश कर लिया । सभी बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर ली ।
मुझ अविनाशी में मन का निश्छल चेता रख मुझ से जुड़ गया । वह मोक्ष को प्राप्त होता है ।
अध्याय ५ :सन्यास योग
मनुष्य के शरीर में इन्द्रियां होती हैं । इन्द्रियां कर्म करती हैं । लेकिन आत्मा अकर्ता है । इन्द्रियों से सत्य कर्म करने से शांति प्राप्त होती है । कामना के वश होने से आदमी बंधनों में बंधा रहता है ।
अध्याय ६ : आत्म संयम
यह मन चलायमान है । सांसारिक बातों से अलगाव रख मन को इश्वर से जोड़े --यह योग कहलाता है । इस अध्याय में योगासन की विधि बताई गई है ।
योगी तीन प्रकार के होते हैं --तप योगी , ज्ञान योगी और कर्म योगी ।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं --जो श्वास श्वास मेरा स्मरण करे , वह मुझे सबसे प्यारा है । वही ज्ञान योगी भी कहलाता है ।
अध्याय ७ : प्रकृति भेद योग
इस अध्याय में माया यानि प्रकृति के अनेक रूपों के बारे में बताया गया है ।
जल, तेज , वायु, पृथ्वी , आकाश , मन , बुद्धि , अहंकार --ये सब मेरी माया हैं जो मनुष्य के भीतर भी हैं और बाहर भी ।
श्रीकृष्ण जी आगे कहते हैं कि मनुष्य तीन कारणों से मुझे स्मरण करते हैं । रोगों से मुक्ति के लिए , ज्ञान प्राप्ति के लिए और कामना के लिए ।
जो लोग कामना के लिए देवताओं की पूजा करते हैं उन्हें कामना की प्राप्ति होती है ।
लेकिन जो लोग मेरा योग ध्यान करते हैं , वे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं । ज्ञान योगी मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैं ।
अध्याय ८ : अक्षक ब्रह्म योग
इस अध्याय में बताया गया है --- सृष्टि में चार युग हते हैं --सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग ।
सतयुग की अवधि --१७ लाख २८००० बर्ष है । त्रेता युग -----------१२ लाख ९६००० वर्ष । द्वापर युग ----------८ लाख ६४००० वर्ष । कलियुग -----------४ लाख ३२००० वर्ष । कुल अवधि --------४३ लाख २०००० वर्ष ।
ब्रह्मा का एक दिन इसका हज़ार गुना वर्षों का होता है । इसी तरह एक रात भी इतनी लम्बी ही होती है ।
अध्याय ९ : राज विद्या योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण अपने विराट रूप का वर्णन करते हैं । हे अर्जुन , यह सारी सृष्टि मुझी से जन्मी है और मुझी में समा जाती है ।
जो लोग देवताओं को मानते हैं , वे देवलोक को जाते हैं । फिर सुख भोगकर वापस संसार में आ जाते हैं ।
जो लोग मुझे मानते हैं , वे अविनाशी पद को जा प्राप्त होते हैं । वे आवागमन से छूट जाते हैं ।
यहाँ श्रीकृष्ण जी उन्हें याद करने के लिए मन्त्र का जाप करने को कहते हैं --
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ नमो नारायण । यह जाप भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं , जो मुझे स्मरण करता है , उसे मैं याद करता हूँ । जो मेरे एक भी श्लोक को पढता है , मैं उसके पास जा खड़ा होता हूँ ।
मेरा साथ ऐसे मिल जाता है , जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है ।
अध्याय १० :विभूति योग
अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं --हे कुन्तीनन्दन मुझे अपने विराट रूप के बारे में और बताइए ।
श्रीकृष्ण जी बताते हैं --हे अर्जुन मैं सर्वव्यापी हूँ ।
