वर्तमान परिवेश में एक बात तो साफ नज़र आती है कि आजकल शराफ़त का ज़माना नहीं रहा । शरीफ होना तो एक गुनाह जैसा लगता है । और शरीफ दिखना भी कम हानिकारक नहीं ।
देखा जाए तो ये तो वही बात हुई कि जिसकी लाठी उसी की भैंस ।
मैं तो कभी कभी सोचता हूँ कि कैसा होता यदि हम भी थोड़े से खूंखार होते या दिखते ।
कोशिश तो बहुत की , मगर ऐनक ने ऐसा होने नहीं दिया ।सोचो कितना मज़ा आता यदि ऐसा होता :
खुशदीप जैसा कद होता
शेरसिंह जैसी मूंछें ।
पाबला जी सा वजनी होता
महफूज़ जैसी बाहें । (डोले)
समीर लाल सा वर्ण होता
और आँखों पर चश्मा काला ।
गोदियाल जी से तेवर होते
फिर पंगा कौन लेता साला ।
या फिर होता पतला दुबला
ब्रूस ली सा फुर्तीला ।
बन्दर जैसा पोज़ बनाकर
हा हु करता , नक्षा सबका ढीला ।
हे प्रभु ,अब अगले जन्म भले ही
मुखौटा शराफत का पहना देना ।
पर कुछ ना बना पाओ तो हमें
रैड बीकन वाला नेता बना देना ।
नोट : कृपया दिमाग पर जोर मत डालियेगा । बस मस्त रहिये ।


