बड़े से मॉल की आंखों में चुभ रही है जो,
गली के मोड़ पे इक छोटी दुकान अभी बाकी है।
हर शख़्स इस शहर में नज़र आता है ग़मगीन,
शुक्र है कुछ चेहरों पर मुस्कान अभी बाकी है।
पोथी पढ़ पढ़ कर इल्म तो बहुत कर लिया हासिल,
पर असल जिंदगी का इम्तिहान अभी बाकी है।
जिसे भी देखो वही दिखाई देता है यहां नेता,
तसल्ली है कुछ लोगों में ईमान अभी बाकी है।
रिश्वतखोरी के दलदल में भी रहते पाक साफ,
वो खुद्दार जिनमें आत्मसम्मान अभी बाकी है।
हैरान ना हो देखकर मुर्दों की मुर्दानगी,
शहर के कुछ मर्दों में जान अभी बाकी है।
वक्त ने कुछ तो भर दिए जो दिए थे जालिमों ने,
उन बेदर्द जख्मों के कुछ निशान अभी बाकी हैं।
रुकसत हुआ वो शख्स जो महीनों से पड़ा था बीमार,
फुटपाथ पर उसका बस कुछ सामान अभी बाकी है।
मत सोचो गुजर गया जल जमी से वो जलजला,
हार्मोज के सागर में उफनता तूफान अभी बाकी है।
बिसराने वाले तो बहुत मिल जाएंगे डॉ दराल,
तू लिखता चल तेरी लेखनी के कद्रदान अभी बाकी हैं।


बहुत अच्छी ग़ज़ल है। हर शेर आज के समाज की सच्चाई को बहुत सरल और असरदार तरीके से कहता है। छोटी दुकानों का संघर्ष, लोगों की उदासी, ईमानदार लोगों की मौजूदगी और आत्मसम्मान की बात दिल को छू जाती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!
शुक्रिया। देखते हैं।
Delete