मैं प्रकाश में सूर्य ,--- ४९ पवनों में भारी चिपवन , ---२८ नक्षत्रों में चन्द्रमा , ---चार वेदों में सामवेद , ---३३ करोड़ देवताओं में इंद्र , ---११रुद्र में शंकर रूद्र, -----पर्वतों में सुमेर पर्वत , ----सप्त ऋषियों में भ्रगु ऋषि , ---वचनों में ओंकार , ---वृक्षों में पीपल, ----ऋषियों में नारद , ----सिद्धों में कपिल मुनि, ---हाथियों में ऐरावत, ----नागों में शेषनाग , ----नदियों में गंगा , ----सप्त समुद्रों में क्षीर समुद्र , ----शस्त्रों में वज्र , ---और गौओं में कामधेनु मैं हूँ ।
अध्याय ११ : विश्व रूप दर्शन
इस अध्याय में श्रीकृष्ण जी अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं । क्योंकि इसे साधारण नेत्रों से नहीं देखा जा सकता , इसलिए वे अर्जुन को दिव्य नेत्र की दृष्टि देते हैं ।
अर्जुन को दिखाई देते हैं ---
अनंत मुख , ---अनंत सूर्यों का प्रकाश , ---हाथ में गदा , शंख और चक्र , ----अनंत भुजाएं, ---अनंत नेत्र , कोटि देवता मुख में प्रवेश कर रहे हैं , ---सारे योद्धा मूंह में समाये जा रहे हैं ----पूरा संसार समाया है ।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं --हे अर्जुन ये सारे योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मरे हुए हैं । तू तो निमित्त मात्र है ।
अर्जुन यह विराट रूप देखकर डर जाता है और कहता है --हे श्रीकृष्ण , मैं आपको नमस्कार करता हूँ । मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ । मैं तो आपके साथ न जाने कैसी कैसी बात करता रहा हूँ । आपकी महिमा अपरम्पार है । आपका यह रूप देखकर मुझे डर लग रहा है । वापस उसी रूप में आ जाओ ।
श्रीकृष्ण कहते हैं --परम परमेश्वर का यह रूप किसी को नहीं दीखता । तू मेरा सखा है । मुझे बहुत प्यारा है । इसलिए तुझे दिखाया है । तुम निडर होकर अपना कर्म करो --युद्ध करो ।
अध्याय १२ : मुक्ति योग
अर्जुन --हे श्रीकृष्ण , आपका कौन सा रूप सर्वश्रेष्ठ है , यह बताओ ।
श्रीकृष्ण --मेरे ८ रूप हैं :
१) कमल नयन रूप ---जो प्रकट रूप है --यही सर्वश्रेष्ठ है ।
२) अक्षर अविनाशी----जिसकी महिमा मन वाणी पर आ नहीं सकती ।
३) अनिर्देश ----------जिसे जिह्वा कह नहीं सकती ।
४) अव्यक्त -----------जो नेत्रों से देखा ना जाये ।
५) सर्वव्यापी ---------मन से जिसका प्रकाश चितव्या नहीं जाता ।
६) अचिंत ------------कोई विकार नहीं ।
७) अचल ------------घटता बढ़ता नहीं , स्थान से चलता नहीं ।
८) ध्रुव ---------------किसी का हिलाया हिला नहीं ।
मेरा कमल नयन रूप सर्वश्रेष्ठ है । जो इसके उपासक हैं , मैं उनका उद्धार करता हूँ , मुक्ति दिलाता हूँ ।
मन का निश्छल चेता मेरे में रख और बुद्धि भी ।
मेरी महिमा का कहना सुनना , मेरे ध्यान साथ जुड़ना --ऐसे जो ज्ञानी मेरे भक्त हैं , उनके गुण सुन ।
किसी का बुरा न करे , किसी से शत्रुता नहीं , सुख दुःख एक समान , सदा संतुष्ट , निडर , हर्ष शोक से रहित , चिंता वांछा रहित , जिसके लिए शत्रु -मित्र , सुख -दुःख , शीत -उशन , सब एक समान हैं , ऐसे भक्त मुझे प्यारे हैं ।
अध्याय १३ : क्षेत्र , ज्ञान , प्रकृति
यह शरीर क्षेत्र कहलाता है , जीव क्षेत्री और शरीर रुपी क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रय्ग ।
शरीर पांच तत्त्वों से बना है : पृथ्वी ---मांस , जल ---रुधिर , अग्नि ---जठराग्नि , पवन ---श्वास और आकाश ---पोलापन ।
शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं ---नेत्र , नासिका , श्रवण , त्वचा और जिह्वा ।
