Wednesday, August 19, 2009

कब खुलेंगी आँखें ?

दृश्य १:



साफ़ और चिकनी सतह वाली चौड़ी सड़कें, अपनी लेन में चलती एक से एक बड़ी कारें, कहीं कोई धुआं नहीं, न प्रदुषण, न किसी हार्न की आवाज़, न कोई यातायात के नियमों का उल्लंघन, रिहाईशी एरिया में चौराहे पर न कोई लाल बत्ती।






यह दृश्य है विकसित देश के एक शहर का, जहाँ हर पैदल आदमी एक वी आई पी है, जिन्हें देखकर गाडियाँ अपने आप उक जाती हैं।जहाँ चौराहे पर पहले आप, पहले आप के सिद्धांत का पालन किया जाता है।







दृश्य २:

टूटी फूटी सड़कें, जगह जगह खुदाई, कहीं आधा अधुरा निर्माण कार्य जो पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा, जबकि कॉमनवैल्थ गेम्स अब ज्यादा दूर नहीं. ट्राफिक में घुसी साइकलें, साइकल पर लदे तीन तीन गैस के सिलेंडर, जिग जैग दोड़ती मोटरसाइकलें, मोटरसाइकल पर दूध के ड्रम, साइकलरिक्शा, ऑटोरिक्शा, घोडागाडी, बैलगाडी, या बिना गाड़ी के बैल और गाय भैंसें , छोटे ट्रक, मोटे ट्रक, और इन सबके बीच में चिनघाद्ती, सरपट दोड़ती, मरती मारती ब्लूलाइन बसें.

यह हाल है भारत की राजधानी दिल्ली की सड़कों का। अब सड़कों का निर्माण तो शायद सरकार किसी तरह पूरा करा लेगी अगले साल तक लेकिन जनता में अनुशासन कहाँ से लायेंगे। हम दिल्ली वाले तो यातायात के नियमों का पालन करने में अपनी तौहीन मानते हैं. यहाँ रोंग साइड से ओवेर्टेक करना सही माना जाता है. आधे ड्राइवर तो ऐसे हैं की हार्न पर हाथ रख कर ही चलते हैं. और अगर आपने नहीं सुना तो ऐसे देखते हैं जैसे अंखियों से गोली मार देंगे.

सबसे खतरनाक ड्राइविंग करते हैं, मोटरसाइकल वाले. हेलमेट को हाथ में टांग, जो स्पीड दिखाते हैं, और हवा में बाल लहराते हैं, तो शायद वो सोचते होंगे की सारी कुंवारियों के दिल मचलकर उन्हीं पर आ गए हैं. दिल्ली वालों की एक और आदत है की रस्ते चलते गाड़ी में से कुछ भी सड़क पर फैंक देते हैं, जैसे. सड़क उनके पिताश्री की हो. अगर हो भी तो क्या सफाई उनके पिताश्री करेंगे? यानी सिविक सेंस तो है ही नहीं.
लेकिन सबसे गन्दी आदत लगती है, जब कोई सेठ सा दिखने वाला गाड़ी का शीशा नीचे करता है, और मुहँ से पूरा एक पाव, गधे की लीद जैसा, पान का अवशेष सड़क पर उगल देता है. यह सीन देखकर मुझे तो लगता है की इनसे तो गधे ही अच्छे, कम से कम वो ये काम मुहँ से तो नहीं करते.

दिल्ली वालों की ट्रैफिक सेंस देखकर मुझे एक पुरानी घटना याद आती है। एक बार दिल्ली की ट्रैफिक पुलिस ने सोचा की हमें पब्लिक में अपनी छवि सुधारनी चाहिए। तो इसके लिए तय हुआ की , एक शिष्टाचार सप्ताह मनाया जाये जिसमे पुलिस के सभी सिपाही जनता को श्रीमान जी कहकर बुलायेंगे। एक दिन एक चौराहे पर एक स्कूटर वाला जब आदत अनुसार स्टाप लाइन से आगे जा रुका तो वहां खड़े कांस्टेबल ने कहा -श्रीमान जी पीछे हो जाइए। बन्दे ने सुना ही नहीं और वहीँ खडा रहा। थोडी देर बाद पुलिस वाले ने फिर कहा -श्रीमान जी पीछे हो जाओ। लेकिन श्रीमान जी तो ठेठ दिल्ली वाले थे, कहाँ सुनने वाले थे. जब और थोडी देर तक स्कूटर वाला पीछे नहीं हटा तो उस हरयाणवी पुलिस वाले के सब्र का बाँध टूट गया और वो अपनी पर आकर बोला --अरै ओ श्रीमान जी के बच्चे, सा * * पाच्छे न होजा, न तै दिखै सै यो डंडा.कहने की जरूरत नहीं, इस बार स्कूटर वाला पीछे हो गया.

