Sunday, October 27, 2013

कॉरपॉरेट कल्चर ने परिवारों को अकेला बना दिया है --


बच्चों को खिला पिला कर,
पोंछती जब माथे का पसीना ! 
एक चमक होती चेहरे पर,
आत्मसंतुष्टि से भर जाता सीना !
रात मे खाना खाते समय वो 
अब सोचा करती है ख्यालों मे कहीं, 
क्या खाया होगा आज बच्चों ने ! 
जाने खाया भी होगा या नहीं !!
लाल के गाल थे कम लाल,
कुछ पतला भी हो गया था ,
जब घर आया था पिछले साल ! 
बिटीया भी अब कहाँ चहकती है , 
भूल सी गई है खिलखिलाना !
सोने लगते हैं जब हम यहाँ ,
तब होता है उसका घर आना !   
ना अम्मा है वहां ना दादी ,
अकेलेपन के हो गए हैं आदी !
महेनों तक बच्चे, अब घर नहीं आते,  
ये मुए कॉरपॉरेट दफ़्तर वाले  
काम कुछ कम क्यों नहीं कराते ! 
क्या ज़माना आ गया है ,
मात पिता की दी हुई शिक्षा ने ही 
बच्चों को मात पिता से दूर करा दिया है !


Friday, October 18, 2013

सुपात्र को दिया गया दान ही सात्विक और सार्थक दान होता है --


आज से २५ -३० वर्ष पूर्व जब हमने गृहस्थ जीवन मे प्रवेश किया तब इंपोर्टेड इलेक्ट्रॉनिक संयंत्रों की बहुत मांग होती थी. क्योंकि तब आर्थिक उदारीकरण लागू नहीं था, इसलिये अधिकतर सामान बाहर से मंगाया जाता था जो अवैधानिक तौर पर ज्यादा होता था. इसीलिये जगह् जगह इंपोर्टेड सामान बेचने की ग्रे मार्केट्स खुली थी जिनमे सारा सामान महंगे सस्ते दाम पर मोल भाव कर खरीदा बेचा जाता था. लेकिन हम जैसे कानून के दायरे मे रहने वालों के लिये सस्ता और इंपोर्टेड सामान खरीदने का एक और तरीका भी था . वह था , एम्बेसी सेल्स का . अक्सर जब कोई विदेशी राजनयिक स्थानांतरित होकर देश छोड़कर जाता तो वह अपने घर के सारे सामान की सेल लगाकर सस्ते दाम पर बेच जाता . हालांकि हमने भी कई बार इन सेल्स के चक्कर लगाये लेकिन खरीद कभी नहीं पाये क्योंकि इस्तेमाल किया हुआ पुराना सामान खरीदने का मन ही नहीं किया . फिर आहिस्ता आहिस्ता घर गृहस्थी का सारा सामान जुटा लिया. इस बीच सरकार की आर्थिक नीतियाँ भी बदली और देश मे ही सभी तरह का सामान मिलने लगा . अब हालात ऐसे हैं कि पुराना सामान आप बेचना भी चाहें तो कोई खरीदार नहीं मिलता क्योंकि अब मध्यम वर्गीय समाज की सामर्थ्य भी नया सामान खरीदने की हो गई है .  

लेकिन एक समाज ऐसा भी है जिन्हे आज भी पुराने सामान की कद्र होती है क्योंकि न उनकी इतनी सामर्थ्य होती है कि वे नया सामान खरीद सकें , न ही उन्हे आवश्यकता होती है . हमे घरेलू सेवाएं प्रदान करने वाले ये निम्नवर्गीय लोग जैसे काम वाली बाई , सुरक्षा कर्मचारी तथा सफाई कर्मचारी आदि लोग पुराने सामान को भी पाकर स्वयं को धन्य समझते हैं. ऐसे मे भाग्यशाली धनाढ्य लोगों का फ़र्ज़ है कि वे अपने पुराने सामान को फेंकने के बजाय इन गरीबों को ही दान कर दें ताकि उनके बच्चे भी इन आधुनिक संयत्रों का आनंद ले सकें . 

हमारी काम वाली भले ही छोटे से किराये के मकान मे रहती हो , लेकिन उसके ठाठ बाठ देख कर उसके गावं वाले बड़े प्रभावित होते हैं . उसका कहना है कि उसके गांव मे उसकी इज़्ज़त और रुतबा एक सेठानी जैसा है . हमे भी लगता है कि कहीं उसके घर पर इनकम टैक्स वालों की रेड ही न पड़ जाये ! क्योंकि घर मे २९ इंच का रंगीन टी वी , १००० वॉट का थ्री इन वन म्यूजिक सिस्टम , और कम्प्यूटर समेट सुख सुविधाओं का सारा साजो सामान मौजूद है . यह अलग बात है कि यह अधिकांश सामान हमारा ही दिया हुआ है.  

