Tuesday, December 18, 2012

यूँ आया ऊँट पहाड़ के नीचे ---


हम नास्तिक तो नहीं हैं लेकिन आर्य समाजी विचारधारा के रहते मूर्ति पूजा में बिल्कुल विश्वास नहीं रखते। ऐसे में जब किसी ऐसे कार्यक्रम के लिए निमंत्रण आ जाता है जिसमे मूर्ति पूजा होती है तब हमारे लिए बड़ी मुश्किल पैदा हो जाती है। अक्सर या तो हम जाने से बचने के बहाने ढूंढते हैं या फिर अनमने भाव से जाकर अपनी उपस्थिति लगाते हैं। हालाँकि ऐसा करते समय थोडा अपराध बोध भी रहता है, विशेषकर अन्य श्रद्धालुओं को देखकर। यह भी जानते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी काम बेमानी ही होता है। 

लेकिन कहते हैं , सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ। यानि जब ऐसे कार्यक्रम का आयोजन  स्वयं साले साहब ने किया हो तो मना कैसे किया जा सकता है। ऐसा ही हुआ इस शनिवार को जब हमारे साले साहब ने अपनी सोसायटी के चार अन्य लोगों के साथ मिलकर माता की चौकी का आयोजन किया। इसमें उनकी सोसायटी के लोगों के अलावा इन पांचों के रिश्तेदार भी सम्मिलित होने थे। इसलिए अपना बचना असंभव था।   



लेकिन जाकर एक बात बहुत अच्छी लगी कि पंडाल को बहुत सुन्दरता से सजाया गया था। मंच पर आसीन देवी देवताओं की मूर्तियाँ भी रंग बिरंगी रौशनी में बहुत भव्य लग रही थी।  संगीत की धुन पर गाने वाला कलाकार  बार बार माता को दिल खोलकर दान देने के लिए उकसा रहा था। उसका कहना था कि जो भक्त माता के चरणों में जितना ज्यादा अर्पित करेगा, माता उसकी झोली उतना ही भर देगी। माता सबकी मन्नत पूरी करती है।

बाहर गेट पर कुछ भिखारी भी दक्षिणा पाने की मन्नत मांग रहे थे। लेकिन भक्तजन तो स्वयं ही मांगने में व्यस्त थे, इसलिए उनकी तरफ किसी का ध्यान कैसे जा सकता था। हमें तो यह देखकर हैरानी हो रही थी कि करोड़ों के अपार्टमेंट में रहने वाले शायद अभी भी असंतुष्ट रहे होंगे जो मन्नत बची थी मांगने के लिए।

लेकिन कुछ पाने की चाह में कुछ देना तो पड़ता ही है। इसलिए सभी श्रद्धानुसार हाथ जोड़े माता के चरणों में धन राशि अर्पित किये जा रहे थे। क्योंकि मामला ससुराल का था , इसलिए जिंदगी में पहली बार हमने भी माता के चरणों में यथोचित भेंट चढ़ाई। आरती के बाद प्रसाद ग्रहण कर सबने भोजन की ओर  प्रस्थान किया।

धार्मिक कार्यक्रमों में अक्सर भोजन में होता है, पूरी , आलू की सब्जी, पेठे की सब्जी और रायता। पेठा यानि कद्दू यानि सीताफल तो हरियाणवी लोगों की मनपसंद सब्जी है। पहले हर शादी में यह सब्जी बनाई जाती थी। इसलिए हमें भी बचपन से बड़ी अच्छी लगती रही है। हालाँकि हमारी धर्मपत्नि घर में कभी नहीं खाती। लेकिन यहाँ तो वो भी चटकारे ले कर खा रही थी।

