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Wednesday, September 8, 2010

ये है गीता का ज्ञान ---

बचपन से सुनते आये हैं कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है

ज्ञानी से ज्ञानी मिले , तो ज्ञान चौगुना हो
मूर्ख से मूर्ख भिड़े , तो खोंसडम खोंसडा हो ( लट्ठम लट्ठा )

इस जन्माष्टमी पर हमने भी कुछ ज्ञान अर्जित करने की सोची जिस समय लोग मंदिर में संगीत मंडली की मधुर धुनों पर थिरक रहे थे , हम ने सोचा क्यों ना गीता का ज्ञान प्राप्त किया जाये --विस्तृत रूप में

इसलिए पढना शुरू किया --श्रीमदभगवद गीता --पहले अध्याय से अठारहवें अध्याय तक
जो थोडा बहुत समझ में आया , वह संक्षिप्त में आपके सन्मुख प्रस्तुत है

अध्याय : विषाद योग

श्री व्यास जी ने धृतराष्ट्र के सारथी संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाने लगा संजय ने दोनों सेनाओं की तैयारी के बारे में बताया दोनों सेनाओं के योद्धाओं और उनके शस्त्रों के बारे में वर्णन सुनाया पांडवों की सेना सात यक्षिणी और कौवों की सेना ग्यारह यक्षिणी बताई

तद्पश्चात अर्जुन ने श्रीकृषण को अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहा वहां का नज़ारा देखकर अर्जुन को मोह उत्पन्न हुआ और उसने शास्त्र त्याग कर युद्ध करने का ऐलान किया

अध्याय :

अर्जुन कहते हैं --हे श्रीकृष्ण जी , यहाँ तो मैं सब अपने ही देख रहा हूँ इनको मार कर मैं कौन सा सुख प्राप्त करूँगा अपने गुरुजनों को मार कर मैं पाप करूँगा मुझे ऐसा राज्य नहीं चाहिए , जो अपने प्रियजनों को मार कर मिले
अर्जुन किसी भी तरह युद्ध के लिए तैयार नहीं होते

इस पर श्रीकृष्ण जी कहते हैं --हे अर्जुन , युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना पाप है , अधर्म है
मनुष्य का सिर्फ शरीर मरता है आत्मा तो अविनाशी है

अध्याय : कर्म योग

श्रीकृष्ण जी कहते हैं --देहधारी को इन्द्रियों से कर्म करना है लेकिन मन को इश्वर में लगाओ सत्कर्म करना मनुष्य का धर्म है काम और क्रोध मनुष्य के दुश्मन हैं

अध्याय : कर्म सन्यास योग

हे अर्जुन , जब जब धर्म की हानि होती है , तब तब मैं प्रकट होता हूँ मैं सर्वव्यापी सत्य रूप हूँ
जो लोग देवताओं की उपासना करते हैं , फल पाने की कामना लिए --वे फल पाते हैं वह फल भी मैं ही देता हूँ
लेकिन जो लोग सीधा मुझ में ध्यान लगाते हैं , बिना फल की कामना किये --उन्हें ज्ञान प्राप्त होता है
पंडित कौन होता है --जिसने सभी कर्म त्याग दिए मन को वश कर लिया सभी बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर ली
मुझ अविनाशी में मन का निश्छल चेता रख मुझ से जुड़ गया वह मोक्ष को प्राप्त होता है

अध्याय :सन्यास योग

मनुष्य के शरीर में इन्द्रियां होती हैं इन्द्रियां कर्म करती हैं लेकिन आत्मा अकर्ता है इन्द्रियों से सत्य कर्म करने से शांति प्राप्त होती है कामना के वश होने से आदमी बंधनों में बंधा रहता है

अध्याय : आत्म संयम

यह मन चलायमान हैसांसारिक बातों से अलगाव रख मन को इश्वर से जोड़े --यह योग कहलाता हैइस अध्याय में योगासन की विधि बताई गई है
योगी तीन प्रकार के होते हैं --तप योगी , ज्ञान योगी और कर्म योगी
श्रीकृष्ण जी कहते हैं --जो श्वास श्वास मेरा स्मरण करे , वह मुझे सबसे प्यारा हैवही ज्ञान योगी भी कहलाता है

