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Thursday, July 22, 2010

विकास --कितने पास , कितने दूर -----

बेशक आज हम प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं । तभी तो जो एक्सप्रेस हाइवेज , मॉल्स , एस्केलेटर्स , ऑटो मोबाइल्स और आधुनिक उपकरण आदि हम अंग्रेजी फिल्मों में ही देखते थे या किसी अप्रवासी भारतीय मित्र के स्वदेश आने पर उनकी कहानियों में ही सुनते थे , वही आज यहाँ भी आम बात हो गए हैं ।

अब ज़रा इसे देखिये --


ये है एक विकसित देश का हाइवे शहर की ओर जाता हुआ ।

और यह रहा दिल्ली से गुडगाँव जाता हुआ एक्सप्रेस हाइवे नंबर ८ ।

ज्यादा फर्क नहीं है । सच पूछिए तो यहाँ ड्राइव करते समय गर्व की अनुभूति होती है ।



यह जगमगाता मॉल --विकसित देश का ।


और यह रहा दिल्ली का एक मॉल । अंदर की जगमगाहट यहाँ भी कम नहीं है ।


लेकिन सारी समानताएं बस यहीं ख़त्म हो जाती हैं ।
क्योंकि भले ही यहाँ भी सब भौतिक सुख सुविधाएँ उपलब्ध हों , लेकिन अभी भी हमारा रहन सहन , रख रखाव , साफ़ सफाई क्या एक विकसित देश का मुकाबला कर सकती है ? अब ज़रा इसे देखिये --


ये है वहां के एक पोश इलाके का आवासीय क्षेत्र ।



और यह रहा दिल्ली का एक पोश रिहायसी क्षेत्र , जहाँ हम रहते हैं ।

दोनों जगह मकानों की कीमत लगभग एक जैसी है ।

वहां गाड़ी पार्क करना भी एक कला है । क्या मजाल कि पीले रंग की रेखा को पार कर जाएँ ।

यहाँ पार्किंग को लेकर सर फूटने तक की नौबत आ जाती है ।


वहां के डाउन टाउन के चौराहे का एक दृश्य। सामने लाल हाथ की बत्ती --पैदल लोगों को रुकने का इशारा । सब शांति से खड़े होकर बत्ती हरी होने का इंतजार कर रहे हैं । दायें हाथ को ट्रैफिक की बत्ती लाल है । इसलिए गाड़ियाँ रुकी हैं । पैदल यात्री पार कर रहे हैं । सब कुछ शांति से हो रहा है ।



यहाँ का एक चौराहा जहाँ प्रतिदिन लाखों पैदल यात्री सड़क पार करते हैं । ट्रैफिक के लिए बत्ती हरी है । लेकिन पैदल यात्री बीच सड़क पर चले जा रहे हैं ।


क्या इसे विकास कहेंगे ?


जिम्मेदार कौन ?

हमारी कानून या सामाजिक व्यवस्था ?
या फिर हमारी अनुशासनहीन मानसिकता ?

वज़ह कुछ भी हो , जब तक यह सब नहीं बदलेगा, हम विकासशील ही बने रहेंगे। कभी विकसित देश नहीं कहलायेंगे ।