पांच कर्म इन्द्रियां होती हैं ---- हाथ , पाँव , गुदा , लिंग और नाक ।
प्रकृति माया है । माया से तत्त्व उपजे हैं । तत्त्व से शरीर बनता है शरीर में आत्मा वास करती है ।
जो इन्द्रियों का दुरूपयोग न करे और आत्मा को ब्रह्म में लगाये , वह परम अविनाशी पद को प्राप्त होता है ।
अध्याय १४ : गुणत्रय विभाग
परम ज्ञान क्या होता है ? यह जान लेना कि यह सारा संसार मुझ से ही प्रकट होता है और मुझ में ही प्रलय होता है ।
हर एक प्राणी में तीन गुण होते हैं : सात्विक , राजसी और तामसी ।
सात्विक गुण : निर्मल पवित्र मन , अज्ञान रहित , निष्पाप ।
राजसी गुण : कुटुंब के साथ मोह , ममता , द्रव्य कमाने कि तृष्णा । तामसी गुण : आलस्य , अति निंद्रा , असावधानता ।
तीनों गुण एक ही व्यक्ति में घटते बढ़ते रहते हैं ।
जो लोग सात्विक गुणों के साथ देह त्याग करते हैं , वे देवलोक को जाते हैं ।
राजसी -पृथ्वी पर लौट आते हैं । और तामसी --पाताल लोक में जाते हैं ।
जो वांछा रहित प्रभु की शरण में जाकर प्रभु का दास हो जाता है , वह तीनों गुणों से अतीत होकर जीवन मुक्त हो जाता है ।
अध्याय १५ : पुरुषोत्तम योग
संसार एक वृक्ष है , जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं । वेद पत्र हैं । यह ब्रह्म लोक से पाताल लोक तक फैला है । सत्व , राज और तम इसके डाल हैं । प्रभु की चैतन्यता से यह उपजता है ।
कुटुंब इसके रस्से हैं , जिनसे बंधा है । इस माया रुपी वृक्ष में यह जीव फंसा है ।
मोह माया को त्याग कर मेरी शरण में आने से मुक्ति प्राप्त होती है ।
अध्याय १६ : देव असुर सम्पदा योग
मनुष्य का स्वभाव देवता स्वरुप हो सकता है या असुर जैसा ।
देवता स्वभाव मनुष्य ---निर्मल हृदय , अहिंसावादी , सत्यवादी , क्रोध रहित , संतुष्ट , निर्लोभ , निश्चल , दयावान , धैर्य पूर्ण होता है । श्वास श्वास मेरा स्मरण करता है ।
असुर स्वभाव मनुष्य ---पाखंडी , अपवित्र , नास्तिक , अहंकारी , लोभी , भोगी , भ्रष्ट , क्रोधी और चिंता में लीन रहता है ।
क्रोध , लोभ , मोह ----ये तीन नरक के द्वार हैं ।
अध्याय १७ : त्रिविध योग
गीतानुसार मनुष्य की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है --सात्विक , राजसी और तामसी । आइये देखते हैं कैसे उत्तपन्न होती है यह प्रवृत्ति।
कर्म करने से ही मनुष्य की प्रवृत्ति का पता चलता है ।
गीतानुसार --पूजा करने की श्रद्धा , आहार , यज्ञ , तप और दान --मनुष्य की प्रवृत्ति दर्शाते हैं । ये सब तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी।
पूजा करने की श्रद्धा :
सात्विक : एक ही भगवान को सर्वव्यापी मान कर श्रद्धा रखते हैं ।
राजसी : देवी देवताओं की पूजा करते हैं ।
तामसी : शरीर को कष्ट देकर , भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।
सात्विक : जिसके खाने से देवता अमर हो जाते हैं । मनुष्य में बल पुरुषार्थ आये । आरोग्यता , प्रीति उपजे । दाल,चावल , कोमल फुल्के , घृत से चोपड़े हुए , नर्म आहार ।
राजसी : खट्टा , मीठा , सलुना , अति तत्ता , जिसे खाने से मुख जले , रोग उपजे , दुःख देवे ।
तामसी : बासी , बेस्वाद , दुर्गन्ध युक्त , किसी का झूठा भोजन ।
यज्ञ :
सात्विक : शास्त्र की विधि से , फल की कामना रहित , यह यज्ञ करना मुझे योग्य है , यह समझ कर किया गया यज्ञ सात्विक कहलाता है ।
राजसी : फल की वांछा करते हुए , भला कहाने को , दिखावा करने को किया गया यज्ञ ।