अध्याय : प्रकृति भेद योग

इस अध्याय में माया यानि प्रकृति के अनेक रूपों के बारे में बताया गया है
जल, तेज , वायु, पृथ्वी , आकाश , मन , बुद्धि , अहंकार --ये सब मेरी माया हैं जो मनुष्य के भीतर भी हैं और बाहर भी
श्रीकृष्ण जी आगे कहते हैं कि मनुष्य तीन कारणों से मुझे स्मरण करते हैंरोगों से मुक्ति के लिए , ज्ञान प्राप्ति के लिए और कामना के लिए
जो लोग कामना के लिए देवताओं की पूजा करते हैं उन्हें कामना की प्राप्ति होती है
लेकिन जो लोग मेरा योग ध्यान करते हैं , वे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैंज्ञान योगी मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैं

अध्याय : अक्षक ब्रह्म योग

इस अध्याय में बताया गया है --- सृष्टि में चार युग हते हैं --सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग

सतयुग की अवधि --१७ लाख २८००० बर्ष है त्रेता युग -----------१२ लाख ९६००० वर्ष द्वापर युग ---------- लाख ६४००० वर्ष कलियुग ----------- लाख ३२००० वर्ष कुल अवधि --------४३ लाख २०००० वर्ष

ब्रह्मा का एक दिन इसका हज़ार गुना वर्षों का होता हैइसी तरह एक रात भी इतनी लम्बी ही होती है

अध्याय : राज विद्या योग

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अपने विराट रूप का वर्णन करते हैंहे अर्जुन , यह सारी सृष्टि मुझी से जन्मी है और मुझी में समा जाती है
जो लोग देवताओं को मानते हैं , वे देवलोक को जाते हैंफिर सुख भोगकर वापस संसार में जाते हैं
जो लोग मुझे मानते हैं , वे अविनाशी पद को जा प्राप्त होते हैंवे आवागमन से छूट जाते हैं
यहाँ श्रीकृष्ण जी उन्हें याद करने के लिए मन्त्र का जाप करने को कहते हैं --

नमो भगवते वासुदेवाय
नमो नारायण यह जाप भी कर सकते हैं

श्रीकृष्ण जी कहते हैं , जो मुझे स्मरण करता है , उसे मैं याद करता हूँजो मेरे एक भी श्लोक को पढता है , मैं उसके पास जा खड़ा होता हूँ
मेरा साथ ऐसे मिल जाता है , जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है

अध्याय १० :विभूति योग

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं --हे कुन्तीनन्दन मुझे अपने विराट रूप के बारे में और बताइए
श्रीकृष्ण जी बताते हैं --हे अर्जुन मैं सर्वव्यापी हूँ
मैं प्रकाश में सूर्य ,--- ४९ पवनों में भारी चिपवन , ---२८ नक्षत्रों में चन्द्रमा , ---चार वेदों में सामवेद , ---३३ करोड़ देवताओं में इंद्र , ---११रुद्र में शंकर रूद्र, -----पर्वतों में सुमेर पर्वत , ----सप्त ऋषियों में भ्रगु ऋषि , ---वचनों में ओंकार , ---वृक्षों में पीपल, ----ऋषियों में नारद , ----सिद्धों में कपिल मुनि, ---हाथियों में ऐरावत, ----नागों में शेषनाग , ----नदियों में गंगा , ----सप्त समुद्रों में क्षीर समुद्र , ----शस्त्रों में वज्र , ---और गौओं में कामधेनु मैं हूँ

अध्याय ११ : विश्व रूप दर्शन

इस अध्याय में श्रीकृष्ण जी अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैंक्योंकि इसे साधारण नेत्रों से नहीं देखा जा सकता , इसलिए वे अर्जुन को दिव्य नेत्र की दृष्टि देते हैं
अर्जुन को दिखाई देते हैं ---