यह तो हम जानते हैं कि कद्दू / पेठा / सीताफल/ पम्पकिन एक  बहुयामी फल / सब्जी है। इसका इस्तेमाल सांभर में , सॉस बनाने के लिए , हलवा और मिठाई बनाने के लिए किया जाता है। विदेशों में भी तरह तरह के पकवान बनाने में उपयोग किया जाता है। लेकिन अक्सर शहर में लोगों को पेठे की सब्जी का नाम सुनकर नाक भों सिकोड़ते देखा है। परन्तु इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों में सब श्रधानुसार सेवन करते हैं।

हम यह भी जानते हैं कि पेठा एक सर्व गुण संपन्न आहार है :

* फैट और कॉलेस्ट्रोल न के बराबर होने से हृदय रोगियों के लिए बहुत उपयुक्त है।

* लो शुगर और हाई फाईबर होने से मधुमेह के रोगी भी आसानी से खा सकते हैं।

* लो सोडियम की वज़ह से बी पी के रोगियों के लिए भी उपयुक्त सब्जी है।

* इसमें मौजूद विटामिन्स और खनिज पदार्थ बच्चों और बड़ों सभी के लिए स्वास्थ्यवर्धक तत्व प्रदान करते हैं
*विटामिन ऐ की अत्यधिक मात्रा रतोंधी जैसे रोग से निजात दिलाती है।

* विटामिन सी और ई से रोग निरोधक शक्ति मिलती है।


अब ज़ेहन में सवाल यह उठता है कि:

* जब इस में इतने गुण हैं तो लोग खाने में क्यों शरमाते हैं !

* दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों में क्यों शौक और श्रद्धा से खाया जाता है ?

 * इस सब्जी को सीताफल क्यों कहते हैं ?


दूसरे सवाल का ज़वाब तो श्रीमती जी के पास भी नहीं था। ज़ाहिर है, जो सब करते हैं , हम भी वही आँख मूंदकर करने लगते हैं। लेकिन बात की तह तक पहुँचने की जिज्ञासा ने ही हमेशा मनुष्य का ज्ञानवर्धन किया है। ब्लॉगिंग का भी यही सार्थक उपयोग है कि हम इन सवालों का ज़वाब ढूंढें। क्या ख्याल है आपका !


42 comments:

  1. सुन्दर लेखनी !!

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  2. सीताफ़ल अपनी पसन्दीदा सब्जी।

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  3. डाक्टर साब लगता है आप मुझे भी डाकटर की उपाधि दिलवाकर ही छोड़ोगे :)

    अक्षय्यनवमी को विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्ड का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड (काशीफल, सीताफल या कद्दू भी कहते हैं)

    नवरात्रि के समय हम नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदि स्वरूपा या आदि शक्ति कहा गया है।

    इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है।

    इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े (कद्दू, सीताफल ) की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा।

    Cont....2



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    1. I think the hands-down winner has to be the unknown Indian who found some other odd looking South American fruits and named them after famous figures of Indian mythology. Calling the fruits from the Annona family Sitaphal and Ramphal helped root them in Indian culture to the extent that many will be surprised to hear of their South American origin. (The name Sitaphal does crop up earlier, but was used for a variety of pumpkin ). According to K.T.Achaya, the first Indian reference to Sitaphal as we know it dates from 1672, with P.Vincenzo Maria describing the pulp as "very white, tender and delicate and so delicious that it unites to agreeable sweetness a most delightful fragrance of rosewater... if presented to one unacquainted with it he would certainly take it for blancmange." That description is as valid today, down to the fruit's affinity with milky desserts.

      This pudding like texture is the reason for its other common name of Custard Apple. But this name also highlights the confusions surrounding these fruits. The Annonas are a large family, which cross easily to create more variants, nearly all of which have fruits that resemble fleshy pine-cones and have creamy flesh. The similarities are strong enough to have resulted in a lot of overlapping names. Outside India 'Custard Apple' is commonly used for Annona reticulata, which is what we call Ramphal, but which is also known in Spanish countries as Cherimoya. But this term is more correctly used for Annona cherimola, which looks like a slightly larger version of our Sitaphal, which is Annona squamosa, sometimes called the Sugar Apple, except in parts of Central America, where it's called Cherimola...

