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Tuesday, September 20, 2011

ये मन ये पागल मन मेरा ---

ब्लॉगर्स मीट वीकली में प्रेरणा अर्गल जी की चर्चा में मिले इस लिंक से निम्न पंक्तियाँ ली गई हैं :

आज आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि आदमी को अच्छा इंसान बनना चाहिए और उसे अच्छे काम करने चाहिएं लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि इंसान बनने के लिए कौन कौन से अच्छे काम करने ज़रूरी हैं ?
तो वह बता नहीं पाएगा।
यही हाल खान-पान , यौन संबंध और अंतिम संस्कार का है।
- डा. अनवर जमाल

पिछली पोस्ट पर पिट्सबर्ग वाले श्री अनुराग शर्मा की टिपण्णी पढ़कर यही लगा कि ब्लोगिंग में कितनी ताकत है . अनुराग जी ने मेरी एक साल पहले गीता ज्ञान पर लिखी पोस्ट पढ़ी और पसंद की . इस बहाने हम भी एक बार फिर स्वयं के ब्लॉग पर पुरानी पोस्ट पर गए और दोबारा सारी पोस्ट पढ़ी . सचमुच कितना ज्ञान भरा है गीता में .

कहते हैं , मनुष्य यदि इन्सान भी बन जाये तो यह एक उपलब्धि है .
गीता के सतरहवें अध्याय में जो बातें कही गई हैं , वह इन्सान को भी देवता बना सकती हैं , यदि आप इनका पालन करने लगें तो . यह अध्याय मेरा भी मनपसंद अध्याय है .

लीजिये आप भी एक बार फिर पढ़िए . वैसे भी ऐसी बातों को बार बार पढने /दोहराने की ज़रुरत होती है .


अध्याय १७ : त्रिविध योग

गीतानुसार मनुष्य की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है --सात्विक , राजसी और तामसी । आइये देखते हैं कैसे उत्तपन्न होती है यह प्रवृत्ति।

कर्म करने से ही मनुष्य की प्रवृत्ति का पता चलता है ।

गीतानुसार --पूजा करने की श्रद्धा , आहार , यज्ञ , तप और दान --मनुष्य की प्रवृत्ति दर्शाते हैं । ये सब तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी।

पूजा करने की श्रद्धा :

सात्विक : एक ही भगवान को सर्वव्यापी मान कर श्रद्धा रखते हैं ।
राजसी : देवी देवताओं की पूजा करते हैं ।
तामसी : शरीर को कष्ट देकर , भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।


आहार :

सात्विक : जिसके खाने से देवता अमर हो जाते हैं । मनुष्य में बल पुरुषार्थ आये । आरोग्यता , प्रीति उपजे । दाल,चावल , कोमल फुल्के , घृत से चोपड़े हुए , नर्म आहार

राजसी : खट्टा , मीठा , सलुना , अति तत्ता , जिसे खाने से मुख जले ,रोग उपजे , दुःख देवे ।

तामसी
: बासी , बेस्वाद , दुर्गन्ध युक्त , किसी का
जूठा भोजन .

यज्ञ :

सात्विक
: शास्त्र की विधि से , फल की कामना रहित , यह यज्ञ करना मुझे योग्य है , यह समझ कर किया गया यज्ञ सात्विक कहलाता है ।

राजसी
: फल की वांछा करते हुए , भला कहाने को , दिखावा करने को किया गया यज्ञ ।

तामसी
: बिना शास्त्र की विधि , बिना श्रद्धा के , अपवित्र मन से किया गया यज्ञ ।

दान :

सात्विक : बिना फल की आशा , उत्तम ब्राह्मण को विधिवत किया गया दान ।

राजसी : फल की वांछा करे , अयोग्य ब्राह्मण को दान करे ।

तामसी : आप भोजन प्राप्त कर दान करे , क्रोध या गाली देकर दान करे ,मलेच्छ को दान करे ।

तप :

सात्विक : प्रीति से तपस्या करे , फल कुछ वांछे नहीं , इश्वर अविनाशी में समर्पण करे ।

राजसी
: दिखावे के लिए , अपने भले के लिए तप करे , अपनी मानता करावे ।

तामसी
: अज्ञान को लिए तप करे , शरीर को कष्ट पहुंचाए , किसी के बुरे के लिए तप करे ।


यहाँ तप चार प्रकार के बताये गए हैं --देह , मन , वचन और श्वास का तप।

देह का तप : किसी जीव को कष्ट न पहुंचाए ।
स्नान कर शरीर को स्वच्छ रखे , दन्त मंजन करे ।
गुरु का सम्मान , मात पिता की सेवा करे ।
ब्रह्मचर्य का पालन करे ।

ब्रह्मचर्य : यदि गृहस्थ हो तो परायी स्त्री को न छुए । यदि साधु सन्यासी होतो स्त्री को मन चितवे भी नहीं ।

मन का तप : प्रसन्नचित रहे । मन को शुद्ध रखे । भगवान में ध्यान लगावे।

वचन का तप : सत्य बोलना । मधुर वाणी --हाँ भाई जी , भक्त जी , प्रभुजी , मित्र जी आदि कह कर बुलावे ।
गायत्री पाठ करे । अवतारों के चरित्र पढ़े ।

श्वास तप : भगवान को स्मरण करे । भगवान के नाम का जाप करे ।


इस तरह मनुष्य के सभी कर्म तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी ।
इन्ही कर्मों का लेखा जोखा बताता है कि आप सात्विक हैं , राजसी हैं या तामसी प्रवृत्ति के मनुष्य हैं ।

यह
मन बड़ा चलायमान होता है । बार बार तामसी प्रवृति की ओर जाने के लिए बेचैन रहता है । इसे काबू में रखने की कोशिश करते रहना चाहिए
।



नोट :
ईश्वर और अल्लाह , पूजा और इबादत , गीता और कुरान --ये नाम भले ही अलग हों , लेकिन इनका अर्थ एक ही है . ये रास्ता दिखाते हैं मनुष्य को इन्सान बनने का .