अनंत मुख , ---अनंत सूर्यों का प्रकाश , ---हाथ में गदा , शंख और चक्र , ----अनंत भुजाएं, ---अनंत नेत्र , कोटि देवता मुख में प्रवेश कर रहे हैं , ---सारे योद्धा मूंह में समाये जा रहे हैं ----पूरा संसार समाया है

श्रीकृष्ण जी कहते हैं --हे अर्जुन ये सारे योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मरे हुए हैंतू तो निमित्त मात्र है
अर्जुन यह विराट रूप देखकर डर जाता है और कहता है --हे श्रीकृष्ण , मैं आपको नमस्कार करता हूँमैं आपसे क्षमा याचना करता हूँमैं तो आपके साथ जाने कैसी कैसी बात करता रहा हूँआपकी महिमा अपरम्पार हैआपका यह रूप देखकर मुझे डर लग रहा हैवापस उसी रूप में जाओ

श्रीकृष्ण कहते हैं --परम परमेश्वर का यह रूप किसी को नहीं दीखतातू मेरा सखा हैमुझे बहुत प्यारा हैइसलिए तुझे दिखाया हैतुम निडर होकर अपना कर्म करो --युद्ध करो

अध्याय १२ : मुक्ति योग

अर्जुन --हे श्रीकृष्ण , आपका कौन सा रूप सर्वश्रेष्ठ है , यह बताओ
श्रीकृष्ण --मेरे रूप हैं :
) कमल नयन रूप ---जो प्रकट रूप है --यही सर्वश्रेष्ठ है
) अक्षर अविनाशी----जिसकी महिमा मन वाणी पर नहीं सकती
) अनिर्देश ----------जिसे जिह्वा कह नहीं सकती
) अव्यक्त -----------जो नेत्रों से देखा ना जाये
) सर्वव्यापी ---------मन से जिसका प्रकाश चितव्या नहीं जाता
) अचिंत ------------कोई विकार नहीं
) अचल ------------घटता बढ़ता नहीं , स्थान से चलता नहीं
) ध्रुव ---------------किसी का हिलाया हिला नहीं

मेरा कमल नयन रूप सर्वश्रेष्ठ हैजो इसके उपासक हैं , मैं उनका उद्धार करता हूँ , मुक्ति दिलाता हूँ
मन का निश्छल चेता मेरे में रख और बुद्धि भी
मेरी महिमा का कहना सुनना , मेरे ध्यान साथ जुड़ना --ऐसे जो ज्ञानी मेरे भक्त हैं , उनके गुण सुन
किसी का बुरा करे , किसी से शत्रुता नहीं , सुख दुःख एक समान , सदा संतुष्ट , निडर , हर्ष शोक से रहित , चिंता वांछा रहित , जिसके लिए शत्रु -मित्र , सुख -दुःख , शीत -उशन , सब एक समान हैं , ऐसे भक्त मुझे प्यारे हैं

अध्याय १३ : क्षेत्र , ज्ञान , प्रकृति

यह शरीर क्षेत्र कहलाता है , जीव क्षेत्री और शरीर रुपी क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रय्ग
शरीर पांच तत्त्वों से बना है : पृथ्वी ---मांस , जल ---रुधिर , अग्नि ---जठराग्नि , पवन ---श्वास और आकाश ---पोलापन
शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं ---नेत्र , नासिका , श्रवण , त्वचा और जिह्वा

पांच कर्म इन्द्रियां होती हैं ---- हाथ , पाँव , गुदा , लिंग और नाक

प्रकृति माया हैमाया से तत्त्व उपजे हैंतत्त्व से शरीर बनता है शरीर में आत्मा वास करती है
जो इन्द्रियों का दुरूपयोग करे और आत्मा को ब्रह्म में लगाये , वह परम अविनाशी पद को प्राप्त होता है

अध्याय १४ : गुणत्रय विभाग

परम ज्ञान क्या होता है ? यह जान लेना कि यह सारा संसार मुझ से ही प्रकट होता है और मुझ में ही प्रलय होता है
हर एक प्राणी में तीन गुण होते हैं : सात्विक , राजसी और तामसी