      No wonder we decided we needed our own names! The other advantage of the mythological approach to naming was that it allowed for a kind of brand extension .

      Ranjit Singh and S.K.Saxena, in their useful guide to Indian fruits, note that in addition to Ramphal (A.reticulata) and Sitaphal (A.squamosa), A.cherimola is also grown in a few places in Assam and South India, and is now called Lakshmanphal. Recently another variant has started appearing in the Mumbai market - a curiously large and misshapen fruit, as if a child started out making a Plasticine Sitaphal, but abandoned it half-way . It's being called Hanumanphal, and Singh and Saxena identify this as the Atemoya, a cross between A.squamosa and A.cherimola , which is gaining in popularity. I wonder though if it's not the variant of Sitaphal called Mammoth , described in the excellent online resources on new crops hosted by Purdue University, as having "fruits lopsided, pulp soft, white, very sweet." Whatever its origins, Hanumanphal is worth looking out for. The Annona variants may be similar, but still differ a lot in terms of eating quality.

      हाँ , कुछ लोगो का यह भी मानना है की जब हनुमान जी लंका , सीता माता के पास पहुंचे तो सीता माता ने उन्हें खाने को जो फल दिए वो (sugar -apple ) थे, उसे बाद में सीताफल कहा जाने लगा और आगे चलकर वहीं से इस शब्द को लोगो ने कद्दू के लिए इस्य्तेमल किया ।

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    2. नोट: उपरोक्त कॉमेंट का अंगरेजी हिसा इकोनोमिक्स टेम्स से लिया गया है।

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    3. गोदियाल जी , आपकी विस्तृत टिप्पणियां पोस्ट को सार्थकता प्रदान कर रही हैं।
      पहली टिप्पणी में नई जानकारी मिली। आभार।
      रामफल सीताफल , लक्ष्मण फल और हनुमान फल निश्चित ही हमारी पौराणिक धार्मिक गाथाओं से सम्बन्ध रखते हैं। लेकिन यह सही है कि पम्पकिन की बहुत सी किस्में देखने को मिलती हैं और विश्व भर में उगाई और विभिन्न रूपों में खाई जाती हैं।

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  4. हमारे यहाँ कद्दू को कुम्हड़ा, कोंहड़ा कहा जाता है, हरियाणा में इसे कोला कहा जाता है। सीताफल छत्तीसगढ़ में शरीफे को कहा जाता है। सुपाच्य होने के कारण इसका उपयोग सार्वजानिक कार्यक्रमों में किया जाता है।

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    1. ललित जी , दिल्ली हरियाणा और यु पी में इसे पेठा कहते हैं। सुपाच्य होने के साथ यह बारह महीने और सस्ता मिलता है। इसका मीठा स्वाद उत्तर भारतियों को खूब भाता है। शायद इसीलिए इसे पसंद किया जाता है। लेकिन इसमें इतने गुण हैं कि विश्व भर में अलग अलग तरीके से इसका सेवन किया जाता है। इसका धार्मिक सम्बन्ध गोदियाल जी ने बहुत खूबसूरती से दिया है।

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  5. मीठा मीठा सुस्वादु पेठा।

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  6. कद्दू के गुणों को बहुत रोचक ढंग से समझा दिया आपने तो!

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  7. इसे खाने में कौन शरमाता है पता नहीं ..बहुत ही फेंसी ढंग से भी बनाया जा सकता है इसे.
    बाकी इस तरह के आयोजनों में जो सबसे ज्यादा मुझे अखरता है वो है गा गा कर अरदास मांगना और फिर देने वाले का नाम गाना.

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  8. मेरे विचार से पेठा (ASHGOURD) एवं कद्दू या सीताफल (Pumpkin ) दोनों अलग अलग फल हैं ...