हमे भी लगता है कि पुराने समान का जब कोई खरीदार ही नहीं तो क्यों ना ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाये जिसके लिये वह भी एक उपलब्धि सी हो. आखिर दान करना भी एक पुण्य का काम है . लेकिन सही मायने मे दान तभी सार्थक होता है जब वह सुपात्र को किया जाये .
गीता अनुसार दान भी तीन प्रकार के होते हैं -- सात्विक , राजसी और तामसी . 

सात्विक दान : जो दान उत्तम ब्राह्मण को किया जाये , जिसे संसारी कामना की इच्छा न हो, स्वयं बिना इच्छा के किया जाये, वह सात्विक दान कहलाता है .  
राजसी दान : किसी इच्छा की कामना करते हुए किया गया दान जिसमे दान के बदले उपकार की अपेक्षा हो, वह राजसी दान कहलाता है . 
तामसी दान : क्रोध और गाली देकर कुपात्र को दिया गया दान तामसी होता है . 

वर्तमान परिवेश मे अधिकांश लोग राजसी प्रवृति के तहत इच्छा पूर्ति के लिये दान करते हैं. अक्सर लोग मंदिरों मे दान बाद मे करते हैं , मन्नत पहले मांग लेते हैं . यानि यह दान सशर्त होता है . यह अज्ञानता की निशानी है . इसी तरह कई बार देखा जाता है कि दान किया गया धन न तो ज़रूरतमंद के पास पहुंच पाता है और ना ही उसका सही उपयोग हो पाता है . ऐसा दान वास्तव मे धन को नष्ट करना है .  

सभी मध्यम वर्गीय परिवारों के घरों मे अनेक सामान ऐसे होते हैं जो वर्षों से या तो पेकेट मे बंद पड़े होते हैं या जिन्हे सालों तक इस्तेमाल कर दिल भर जाता है. विशेषकर पुराने सामान को अब कोई नहीं खरीदता. ऐसे सामान को यदि किसी गरीब और ज़रूरतमंद को दान कर दिया जाये तो निश्चित ही पाने वाले को अपार खुशी का अहसास होगा। और यही सार्थक दान होगा. 
      
नोट : त्यौहारों के इस मौसम मे अपना घर साफ करके भी आप दूसरों के घर रौशन कर सकते हैं ! 
         

Monday, October 14, 2013

मोटरसाइकल चलाते समय सर के बालों से ज्यादा सर की सुरक्षा आवश्यक है --


चौराहे पर जैसे ही बत्ती लाल हुई और गाडी स्टॉप लाइन से पहले रुकी, तभी एक छोटी बच्ची ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर खडी होकर तमाशा दिखाने लगी. पतली दुबली मैली कुचैली , उम्र यही कोई ६ वर्ष रही होगी , हालांकि कुपोषित बच्चों मे सही आयु का पता लगाना लगभग असंभव सा होता है. बच्ची कलाबाज़िया खाती हुई सड़क पर उछल कूद मचा रही थी। अब तक उसके आस पास कई मोटरसाइकल आकर रुक गई थी.
एक दो मिनट नटबाज़ी दिखा कर फिर उसने हाथ फैलाने शुरू कर दिये. इस बीच एक और बच्ची जो मुश्किल से दो साल की रही होगी , भीख मांगने का काम शुरू कर चुकी थी. वह सर उठाये और एक हाथ फैलाये एक मोटरसाइकल सवार के आगे खडी थी. कुछ पल उसे निहारने के बाद युवक ने ज़ेब से निकाल कर एक सिक्का बच्ची के हाथ मे रख दिया. सिक्का हाथ मे आते ही बच्ची ने सर झुका कर हाथ मे रखे सिक्के को देखा और उसके चेहरे पर अनायास ही एक मासूम सी संतुष्ट मुस्कान फै़ल गई. ज़ाहिर था , दो साल की मासूम बच्ची भी पैसे की ताकत को पहचानती थी. 

वह मोटरसाइकल सवार युवक अब एक हाथ मे मोबाइल पकड कर उसे दर्पण की तरह प्रयोग करते हुए मोबाइल के स्क्रीन मे अपना चेहरा देख रहा था. उसने हैलमेट को उतार कर हेंडल पर टांग दिया था और दूसरे हाथ से बालों को संवार रहा था. वह एक हाथ से एक कुशल कारीगर की तरह अपने बालों को ऐसे सेट कर रहा था जैसे कोई मूंगफली बेचने वाला मूंगफलियों को आग की हांडी के चारों ओर सजाता है. पूर्ण रूप से संतुष्ट होने के बाद उसने जेब से एक रुमाल निकाला और एक मंजे हुए जादूगर की तरह उसकी तह खोली. हमने सोचा शायद मोबाइल के स्क्रीन को साफ करना चाहता है. लेकिन उसने बड़ी सफाई से रुमाल को सर पर बिछाया और इतमिनान से सर के पीछे गांठ लगाई. फिर हैलमेट उठाकर सर पर रख लिया. लेकिन हैलमेट को बांधने के लिये कोई प्रायोजन नहीं था. यह देख कर हम तो सकते मे आ गए। क्योंकि युवक ने हैलमेट सर पर रख कर अपने माल की रक्षा का प्रबन्ध तो कर लिया था , लेकिन जान की सुरक्षा के बारे मे उसने सोचा ही नहीं. ज़ाहिर था, उसे सर से ज्यादा सर के बालों की चिन्ता थी. इस बीच बत्ती हरी हो गई और वह युवक फर्राटे से हवा से बातें करने लगा. हम तो बस उसकी सलामती की दुआ करते हुए आगे बढ गए.        

