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Tuesday, May 24, 2011

मुन्घेरीलाल का हसीन सपना ---ब्लोगर्स कॉकटेल ---

वर्तमान परिवेश में एक बात तो साफ नज़र आती है कि आजकल शराफ़त का ज़माना नहीं रहा शरीफ होना तो एक गुनाह जैसा लगता है और शरीफ दिखना भी कम हानिकारक नहीं

सड़क पर यातयत में हों , या मार्केट में , गाड़ी पार्क करनी हो या कहीं लाइन में खड़ा होना पड़े --यदि आप शराफ़त के पुतले दिखते हैं तो समझ जाइये कि आप की दाल गलने वाली नहीं । यदि आप सही भी हों तो दूसरे आपको गलत साबित करके ही मानेंगे ।

देखा जाए तो ये तो वही बात हुई कि जिसकी लाठी उसी की भैंस

मैं तो कभी कभी सोचता हूँ कि कैसा होता यदि हम भी थोड़े से खूंखार होते या दिखते ।

कोशिश तो बहुत की , मगर ऐनक ने ऐसा होने नहीं दिया

सोचो कितना मज़ा आता यदि ऐसा होता :


खुशदीप जैसा कद होता

शेरसिंह जैसी मूंछें ।


पाबला जी सा वजनी होता

महफूज़ जैसी बाहें । (डोले)


समीर लाल सा वर्ण होता

और आँखों पर चश्मा काला ।


गोदियाल जी से तेवर होते

फिर पंगा कौन लेता साला ।


या फिर होता पतला दुबला

ब्रूस ली सा फुर्तीला ।


बन्दर जैसा पोज़ बनाकर

हा हु करता , नक्षा सबका ढीला ।


हे प्रभु ,अब अगले जन्म भले ही

मुखौटा शराफत का पहना देना ।


पर कुछ ना बना पाओ तो हमें

रैड बीकन वाला नेता बना देना


नोट : कृपया दिमाग पर जोर मत डालियेगाबस मस्त रहिये