सात्विक गुण : निर्मल पवित्र मन , अज्ञान रहित , निष्पाप
राजसी गुण : कुटुंब के साथ मोह , ममता , द्रव्य कमाने कि तृष्णातामसी गुण : आलस्य , अति निंद्रा , असावधानता

तीनों गुण एक ही व्यक्ति में घटते बढ़ते रहते हैं
जो लोग सात्विक गुणों के साथ देह त्याग करते हैं , वे देवलोक को जाते हैं
राजसी -पृथ्वी पर लौट आते हैंऔर तामसी --पाताल लोक में जाते हैं

जो वांछा रहित प्रभु की शरण में जाकर प्रभु का दास हो जाता है , वह तीनों गुणों से अतीत होकर जीवन मुक्त हो जाता है

अध्याय १५ : पुरुषोत्तम योग

संसार एक वृक्ष है , जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैंवेद पत्र हैंयह ब्रह्म लोक से पाताल लोक तक फैला हैसत्व , राज और तम इसके डाल हैंप्रभु की चैतन्यता से यह उपजता है
कुटुंब इसके रस्से हैं , जिनसे बंधा हैइस माया रुपी वृक्ष में यह जीव फंसा है

मोह माया को त्याग कर मेरी शरण में आने से मुक्ति प्राप्त होती है

अध्याय १६ : देव असुर सम्पदा योग

मनुष्य का स्वभाव देवता स्वरुप हो सकता है या असुर जैसा

देवता स्वभाव मनुष्य ---निर्मल हृदय , अहिंसावादी , सत्यवादी , क्रोध रहित , संतुष्ट , निर्लोभ , निश्चल , दयावान , धैर्य पूर्ण होता हैश्वास श्वास मेरा स्मरण करता है

असुर स्वभाव मनुष्य ---पाखंडी , अपवित्र , नास्तिक , अहंकारी , लोभी , भोगी , भ्रष्ट , क्रोधी और चिंता में लीन रहता है

क्रोध , लोभ , मोह ----ये तीन नरक के द्वार हैं

अध्याय १७ : त्रिविध योग

गीतानुसार मनुष्य की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है --सात्विक , राजसी और तामसी । आइये देखते हैं कैसे उत्तपन्न होती है यह प्रवृत्ति।

कर्म करने से ही मनुष्य की प्रवृत्ति का पता चलता है

गीतानुसार --पूजा करने की श्रद्धा , आहार , यज्ञ , तप और दान --मनुष्य की प्रवृत्ति दर्शाते हैं । ये सब तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी।

पूजा करने की श्रद्धा :

सात्विक : एक ही भगवान को सर्वव्यापी मान कर श्रद्धा रखते हैं ।
राजसी : देवी देवताओं की पूजा करते हैं ।
तामसी : शरीर को कष्ट देकर , भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।


आहार :

सात्विक : जिसके खाने से देवता अमर हो जाते हैं मनुष्य में बल पुरुषार्थ आये आरोग्यता , प्रीति उपजे दाल,चावल , कोमल फुल्के , घृत से चोपड़े हुए , नर्म आहार

राजसी : खट्टा , मीठा , सलुना , अति तत्ता , जिसे खाने से मुख जले , रोग उपजे , दुःख देवे

तामसी : बासी , बेस्वाद , दुर्गन्ध युक्त , किसी का झूठा भोजन

यज्ञ :

सात्विक : शास्त्र की विधि से , फल की कामना रहित , यह यज्ञ करना मुझे योग्य है , यह समझ कर किया गया यज्ञ सात्विक कहलाता है
राजसी : फल की वांछा करते हुए , भला कहाने को , दिखावा करने को किया गया यज्ञ
तामसी : बिना शास्त्र की विधि , बिना श्रद्धा के , अपवित्र मन से किया गया यज्ञ

दान :

सात्विक : बिना फल की आशा , उत्तम ब्राह्मण को विधिवत किया गया दान
राजसी : फल की वांछा करे , अयोग्य ब्राह्मण को दान करे
तामसी : आप भोजन प्राप्त कर दान करे , क्रोध या गाली देकर दान करे , मलेच्छ को दान करे

तप :