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    1. मेरा भी यही कहना है -पेठा जिससे बनता है वह कुम्हड़े की अलग ही प्रजाति है जिसकी सब्जी इधर नहीं बनती -इससे ही उड़द की बरियाँ -कोहरौडी भी बनती है -सब्जी का कोहड़ा अलग है जो ब्राह्मणों का प्रिय व्यंजन है ! सीताफल तो इधर भी शरीफा को कहते हैं!

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  9. पेठा जिससे बनता है हमारे यहा उसे "बरिहा"कहते है,कद्दू को "कुम्हड़ा"सरीफा को
    सीताफल कहा जाता है,पकने पर बहुत मीठा स्वादिष्ट फल होता है,,,,

    recent post: वजूद,

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  10. .
    .
    .
    सतीश सक्सेना जी से सहमत,

    पेठा और कद्दू दो अलग अलग फल हैं। आगरे की मशहूर पेठे की मिठाई कद्दू से नहीं बनायी जा सकती...उसके लिये पेठा की जरूरत होगी...


    ...

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    1. हैरानी की बात यह है कि हमारे यहाँ कद्दू को ही पेठा कहते हैं और पेठा को भी पेठा। वैसे यह सही है कि मिठाई वाला पेठा अलग होता है।

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  11. और तो और एक जादुई छड़ी फिरते ही ये प्यारी सी बग्गी बन जाता है :-)

    हमें तो बड़ा पसंद है....(और चोकलेट पेठा तो वाह जी वाह...पहली बार भतीजे की शादी में खाया..)

    सादर
    अनु

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  12. यदि बात कद्दू की हो रही है तो मुझे इसकी सब्जी खट्टी मिट्ठी अच्छी लगती है और रही बात ना पसंद करने वालों की तो भई वो तो पसंद अपनी-अपनी ख्याल अपना-अपना, मगर हाँ मेरी समझ से ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों में लोग केवल इसलिए खाते है क्यूंकि वह भोग का हिसा बन चुका होता है। तो ऐसे में भला माता को कौन नाराज़ करना चाहेगा...:)वैसे मैं तो मूर्ति पूजा में विश्वास रखती हूँ और मेरा ऐसा मानना है की भगवान के भोग के लिए बनाया गया भोजन अपने आप ही अत्यधिक स्वादिष्ट लगने लगता है। जैसे घर में साधारण रूप में बना हलवा और गुरुद्वारे में प्रसाद के रूप में मिलने वाला हलवा दोनों में ज़मीन आसमान का फेर्क होता है। फिर भले ही सामग्री की मात्रा बराबर ही क्यूँ ना हो :)यहाँ तक के तुलसी के पत्ते डला सादा पानी जो भगवान के मंदीर से मिलता है उसमें गंगा जल सा अहसास होता है और वही तुलसी डाला पानी आप घर में पीकर देख लीजिये फर्क अपने आप समझ में आयेगा :)ऐसा मेरा मानना है।

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    1. पल्लवी , जी हम भी घर में लड्डू और जलेबी बनाकर देख चुके हैं। लेकिन हलवाई जैसा स्वाद स्वाद नहीं आया। :)

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  13. किसी भी भोज में वही सब्जियां बनायी जाती थी .. जो प्रचुर मात्रा में पैदा होती थी .. साथ ही पकाने के वक्‍त कम गलती थी .. जैसे कोंहडा , कटहल .. कहा भी गया है भोज के वक्‍त कोंहडा ..ऐसा इसलिए ताकि उपस्थित भीड को सब्‍जी की कमी न हो जाए .. अब समाज में इसे स्‍वीकृति देने के लिए जो भी कहानियां गढी जाएं !!

