देश की १२२ करोड़ जनता में से करीब पौने दो करोड़ लोग दिल्ली में रहते हैं । हम जैसे हर औसत दर्जे के व्यक्ति की कम से कम १२२ लोगों से तो दोस्ती होती ही होगी । फिर रिश्तेदार , कार्यस्थल पर सहकर्मी और तत्कालिक सहयोगी भी मिलकर १२२ और हो जाते होंगे । इन सब को मिलाकर हर वर्ष शादियों के सीजन में १०-१२ परिवारों में शादी अवश्य होती होगी । यानि हर सर्दियों में कम से कम १०-१२ शादियों के निमंत्रण ।
गुजरे ज़माने में हरियाणा में शादियाँ गर्मियों में ही होती थी । इसकी वज़ह रही होगी -- अप्रैल तक रबी की फसल तैयार होकर आमदन का होना । एक बार पैसा हाथ में आ जाए तो किसान को तीन ही काम सूझते थे --एक लड़की की शादी करना --दूसरा घर बनाना --और तीसरा लड़ाई झगडा कर कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना ।
लेकिन शादियों के लिए तपतपाती गर्मी में मई जून के महीने ही होते थे ।
पहले सगाई , फिर लगन और आखिर में शादी का दिन --यानि दावत का दिन । सारे गाँव को न्यौता दिया जाता । आस पड़ोस और करीबी घरों में चूल्हा न्यौत ( घर के सब सदस्य) निमंत्रण दिया जाता ।
लड़के की शादी में एक दिन पहले दावत का इंतजाम होता । दावत में लड्डू , साथ में पूरी और सीताफल की सब्जी होती । घर के दालान में सफाई कर , फर्श पर टाट बिछाकर पंगत लगाई जाती । ठीक वैसे जैसे गुरूद्वारे में पंगत में बैठकर खाना खाते हैं । लोगों में लड्डू खाने की होड़ लगी होती ।
लड़की की शादी में खाने में मिठाइयों में लड्डुओं के साथ जलेबी भी बनाई जाती । जिसका काम थोडा अच्छा होता वह सात तरह की मिठाइयाँ बनवाता जिसे तस्तरी कहा जाता था । रंग बिरंगी मिठाइयाँ बड़े चाव से खाई जाती ।
कुल मिलाकर गाँव में शादियाँ पूरे गाँववासियों के लिए एक जश्न का माहौल पैदा कर देती थी ।
धीरे धीरे गाँव में शहर का असर आने लगा । फिर वहां भी टेबल पर बफ़े सजाकर खड़े होकर खाने की रिवाज़ शुरू हो गई जिसे आरम्भ में बड़े बूढों ने बहुत बिसराया । लेकिन अंतत : वक्त के आगे सभी को झुकना पड़ा ।
अब शादियों के मामले में शहर और गाँव में कोई फर्क नहीं रह गया ।
इधर शहर में भी अब शादियों का स्वरुप बहुत बदल गया है ।
अब लगभग सभी लोग विद फैमिली निमंत्रण देते हैं । लेकीन बहुत कम लोग निमंत्रण देने के लिए घर पर आते हैं । या तो कार्ड ऑफिस में पकड़ा दिया जाता है या फिर कुरियर से घर भेज दिया जाता है ।
उस पर अक्सर दिल्ली की शादियाँ किसी पेज थ्री पार्टी से कम नहीं होती जहाँ मौजूद होना भी एक स्टेटस सिम्बल माना जाता है ।
लेकीन सबसे ज्यादा असमंजस्य की स्थित तब आती है जब कार्ड तो मिल जाता है लेकिन बुलाने वाला न खुद कार्ड देने आता है , न फोन करता है । बस कार्ड भिजवाकर अपने घर में शादी की सूचना दे देता है ।
ऐसे में अब सवाल यह पैदा होता है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए ।
क्या उस शादी में जाना चाहिए जिसमे आपको बस कार्ड भिजवा दिया गया है ?
या ऐसी शादी में नहीं जाना चाहिए ?
इस बारे में आपके क्या विचार हैं , कृपया अवश्य बताईयेगा ।
Showing posts with label शादियाँ . निमंत्रण. Show all posts
Showing posts with label शादियाँ . निमंत्रण. Show all posts
Monday, January 23, 2012
Subscribe to:
Posts (Atom)