तामसी : बिना शास्त्र की विधि , बिना श्रद्धा के , अपवित्र मन से किया गया यज्ञ ।
दान :
सात्विक : बिना फल की आशा , उत्तम ब्राह्मण को विधिवत किया गया दान ।
राजसी : फल की वांछा करे , अयोग्य ब्राह्मण को दान करे ।
तामसी : आप भोजन प्राप्त कर दान करे , क्रोध या गाली देकर दान करे , मलेच्छ को दान करे ।
तप :
सात्विक : प्रीति से तपस्या करे , फल कुछ वांछे नहीं , इश्वर अविनाशी में समर्पण करे ।
राजसी : दिखावे के लिए , अपने भले के लिए तप करे , अपनी मानता करावे ।
तामसी : अज्ञान को लिए तप करे , शरीर को कष्ट पहुंचाए , किसी के बुरे के लिए तप करे ।
यहाँ तप चार प्रकार के बताये गए हैं --देह , मन , वचन और श्वास का तप।
देह का तप : किसी जीव को कष्ट न पहुंचाए ।
स्नान कर शरीर को स्वच्छ रखे , दन्त मंजन करे ।
गुरु का सम्मान , मात पिता की सेवा करे ।
ब्रह्मचर्य का पालन करे ।
ब्रह्मचर्य : यदि गृहस्थ हो तो परायी स्त्री को न छुए । यदि साधु सन्यासी हो तो स्त्री को मन चितवे भी नहीं ।
मन का तप : प्रसन्नचित रहे । मन को शुद्ध रखे । भगवान में ध्यान लगावे ।
वचन का तप : सत्य बोलना । मधुर वाणी --हाँ भाई जी , भक्त जी , प्रभु जी , मित्र जी आदि कह कर बुलावे ।
गायत्री पाठ करे । अवतारों के चरित्र पढ़े ।
श्वास तप : भगवान को स्मरण करे । भगवान के नाम का जाप करे ।
इस तरह मनुष्य के सभी कर्म तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी ।
इन्ही कर्मों का लेखा जोखा बताता है कि आप सात्विक हैं , राजसी हैं या तामसी प्रवृत्ति के मनुष्य हैं ।
अध्याय १८ : मोक्ष सन्यास योग
अर्जुन पूछते हैं --हे माधव , सन्यास क्या है , त्याग क्या है , कृपया यह बताओ।
श्रीकृष्ण जी --हे अर्जुन मनुष्य को सत्कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए ।
यज्ञ , दान , तपस्या , स्नान आदि तन और मन की शुद्धि के लिए होते हैं । इन्हें बिना फल की वांछा किये करते रहना धर्म है । यही सात्विक त्याग कहलाता है ।
सब प्राणियों को एक समान समझ कर , किसी को दुःख न दे, यह सात्विक ज्ञान कहाता है ।
तेरा मेरा फर्क करना --राजसी ज्ञान कहाता है ।
बुरी दृष्टि , कष्ट देने वाला कर्म करना -तामसी ज्ञान कहाता है ।
इसी तरह कर्म , कर्म कर्ता , बुद्धि , सुख और द्रढ़ता भी तीन प्रकार के होते हैं -सात्विक , राजसी और तामसी ।
चार वर्णों के गुण इस प्रकार हैं ---
ब्राहमण : इन्द्रियों को जीतना , मन जीतना , ताप करना , भजन करना , पवित्र , क्षमा , कोमल स्वाभाव , परमेश्वर से लगाव ।
क्षत्रिय : शूरमा , दानी , इश्वर में श्रद्धा ।
वैश्य : खेती करना , वाणिज्य , व्यापार , गौवों की सेवा।
शूद्र : तीनों वर्णों की सेवा करना । जो प्राप्ति हो , उसी में संतुष्टि करना ।
अपने अपने धर्म का पालन करने से कल्याण होता है ।
इसलिए हे अर्जुन , युद्ध करना तेरा धर्म है ।
यह ज्ञान जो मैंने तुझको दिया है , श्रद्धालु भक्तों को ही सुनाना ।
जो मेरे एक श्लोक का भी पाठ करता है , मैं उसके निकट जा खड़ा होता हूँ । जो इसको सत्य मानकर ग्रहण करता है , वह मुक्त हो जाता है ।
अर्जुन ---हे श्रीकृष्ण जी , तुम्हारी कृपा से मेरा मोह भंग हो गया है । मैंने ज्ञान पाया है । बुद्धि निर्मल हुई है ।
मैं युद्ध करता हूँ ।
संजय कहता है --हे धृतराष्ट्र , जिस सेना में अर्जुन जैसा योद्धा और श्रीकृष्ण जैसे सारथि हैं , उन्ही पांडवों की जय होगी और तेरे अधर्म पुत्र हारेंगे --यह निश्चित है ।