नोट : दो पहिये वाहन चालकों को हैलमेट पहन कर ड्राइव करना चाहिये. लेकिन हैलमेट को मजबूती से बांधना भी आवश्यक है. किसी भी दुर्घटना के समय यह जीवन रक्षक साबित हो सकता है.   

Sunday, October 6, 2013

छत पर भूल भुलैया , गाइड संग जाना भाभी भैया --


लखनऊ यात्रा के दौरान कुछ घंटों का समय था , इसलिये शहर घूमने के लिये निकल पड़े. देखने के लिये एक ही एतिहासिक जगह थी -- बड़ा इमामबाड़ा. शहर के पुराने क्षेत्र मे इस शानदार कृति को लखनऊ के नवाब असफ़ उद् दौला ने अठारहवीं सदी मे बनवाया था.  





१८ मीटर ऊंचे रूमी दरवाज़े से होकर जब आप अंदर आते हैं तो यह नज़ारा दिखाई देता है.   


 हरे भरे लॉन के चारों ओर रास्ता बना है.  




दायीं ओर एक मस्जिद है.  




इसे आसफ़ी मस्जिद कहते हैं.  



मुख्य इमामबाड़ा मे एक करीब ५० मीटर लम्बा हॉल बना है जिसकी खूबसूरती यह है कि इसमे एक भी बीम का सहारा नहीं लिया गया है. इस हॉल मे आसफा उद् दोला का मक़बरा बना है और साथ ही इसके आर्किटेक्ट की कब्र भी. कहते हैं इसे नवाब साहब ने उस समय बनवाया था जब वहां अकाल पड़ा हुआ था. इसे बनवा कर उन्होने लोगों को काम दिया जिससे गुजर बसर हो सके. इस हॉल के चारों ओर अनेक चेम्बर बने हैं जिनमे विभिन्न प्रकार के ताज़िये रखे हैं। इन चेंबर्स के उपर जो भवन है , उसे भूल भुलैया कहते हैं क्योंकि इसमे इतने रास्ते और सीढ़ियाँ बनी हैं कि यदि बिना गाइड के घुस गए तो थक कर चूर हो जायेंगे लेकिन बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा.     




यहाँ गाइड तो वैसे भी अनिवार्य है.  




इमामबाड़ा के आगे और पीछे वाली दीवारों मे इस तरह की गैलरी बनी हैं जिनमे सारे रास्ते खुलते हैं. ज़ाहिर है , यदि भूल हुई तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने मे ३३० फुट पैदल चलना पड़ेगा. अंदर गर्मी भी होती है और सीढ़ियाँ चढ़ने से पसीना आता है , इसलिये पानी की बोतल साथ ले जाना एक अच्छा विकल्प है.    



छत का एक दृश्य.  




छत से पीछे की ओर नज़र आ रहा है , किंग ज्योर्ज मेडिकल कॉलेज.  




चारों ओर बनी आर्चेज से शहर का सुन्दर नज़ारा दिखाई देता है.  





मुख्य भवन के बाहर बनी है एक बावली. इसके सबसे निचले तल मे पानी भरा है जो सीधा गोमती नदी से आता है. इसमे कई मंज़िलें हैं जिनमे छत की ऊँचाई को बस ५ फुट रखा गया है. गाइड ने बताया कि पुराने ज़माने मे अंग्रेज़ जो लम्बे होते थे , उन्हे झुकाने के लिये ऐसा किया गया था. लेकिन सच तो यही था कि जो भी यहाँ आयेगा , उसे सर झुकाना ही पड़ेगा वर्ना सर फूट जायेगा. सर झुकवाने का यह तरीका भी बड़ा दिलचस्प लगा. बावली की उपरी मंज़िल पर पीछे से निचले तल के पानी मे द्वार पर खड़े लोग साफ नज़र आते हैं. इसके अनेक झरोखों से गुप्त रूप से द्वार पर नज़र रखी जा सकती है.       




घूमते घूमते धूप निकल आई थी. सुहानी धूप मे रूमी दरवाजे का एक फोटो ले कर हम निकल पड़े सीधे एयरपोर्ट की ओर.   

नोट : फोटो मोबाइल कैमरे से. यहाँ के कुछ और मेघ आच्छादित फोटो यहाँ देख सकते हैं.