सात्विक : प्रीति से तपस्या करे , फल कुछ वांछे नहीं , इश्वर अविनाशी में समर्पण करे
राजसी : दिखावे के लिए , अपने भले के लिए तप करे , अपनी मानता करावे
तामसी : अज्ञान को लिए तप करे , शरीर को कष्ट पहुंचाए , किसी के बुरे के लिए तप करे


यहाँ तप चार प्रकार के बताये गए हैं --देह , मन , वचन और श्वास का तप।

देह का तप : किसी जीव को कष्ट पहुंचाए
स्नान कर शरीर को स्वच्छ रखे , दन्त मंजन करे
गुरु का सम्मान , मात पिता की सेवा करे
ब्रह्मचर्य का पालन करे

ब्रह्मचर्य : यदि गृहस्थ हो तो परायी स्त्री को छुए यदि साधु सन्यासी हो तो स्त्री को मन चितवे भी नहीं

मन का तप : प्रसन्नचित रहे मन को शुद्ध रखे भगवान में ध्यान लगावे

वचन का तप : सत्य बोलना मधुर वाणी --हाँ भाई जी , भक्त जी , प्रभु जी , मित्र जी आदि कह कर बुलावे
गायत्री पाठ करे अवतारों के चरित्र पढ़े

श्वास तप : भगवान को स्मरण करे भगवान के नाम का जाप करे


इस तरह मनुष्य के सभी कर्म तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी
इन्ही कर्मों का लेखा जोखा बताता है कि आप सात्विक हैं , राजसी हैं या तामसी प्रवृत्ति के मनुष्य हैं

अध्याय १८ : मोक्ष सन्यास योग

अर्जुन पूछते हैं --हे माधव , सन्यास क्या है , त्याग क्या है , कृपया यह बताओ

श्रीकृष्ण जी --हे अर्जुन मनुष्य को सत्कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए
यज्ञ , दान , तपस्या , स्नान आदि तन और मन की शुद्धि के लिए होते हैंइन्हें बिना फल की वांछा किये करते रहना धर्म हैयही सात्विक त्याग कहलाता है

सब प्राणियों को एक समान समझ कर , किसी को दुःख दे, यह सात्विक ज्ञान कहाता है
तेरा मेरा फर्क करना --राजसी ज्ञान कहाता है
बुरी दृष्टि , कष्ट देने वाला कर्म करना -तामसी ज्ञान कहाता है
इसी तरह कर्म , कर्म कर्ता , बुद्धि , सुख और द्रढ़ता भी तीन प्रकार के होते हैं -सात्विक , राजसी और तामसी

चार वर्णों के गुण इस प्रकार हैं ---
ब्राहमण : इन्द्रियों को जीतना , मन जीतना , ताप करना , भजन करना , पवित्र , क्षमा , कोमल स्वाभाव , परमेश्वर से लगाव
क्षत्रिय : शूरमा , दानी , इश्वर में श्रद्धा
वैश्य : खेती करना , वाणिज्य , व्यापार , गौवों की सेवा
शूद्र : तीनों वर्णों की सेवा करनाजो प्राप्ति हो , उसी में संतुष्टि करना

अपने अपने धर्म का पालन करने से कल्याण होता है

इसलिए हे अर्जुन , युद्ध करना तेरा धर्म है
यह ज्ञान जो मैंने तुझको दिया है , श्रद्धालु भक्तों को ही सुनाना
जो मेरे एक श्लोक का भी पाठ करता है , मैं उसके निकट जा खड़ा होता हूँजो इसको सत्य मानकर ग्रहण करता है , वह मुक्त हो जाता है

अर्जुन ---हे श्रीकृष्ण जी , तुम्हारी कृपा से मेरा मोह भंग हो गया हैमैंने ज्ञान पाया हैबुद्धि निर्मल हुई है
मैं युद्ध करता हूँ

संजय कहता है --हे धृतराष्ट्र , जिस सेना में अर्जुन जैसा योद्धा और श्रीकृष्ण जैसे सारथि हैं , उन्ही पांडवों की जय होगी और तेरे अधर्म पुत्र हारेंगे --यह निश्चित है