इसी तरह की एक घटना मेरे साथ पिछले साल हुई. इस बार ट्रैफिक पुलिस ने सोचा की दिल्ली वाले ट्रैफिक के नियमो का कितना उल्लंघन करते हैं , ये जानना चाहिए. तो हुआ यूँ की एक विशेष दिवस पर ट्रैफिक विभाग ने अपनी सारी पुलिस फोर्स एक ही रूट पर लगा दी और निर्देश दिए गए की आज किसी को भी नहीं छोड़ना है. जो भी यातायात के नियमों का उल्लंघन करेगा, उसका चालान ज़रूर कटेगा. अब अपनी किस्मत देखिये की उस दिन किसी ज़रूरी काम से मुझे ३० किलोमीटर दूर जाना पड़ा. अमर्जंसी थी इसलिए मैंने भी अंधाधुंध गाड़ी दौडाई. अगले ही दिन मेरे पास ट्रैफिक पुलिस का चालान आ गया ,जिसमे लिखा था--श्रीमान , आपने निम्नलिखित यातायात के नियमों का उल्लंघन किया है , जिसका विस्तृत विवरण इस प्रकार है :रेड लाईट जम्पिंग ---३० बार स्टाप लाइन क्रोसिंग --२० बार ओवरस्पीडिंग ----------४० बार टॉकिंग ओंन मोबाइल --१० बार रेड लाईट पर हार्न बजाना ---५० बार रोंग साइड से ओवरटेकिंग ---१० बार सीट बेल्ट नहीं लगाना -----३० बार
नियमित दर से कुल जुर्माना राशिः हुई --५०००० रूपये और एक ही दिन में इतने उल्लंघन करने के लिए विशेष जुरमाना --१००००इस तरह कुल राशिः --६०,००० रूपये नीचे लिखा था ,यदि आपने ये राशिः ९ अप्रैल तक जमा नहीं करायी तो हाई कोर्ट के आदेश अनुसार हर जुर्म पर ५०० रूपये अतिरिक्त लगकर ये राशिः हो जायेगी --१५०,००० रूपये. अब ये पढ़कर मेरे तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी. पसीना आ गया , हाथ कांपने लगे और शायद हार्ट अटैक ही आ जाता की, तभी मेरी आँख खुल गयी और मैंने जाना अरे ये तो सपना था !अब इस सपने से मेरी आँख तो खुल गयी, पर दिल्ली के दोस्तों आपकी कब खुलेगी ?ज़रा सोचियेगा ज़रूर.

10 comments:

  1. दरल जी,
    आपका लेख सचमुच शिक्षाप्रद लगा.सराहनीय.दिल से बधाई!!

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  2. kaash ki khul jaaye aankh logon ki
    waah............
    umda aalekh
    abhinandan !

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  3. शायद उस दिन जब आपका वह उत्तर, जिसने आप की आँखें खोल दी, सही ढंग से इस देश में लागू होगा और किसी की भी सिफारिश छोड़ देने के लिए नहीं सुनी जायेगी.

    आँखे खोल देने वाले इस लेख हेतु आप का आभार.

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  4. दिल्ली वालो कब खुलेगी आपकी आँख....??

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  5. बिल्कुल सही लिखा कि दिल्लीवालों को अपने ट्रेफिक सेंस के बारे में सोचना चाहिए...जितनी लम्बी गाड़ी होगी वह जेब्रा लाइन से उतनी ही आगे खडी होती है..
    सोचकर डर लगता है कि क़ॉमनवेल्थ गेम में सड्कों की हालत यही रही तो क्या होगा.

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  6. डॉक्टर दराल, आप जैसी हस्ती की बधाई मेरे लिए टॉनिक की तरह काम करेगी. आशा है आप मेरी खामियों की ओर भी इंगित करते रहेंगे. रही बात एक देश में दो देश की तो खाद्य सुरक्षा पर दस्तावेज तैयार करने के लिए एसडी तेंदुलकर की एक रिपोर्ट सरकार को मिली है. हालांकि ये रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है. लेकिन इसके अनुसार देश में बीपीएल में 11 करोड़ लोग बढ़ गए हैं. बीपीएल की आबादी का आंकड़ा 38 फ़ीसदी हो गया है. पहली बार बीपीएल के आंकलन के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ़-सफ़ाई जैसे मानकों को भी जोड़ा गया है. ये है देश का सच

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  7. जी हाँ,
    यही हाल है अपनी राजधानी का।
    बिल्कुल सही चित्रण।
    बधाई!

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  8. huzoor !!
    pehle to mn mein jo traffic hotch-potch hai
    use hi duur karna hoga
    be-imaani , laalach , thagee aur jane kya-kya
    jaam lagaye khade haiN
    khair ,,,, ek jaagruk rachnaa , achha aalekh

    ---MUFLIS---

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  9. खुशदीप भाई, आपने बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है. यह रिपोर्ट मैंने भी पढ़ी थी अखबार में, और जहाँ तक मुझे याद है, ३८ % लोग गरीब पाए गए हैं, उपरोक्त तथ्यों के आधार पर. लेकिन बी पी एल श्रेणी के लोग गरीबों से भी ज्यादा गरीब होते हैं. फिर भी रिपोर्ट के आने के बाद स्थिति ज्यादा साफ़ होगी. आभार

    मैं मुफलिस जी से पूर्णतय सहमत हूँ. पहले हमें आज के रावण के दस रूपों से छुटकारा पाना होगा. कौन हैं ये दस रूप, इसका जिक्र कुछ समय बाद. शुक्रिया ज़नाब

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  10. वो कहते हैं ना कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते...यहाँ दिल्ली में प्यार और दुलार से मानने वाला कोई नहीं है...इनको डंडे का डर दिखाई देना चाहिए...तभी सुधरेंगे सब के सब

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