Thursday, September 30, 2010

तन सुन्दर हो तो मन भी सुन्दर होना चाहिए ---

पिछली पोस्ट में मैंने राष्ट्र मंडल खेलों से सम्बंधित दिल्ली में हुए विकास पर सचित्र लेख लिखा था । इस पर बहुत से मित्रों ने अपने विचार प्रकट किये । अधिकांश मित्रों को इस बारे में जानकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई । कुछ मित्र ब्लोगर्स ने खेलों के आयोजन में हुई कुव्यवस्था और व्याप्त भ्रष्टाचार पर आक्रोश व्यक्त किया , जो वर्तमान परिवेश में स्वाभाविक लगता है। विकास कार्यों को लेकर स्थायित्त्व की भी शंका देखी गई ।


कहते हैं --तन की खूबसूरती के साथ मन की खूबसूरती भी हो तो क्या कहने । जहाँ तन की सुन्दरता क्षणिक होती है , वहीँ मन की सुन्दरता स्थायी होती है । मन सुन्दर होता है चरित्र से । और चरित्र निर्माण मनुष्य के व्यक्तित्त्व पर निर्भर करता है ।



दिल्ली की सुन्दरता पर भी यही लागु होता है । आज बाहर से भले ही दिल्ली की खूबसूरती बढ़ गई हो , लेकिन जब तक दिल्ली वालों का चरित्र निर्माण नहीं होगा , तब तक सारी सुन्दरता खोखली ही नज़र आएगी ।


यह कैसे संभव होगा ?


अदा जी की एक पोस्ट में पढ़ा था --किसी भी देश या शहर का चरित्र उसके यातायात से पता चलता है । यहाँ भी सड़कों पर हमारा व्यवहार दर्शाता है कि हम कितने विकसित हुए हैं ।

हम पूर्ण रूप से विकसित तभी माने जायेंगे जब हम :

* रास्ते चलते सड़कों पर थूकना छोड़ देंगे । यह हमारी आदत भी है और मजबूरी भी । मजबूरी इसलिए कि एक तो हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ आम तौर पर प्रदूषण ज्यादा है । उसपर हमारा बीडी सिगरेट पीने का शौक । अब थूक तो आएगा ही । तो क्यों न धूम्रपान ही त्याग दें ।

* पान की पीक मारना छोड़ देंगे । शायद सबसे ज्यादा पान चबाने वाले यहीं मिलेंगे । इसीलिए सारी सरकारी इमारतों और सार्वजानिक स्थानों पर पान के धब्बे और रंग अलग ही नज़र आते हैं । क्यों न पान , सुपारी , गुटखा आदि चबाना छोड़ दिया जाए ।

* कहीं भी मूत्र वित्सर्जन करना छोड़ देंगे । इस काम में तो हमारी मास्टरी है । भले ही इस सुविधा का लाभ सिर्फ पुरुष ही उठाते हैं । लेकिन देश में पुरुष भी तो महिलाओं से कहीं ज्यादा हैं ।
दिल्ली सरकार ने जगह जगह आधुनिक किस्म के टॉयलेट्स बनाये हैं । इनका इस्तेमाल किया जाए तो कैसा रहे ।

* सड़कों पर कूड़ा करकट नहीं डालेंगे । आजकल बड़ों से बच्चे ज्यादा सचेत हैं ।

* सड़क पार करने के लिए जेब्रा क्रॉसिंग का इस्तेमाल करेंगे । अभी तो हम रेलिंग फांदकर या तोड़कर रास्ता बना लेने में अपनी शान समझते हैं ।

* सड़कों पर बने फुट ओवरब्रिज या अंडर पास का इस्तेमाल करेंगे । डरिये नहीं --ये नहीं गिरेंगे ।

* बिना बात होर्न बजाना छोड़ देंगे । यह आदत भी यहाँ बहुतायत में पाई जाती है ।

* यातायात के नियमों का पालन करेंगे ।

अब यह तभी संभव है जब सारे भारत के लोग मिलकर प्रयास करें । क्योंकि दिल्ली में दिल्ली के मूल निवासी तो मुश्किल से १०-२० % ही हैं । बाकि सब तो अन्य राज्यों से विस्थापित या काम की तलाश में आये भारतवासी हैं ।

और अंत में सबसे प्रमुख बात ---आज अयोध्या मामले पर कुछ भी फैसला आए , हम अमन और भाईचारा बनाए रखेंगे ।

यदि सभी मिलकर प्रयास करें , तभी हम दिल्ली वाले विदेशियों और विदेश में रहने वाले भारतियों का दिल जीत सकते हैं ।