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    1. संगीता जी , बात तो तर्कसंगत लगती है।

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  14. कद्दू मेरी पसंदीदी सब्जी है ...इसका रायता मुझे बहुत पसंद है ...हरा और पीला दोनों कद्दू मुझे पसंद है ..हा इसके बारे में कहते है की यह गैस बनाती है ? तो आप बताये की इसकी सब्जी खाने से क्या पेट में गैस बनती है ? इसका उपयोग लोग दिवाली पर और नवरात्रियो में जादू -टोनो के लिए भी करते है ...

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    1. जी गैस वाली बात तो सही नहीं लगती। यह तो सुपाच्य सब्जी है। जादू टोने वाली बात नई लगी।

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  15. हरियाणा में पेठे को कोल्हा कहा जाता है, ललित जी ने सही याद दिलाया
    गांव की शादियों में तो यह जरुर बनती थी

    प्रणाम

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    1. दरअसल हर 50-100 किलोमीटर की दूरी पर भाषा और शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। हम तो पीले कद्दू को ही पेठा कहते हैं।

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  16. बात मटा की चौकी से शुरू हो कर कद्दू पर आ टिकी .... सब्जी के इतने लाभ आपने बता दिये हैं जो पहले मालूम नहीं थे ....
    पेठा और कद्दू (जिसे काशीफल भी कहा जाता है ) दोनों अलग अलग फल हैं ....
    शायद यह सुपाच्य होती होगी इसी लिए पूरी कचौरी के साथ इसे खाया जाता होगा ।

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  17. हमारे यहां सीताफल एक स्‍वादिष्‍ट फल होता है, जो पहाड़ों पर स्‍वत: ही उगता है। काशीफल कद्दू है, जिसकी सब्‍जी बनती है और पेठा जिससे आगरे का पेठा बनता है। कद्दू से ना केवल स्‍वादि सब्‍जी बनती है अपितु इसका रायता भी बहुत अच्‍छा बनता है।

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  18. कद्दू पीले रंग का फुल और फल वाला होता है. कुम्हडा से उड़द दाल से बड़ी बनाई जाती है .और सीता फल एक कंपोजिट फल है .छोटे दानेवाला . कुम्हडा याने सफ़ेद फल से ही शक्कर की चाशनी लगाकर पेठा बनाया जाता है ..तीनों ही फल स्वास्थ के लिए लाभकारी हैं .जहाँ तक मेरी जानकारी है सीताफल मुह के सौदर्य वर्धन का फल है इसे खाने के लिए मुह को अलग अलग दिशा में चलाना पड़ता है

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  19. मेथी के बघार के साथ गुड और अमचूर मिश्रित इसकी खट्टी -मीठी सब्जी बहुत स्वादिष्ट होती है !
    यह सच है की प्रसाद के रूप में बनाया जाने वाला खाना कितना भी सादा हो , स्वादिष्ट ही लगता है !

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  20. मुझे तो कद्दू और पूजा वि‍धि‍यों, दोनों से ही परहेज़ नहीं. दोनों को नि‍र्विकार भाव से स्‍वीकार कर लेता हूँ :)

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  21. सतीश जी ने सही कहा कि कद्दू और पेठा अलग अलग है और दोनों चीज़े सब्जी मंडी में मिलती हैं दिल्ली में भी. कद्दू के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्त्व को गोदियाल जी ने विस्तार से समझा दिया. लेकिन भोज में विशेषकर गाँवो में कद्दू और आलू की सब्जी बनाने का विशेष प्रावधान इसलिये था कि कद्दू अगर साबुत रखे रहें तो वह महीनों खराब नहीं होता. सब्जियों में कद्दू ही एक मात्र ऐसी सब्जी है. भगवान ने उसकी पैकिंग बहुत ध्यान में रख कर बनाइ है. यही स्थिति आलू की भी है. इसलिए यह दोनों चीजें आसानी से, हर मौसम में, हर जगह सही कीमत में मिल जाती हैं और इसलिए भोज में में लोकप्रिय है. शहरों में तो अब बहुत सब्जियां बारहों महीने मिल जाती है.

