गौमुख से निकल गंगोत्री होती हुई भागीरथी नदी देवप्रयाग आकर बद्रीनाथ से आती हुई अलकनंदा से मिलकर गंगा बनती है । यहाँ से करीब ६० किलोमीटर हृषिकेश तक का पहाड़ी सफ़र गंगा की पवित्रता को बनाये रखता है। हालाँकि शिवपुरी नामक स्थान पर राफटिंग क्लब खुलने से मनुष्य की गंगा के साथ छेड़खानी शुरू हो चुकी है । गंगा सबसे ज्यादा पवित्र हरिद्वार में ही नज़र आती है ।
हमारा चिल्ला हरिद्वार आना पिछली बार ८ साल पहले हुआ था । सबसे पहला बदलाव तो यह लगा कि अब गाड़ी पार्क करने के लिए बड़ी आरामदायक पार्किंग बन गई है सड़क के साथ । गाड़ी पार्क कर सड़क के नीचे बने अंडर पास से होकर जैसे ही हम गंगा की तरफ आए, गंगा किनारे तक का १०० मीटर लम्बा रास्ता भिखारियों से अटा पाया । ऐसा लगा जैसे हरिद्वार के सारे भिखारियों के लिए यह स्थान आरक्षित कर दिया गया हो ।
उन्हें देख कर अनायास ही मुन्ना भाई फिल्म के उस जापानी टूरिस्ट की याद आ गई , जो कह रहा था --हंगरी इंडिया , पुअर इंडिया । हरिद्वार में ऐसे स्वागत की अपेक्षा नहीं थी ।
पुल पार कर पश्चिमी घाट पर पहुँच कर हम हरिद्वार की गलियों में घुस गए । खचाखच भरे बाज़ार में तरह तरह की दुकाने सजी थी , हालाँकि हमारा खरीदारी का कोई मन नहीं था । हमें तो जाना था मनसा देवी के मंदिर जो सामने पहाड़ की चोटी पर था । पिछली बार हमारा यहाँ आना १९८४ में हुआ था।
रास्ता पूछते हुए जब मेन रोड पर आए तो पता चला कि ट्रॉली की टिकेट्स बंद हो चुकी थी । इसलिए पैदल चलने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था । वैसे भी हमें तो पैदल चलना ही अच्छा लगता है । करीब १०० मीटर की खड़ी सीढियां चढ़कर जब सड़क नज़र आई तो बड़ा इत्मिनान हुआ । सबसे पहले हमने चाय वाले को ढूँढा ।
लेकिन उसने ऐसी चाय पिलाई की पीने के बाद पीने और पिलाने वाले दोनों को शर्म आ रही थी ।
चाय ख़त्म कर हम तो लग गए अपने पसंददीदा काम पर ।
आगे का रास्ता समतल सड़क का था । इसलिए मस्ती में चलते और फोटो खींचते हुए चलते रहे ।
करीब आधा किलोमीटर पैदल चल कर हम पहुँच गए मंदिर में । किसी भी मंदिर में हमारा आना करीब १५ साल बाद हुआ था । वैसे भी हमें तो मंदिर से ज्यादा आस पास की खूबूरती ज्यादा आकर्षित करती है । लेकिन यहाँ आकर आअश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई यह देख कर कि सब इंतज़ाम बहुत बढ़िया थे । मंदिर भी साफ था । बिना किसी हील हुज्ज़त के हमने मंदिर का चक्कर लगाया । कदम कदम पर पंडित बैठे थे लेकिन कोई लूट मार नहीं थी। सब श्रद्धानुसार दान पात्र में १०-२० रूपये डाल रहे थे ।
मुख्य गर्भकक्ष के आगे बहुत भीड़ थी । लोग प्रसाद चढ़ा रहे थे । लेकिन हम कुछ लेकर नहीं गए थे । हमने श्रीमती जी से कहा --चिंता नहीं , १०१ रूपये दान कर दो । पंडित जी ने भी ख़ुशी ख़ुशी फटाफट रसीद काट दी । फिर एक छोटे से आधे कटे नारियल में कुछ गुलाब के फूल प्रसाद के रूप में दिया जिसे पाकर श्रीमती जी तो कृतार्थ हो गई ।
हम खड़े खड़े देख रहे थे उस नौकर को जो सर पर नारियल से भरा ५० किलो का बोरा रखकर बाहर निकला ।
रास्ते में सैंकड़ों सेल्समेन को नारियल वाला प्रसाद बेचते देखकर जो लग रहा था कि इतने नारियल कहाँ से आते होंगे , वह राज़ अब खुल रहा था ।
लेकिन वर्षों बाद खुशबू वाले गुलाब देखने को यहीं मिले ।
चित्र में गंगा घाट और शाम की आरती के लिए एकत्त्रित हुए हजारों श्रद्धालु । दूर नज़र आ रहा है बैरेज जिससे गंगा की दिशा बदलकर मोड़ दिया गया है घाट की ओर । गंगा पार जो घना जंगल नज़र आ रहा है उसके बायीं ओर है चिल्ला रेस्ट हाउस ।
और इस तरह पूरा हुआ हमारा हर की पौड़ी पर गंगा दर्शन ।
अब आप भी घर बैठे आनंद लीजिये गंगा मैया की आरती का ।