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  22. अब सचमुच यह कन्फ्यूजन हो गया है कि कद्दू क्या है लौकी क्या है और कुम्हड़ा /कोहंडा क्या क्या है कैसे दीखते हैं -सतीश सक्सेना जी के अंगरेजी नामों से गूगल सर्च मार जाय !
    पेठा वाला कुम्हड़ा = http://www.google.com/imgres?imgurl=http://www.celkau.in/Crops/Vegetables/Ashgourd/images/ashgourd.jpg&imgrefurl=http://www.celkau.in/Crops/Vegetables/Ashgourd/ashgourd.aspx&h=1053&w=1440&sz=364&tbnid=Vc9H8GD9XpktWM:&tbnh=90&tbnw=123&zoom=1&usg=__3Taj2ZZqLUxaPUJGU7oN0kENf5s=&docid=wYZd_s269Dek9M&hl=en&sa=X&ei=ZhXTUOraFY_OrQf58ICICA&ved=0CDUQ9QEwAQ&dur=2230
    सब्जी वाला कुम्हड़ा =http://www.google.com/imgres?hl=en&client=gmail&tbo=d&rls=gm&biw=853&bih=544&tbm=isch&tbnid=1Nc-9ca8QHlt5M:&imgrefurl=http://www.jamaicamix.com/Food/JamaicanFruitAndVegetablesPicturePage2.html&docid=pYFUEQPI84MA2M&imgurl=http://www.jamaicamix.com/image/WestIndianPumpkin.jpg&w=320&h=240&ei=ERbTUP2kKMXOrQeWtoGIDg&zoom=1&iact=hc&vpx=161&vpy=176&dur=474&hovh=190&hovw=251&tx=129&ty=89&sig=105631958242413033426&page=1&tbnh=147&tbnw=186&start=0&ndsp=13&ved=1t:429,r:1,s:0,i:104

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  23. डॉ .साहब कुम्हड़ा का रायता भी बहुत स्वादिष्ट बनता है इसे उबाल कर और योरोप और खासकर अमरीका में हैलीवीन का मुख्य आकर्षण यही पम्पकिन होता है गहरे पीले रंग का आकार खासा बड़ा

    जिसकी लैम्प भी बानी जाती है दरवाज़े पे रख दिया जाता है आलोकित करके .

    सीता फल में मैथी दाने की लोडिंग और पत्नीला सीताफल की सब्जी गजब ढाती है .

    कीरतन ,संकीर्तन विरेचन करता है आजकल तो हर मांगलिक अवसर पर लोग नांचते हैं मुक्त होतें हैं और जगराते में डबल स्वाद भजन का भजन और साथ में पैरोडी शीला जवान हुई डार्लिंग तेरे लिए

    ,कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना जीने न देगा ये ज़ालिम ज़माना ...

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  24. ...हमारे गाँव में कुछ समय पहले तक शादी- विवाह में पूड़ी और कद्दू की सब्जी मुख्य व्यंजन हुआ करता था,अब काफी बदलाव आ गए हैं ।

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  25. लेकिन आजकल भी पंगतों में आलू की सब्जी और पूड़ी का वर्चस्व यथावत बना हुआ है।।।।

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  26. डेसीबल लेवल लेवल बहुत हाई होता है इन आयोजनों का अलबत्ता नि :शुल्क आध्यात्मीकरण करते हैं ये जगराते माता के .

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  27. पोस्ट की पोस्ट ओर इतनी जानकारी ... टिप्पणियों को पढ़ना भी जानकारी भरा है ...

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  28. कद्दू के बीज को केसे खाना चाहिए पानी से धोकर खाने चाहिए या फिर सुखाकर?

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  29. प्लीज मार्गदर्शन करे पानी से धोकरभी कद्दू के बीज को खाया जा सकता है और ये बहुत बेहतरीन सेक्स बूस्टर हे...

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